Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Amit Jain and Soni Jain v. Sunshine Infraheights Private Limited
Complaint No. NCR169/04/118683/2024
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2025-09-03
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय गौतमबुद्धनगर पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 20:6 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थित -: डा० दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम do शिकायत संख्या | यूनिट | जमा धनराशि vo | आवंटन पत्र | वांछित ष संख्या की तिथि गल्राठ्आ्र०का86588/2024 | अमित जैन व 0-002 | रु0 6,0,000/ | १0.03.2047 | यूनिट का सोनी जैन कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। बनाम सनसाइन इन्फ्राहाईट्स प्रा.लि. शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु शिकायत संस्थित की गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्तागण का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना SILVER LUNE URBE मेरठ में Unit No D-02 बुक करायी गयी थी। आवंटित यूनिट की कुल कीमत wo 4t80/ है जिसके एवज में शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी को धनराशि Go 6,0,000,//- का भुगतान किया गया | शिकायतकर्तागण द्वारा शिकायत पृष्ठ पर उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी की परियोजना 06 वर्ष से अधिक विलम्बित है। विपक्षी की परियोजना में निर्माण कार्य बंद है। विपक्षी ओ.सी /सी.सी अथवा एन.ओ.सी प्राप्त करने में असफल रहा है। अतः शिकायतकर्तागण द्वारा यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्तागण द्वारा शिकायत के समर्थन में आवेदन फार्म, आवंटन पत्र व चेको की छाया प्रतियां दाखिल की गई है। शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् है:- क्रम विवरण | दिनांक भुगतान की गई धनराशि [संख्या (रु0) ' विपक्षी द्वारा जारी चेक संख्या 000005 40.04.2047 रु0 2,20,000 /
चेक संख्या 24295 40.04.2047 रु0 2,40,000/ चेक संख्या 946463 40.0.207 BO 4,50,000 / कुल योग : रु0 6,40,000 / विपक्षी को लिखित जवाब दाखिल करने हेतु पर्याप्त अवसर प्रदान किये गये परन्तु विपक्षी द्वारा लिखित जवाब दाखिल नहीं किया गया जिस कारण पीठ द्वारा दिनांक 02.06.2025 को विपक्षी का लिखित जवाब दाखिल करने का अवसर समाप्त करते हुए विपक्षी को मौखिक अथवा लिखित बहस प्रस्तुत करने का भी एक अवसर प्रदान किया गया परन्तु विपक्षी नियत तिथि पर अनुपस्थित रहे जिस कारण विपक्षी का बहस करने का अवसर समाप्त करते हुए पत्रावली विपक्षी के विरूद्ध एकपक्षीय बहस हेतु अग्रसारित करते हुए शिकायतकर्तागण की एकपक्षीय बहस सुनी गयी। शिकायतकर्तागण द्वारा दाखिल प्रपत्रों के आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किया जाता हैं :- 4. क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ? निस्तारण प्रश्न संख्या A: प्रश्न We इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? शिकायतकर्तागण का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में प्लॉट बुक करायी गयी थी। आवंटित युनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य दिनांक 40.03.2047 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ परन्तु आवंटन पत्र में कब्जा दिये जाने की तिथि अंकित नहीं है। ऐसी स्थिति में माननीय उच्चतम न्यायालय की सिविल अपील संख्या 3533--3534 / 2047 M/s. Fortune Infrastructure (now known as M/s. Hicon Infrastructure) & ANR. Vs. Trevor D'lima & Ors ¥ स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि-:
Moreover, a person cannot be made to wait indefinitely for the possession of the flats allotted to them and they are entitled to seek the refund of the amount paid by them, along with compensation. Although we are aware of the fact that when there was no delivery period stipulated in the agreement, a reasonable time has to be taken into consideration. In the facts and circumstances of this case, a time period of 3 years would have been reasonable for completion of the contract i.e., the possession was required to be given by last 2 a quarter of 204, Further there is no dispute as to the fact that until now there is no redevelopment of the property. Hence, in view of the above discussion, which draw us to an irresistible conclusion that there is deficiency of service on the part of the appellants and accordingly the issue is answered.
उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार फ्लैट के कब्जे हेतु किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय तक प्रतीक्षा नहीं करायी जा सकती है, जहाँ अनुबन्ध में कब्जे की तिथि नहीं दी गयी है वहाँ एक रीज़नेवल समयावधि 3 वर्ष कब्जे हेतु अवधारित की जानी होगी। प्रस्तुत शिकायत में उभयपक्ष के मध्य दिनांक 40.03.2047 को आवंटन पत्र निष्पादित हुए परन्तु आवंटन पत्र में कब्जा दिये जाने की तिथि अंकित नहीं है। ऐसी स्थिति में उपरोक्त माननीय उच्चतम न्यायालय की न्याय नजीरों के अनुसार कब्जा देने की अवधि 3 वर्ष मानी गयी है | इस प्रकार आवंटन पत्र की तिथि 40.03.2047 से 3 वर्ष अर्थात मार्च 2020 तक विपक्षी द्वारा आवंटित यूनिट का कब्जा उपलब्ध कराया जाना था परन्तु अभी तक विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण को यूनिट का कब्जा उपलब्ध नहीं कराया गया है।
पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के अवलोकन से विदित है कि शिकायतकर्तागण को अनुबंधानुसार प्लॉट का कब्जा अनुबंध की तिथि 40.03.2047 से 03 वर्ष अर्थात मार्च 2020 में प्राप्त होना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्तागण को प्लॉट का कब्जा नहीं प्राप्त हुआ है। विपक्षी की ओर से न तो लिखित कथन और न ही ओ.सी /सी. सी या वांछित अनापत्ति प्रमाण पत्र की प्रति उपलब्ध कराई गई है। इससे स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना अभी पूर्ण नहीं है और न ही विपक्षी को ओ.सी /सी.सी प्राप्त हुआ है। फिर भी शिकायतकर्तागण द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। ऐसी स्थिति में परियोजना विलम्बित होने के बावजूद भी यदि आवंटी परियोजना में बना रहना चाहता है तो उक्त के सम्बन्ध में रेश अधिनियम की धारा i3 (!)बी में यह प्रावधान दिया गया है कि परियोजना विलम्बित होने के बावजूद भी यदि आवंटी परियोजना में बना रहना चाहता है तो वह कब्जा प्राप्त होने तक विलम्बित अवधि का ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में 3 ii ac एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 के प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है कि :- ” प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर एणग्रीमेंट में कब्जा देने की आश्वासित तिथि (Promised Date) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ पजेशन की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवधि माना जाएगा।”
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या: 43029 / 4985, “M.C. Mehta Versus Union of India” में पारित आदेश, दिनांक 04-44-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है:-- “With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place.” इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: 43029 // 4985 में पारित आदेश दिनांक 09-42-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है:- “in the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:-
"42, That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQ| category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more. "” Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed. ” माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक o4-:-20I9 से दिनांक 44-02-2020 तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक 09-42-209 में पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च 4 = Ss sb iad
न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04-44-2049 से दिनांक 09-42-2049) एवं 33 दिन(66«2) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक Ura 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवधि विपक्षी के नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी को उत्तरदायी ठहराना न््यायोचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि उपर्युक्त वर्णित दोनो अवधियों के लिए परियोजना को पूर्ण होने में हुए विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल-35 दिन+ 33 दिन अर्थात् 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त aifds—i9 महामारी के सम्बंध में Goto रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनाक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्तागण से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी कोविड-49 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त सिविल अपील to 6649-50 / 2048 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"'में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः-
"the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206, The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " क्र ि्न्नननानाा ऑल उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्तागण विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ sara वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
"Section | 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ.प्र. रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व Ga के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.40.208 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा
विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर g2(ii) ¥ प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination «ell notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+I5 fer की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्तागण की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी |४८7.२+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2०)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। उपरोक्त तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्तागण यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज पाने के अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न Wert निस्तारित किया जाता है। है। उपरोक्त प्रश्न का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता आदेश
विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश पोर्टल पर अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के भीतर शिकायतकर्तागण से अवशेष धनराशि प्राप्त कर, शिकायतकर्तागण की यूनिट आवंटन पत्र/अनुबंध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराएं। विपक्षी शिकायतकर्तागण को दिनांक 04.04.2020 से ओ.सी/सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि BO 6,40,000,// पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्तागण को वापस की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्तागण को वापस की जायेगी। निस्तारण प्रश्न संख्या 4 के अनुसार फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए (माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 43029,//985 के अनुसार ) 68 दिन तथा दिनांक 25.03.2020 Ej — = से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्तागण का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा।
विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 20:6 की धारा 2(2४)0) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर add के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्तागण द्वारा भी Mcie+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन 45 दिन में नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्तागण रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। ie fees S288, 2025, (डा०दीपक स्वरूप सक्सेना) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर