Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Priyanka Singh v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. NCR145/06/0918/2019
- Decision date
- 2019-10-30
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04ए श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष [ कम Yo | शिकायत Ho | शिकायतकर्ताण | | 4 | एन.सी.आर45 /06 /0978 /209 प्रियंका सिंह 2 एन.सी.आर445 / 06 / 0906 / 2049 mais झष 3 | waxthami4s / 06 / 0792 /209 ऋषि कुमार बनाम उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड शिकायतकर्ता प्रियंका सिंह के साथ 2 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। यह तीनों शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह तीनों शिकायतें UCHDPL Wave Executive Floor से सम्बंधित है। अत: एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत to एन.सी. amri4s / 06 // 098 / 2049 प्रियंका सिंह अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्द कब्जा अन्यथा जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL Wave Executive Floor में फ्लैट नं०-4-50 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर fx के आधार पर 28,94,650,//-रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को दिनांक 23.09.2049 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कब्जा नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि परियोजना विलम्ब है और भौतिक स्थल पर कोई कार्य नहीं हो रहा है। अत: शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के fee कब्जा अन्यथा जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया है।
शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में खाता विवरण, अपार्टमेन्ट आवंटी अरेन््जमेन्ट की छायाप्रति दाखिल की गयी हैं। or 2 विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि रेरा में परियोजना की what की तिथि sts220I9 दी गयी है। शिकायतकर्ता को उनकी नामित परियोजना Wave City के सेक्टर-5 में यूनिट सं०-&-50 आवंटित की गयी। परियोजना फोर्स मैज्योर ०ए७॥$ के कारण विलम्बित हुई, जो कि उनके नियंत्रण में नहीं था। स्थानीय किसानों द्वारा धरना प्रर्दशन के कारण कार्यों में बाधा उत्पन्न हुई। प्रश्नगत परियोजना को दिनांक 3t422000 तक पूर्ण कर लिया जायेगा और शिकायतकर्ता को शीघ्र ही कब्जे हेतु ऑफर कर दिया जायेगा। परियोजना के सम्बन्ध में पूर्णता की पुष्टि पीठ के समक्ष दिनांक 2008.20:9 का कहा गया कि दिसम्बर 2049 तक कब्जा दे दिया जायेगा। विपक्षी की ओर से अपने कथन के समर्थन में रेरा में परियोजना की पंजीकरण प्रमाण पत्र की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचारणीय किये गये :- 4. क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते ? 2... क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? 3. क्या शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि वापस दिलाये जाने की मांग करना उचित है ? 4... कया शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? निस्तारण बिन्दु संख्या-
बिन्दु vio 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। परियोजना रेरा में पंजीकृत है। इस सम्बंध में मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या- 2737 /2047 नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राएलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है। जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि-: +) Y The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale.
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह we है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के THR का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता। धारा 4(2)0)(सी) के अन्तर्गत प्रोमोटर एक नई समय सीमा दे सकता है, जो कि अनुबन्ध पर निर्भर नहीं होगा किन्तु wat समय सीमा रेरा में दिये गये “पीनल कन्सीक्वेसिज़” से बचा सकता है किन्तु उससे वह अनुबन्ध में दिये गये उत्तरदायित्वों से मुक्त नहीं होगा। इससे अवधारित किया जा सकता है कि प्रोमोटर अनुबन्ध में दिये गये कब्जे की तिथि के लिए उत्तरदायित्व है एवं विलम्ब की गणना अनुबन्ध की तिथि के अनुसार की जायेगी वैसे भी ऑनगोईंग परियोजना रेरा की परिधि में आते है। तद्नुसार बिन्दु संख्या 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 2 बिन्दु to 2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure events) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक we आदेश, निर्णय व डिकी से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, साथ ही यह भी कहा गया कि परियोजना किसानों के उग्र weer, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, नोट बंदी, के कारण परियोजना प्रभावित हुई। विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना yD
विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है जिससे की विदित हो कि परियोजना की भूमि पर कार्य बाधित था | इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 /20:7 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं we ti0 4 फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया है:ः- Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature. उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। Taga बिन्दु vo 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 3 शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया है कि विपक्षी द्वारा 23.09.20I9 तक कब्जा दिया जाना था, किन्तु आज तक कब्जा नहीं दिया गया है, जिस कारण जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है, जिस पर विपक्षी का कहना है कि रेरा में परियोजना की पूर्णता तिथि 34.:220:9 दी गयी है और शीघ्र ही कब्जे हेतु ऑफर कर दिया जायेगा। जहाँ तक केता द्वारा रिफण्ड के अनुरोध का प्रश्न है, इस विषय में रेरा अधिनियम के प्राविधानों को समग्र रूप से ver जाना आवश्यक है ताकि सभी पक्षों के मत को दृष्टिगत TY हुए एक संतुलित निर्णय लिया जा सकें। रेरा एक्ट की धारा 48 (4) F प्राविधान है कि :- Section 78 (7) “If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,
in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. इस प्रकार केता को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नही मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा मासिक दर से ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें। रेरा अधिनियम की धारा 34(f) 4 रेरा के अन्य “फंग्शन्स” के साथ-साथ " to ensure compliance of the obligations cast upon the promoters, the allottees and the real estate agents under this Act and the rules and regulations made thereunder " का भी उल्लेख है। इसी प्रकार धारा 32 में रियल see सेक्टर के विकास हेतु अथॉरिटी के उत्तरदायित्यों में निम्न भी सम्मिलित हैं :-
“32. The Authority shall in order to facilitate the growth and promotion of a healthy, transparent, efficient and competitive real estate sector make recommendations to the appropriate Government of the competent authority, us the case may be, on, (a)protection of interest of the allottees, promoter and real estate agent,....... (any other issue that the Authority may think necessary for the promotion of the real estate sector.” उक्त प्राविधानों से यह स्पष्ट है कि “रियल एस्टेट सेक्टर” के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करने के लिए इसके सभी ew होल्डर्स के हितों को समग्र रूप से देखते हुए समुचित निर्णय लेने का उत्तरदायित्व इस ऑथरिटी का है। yy इस कम में मा. मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा नीलकमल रियलटर्स सबअरबन प्रा.लि. बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, जिसमें रेरा अधिनियम की वैद्यानिकता के सम्बंध में निर्णय दिया गया था, के WAR 424 में मा. उच्च न्यायालय द्वारा निम्न संवीक्षण किया :-
“१24, The entire scheme of the RERA is required to be kept in mind. It is already submitted during the course of hearing that in many cases helpless allottees had approached consumer forum, High Courts, Apex Court in a given fact situation of the case. The courts have been passing orders by moulding reliefs by granting interest, compensation to the allottees, and issuing directions for timely completion of project, transit accommodation during completion of project, so on and so forth. Under RERA now this function is assigned to the authority, tribunal. An appeal lies to the High Court. Under one umbrella, under one regulation and one law all the issues are tried to be resolved. Provisions of Section 77 refers to power to adjudicate. A District Judge is conferred with the power to adjudicate compensation under Sections /2, 4, 46 and 79. A promoter could very well put up his case before the adjudicator who deals with the issues in the light of the fact situation of each case. Therefore, there should not be any apprehension that mechanically compensation would be awarded against a promoter on failure to complete the development work.” उक्त से we है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद, यद्यपि समय से इकाई न मिलने की दशा में आवंटी का अपनी धनराशि ब्याज सहित मांगने का अधिकार है, तथापि उक्त वर्णित संवीक्षा को देखते हुए अथॉरिटी, प्रकरण के समस्त तथ्यों, के आधार पर ‘by moulding reliefs by granting interest, compensation _to_the_allottees, and issuing directions for timely timel
completion of project, transit. transit accommodation during completion of during completion o, project, so on and so forth’ के अनुरूप आदेया पारित किए जा सकते हैं। एलोटीज़ द्वारा धनराशि वापस किए जाने व परियोजना में बने रहने वाले एलोटीज के हितों में सन्तुलन के प्रसंग में “चित्रा शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया” (744 / 2047) के निर्णय में मा. सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय के we 40 में निम्न ऑबजरवेशन किया है :- 40. As we have stated earlier, an amount of Rs 750 crores is lying in deposit before this Court pursuant to the interim directions, on which > है शिकायतकर्ता द्वारा अपार्टमेन्ट आवंटी अरेन्जमेन्ट की प्रति दाखिल की गयी है, जिसके प्रस्तर-4. में 48 माह एवं 3 माह की अनुग्रह अवधि में कब्जा दिये जाने का उल्लेख किया गया है। प्रश्नगत अनुबन्ध दिनांक 24.09.2045 को निष्पादित कराया गया, जिसके अनुसार कब्जे की तिथि 24.42.2049 होती है। न्यायहित में यह उचित होगा कि विपक्षी कथनानुसार दिसम्बर 2049 तक कब्जा देना सुनिश्चित करें | ऐसी दशा में परियोजना विलम्ब की श्रेणी में नहीं कही जा सकती है, परन्तु अन्य प्रकरण में अनुबन्ध के अनुसार परियोजना विलम्बित है, जिसके अनुसार अन्य शिकायतकर्तागण विलम्ब के लिए धनराशि पाने के अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 48(4)(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment 0५6 to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल ०)
interest has accrued. The home buyers have earnestly sought the issuance of interim directions to facilitate a pro-rata disbursement of this amount to those of the home buyers who seek a refund. "We are keenly conscious of the fact that the claim of the home buyers who seek a refund of monies deserves to be considered with empathy. Yet, having given our anxious consideration to the plea and on the balance, we are not inclined to accede to it for more than one reason. Firstly ............+ Secondly, the figures which have been made available presently, following the opening of the Web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund." मा. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उक्त प्रसुतरों में उद्धरत “ऑबजरवेशनस्“ एवं रेरा एक्ट की समग्र व्यवस्था को देखते हुए यह भी स्पष्ट है कि यदि विलम्ब के प्रत्येक मामले में धनराशि लौटाने का ही निर्णय लिया जाये तो निश्चय ही यह अधिनियम के “ऑबजेक्टिव” तथा “स्कीम” के अनुरूप न होगा। रिफण्ड का निर्णय लेते समय प्रत्येक मामले की “यूनीकनेस” प्रकरण के समस्त तथ्यों यथा “कन्सट्रक्शन” की स्थिति, कम्पलीशन की “टाईम लाईन", प्रोमोटर्स के द्वाव ऑफर ऑफ पजेशन के “कमिटमेन्ट” की स्थिति, अन्य “स्टेक होल्डर्स', विशेष रूप से परियोजना के साथ बने रहने वाले “एलॉटीज” पर प्रभाव, "प्रस्तावित पज़ेशन डेट” के विषय में “Hany” आदि पर विचार किया जाना न्यायहित में होगा। चूंकि परियोजना पूर्णता की ओर है। न््यायहित में यह उचित होगा कि विपक्षी को निर्देश देकर परियोजना को समयबद्ध रूप से पूर्ण करने हेतु आदेश दिये जायें। अनुबन्ध के WaR-44 के अनुसार ग्रेस अवधि सहित कब्जा दिनांक 24.42.2049 को दिया जाना है, जो तिथि अभी आनी बाकी है एवं यह परियोजना विलम्बित नहीं है। अतः अनुबन्धानुसार शिकायतकर्ता कब्जा लेने पर विचार करें। वैसे भी शिकायतकर्ता द्वारा परियोजना में निवेश फ्लैट के कब्जे हेतु की गयी थी। निश्चय ही परियोजना में बने रहने की दशा में यदि कोई विलम्ब होता है, तो एलॉटीज़ को विलम्ब हेतु नियमानुसार ब्याज प्रोमोटर्स द्वारा देय होगा। निस्तारण बिन्दु सं०-3 Pena किया जाता है।
निस्तारण बिन्दु to 4 शिकायतकर्ता का कहना है कि परियोजना 23.09.20I9 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। x धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक ॥7.0.208 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के ue 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) 4 प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर (iii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को धटाकका प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्ब के लिए ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी McLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा।
जहां तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में सिविल अपील Wo 6649-50 ,/ 2048 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 20]6 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, ०) i 0 wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो की तिथि तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता ओ.सी. मिलने अथवा कब्जा ऑफर किये जाने तक ही ब्याज पाने के अधिकारी at aq बिन्दु सं0-4 निस्तारित किया जाता है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्तागण के फ्लैट की समस्त सुविधाओं को पूर्ण कर दिसम्बर 209 तक ओ. सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें |
2. यदि कोई विलम्ब होता है, तो विपक्षी, शिकायतकर्तागण को अनुबन्धानुसार ओ.सी / सी.सी सहित कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक MCLRtH प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये। 3. यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2076 के धारा 2 vali) के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा ») 34 डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर MCLR+ प्रतिशत होनी चाहिए। 4. इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस ओदश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। 5 इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20:6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक | ya 2049 oy (राजीव कुमार) | (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण