Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Krishna Kant Agarwal v. Prateek Realtors India Private Limited
Complaint No. NCR145/06/96559/2022
- Decision date
- 2026-01-20
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 3 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
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Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर ह पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थितः- Slo दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम |. शिकायत संख्या डक के. शिकायतकर्ता | यूनिट qo |. “EEE धनराशि wo | आवंटन/ | = वांछित अनुतोष | सं० * ‘ | फ्लैट बायर | कब्जा दिये | एग्रीमेंट की | जाने की a ' ह F a | _ sd had ia तिथि ॥ |. | NCRI45/06/96559/2022 | कृष्णा कांत | सी 2- 707 | BO 62,6,900,/ | 26.05.20:5 | Are 20i8 | यूनिट का अग्रवाल तथा 06 कब्जा व : माह अनुग्रह | विलम्बित अवधि क॑ | अवधि का । साथ अर्थात | ब्याज दिलाये | सितम्बर जाने का | 2048 अनुरोध किया लि ae 7 ___[ गया है। बनाम * प्रतीक रियलटर्स इण्डिया प्रा.लि. शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्ध यूनिट का कब्जा. व विलम्बित अवधि' का व्याज दिलाये जाने हेतु्यह- शिकायत"संस्थित-की गयीं है| संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना GRAND CARNESIA AT PRATEEK GRAND CITY में यूनिट संख्या सी 2-707 ge करायी गयी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि wo 62,6,900,/-का भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत पृष्ठ पर यह उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा मार्च 2048 में यूनिट का कब्जा दिया जाना था परन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक यूनिट का कब्जा नहीं दिया गया है। जबकि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी द्वारा भेजे गये मांग पत्र के अनुसार धनराशि का भुगतान किया गया है। अतः शिकायतकर्ता ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि' का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया है। .... शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के समर्थन में आवंटन, फ्लैट बायर willie,
प्रतिउत्तर, एप्लिकेंट लेजर व बैंक स्टेटमेंट की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी हैं । शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि -का विवरण निम्नवत् है:- — =S 2 ] क्रम विवरण | दिनांक भुगतान की गई धनराशि [संख्या : (रु0) ॥ विपक्षे द्वारा जारी एप्लिकेंट लेजर 30.04.2022 रु0 58,24,407 / पीएनबी-बैंक wete 24.05.2022 रु0 4,00,000 / कुल योग : रु0 62,24,407/ चूंकि शिकायतकर्ता द्वारा शिक्रायत पृष्ठ पर विपक्षी की भुगतान की गयी धनराशि GO 62,6,900/ अंकित की गयी है। लेकिन एप्लिकेंट लेजर व बैंक Rete के अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि wo 62,24,407 / का भुगतान किया गया है परन्तु शिकायत॒कर्ता सुनवाई दिनांक 24.07.2028 को आदेश दिनांक 43.05.2024 के अनुपालन में विपक्षी को धनराशि wo 62,6,490 / भुगतान होने पर सहमति दी गयी है जिस कारण वर्तमान प्रकरण में विपक्षी को भुगतान की गयी धनराशि Bo 62,46,.90/ को संज्ञान में लेते हुए आदेश पारित किया जा रहा है।
विपक्षी की ओर से लिखित आपत्ति दाखिल की गई है जिसमें यह उल्लिखित किया गया है किःशिकायतकर्ता की. यूनिंट संख्या सी2-707 परियोजना ग्राण्ड कारनेशिया से सम्बन्धित है। विपक्षी द्वारा दिनांक t2.02.202 को डीम्ड ओ.सी /सी.सी के आधार पर कब्जा प्रस्ताव दिया जा चुका है। विपक्षी द्वारा दिनांक 0१.02.2024 को चारों aie orate प्रमाण पत्र के साथ ओ.सी हेतु आवेदन किया जा चुका है। विपक्षी की परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई जो विपक्षी के नियत्रंण से बाहर था। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि बिल्डर बायर एग्रीमेंट के क्लाज-49 के अनुसार यूनिट का कब्जा सितम्बर 2048 में दिया जाना था परन्तु माननीय उच्च न्यायालय के आदेश से is माह व Hifas—t9 महामारी के कारण से 06 माह परियोजना में निर्माण कार्य बंद था जिस कारण विपक्षी द्वारा: सितम्बर 2020 में यूनिट का कब्जा दिया जाना था। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा kr अधिनियम की धारा 496) के प्राविधानों का उल्लंघन किया गया है। परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई जो विपक्षी के Paco से ब्राहर था। विपक्षी द्वारा फोर्स मैज्योर के सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अपील संख्या 940 /2047 विक्रम चटर्जी व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया व अन्य में पारित आदेश के प्रस्तर संख्या 440 व यूपी 2 eS
रेरा पीठ-4 द्वारा शिकायत संख्या wails / 44 / 85434 // 2024 में पारित आदेश का संदर्भ अंकित किया गया है। परियोजना में हुये विलम्ब के लिए यह कारण aa गये है कि परियोजना में अगस्त-सितम्बर 2044 में निर्माण कार्य प्रारम्भ होने के बाद माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा Re संख्या सी-9857 /20i5 उत्तर रेलवे दूर संचार व 43 अन्य बनाम स्टेट ऑफ यूपी व 4 अन्य में आदेश होने का संदर्भ अंकित किया गया है। इस प्रकार परियोजना में. निर्माण कार्य 44.07.2046 तक बंद था। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण होने के कारण निर्माण कार्य दिनांक 04.:.20:9 से 09.42.2049 तक बंद किये जाने का आदेश पारित किया गया। इसके उपरांत माननीय न्यायालय द्वारा फरवरी' 2020 तक निर्माण कार्य बंद किये जाने का आदेश पारित किया गया। तत्पश्चात् कोविड-49 महामारी के कारण निर्माण कार्य बाधित हुआ। विपक्षी ने जीरो पीरिएड के सम्बंध में शिकायत संख्या एनसीआर 445 /02 /7ii57 /202i में पारित आदेश दिनांक ॥4. 09.2024 व शिकायत संख्या एनसीआर445 / 05 /94974,/2022 में पारित आदेश का संदर्भ अंकित किया है जिसमें दिनांक 49.02.2045 से 46.08.2046 तक जीरो पीरिएड माना गया। अतः विपक्षी. द्वारा शिकायत निरस्त किये जाने तथा शिकायतकर्ता को 90 दिनों में अवशेष देय धनराशि का भुगतान करके यूनिट का कब्जा लिये जाने हेतु निर्देशित किये जाने का अनुरोध किया गया है।
शिकायतकर्ता द्वारा दाखिल प्रतिउत्तर में यह उल्लिखित किया “गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट संख्या सी2-707 बुक करायी गयी थी। विपक्षी द्वारा अनुबंधानुसार यूनिट का कब्जा मार्च 2048 में दिया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष समय सम्पूर्ण धनराशि का भुगतान किया जा चुका है। शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 48.05.2022 को विपक्षी के कार्यालय में फाइनल डिमांड लेटर प्राप्त किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 24.05.2022 को मांग पत्र & अनुसार धनराशि का भुगतान कर दिया गया था परन्तु शिकायतकर्ता को आज की तिथि तक यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। अतः Remand द्वारा यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज fear जाने का अनुरोध किया गया है। इसके अतिरिक्त शिकायतकर्ता द्वारा प्रार्थनापत्र के साथ विपक्षी द्वारा प्रेषित प्री-कैंसिलेशन पत्र व यूनिट निरस्तीकरण पत्र की प्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्षों के cept को सुना गया। ह
उभयपक्ष के अभिवचनों के आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किये जाते हैं :- 4. क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते हैं ? तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? 2. क्या विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट का निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नही? 3. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? 4. कया शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ? निस्तारण प्रश्न संख्या-4 :- प्रश्न संख्या-4 इस तथ्य पर विरचित है कि क्या रेरा आने से पूर्व कें अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते है तथा कया पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? ॥ su ह सम्बन्ध में area: सर्वोच्च. न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-6745-6749 /202 “ARR =e प्रोमोटर्स एंड डेवलपर्स wo fo बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य” में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि :- ह "54. From the scheme of the Act 206, its application is retroactive in character and it can safely be observed that the projects already completed or to which the completion certificate has been granted are not under its fold and therefore, vested or accrued rights, if any, in no manner are affected. At the same time, it will apply after getting the on-going projects and future projects registered under Section 3 to prospectively follow the mandate of the Act 206."
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा अधिनियंम लागू होने से पूर्व (= जो भी अनुबन्ध हस्ताक्षरित हुए या अधिनियम लागू होने से पूर्व की परियोजनाओं, & 2: जहाँ पर पूर्णता प्रमाण पत्र सम्प्रवर्तक द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वहाँ पर 4 अधिनियम का प्रवर्तन पूर्वव्यापी प्रभाव रहेगा। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन गोईंग” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते हैं। उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आर्ब्जेवेशन से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि रेरा पंजीकरण से पूर्व प्रोमोटर एवं आवंटी 'के मध्य अनुबन्ध निष्पादित हुए हैं, परन्तु यदि परियोजना को रेरा में पंजीकरण कराया जाता है, तो रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजज़ा को रेरा में पंजीकृत कराया गया है, जिसका पंजीकरण संख्या- UPRERAPRIZ3 है। अतः वर्णित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना वर्तमान में “ऑनगोईंग प्रोजेक्ट” की श्रेणी में आती है। ऐसी दशा में रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। तदनुसार प्रश्न eet निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 2 -: प्रश्न संख्या 2? इस आशय का विरचित किया गया
है कि क्या विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट को निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नहीं? ह । ह . विपक्षी की ओर से शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट निरस्त किये जाने के सम्बन्ध में दाखिल लिखित जवाब व् सुनवाई के दौरान कोई तर्क प्रस्तुत नहीं किया गया है। बल्किं लिखित जवाब में. यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि शिकायतकर्ता अवशेष देय धनराशि का भुगतान करके यूनिट का कब्जा प्राप्त Hy | | शिकायतकर्ता द्वारा दाखिल यूनिट निरस्तीकरण पत्र के अवलोकन से fated. है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता द्वारा अवशेष देय धनराशि रु0 5,55,722 / का भुगतान न किये जाने के कारण आवंटित यूनिट निरस्त कर दी गयी है। उक्त के सम्बन्ध में भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) (विक्रय /पट्टा के लिए करार) नियमावली, 20i8 की धारा 9.3 (2) में यह प्राविधानित है कि :- धारा 9.3 ii. In case of Default by Allottee under the condition listed above continues for a period beyond 3 (three) consecutive months after notice from the Promoter in this regard, the Promoter may cancel the allotment of the [Apartment/Plot] in favour of the Allottee and refund the money paid to him by the Allottee by deducting the booking amount and the interest liabilities and this Agreement shall thereupon stand terminated. The Promoter must not be in default to _ take this benefit; Provided that the Promoter shall: intimate the 5 कर ——_SS>.
Allottee about such termination at least thirty days prior to such * termination. . पत्रावली के अवलोकन से स्पष्ट है कि उभयपक्ष के मध्य दिनांक 26.05.2045 को एग्रीमेंट निष्पादित किया गया था जिसके अनुसार यूनिट का कब्जा मार्च 2048 तथा 06 माह अनुग्रह अवधि में परियोजना पूर्ण कर यूनिट का कब्जा सितम्बर 2078 तक उपलब्ध कराया जाना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। इसके अतिरिक्त शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु कन्सट्रक्शन लिंक पेमेंट प्लान का चयन किया गया था जिसके अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा चरणबद्ध रूप से देय धनराशि का भुगतान किया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा पेमेंट प्लान के अनुसार यूनिट की कुल कीमत wo 64,75,000/ के सापेक्ष रु० 62,46,.90/or भुगतान किया जा चुका है जो कि यूनिट की कुल कीमत से भी अधिक है जिस कारण विपक्षी द्वारा किया गया यह तर्क कि शिकातयकर्ता द्वारा समय से देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया है संधारणीय नहीं है। उपरोक्त प्राविधानों में' यह स्पष्ट 'उल्लिखित ef यदि wet स्वयं दोषी है तो वह उपरोक्त प्राविधानों के अनुसार शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त नहीं कर सकता है और न ही उपरोक्त प्राविधानों के अनुसार लाभ ले सकता है। अतः उक्त तथ्यों के आधार पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक नहीं है। ह यहाँ यह भी उल्लिखित किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्गगत शिकायत दिनांक 30.06.2022 को योजित की गयी थी
तथा विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट पीठ के समक्ष विचारणीय रहने के दौरान दिनांक 23.06.2025 को निरस्त की गयी। विपक्षी द्वारा जारी यूनिट निरस्तीकरण पत्र पर तिथि का उल्लेख नहीं है। इससे यह स्पष्ट नहीं है कि विपक्षी द्वारा यूनिट कब निरस्त की गयी है। । ह उपरोक्त वर्णित तथ्यों के अवलोकन से यह विदित होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्नगत यूनिट के सापेक्ष यूनिट की कीमत से अधिक धनराशि का भुगतान किया गया है तथा विपक्षी द्वारा बिना किसी आधार के तथा उपरोक्त उल्लिखित प्राविधानों के विपरीत शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त कर दी गयी है जोकि 6 a उपरोक्त प्राविधानों के विपरीत है। अतः विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक नहीं है। TEAR प्रश्न संख्या 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 3--: प्रश्न संख्या-३ इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने के कारण विलम्बित हुई? फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 क़े प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है Pe " प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर एग्रीमेंट में कब्जा देने की आश्वासित तिथि (Promised Date) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ gored की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवंधि माना जाएगा |"
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल-अपील संख्या: 43029 / 4985, “M.C. Mehta Versus Union of India” में. पारित आदेश, दिनांक o4—44-20:9 F निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such. activity takes place.” इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: 43029,/4985 में पारित, आदेश दिनांक 09-2-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “In the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:- "l2. That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQ| category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of Decernber were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in
7 SS GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more. "” Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.” : माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक 04-44-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक 09-42-209 में पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध ज्ञगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04-44-2049 से दिनांक 09-42-2049) एवं 33 दिन(66«2) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक Ua 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गयाः। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवंधि विपक्षी के नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी को उत्तरदायी ठहराना न्यायोंचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकांलना उचित होगा कि उपर्युक्त वर्णित दोनो अवधियों के लिए परियौजना को पूर्ण होने में हुए विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल-35 दिन+ 33 दिन अर्थात् 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकाईी है। अधिकाओी है।
इसके अतिरिक्त prfas—i9 महामारी के सम्बंध में उ0प्र0 रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक. 06.06.2020 को कोविड-१9 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनोक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा |, SS 8 (=) Rie Ny अधिकारी होगा। उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी कोविड--49 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। तद्नुसर प्रश्नग सख्या 3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 4-: प्रश्न संख्या-4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया. जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके उपरान्त var यूनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य दिनांक 26.05.2045 को अनुबंध पत्र निष्पादित हुआ। अनुबंध पत्र के अनुसार यूनिट का कब्जा मार्च 2078 तथा 06 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात सितम्बर 20॥8 में दिया जाना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 07 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है। चूंकि शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का. कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित होगा। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है।इस सम्बन्ध में सिविल अपील tio 6649-50 /20:8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"'में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:- "the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser’ ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का छा <- 9 जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया”के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
"Section 8()(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing . over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ.प्र. रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। | ह जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा
(विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.40.20i8 कोः भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय/पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय ,पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर o2(ii) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:-- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी uray 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को ४८,₹+प्रतिशत व0 अर की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(24)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। उपरोक्त तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित _ अवधि का ब्यांज पाने का अधिकारी है। तद्नुसार प्रश्न संख्या-4 Prema किया जाता है।
. उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता है। oe आदेश \. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश पोर्टल पर अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट को पुर्नस्थापित करते हुए शिकायतकर्ता से अवशेष धनराशि प्राप्त कर, शिकायतकर्ता की यूनिट आवंटन्त-पत्र /अनुबंध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर ऑससी»सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय ' स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराएं। 2... विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक 04.0.2048 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि Go 62,46,900/ (So बासठ लाख सोलह हजार नौ सौ रूपये मात्र) पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि. से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। निस्तारण प्रश्न संख्या 3 * के अनुसार फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए (माननीय उच्चतम . न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 43029,/4985 के अनुसार ) 68 दिन तथा दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए iL — fio. हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ 'ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dites) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। |
: विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 206 की धारा 2(2०)0) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी शटाए++ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। - इस आदेश का Voor भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य Eta प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। : विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश-का अनुपालन 45 दिल में नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। . आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। sees ieee (डा०दीपक स्वरूप WRT) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर