Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Abhinav Maheshwari v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. NCR145/09/82195/2021
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2022-09-13
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (for the complainant)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू--सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04ए आदेश अन्तर्गत gRI-34 श्री राजीव कुमार, माननीय अध्यक्ष शिकायत संख्या -— NCRI45/09/8295/202 अभिनव महेश्वरी बनाम उप्पल चड्ढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध पक्षकारों के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराते हुए कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संपेक्ष में शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL Sector-7 Plots 4 प्लॉट संख्या-350 SQ YDS बुक किया गया था, जिसकी कुल कीमत 26,25,000,/- रूपये है, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा 7,87,500/— रूपये की धनराशि का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को अनुबन्ध के अनुसार प्रश्नगत प्लॉट का कब्जा दिनांक 22.08.2006 तक दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा i5 वर्ष उपरान्त अभी भी प्रश्नगत प्लॉट का कब्जा नहीं दिया गया है और न ही विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना से सम्बन्धित कोई वांछित प्रमाण पत्र अथवा ओ.सी. /सी.सी. प्राप्त किया गया है। विपक्षी द्वारा पक्षकारों के मध्य अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने तथा पक्षकारों के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में रजिस्ट्रेशन फार्म की प्रति, जमा धनराशि की रसीदें, लिखित बहस दिनांकित 25.06.2022 की प्रति, माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेशों की प्रतियाँ, इसी पीठ द्वारा पारित आदेश की प्रतियाँ दाखिल की गयी हैं। aN 2
विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा “एक्सप्रेशन site sere” के तहत 7,87,500,/- रूपये की धनराशि का भुगतान करते हुए प्रश्नगत प्लॉट बुक किया गया, जिसमें ले-आऊट unforeseen circumstances के कारणों से परिवर्तित कर दिया गया। शिकायतकर्ता को पुनः वही प्लॉट आवंटित किया गया। प्लॉट का कुल मूल्य (बिना कर) 26,50,000/- रूपये है और शिकायतकर्ता द्वारा 7,87,500,/- रूपये की धनराशि का भुगतान किया गया है। विपक्षी द्वारा माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या-273 /2047 “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राएलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“ में पारित निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि रेरा के प्राविधान प्रोस्पेक्टिव हैं, परन्तु रेरा अधिनियम की धारा-4(2)()(८) के अनुसार वे कब्जा प्रदान किये जाने की एक नयी समय-सीमाः निर्धारित कर सकते हैं और वह रेरा अधिनियम के अन्तर्गत “पीनल कॉन्सीक्वेसिज़” का भागी न होगा। परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण विलम्बित हुई, जो कि उनके नियंत्रण में नहीं था। स्थानीय किसानों द्वारा धरना प्रदर्शन के कारण कार्य कराये जाने में बाघा उत्पन्न By! दिल्ली NCR में बढ़ते हुए प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अक्टूबर 2049 से जनवरी 2020 तक निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गयी थी। कोविड-49 के कारण भी परियोजना स्थल पर मार्च 2020 से सितम्बर 2020 तक किसी प्रकार का निर्माण नहीं हो सका। इसके अतिरिक्त सांय 6 बजे से प्रात: 6 बजे तक के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गयी थी, जिसके कारण भी परियोजना में निर्माण कार्य विलम्बित हुआ है। बिल्डर बायर Wire के प्रावधानों के अनुसार, जो इस प्राधिकरण का विषय नहीं है, शिकायतकर्ता को Arbitration का आह्वान करना होगा या शिकायतों के निवारण के लिए अन्य फोरम में जाना होगा। विपक्षी का यह भी कहना है कि पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है। TRO ऑफ इन्ट्रेस्ट के प्रस्तर-(6) का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वह शिकायतकर्ता को प्रश्नगत प्लॉट का कब्जा देने में सक्षम नहीं है, जिस कारण वह शिकायतकर्ता की जमा धनराशि जून, 2022 से 2 से 3 किश्तों में वापिस करने हेतु तैयार हैं उपरोक्त तथ्यों के आधार पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को अपनी जमा धनराशि प्राप्त करने हेतु, निर्देशित किये जाने का अनुरोध किया गया है।
विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में एक्सप्रेशन ऑफ इन्ट्रेस्ट दिनांकित 49.03.2006 की प्रति, रजिस्ट्रेशन फार्म फॉर एक्सप्रेशन ऑफ ese की प्रति, जमा धनराशि की रसीदों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किये जाते हैं >> 4... क्या परियोजना के रेरा में पंजीकरण से पूर्व उत्पन्न हुई शिकायतें रेरा के क्षेत्राधिकार से बाहर हैं तथा क्या रेरा में दी समय-सीमा के बाद ही विलम्ब की गणना की जायेगी ? 2... क्या force majeure events यथा मा. न्यायालय के स्थगनादेश, मा. एन.जी.टी. आदि के निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध आदि के कारण विपक्षी की परियोजना विलम्बित हुई? यदि हाँ तो प्रभाव? 3. क्या अनुबन्ध में आरबिट्रैशन aif होने के कारण वाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार इस पीठ को नही है? 4. क्या बिल्डर के प्रस्ताव पर शिकायतकर्ता को जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? 5. क्या विपक्षी द्वारा रेरा के प्राविधान के अर्न्तगत प्लॉट के कुल कीमत की 40 प्रतिशत धनराशि प्राप्त होने के उपरान्त उभय पक्ष के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराया गया और क्या उभय पक्ष के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराया जाना अनिवार्य है ? 6. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की दर क्या होगी ? निस्तारण बिन्दु संख्या-4 बिन्दु deri इस तथ्य पर विचरित है कि क्या परियोजना के रेरा में पंजीकरण से पूर्व उत्पन्न हुई शिकायतें रेरा के क्षेत्राधिकार से बाहर हैं तथा क्या रेरा में दी समय-सीमा के बाद ही विलम्ब की गणना की जायेगी ?
इस सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-6745--6749 // 2024 “मैसर्स न्यूटेक प्रोमोटर्स एंड डेवलपर्स wo feo बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य” में दिये गये निर्णय में we रूप से उल्लिखित किया गया है कि :- 54. From the scheme of the Act 206, its application is retroactive in character and it can safely be observed that the projects already completed or to which the completion certificate has been granted are not under its fold and therefore, vested or accrued rights, if any, in no manner are affected. At the same time, it will apply after getting Ly the on-going projects and future projects registered under Section 3: to prospectively follow the mandate of the Act 206."
* उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा अधिनियम लागू होने से पूर्व जो भी अनुबन्ध हस्ताक्षरित हुए या अधिनियम लागू होने से पूर्व की परियोजनाओं, जहाँ पर पूर्णता प्रमाण पत्र सम्प्रवर्तक द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वहाँ पर अधिनियम का प्रवर्तन पूर्वव्यापी प्रभाव रहेगा। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन गोईंग” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते हैं। उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आर्ब्जेवेशन से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि रेरा पंजीकरण से पूर्व प्रोमोटर एवं आवंटी के मध्य अनुबन्ध निष्पादित हुए हैं, परन्तु यदि परियोजना को रेरा में पंजीकरण कराया जाता है, तो रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। विपक्षी द्वारा venta परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया है। अतः वर्णित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना वर्तमान में “ऑनगोइईंग प्रोजेक्ट” की श्रेणी में आती है। ऐसी दशा में रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। इसके अतिरिक्त Re याचिका संख्या-2737/2047 “नीलकमल Raced सबअर्बन tio fo बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” के उद्धरत प्रकरण में माननीय बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा कहा गया है कि :-
"The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale." उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के प्रस्तर का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता और किसी आवंटी विशेष के प्रकरण में विलम्ब की गणना बी.बी.ए. के प्राविधानानुसार गणना होगी | रेरा पंजीकरण के समय दी गई नई समय-सीमा केवल रेरा अधिनियम के अधीन “पीनल कॉन्सीक्वेसिज” से ही बचा सकता है। स्पष्टतया विलम्ब की गणना आवंटन ,/अनुबन्ध के अधीन होगी एवं वह प्राविधान रेरा में दी गई P तिथि से “ओवररिटिन” नहीं होगी। cage बिन्दु संख्या-4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2 बिन्दु संख्या-2 इस आशय से विचरित किया गया है कि क्या force majeure events यथा मा. न्यायालय के स्थगनादेश, मा. एन.जी.टी. आदि के निर्माण कार्य पर प्रतिबन्च आदि के कारण विपक्षी की परियोजना विलम्बित हुई? यदि हाँ तो प्रभाव? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। '
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि स्थानीय किसानों द्वारा धरना प्रदर्शन के कारण कार्यो में बाधा उत्पन्न हुई, माननीय न्यायालयों के भूमि अधिग्रहण के Vr आदेश के कारण परियोजना विलम्बित हुई। दिल्ली NCR में बढ़ते हुए प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अक्टूबर 2049 से जनवरी 2020 तक निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गयी थी। इसके अतिरिक्त ua 6 बजे से प्रात: 6 बजे तक के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी गयी थी, जिसके कारण भी परियोजना में निर्माण कार्य विलम्बित हुआ है। कोविड-49 के कारण भी परियोजना स्थल पर मार्च 2020 से सितम्बर 2020 तक किसी प्रकार का निर्माण नहीं हो सका। 5. No. Reason Time Period I Stay on project by Hon'ble January 202-January 207 Supreme Court of India 2 As per NGT order Ban on| November 20I7- January 208 Construction Activity in Delhi NCR to curb pollution. 3 As per NGT order Ban on} October 20I8- December 20I8 Construction Activity in Delhi NCR to curb pollution. 4 As per NGT order Ban on October 209- January 2020 Construction Activity in Delhi NCR to curb pollution. लि 5 Ban on Construction due to the | March 2020-September 2020 Pandemic (Covid-9) माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गये स्थगनादेश सम्बन्धी अपने दावे के समर्थन में विपक्षी द्वारा कोई साक्ष्य/अभिलेख प्रस्तुत नहीं किये गये हैं। अतः यह आधार ग्राह्य नहीं है। प्रकरण में उभय पक्ष के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है, परन्तु इसी परियोजना के अन्य आवंटियों के पक्ष में निष्पादित अनुबन्ध के weae2t में फोर्स मैज्योर के सम्बन्ध में निम्नलिखित उल्लिखित रहता है :-
2. FORCE MAJEURE is subject to force majeure clause which inter-alia include delay on account of non-availability of steel, cement or any other materials for developing the area and implementation of the Scheme, or water supply or electric power or slow down strike or due to a dispute with the construction agency employed by the DEVELOPER, civil commotion or by reason of war, or enemy action or earthquake or any act of God, delay in certain decisions/clearances from statutory body(ies), or if non- delivery of possession is as a result of any notice, order, rules or notification of the Government and /or any other public or Compatant Authority or for any other reason(s) beyond the contro! of the DEVELOPER and for any of the aforesaid evet, the DEVELOPER shall be entitled to a reasonable corresponding extension of the time of delivery of possession of the said 'Plot' on account of force majeure circumatances and in such eventually the ALLOTTEE(S) will not claim any amount of money by way of refund/damages/compensation/interest, etc. from the DEVELOPER. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-43029 / 4985 “एम. सी. मेहता बनाम भारत सरकार“ में पारित आदेश दिनांक 04.44.2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है हर >
With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place. इसके अतिरिक्त उपरोक्त सिविल अपील संख्या-43029 / 4985 में पारित आदेश दिनांक 09.42.2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है :- In the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:-
"{2. That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more." Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed. pr 8
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक 04.44.2009 से दिनांक 44.02.2020) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश दिनांक 09.2.209 में पूर्ण प्रतिबन्ध को Berd हुए आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04.44.2049 से दिनांक 09.42.2049) एवं 33 दिन 65652) (दिनांक 40.42.2049 से दिनांक 44.02.2020 तक UT 6 बजे से सुबह 6 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। विपक्षी ऐसी दशा में कुल 35+33 = 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण आंशिक रूप से लाभ पाने का अधिकारी है। समस्त सुसंगत तथ्यों पर feared उ0प्र0 wr अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनाक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकाय॑तकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। तद्नुसार बिन्दु संख्या-2 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-3 विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आरबिट्रेशन का क्लाज है, जिस कारण शिकायतकर्तागण व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बिट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है।
इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा “Aad एमआर एम.जी.एफ. लैन्ड लिमिटेड बनाम आफताब सिंह" 208 SCC Online SC 277 में अभिनिर्धारित किया गया है कि कुछ विवादों का निराकरण आरबिट्रेटर द्वारा आरबिट्रेशन अनुबन्ध के पश्चात् भी नहीं की जा सकती है। विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आरबिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये है और इसका क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को PRaRa करने के लिए आरबिट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि Di भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 20i6 की धारा 79, आरबिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। माननीय एन.सी.डी.आर.सी. ने “ए.अय्यास्वामी बनाम पारमाशिवम एवं अन्य“, (206) 0 SCC 386 में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि यही सिद्धान्त, रियल एस्टेट अधिनियम के तहत उक्त मामलों में भी लागू होता है, क्योंकि यह अधिनियम गृहकेताओं एवं fed के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आरबिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु संख्या-3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-4 निस्तारण बिन्दु संख्या-4 इस आशय से विचरित किया गया है कि क्या बिल्डर के प्रस्ताव पर शिकायतकर्ता को जमा धनराशि वापस art जा सकती है? यह वाद बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी द्वारा प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि वह शिकायतकर्ता को प्रश्नगत प्लॉट का कब्जा देने में सक्षम नहीं है, जिस कारण वह शिकायतंकर्ता की जमा धनराशि जून, 2022 से 2 से 3 किश्तों में वापिस करने हेतु तैयार हैं। इन आधारों पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को अपनी जमा धनराशि प्राप्त करने हेतु, निर्देशित किये जाने का अनुरोध किया गया है। इस सम्बन्ध में रेश अधिनियम की aris() में निम्नलिखित प्राविधान दिये गये हैं :- Section 76 (7) “If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,- (a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (8) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, Ns ३0 he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed.
इस प्रकार क्रेता को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नहीं मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा प्रत्येक माह के विलम्ब हेतु ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें, परन्तु प्रश्नगत प्रकरण में शिकायतकर्ता द्वारा अपनी मूल शिकायत में कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। प्रश्नगत प्रकरण में विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को जमा धनराशि वापस करने हेतु प्रस्ताव किया गया, किन्तु शिकायतकर्ता कब्जा चाह रहा है। नियमतः रेरा के प्राविधानों के अनुसार विपक्षी उसी दशा में धनराशि वापस कर सकता है, जहाँ यह स्पष्ट हो कि विपक्षी अपनी परियोजना पूर्ण करने में असमर्थ हैं या उनके द्वारा परियोजना का परित्याग (Abandoned) किया गया हो। प्रकरण में ऐसा कोई साक्ष्य पत्रावली पर उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थिति में विपक्षी अपनी स्वेच्छानुसार अनुतोष प्रदान करने का निर्धारण नहीं कर सकता है तथा यह दोनों पक्षों की सहमति से ही सम्भव है। तद्नुसार बिन्दु संख्या-4 निस्तारित किया जाता है।. निस्तारण बिन्दु संख्या-5 निस्तारण बिन्दु संख्या-5 इस तथ्य पर विचरित किया गया है कि क्या विपक्षी द्वारा रेरा के प्राविधान के अर्न्तगत प्लॉट के कुल कीमत की 40 प्रतिशत धनराशि प्राप्त होने के उपरान्त उभय पक्ष के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराया गया और क्या उभय पक्ष के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराया जाना अनिवार्य है ? पत्रावली पर दाखिल जमा धनराशि की रसीदें एवं अन्य अभिलेखों के अवलोकन से विदित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में प्लॉट बुक पे 44
किये जाने हेतु धनराशि का भुगतान किया गया है, परन्तु विपक्षी द्वारा पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध पत्र निष्पादित नहीं कराया गया है। शिकायतकर्ता का. यह कहना है कि उनके द्वारा दिनांक 22.42.2005 को विपक्षी की परियोजना UCHDPL Sec-7, Plots ¥ 350 वर्ग गज़ का प्लॉट बुक कराया गया, परन्तु विपक्षी द्वारा उभय पक्ष के मध्य अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है। प्रश्नगत प्रकरण में 350 वर्ग गज़ के प्लॉट के लिए 7500 /- रूपये प्रति वर्ग गज की दर से शिकायतकर्ता द्वारा 7,87,500 //-रूपये की धनराशि विपक्षी को अदा की गयी थी, जो कि प्लॉट के कुल मूल्य 26,25,000/— रूपये के 0 प्रतिशत की धनराशि से अधिक है। ऐसी दशा में सर्वप्रथम उभय पक्षों के मध्य रेरा के प्राविधानों के अनुसार अनुबन्ध निष्पादित कराया जाना अनिवार्य है। इस सम्बन्ध में रेरा अधिनियम, 20:6 की धारा-43 में स्पष्ट रूप से प्राविधानित है कि :- 43. No deposit or advance to be taken by Promoter without fiorst entering into agreement for sale.- (l) A promoter shall not accept a sum more than ten per cent of the cost of the apartment, plot, or building as the case may be, as an advance payment or an application fee, from a person without first entering into a written agreement for sale with such person and register the said agreement for sale, under any law for the time being in force.
(2) The agreement for sale referred to in sub-section (l) shall be in such form as may be prescribed and shall specify the particulars of development of the project including the construction of building and apartments, along with specifications and internal development works and external development works, the dates and the manner by which payments towards the cost of the apartment, plot or building, as the case may be, are to be made by the allottees and the date on which the possession of the apartment, plot or building is to be handed over, the rates of interest payable by the promoter to the allottee and the allottee to the promoter in case of default, and such other particulars, as may be prescribed. ON 2
CURIA से यह स्पष्ट है कि प्रोमोटर, यथास्थिति, अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन की लागत के 40 प्रतिशत से अधिक राशि अग्रिम संदाय अथवा आवेदन फीस के रूप में किसी व्यक्ति, उस व्यक्ति के साथ लिखित करार किये बिना, स्वीकार नहीं करेगा और var विकय करार को तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन पंजीकृत करेगा। ऐसे में यह विपक्षी का दायित्व है कि वह यदि प्लॉट की कुल कीमत की io प्रतिशत से ज्यादा की धनराशि लेता है, तो निश्चित रूप से अनुबन्ध निष्पादित करेगा और यदि नहीं कराता है, तो रेरा अधिनियम के अन्तर्गत दंडनीय होगा। अभिलेखों से विदित है कि विपक्षी द्वारा ker अधिनियम की धारा-43 का उल्लंघन किया गया है। यदि यह मान भी लिया जाये कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को अनुबन्ध निष्पादित किये जाने हेतु कहा गया था, जो अभी शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षर नहीं किया गया। फिर भी यह विपक्षी का उत्तरदायित्व था कि वह ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता से 40 प्रतिशत से अधिक की धनराशि न लेते। स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा प्रश्नगत प्रकरण में अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है। प्रश्नगत प्रकरण में शिकायतकर्ता, विपक्षी की परियोजना में प्लॉट लेने हेतु इच्छुक हैं, तो इस आदेश के 45 दिनों के भीतर राज्य सरकार द्वारा विज्ञप्त प्रारूप पर अनुबन्ध पत्र निष्पादित करायें। dager बिन्दु संख्या-5 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-6
शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा अनुबन्ध के अनुसार प्रश्नगत प्लॉट का कब्जा दिनांक 22.08.2006 तक दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा 45 वर्ष उपरान्त अभी भी प्रश्नगत प्लॉट का कब्जा नहीं दिया गया है और न ही विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना से सम्बन्धित कोई वांछित प्रमाण पत्र अथवा ओ.सी. / सी.सी. प्राप्त किया गया है। विपक्षी द्वारा पक्षकारों के मध्य अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है। अत: शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने तथा पक्षकारों के मध्य अनुबन्ध निष्पादित कराये जाने का अनुरोध किया गया है। रेरा अधिनियम, 20:6 की oRT—ra(t) में निम्नलिखित प्राविधान दिये गये हैं:- Section 78 (7) “If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,- (a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or % 43 (0) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be ‘prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act:
Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. इस प्रकार Sa को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नही मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा प्रत्येक माह के विलम्ब हेतु ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें, परन्तु प्रश्नगत प्रकरण में शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज fart जाने का अनुरोध किया गया है। चूंकि पक्षकारों के मध्य अनुबन्ध निष्पादित नहीं कराया गया है, जिससे यह विदित हो सके कि विपक्षी द्वारा कब तक कब्जा दिया जाना था, परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज करायी गयी ऑनलाईन शिकायत में कहा गया है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को दिनांक 22.08.2006 तक परियोजना पूर्ण कर कब्जा दिये जाने का दायित्व था, परन्तु विपक्षी द्वारा उक्त निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है और न ही विपक्षी द्वारा दाखिल प्रतिवाद पत्र में कब्जा दिये जाने के सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण किया गया है और न ही शिकायतकर्ता के तर्क परं कोई अपत्ति की गयी है। ऐसे में दिनांक 22.08.2006 तक परियोजना पूर्ण कर कब्जा दिये जाने की तिथि माना जाना उचित प्रतीत होता है। इसके अतिरिक्त फोर्स मैज्योर के मद में विपक्षी कुल 68 दिन की अवधि के लिए लाभ पाने का अधिकारी है। (जैसा कि निस्तारण बिन्दु संख्या-2 में वर्णित है।)
जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील Wo 6649-50 /20i8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल" में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि 44 "the period of Interest should close on April 20l6 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी. / सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को दिनांक 22.08.2006 + 68 दिन अर्थात् दिनांक 30.40.2006 से ओ.सी /सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। जहाँ तक ब्यांज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल Raced सबअर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि —
"Section 8(l)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to ‘give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay > 45 interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। रेरा एक्ट की धारा 2(2७) में प्राविधान है कि :- (za) "interest" means the rates of interest payable by the promoter or the allottee, as the case may be. Explanation.—For the purpose of this clause—
(0) the rate of interest chargeable from the allottee by the promoter, in case of default, shall be equal to the rate of interest which the promoter shall be liable to pay the allottee, in case of default; (ii) the interest payable by the promoter to the allottee shall be from the date the promoter received the amount or any part thereof till the date the amount or part thereof and interest thereon is refunded, and the interest payable by the allottee to the promoter shall be from the date the allottee defaults in payment to the promoter till the date it is paid; जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47020I8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 20:8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय ,/पटटा विलेख के प्रारूप के WER 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9.26) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to \ ‘Y 6 MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:"
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को ॥४८,ए+ प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+I प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2४)0) में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा रिट याचिका संख्या-सी-3289 / 2020 “wat बिल्डवेल कंस्ट्रक्शन्स wife. बनाम पूनम सूद एवं अन्य” में दिनांक 06.02.2020 को पारित निर्णय में यह उल्लेखित किया गया है कि:-
Coming to the next ground of challenge to the impugned order by the petitioner's counsel that the interest awarded by respondent no.l (MCLR+I) is excessive, is also without any merit. It is an admitted fact to the petitioner that respondent no.] had booked a flat and till the filing of the writ petition, the possession of the flat has not been given to him. The interest had been awarded in terms of Clause 9.2(ii) of the form of agreement contained in the U.P. Real Estate (Regulation and Development) (Agreement for Sale/Lease) Rules, 208. The respondent no.2 has given cogent reasons in the impugned order. Respondent no.2 has rightly placed reliance on Clause 9 sub-clause(ii) of the Rules, 20i8 which provides that in the event of default on the part of the promotor, the allottee shall have the option of terminating the agreement in which case the promoter shall be liable to refund the entire money paid by the allottee under any head whatsoever, towards the purchase of the flat at the rate of MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules within forty-five days of receiving the termination notice. Learned counsel for the petitioner has failed to bring to our notice any Rule in the Rules, 206, providing otherwise. a 7 तत्पश्चात् रिट याचिका संख्या-सी-9420,// 2020 “हैबीटेक इंफास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम उ0प्र0 राज्य सरकार एवं अन्य” में दिनांक 06.07.2020 को महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन देते हुए यह उललेखित किया है किः-
On 2.09.20l9 the respondent authority directed the petitioner to refund the entire amount alongwith interest @ MCLR + % from the date of deposit till the date of order. Thereafter, recovery certificate and citation was issued on 07.02.2020................-----«->तन्«-न्-«- and only on complaint under Section 8 authority proceeded to direct for the refund of the money alongwith payment of interest @ MCLR + l%, which was in view of Real Estate (Regulation & Development) (Agreement to Sale) Regulations, 208.....ccceseeeeeeee Thus power of refund of amount along with interest which has been provided under Section 8, with the authority was rightly exercised by it in the interest of justice. माननीय उच्च न्यायालय द्वारा भी रेरा प्राधिकरण के पीठ द्वारा नियमावली के अन्तर्गत |४०0,१ + % की वार्षिक ब्याज दर से दिये गये आदेश को उचित एवं सही माना है। अत: उपरोकतानुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से यह अवधारित किया जा सकता है कि राज्य सरकार द्वारा नियमावली के अन्तर्गत निर्धारित की गयी ब्याज दर उचित एवं सही है। ब्याज दर को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के MCLR+ प्रतिशत से सम्बद्ध करने के सिद्धान्त को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी Storr गया है और न्यायोचित ठहराया है।
ऐसे में उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गयी भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास), (विकय /पढ्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 के अन्तर्गत निर्धारित की गयी वार्षिक ब्याज दर MCLR+ प्रतिशत, जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अधिकतम ब्याज दर से i प्रतिशत ज्यादा है, उचित एवं सही है। dager बिन्दु संख्या-6 निस्तारित किया जाता है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। के l. 8 आदेश विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्ता के प्लॉट की समस्त सुविधाओं को अनुबन्ध के अनुसार पूर्ण कराकर दिनांक 34.40.2022 तक ओ.सी. /सी.सी. सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। विपक्षी, शिकायतकर्ता को दिनांक 30.402006 से ओ.सी. /सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर fest ब्याज के रूप में MCLRHH प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की देय धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही इस अवधि में शिकायतकर्ता द्वारा यदि कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा।
विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 2046 की धारा 2(2०)0) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर add के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। पक्षकारों को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश पोर्टल पर अपलोड होने के 45 दिनों के अन्दर उ0प्र0 शासन आवास एवं शहरी नियोजन अनुभाग-3 की अधिसूचना संख्या-4740 /8--3-48-65 विविध /ie के दिनांक 7.:020:8 को जारी किये गये “tre टू सेल” के प्रारूप पर अनुबन्ध निष्पादित कराना सुनिश्चित करें। ही i9 5. विपक्षी द्वारा eer अधिनियम की arri3(t) के उल्लंघन के सम्बन्ध में सचिव, रेरा विपक्षी के ऊपर दण्डात्मक कार्यवाही करते हुए अर्थदंड अधिरोपित करना सुनिश्चित करें। 6. इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। 7. यदि विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता को यह अधिकार होगा कि रेरा प्राधिकरण के माध्यम से अपने आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। दिनांक “ho /५9/2022 YY Ons goa ee (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण