Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Prithipal Singh Sikka v. ATS Grand Realtors Private Limited
Complaint No. NCR145/10/123583/2024
- Decision date
- 2026-05-12
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 3 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
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Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थित:- डा0 दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम | शिकायत संख्या ae | धनराशि vo | एग्रीमेंट फार | कब्जा दिये | वांछित ¥o #0 सेल की (जाने की | अनुतोष तिथि तिथि | . | ट९450723583/2024 | पृथीपाल सिंह i रु0 40,59,896 / | 26.07.20I9 | ॥ दिसम्बर | यूनिट का सिक्का 2023 कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। बनाम एटीएस ग्राण्ड रियलटर्स प्रा. लि. शिकायतकर्ता द्वारा विषक्षी के विरूद्ध-यूनिड>कौ*कब्जा व विलम्बित अवधि का
ब्याज दिलाये जाने हेतु aE Rena eR की”गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना ATS Khyber Range 4oUfe We Groin gH as गई, जिसके सापेक्ष शिकायततकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि Go 40,59,896 / का भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा लिखित कथन दाखिल करते हुए यह उल्लिखित किया गया है कि शिकायततकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना ATS Khyber Range में यूनिट संख्या जीएफ-04ए बुक करायी गयी थी। आवंटित यूनिट की कुल कीमत wo 44,74,250,/ जो कि 80 :20 पेमेंट प्लान के अन्तर्गत बुक करायी गयी थी। शिकायतकर्ता द्वारा आवंटित यूनिट की कुल कीमत wo 40,74,250/ के सापेक्ष wo 35,77,000/ का भुगतान किया गया है। उभयपक्षों के मध्य दिनांक 07.09.2020 को सेप्लीमेंट्री एग्रीमेंट निष्पादित हुआ। विपक्षी द्वारा अनुबंध के क्लाज 7.4 के अनुसार निर्धारित अवधि 34.42.2023 तक यूनिट का कब्जा दिया जाना था परन्तु विपक्षी निर्धारित अवधि में कब्जा देने में असफल रहा है। शिकायतकर्ता रेरा अधिनियम की धारा 48(3) के तहत विलम्बित अवधि का ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित किया गया है कि उनके द्वारा पेमेंट प्लान के अनुसार 80 प्रतिशत धनराशि की अदायगी विपक्षी को की जा चुकी है। अत: शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के समर्थन में एग्रीमेंट फॉर सेल व कस्टमर लेजर की छाया प्रतियाँ दाखिल की गयी हैं। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् है:- val | = | दिनांक भुगतान की गई धनराशि | संख्या (रु0 4 विपक्षी द्वारा जारी : | कस्टमर लेजर 07.44.2025 रु0 40,59,896 / |
विपक्षी के अधिवक्ता दिनांक 05.42.2024 को पीठ के समक्ष उपस्थित हुए। विपक्षी को लिखित जवाब दाखिल किये जाने हेतु पर्याप्त अवसर दिये गये परन्तु विपक्षी द्वारा प्रकरण में लिखित जवाब दाखिल नहीं किया गया जिस कारण पीठ द्वारा दिनांक 43.08.2025 को, विपक्षी का#लिखित जवाब दाखिल करने का अवसर समाप्त करते हुए विपक्षी <को७लिखिंत«बहसे«दांखिल करने का समय प्रदान किया उक्त के पश्चात दिल्ञांक॥49.44.2025..को...शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया कि विपक्षी द्वारा उनकी यूनिट दिनांक 07.44.2025 को निरस्त कर दी गयी है जिस कारण से पीठ द्वारा पुनः विपक्षी को लिखित बहस दाखिल करने का अवसर प्रदान किया गया परन्तु विपक्षी द्वारा प्रकरण में कोई लिखित बहस दाखिल नहीं की गयी जिस कारण से पीठ द्वारा दिनांक 46.03.2026 को विपक्षी का लिखित बहस दाखिल करने का अवसर समाप्त करते हुए विपक्षी की मौखिक बहस सुनी गयी। विपक्षी द्वारा दिनांक 6.03.2026 को मौखिक बहस प्रस्तुत करते हुए तर्क किया गया कि उनके द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त कर vad यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किये जा चुके है और अब पीठ द्वारा पारित आदेश के क्रम में यूनिट पर यथास्थिति बनायी हुई है। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा कथन किया गया कि शिकायतकर्ता द्वारा वापस लौटाये गये पैसे का उल्लेख उन्हें अपने एकाउंट में नहीं मिला है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत प्रपत्रों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न विरचित किये गयें :-- 4. क्या विपक्षी द्वारा यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नही? 2. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? 3. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ?
निस्तारण प्रश्न संख्या oes संख्या se आशय का विरचित किया गया है कि क्या विपक्षी द्वारा यूनिट को निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नही? इसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से दिनांक 6.03.2026 को मौखिक बहस प्रस्तुत करते हुए यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि उनके द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त कर उक्त पर तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किये जा चुके है। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि शिक़ायतकर्तो द्वारा जो धनराशि वापस उनके एकाउंट में लौटायी गयी है.वह ee प्रदर्शित नहीं हो ene | शिकायतकर्ता द्वारा ae निरस्तीकरण के सम्बन्ध में प्रार्थना पत्र दाखिल किया गया है जिसमें यह उल्लिखित है'कि उनके द्वारा अक्टूबर 2024 में पीठ के समक्ष शिकायत योजित की गयी तथा विपक्षी द्वारा वाद पीठ के समक्ष लम्बित रहने के दौरान दिनांक 07.44.2025 को मनमाने तरीके से शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त कर दी गयी है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी द्वारा जारी यूनिट निरस्तीकरण पत्र दिनांक 07.4.2025 को निरस्त किये जाने का अनुरोध किया गया है।
पत्रावली के अवलोकन से विदित है कि सेप्लीमेंट्री एग्रीमेंट दिनांक 26.07. 2049 से स्पष्ट है कि आवंटित यूनिट की कुल कीमत धनराशि wo 44,77,250 / है जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा रु० 40,59,896,/का भुगतान किया गया है जो कि यूनिट की कुल कीमत का लगभग 92 प्रतिशत से अधिक है। विपक्षी द्वारा अनुबंध पत्र के अनुसार परियोजना पूर्ण करते हुए शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा दिसम्बर 2023 में दिया जाना था। विपक्षी द्वारा वाद पीठ के समक्ष लम्बित रहने के दौरान दिनांक 07.44.2025 को शिकायतकर्ता की यूनिट अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट निरस्त होने व विपक्षी द्वारा 3 —=—=S यूनिट निरस्त करते हुए धनराशि vo 28,22,877/शिकायतकर्ता के खाते में स्थानान्तारित किये जाने का साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है। इसके अतिरिक्त यह भी उल्लेखनीय है कि शिकायतकर्ता द्वारा पुनः जो धनराशि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता के खाते में स्थानान्तारित की गयी है वह धनराशि वापस विपक्षी के खाते में दिनांक 40.42.2025 को स्थानान्तारित कर दी गयी है जिसका बैंक द्वारा जारी प्रमाण पत्र के रूप में साक्ष्य शिकायतकर्ता द्वारा पत्रावली पर दाखिल किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का भुगतान न किये जाने के सम्बन्ध में भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) (विक्रय / पट्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 की धारा 9.3 (2) में यह प्राविधानित है कि — धारा 9.3
ii. In case of Default by Allottee under the condition listed above continues for a period beyond 3 (three) consecutive months after notice from the:Promoter in this regard, the Promoter may:cancel the.allotment,of the [Apartment/Plot]\in-favour of the Allottee and refund the money paid to him “by the Allottee by deducting the booking amount andj'the interest liabilities and this Agreement shall thereupon stand terminated. The Promoter must..ndtbe. in default..totake this benefit; Provided that the Promoter shall intimate the Allottee about such termination at least thirty days prior to such termination. पत्रावली के अवलोकन से स्पष्ट है कि उभयपक्ष के मध्य दिनांक 26.07.209 को सेप्लीमेंट्री एग्रीमेंट निष्पादित किया गया था जिसके अनुसार यूनिट का कब्जा परियोजना पूर्ण कर दिसम्बर 2023 तक उपलब्ध कराया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु Hagen लिंक पेमेंट प्लान का चयन किया गया था जिसके अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा चरणबद्ध रूप से देय धनराशि का भुगतान करते हुए 80 प्रतिशत धनराशि का भुगतान ऑफर ऑफ पजेशन से पूर्व व 20 प्रतिशत धनराशि का भुगतान ऑफर ऑफ पजेशन के समय किया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा पेमेंट प्लान के अनुसार यूनिट की कुल कीमत WO 44,7,250,/ के सापेक्ष WO 40,59,896 ,/ का भुगतान किया जा चुका है जो कि यूनिट की कुल कीमत का लगभग 92 प्रतिशत से अधिक है। विपक्षी द्वारा ——— ज्ज्क- 4
लिखित बहस में यह तथ्य अंकित किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा समय से देय धनराशि का भुगतान न किये जाने के कारण उनके द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त की गयी है। ऐसी स्थिति में जब शिकायतकर्ता 92 प्रतिशत धनराशि का भुगतान विपक्षी को कर चुके है तब विपक्षी द्वारा किया गया यह तर्क कि शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का भुगतान समय से नहीं किया गया है संधारणीय नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि विपक्षी द्वारा निर्धारित समयावधि में परियोजना पूर्ण नही की गयी है जिस कारण से विपक्षी अपने दोष का लाभ नही ले सकता है। यहाँ यह भी उल्लिखित किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्गगत शिकायत दिनांक 03.0.2024 को योजित की गयी थी तथा विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट पीठ के समक्ष विचारणीय रहने के दौरान दिनांक 07.4.2025 को निरस्त की गयी है तथा विपक्षी द्वारा सुनवाई दिनांक 46.03.2026 को मौखिक रूप से कथन किया गया कि उनके द्वारा प्रश्नगत यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित कर दिये गये है परन्तु»विपक्षी पर्याप्त अवसर दिये जाने के पश्चात भी उक्त के सम्बन्ध में कोई.पींठःके समक्ष 'प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे। इस सम्बन्ध में माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा अपील संख्या 485,/2023 अलका ढींगरा एव 'तोशन ढींगरा बनाम्त गौरसन््स रियलटेक प्रा.लि. में दिनांक 48.02.2005 को पारित आदेश का उल्लेख कियाँ जानी महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा Gat आदेश के WAX 28 व 29 में यह उल्लिखित किया गया है कि :-
28- It was held that lis pendens commences at the stage of institution of the petition and not at the stage when the notice is issued by the court. Thus, taking Review Petition pending, though defective, it was held that Section 52 of the Transfer of Property Act would apply to the third-party purchases, once the sale was executed after the review petition was instituted before the Court. In other words, the transfer of property that is made during the pendency of the suit/proceedings is subject to the final decision of the litigation. Paragraph 47 and 49 is extracted: “47, ॥ short, the doctrine of lis pendens that Section 52 of the Transfer of Property Act encapsulates, bars the transfer of a suit property during the pendency of litigation. The only exception to the principle is when it is transferred under the authority of the court and on terms imposed by it. Where one of the parties to the suit transfers the suit property (or part of it) to a third-party, the latter is bound by the result of the proceedings even if he did not have notice of the suit or proceedings...” “
49. The purpose of lis pendens is to ensure that the process of the court is not subverted and rendered infructuous. In the absence of the doctrine of lis pendens, a defendant could defeat the purpose of the suit by alienating the suit property. This purpose of the provision is clearly elucidated in the explanation clause to Section 52 which defines “pendency”. Amending Act 20:0f.929 substituted the word “pendency’sin place of “active prosecution”. The amending Act alsosincluded the Explanation defining the expression “pendency,of. suit onjproceeding”, “pendency” is defined to commence from thé “date of institution” until the “disposal”. The argument of the respondents that the doctrine of lis pendens does not apply because the petition for review was lying in the registry in a defective state cannot be accepted. The review proceedings were “instituted” within the period of limitation of thirty days. The doctrine of lis pendens kicks in at the stage of “institution” and not at the stage when notice is issued by this Court. Thus, Section 52 of the Transfer of Property Act would apply to the third-party purchases once the sale was executed after the review petition was instituted before this Court. Any transfer that is made during the pendency is subject to the final result of litigation.” [vide M/s. Siddamsetty Infra (supra)] pL rc It is categorical and specific case of respondent that the unit came to be deemed cancelled on 02.09.209 during 6 — =
pendency of the complaint. Further, during pendency of the complaint, third party right was created by the respondent deliberately and willfully. Therefore, sale deed executed in favour of third party by the respondent is in the teeth of the principle of lis pendens. Sale deed in favour of third party would be subject to the outcome of this appeal, which is continuation of the complaint. The allotment/sale deed of the unit made to a third party during subsistence of the agreement and pendency of the complaint would be hit by Section 22(4)(h) and Section (5) of Act, 2026. BRIT न्याय नजीर के अवलोकन से स्पष्ट है वाद पीठ के समक्ष विचाराधीन होने के दौरान शिकायतकर्ता की शिकायत रेरा अधिनियम की धारा 44 (4)(एच) तथा धारा 44(5) में उल्लिखित प्राविधान उभयपक्षों पर बाध्य है तथा पीठ द्वारा शिकायत का निस्तारण करते समय जो निर्णय दिया जाएगा वह निर्णय उभयपक्षों के साथ-साथ तृतीय पक्ष पर भी बाध्यंकारी होगा।
उपरोक्त वर्णित cede अवलोकन-सै ae विदित होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्नगत यूनिट के सापेक्ष यूनिट की कीमत की लगभग 92 प्रतिशत धनराशि का भुगतान किया गया है तथा विपक्षी..द्वारा बिना किसी आधार के तथा उपरोक्त उल्लिखित प्राविधानों के विपरीत शिकायतकर्ता की यूनिट वर्तमान शिकायत पीठ में लम्बित रहने के दौरान निरस्त की गयी है जोकि विधि सम्मत तथा उपरोक्त न्याय नजीर एवं प्राविधानों के विपरीत है। अतः विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक नहीं है। तदनुसार प्रश्न संख्या 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या-2 प्रश्न संख्या-2 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने के कारण विलम्बित हुई? फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 के प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है re ' प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर एग्रीमेंट में कब्जा देने की आश्वासित तिथि (Promised Date) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय 7 Ss अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ पजेशन की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवधि माना STAT |” पत्रावली पर दाखिल बिल्डर बायर एग्रीमेंट दिनांकित 04.40.2045 के प्रस्तर 244 में फोर्स मैज्योर के सम्बन्ध में निम्नलिखित उल्लेख है कि :-
The completion date is subject to force majeure conditions and/or subject to any other reasons beyond the control of the Developer, No claim by way of damages/compensation shall lie against the developer in case of delay in handing over the possession on account of any of the aforesaid reasons and the developer shall be entitled to a reasonable extension of time for the delivery of possession of the said Flat/Villa to the Allottee माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या: 43029/985, “MC. Mehta Versus Union of India” में पारित आदेश, दिनांक 04—4—209 में निम्नलिखित निर्देश दिये है:- “With respect to demolition,and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well assthe municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place.” इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: 73029 /985 में पारित आदेश दिनांक 09-42-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “in the affidavit dated 05.2.2029, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:-
"42, That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities 8 — Se during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI| category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist uw in severe+/emergency category for 48 hours or more. Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.” माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक 09-42-20॥9 में पूर्ण
प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04-74-20:9 से दिनांक 09-42-2049) एवं 33 दिन(66+2) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक Ua 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवधि विपक्षी के नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी aj, sera ser न््यायोचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकालना उचित«होगा: कि उपर्युक्त वर्णित तीनों अवधियों के लिए परियोजना को पूर्ण होने Fey विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल- 35 दिन#«33. दिन .अर्थात्<68 ,दिन. निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकारी है। उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी कोविड-49 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। तद्नुसार प्रश्न संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 3-: प्रश्न संख्या-3 इस आशय का विरचित किया गया है कि an शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की gar दर होगी? पत्रावली पर उपलब्ध सेप्लीमेन्ट्री एग्रीमेंट दिनांक 26.07.209 के अनुसार शिकायतकर्ता को दिसम्बर 2023 तक यूनिट का कब्जा प्राप्त होना था परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के ee अनुसार यह भी स्पष्ट है कि विपक्षी को गाजियाबाद विकास प्राधिकरण द्वारा दिनांक 06.08.2025 को पूर्णता प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है जो पत्रावली पर उपलब्ध है।
इस प्रकार विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 4.5 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित है। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील Ho 6649-50 /20:8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल''में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:- "the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not haye.any further grievance after April 206 with respect to delay in*handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to, beallowed to reap the benefits of her own delay, in taking possession." -. j उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी*बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। _ जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
"Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " Ss 0 अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.:0.20I8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9.2(॥) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable.to refund the entire money paid by the Allottee under anywhead whatsoever towards the purchase of the apartment, along-with interest»at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending» Rate) on home loan of State Bank of India +7% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:" यही दर आवंटियों.«के-द्वौरा-डिफॉल्ड- की-.स्थित्रि में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+Ufegrt की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2०)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। अत: vad तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज प्राप्त करने के अधिकारी है। तद्नुसार प्रश्न संख्या-3 faa किया जाता है।
उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता है। आदेश _—— Sj 42 विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश अपलोड होने की तिथि से 45 दिन में शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट को पुर्नस्थापित करते हुए, शिकायतकर्ता से यूनिट के सापेक्ष बिल्डर बायर एग्रीमेंट के अनुसार अवशेष देय धनराशि प्राप्त कर ओ.सी,/सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक 04.0.2024 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि BO 40,59,896 / पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें| ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। निस्तारण प्रश्न संख्या 2 के अनुसार फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए 68 दिन तथा दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेग़ी.।.साँथ हीः ae ,शिकायुतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भीहढस अवधि का ब्याज़ देय न होगा।
विपक्षी को यह निर्देशित किया. ज़ांता है कि. रेरा. अधिनियम, 20:6 की धारा 2(2०)())के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी MCLRH प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा।| यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। प्रश्नगत शिकायत में इस पीठ द्वारा यथास्थिति बनाये रखने हेतु पारित आदेश एवं WHA आदेश को ACTA समाप्त किया जाता है। इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2076 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। 42 ——as, विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। eosin YE SS 226 (Sto दीपक स्वरूप TART) सदस्य उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण 43