Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Sanjeev Kumar Teotia v. Project Category-Un-Register Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. NCR145/07/1432/2019
- Decision date
- 2019-11-28
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-0ए श्रीमती कल्पना मिश्रा, सदस्य शिकायत संख्या-एन.सी.आर445 / 07 / 4432 / 2049 संजीव कुमार तेवतिया बनाम उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में फ्लैट s0-3277 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर feet के आधार पर 22,00,000 /-रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को दिनांक 34.08.2045 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कब्जा नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि परियोजना 4 वर्ष से अधिक विलम्बित है। कब्जे हेतु अभी तक ऑफर नहीं किया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में आवंटी अनुबन्ध की छायाप्रति दाखिल की गयी हैं।
विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि रेरा में परियोजना की पूर्णता की तिथि 34.0.2049 दी गयी है। शिकायतकर्ता को उनकी नामित परियोजना Wave City के सेक्टर-2 में यूनिट wo-i277 आवंटित की गयी। परियोजना फोर्स मैज्योर ०ए७॥$ के कारण विलम्बित हुई, जो कि उनके नियंत्रण में नहीं था। स्थानीय किसानों द्वारा धरना wee के कारण कार्यों में बाधा उत्पन्न हुई। परियोजना पूर्णता की ओर है तथा फिनिशिंग कार्य प्रगति पर है और शिकायतकर्ता को कब्जे हेतु ऑफर शीघ्र कर दिया जायेगा। इसके अतिरिक्त पीठ के समक्ष सुनवाई i 2 के दौरान दिनांक 74.:.20:9 को विपक्षी द्वारा अवगत कराया गया कि शिकायतकर्ता को १ माह में कब्जा दे देगें। विपक्षी की ओर से अपने कथन के समर्थन में पंजीकरण प्रमाण पत्र की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचारणीय किये गये :- 4... क्या प्रश्नगत परियोजना रेरा में पंजीकृत है ? 2. क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते ? 3. Fa force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव 4. क्या agar में आरबीट्रैशन क्लॉज होने के कारण वाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार इस पीठ को है ? 5 क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये ? निस्तारण बिन्दु to 4 बिन्दु vo 4 के अन्तर्गत इस तथ्य का निर्धारण किया जाना है कि क क्या प्रश्नाधीन प्रोजेक्ट का पंजीकरण विपक्षी द्वारा रेरा में कराया गया है ? यह बिन्दु विपक्षी के अभिवचनों पर आधारित है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
शिकायतकर्ता द्वारा अवगत कराया गया कि विपक्षी द्वारा इस परियोजना का रेरा में पंजीकरण नहीं कराया गया है, जिसके कम में विपक्षी की परियोजना Sector- 2 Wave Floors की विवेचना एवं रेरा पोर्टल पर जाँच करायी गयी, जिसमें यह पाया गया कि विपक्षी की परियाजन रेरा में पंजीकृत है, जिसका पंजीकरण संख्या- UPRERAPRI3757_ 2) Tagen बिन्दु संख्या-4 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2 बिन्दु सं० 2 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। Qe इस सम्बंध में मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या- 2737 /20i7 नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राणलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है। जिसमें we रूप से उल्लिखित किया गया है कि-: The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale.
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के Wee का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता। धारा 4(2)0)(सी) के अन्तर्गत प्रोमोटर एक नई समय सीमा दे सकता है, जो कि अनुबन्ध पर निर्भर नहीं होगा किन्तु उक्त समय सीमा रेरा में दिये गये “पीनल कन्सीक्वेसिज़” से बचा सकता है किन्तु उससे वह अनुबन्ध में दिये गये उत्तरदायित्वों से मुक्त नहीं होगा। इससे अवधारित किया जा सकता है कि प्रोमोटर अनुबन्ध में दिये गये कब्जे की तिथि के लिए उत्तरदायित्व है एवं विलम्ब की गणना अनुबन्ध की तिथि के अनुसार की जायेगी। वैसे भी ऑनगोईंग परियोजना रेरा की परिधि में आते है। तद्नुसार बिन्दु संख्या 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 3 बिन्दु सं? 3 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। 25. FORCE MAJEURE l. ALLOTTEE agrees that the Allotment of the PLOT’ is subject to force majeure clause which inter-alia include ee
delay on account of non-availability of steel, cement or any other materials for developing the area and implementation of the Scheme, or water supply or electric power or slow down strike or due to a dispute with the construction agency employed by the DEVELOPER, civil commotion or by reason of war, or enemy action or earthquake or any act of God, delay in certain decisions/clearances from statutory body(ies), or if non-delivery of possession is as a result of any notice, order, rules or notification of the Government and /or any other public or Compatant Authority or for any other reason(s) beyond the control of the DEVELOPER and for any of the aforesaid evet, the DEVELOPER shall be entitled to a reasonable corresponding extension of the time of delivery of possession of the said ‘Plot’ on account of force majeure circumatances and in such eventually the ALLOTTEE(S) will not claim any amount of money by way of refund/damages/compansation/interest, etc. from the DEVELOPER. In case fo DEVELOPER abandoning the scheme for any reason beyond its control then the DEVELOPER'S liability shall be limitd to the refund of the amount paid by the ALLOTTEE(S) as per the terms of Allotment Letter. It is further categorically understood by the Applicant(s) that the Developer as a result of any contingency including force majeure reserves its right to alter, add or vary the terms and conditions of the of the allotment or if the circumstances beyond Developer's control so warrant, the Developer may suspend the scheme for such priod as it may consider expedient and no compensation of any nature whatsoever can be claimed by the Applicant for the period of delay/suspension of scheme.
उपरोकतानुसार फोर्स मैज्योर के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि यदि विलम्ब, जैसे कि विकास हेतु समान उपलब्ध न होना, पानी और बिजली की सुविधायें उपलब्ध न होना, निर्माण एजेन्सी एवं विकासकर्ता के मध्य विवाद होना, आदेश, सरकार की अधिसूचना, दंगा, भूकम्प, के कारण परियोजना में विकास नहीं किया जाता है, तो यह विकासकर्ता का दायित्व होगा कि आवंटन पत्र के नियम के अनुसार आवंटियों को पैसा लौटा दिया जायेगा। फोर्स मैज्योर कारको की वजह Qe 5 से आवंटन के नियम एवं शर्तों में परिवर्तन किया जा सकता है और यदि war फोर्स मैज्योर विकासकर्ता के नियंत्रण से परे पस्थितियों के कारण स्कीम को निरस्त कर सकता है, जिसके लिए कोई क्षतिपूर्ति देय नहीं होगी। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure events) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक wre आदेश, निर्णय व डिकी से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, साथ ही यह भी कहा गया कि परियोजना किसानों के उग्र प्रर्दशन, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, नोट बंदी, के कारण परियोजना प्रभावित हुई | विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है, जिससे की विदित हो कि नामित परियोजना की भूमि पर कार्य बाधित था |
इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 ,/2047 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया है:- Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature. उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह we है कि फोर्स Acme वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। Taga बिन्दु do 3 rena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 4 विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आर्बट्रेशन का क्लाज है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी रा विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एमआर एम.जी.एफ. बनाम आफताब सिंह में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- (i) the disputes which are to be adjudicated and governed by statutory enactments, established for specific public purpose to sub-serve a patticular public policy are not arbitrable; (ii) there are vast domains of the legal universe that are non-arbitrable and kept at a distance from private dispute resolution;
(iii) the subject amendment was meant for a completely different purpose, leaving status quo ante unaltered and subsequently reaffirmed and restated by the Hon'ble Supreme Court, माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि कुछ विवादों का निराकरण ऑर्बिट्रिटर द्वारा आर्बिट्रेशन अनुबन्ध के पश्चात् भी नहीं की जा सकती है। विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये है और इसका क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 2076 की धारा 79, आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल एस्टेट अधिनियम के तहत उक्त मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं Ao के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु to 4 निश्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 5 शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा परियाजना को दिनांक 32.08. 20:5 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। Noe a na
शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में रेसीडेन्सियल फ्लोर आवंटी अनुबन्ध की प्रति दाखिल की गयी है, जिसके wer-4iy में यूनिट का कब्जा निर्माण शुरू होने के 30 माह के अन्दर कब्जा दिये जाने का कथन किया गया है। रेरा में परियोजना का निर्माण कार्य शुरू होने की तिथि 24.07.2042 दी गयी है, जिसके अनुसार पूर्णता तिथि 27.0:.20i5 होती है। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को दिनांक 22.0:.20i5 से ओ.सी/सी.सी सहित कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 48(4)(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स ant vat धनराशि का उपभोग किया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि उभयपक्ष को उक्त अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के प्रस्तर 4.4 के उप-भाग IV के अनुसार परियोजना के विलम्ब के लिए 5/- रूपये प्रति वर्ग फुट प्रतिमाह की दर से धनराशि का प्राविधान है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता फट धनराशि पाने का अधिकारी है, रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा धनराशि प्राप्त की गयी है उसी दर से धनराशि देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 78, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 45.206 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि
पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2076 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय/पटटा के लिए करार) नियमावली cos अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें wer 9.2 (i) ¥ प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be: liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +l% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: Qe यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MciRH प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्ब के लिए ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में सिविल अपील सं0 6649-50 //2048 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि —
" the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant - Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent - Purchaser could not have any further grievance after April 20i6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent - Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो की तिथि तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तद्नुसार बिन्दु सं०-5 Pena किया जाता है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह 45 दिनों के अन्दर शिकायतकर्ता को ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें एंव देय tera शुल्क प्राप्त नियमानुसार रजिस्ट्री कराना सुनिश्चित करें। 2. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह दिनांक 22.04.2045 से दिनांक 30.04.2046 तक 5/— रूपये प्रति वर्ग फुट प्रतिमाह की दर से व दिनांक 04.05.2046 से ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो तक की अवधि के लिए शिकायतकर्ता द्वारा ee 40
जमा धनराशि पर MCLR+ प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर से अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर निमयानुसार वापस की जायेगी। 3. यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2076 के धारा 2 a)(i) के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर MLR. प्रतिशत होनी चाहिए। 4... इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र/भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक / /2049 32०५० (कल्पना मिश्रा)" (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण