Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Vishwas Mathur and Asha Mathur v. Prateek Realtors India Private Limited
Complaint No. NCR145/03/89471/2022
- Decision date
- 2026-03-19
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 3 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
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Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 20:6 की aIRI-3t के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थितः- sto दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम शिकायत संख्या | | यूनिट न0 जमा धनराशि eo | आवंटन की | कब्जा दिये | व॒छित do तिथि जाने की अनुतोष कि L iz तिथि ] लराबड्ाठठाइ947/2022 | विश्वास माथुर पी 5-704 BO 50,46,794 / | 29.2.2074 | मार्च 2078 यूनिट का व आशा माथुर र् तथा 06 माह | कब्जा व ह ् अनुग्रह अवधि | विलम्बित अर्थात अवधि का सितम्बर 20:8 | ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया | wel | बनाम प्रतीक रियलटर्स इंडिया प्रा.लि. शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु-यह शिकायत-संस्थित की.गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्ता'-कां कथन है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना Grand Paeonia At Prateek Grand City 4 यूनिट WeI-P-5-70l बुक कराई गयी थी जिसके सापेक्ष _शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि रु 50,46,794 /-का भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत पृष्ठ पर यह उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा मार्च 2048 में यूनिट का कब्जा दिया जाना था परन्तु विपक्षी का निर्धारित अवधि में यूनिट का कब्जा देने में असफल रहा है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से एडवांस रजिस्ट्रेशन फार्म, अनुबंध पत्र व एप्लिकेंट लेजर की छायाप्रतियाँ दाखिल की गई है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् हैः- क्रम विवरण दिनांक भुगतान की गईं धनराशि [संख्या (रु0) + विपक्षी द्वारा जारी
एप्लिकेंट लेजर 24.08.207 रु0 50,46,794 / —— विपक्षी की ओर से लिखित आपत्ति दाखिल की गई जिसमें यह उल्लिखित है कि शिकायतकर्ता को परियोजना ग्राण्ड पियोनिया में यूनिट संख्या dis /70! आवंटित की गई थी। विपक्षी की परियोजना रेरा में पंजीकृत है। विपक्षी को वांछित अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त हो जाने के उपरांत विपक्षी द्वरा दिनांक 04.02.2024 को aia हेतु आवेदन किये जाने के आधार पर विपक्षी द्वारा दिनांक 47.02.2024 को शिकायतकर्ता के पक्ष में फाइनल डिमांड we पजेशन के लिए जारी किया गया विपक्षी की परियोजना अप्रत्याशित घटनाओं के कारण विलम्बित हुई, जो विपक्षी की fasion से बाहर थी। विपक्षी द्वारा परियोजना में हुये विलम्ब के लिए यह कारण दर्शाये गये है कि परियोजना में अगस्त-सितम्बर 2004 में निर्माण कार्य प्रारम्भ होने के बाद माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा Re संख्या सी-9857 /205 उत्तर रेलवे दूर संचार व 73 अन्य बनाम स्टेट ऑफ यूपी TT में आदेश दिनांक 49.022045 में Status Quo होने का संदर्भ अंकित किया गया है। इस प्रकार परियोजना में निर्माण कार्य i40720I0 तक बंद था। इसके अतिरिक्त कोविड-9 महामारी, माननीय - उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण होने के कारण निर्माण कार्य दिनांक 04.t7.20:9 से 09.:2.2009 तक बंद किये जाने का आदेश पारित किया गया। इंसके उपरांत माननीय न्यायालय द्वारा फरवरी 2020 तक निर्माण कार्य बंद किये जाने का आदेश पारित किया गया। विपक्षी द्वारा दिनांक 49.02.20I5 से 46.08.20:6 तक जीरो पीरिएड का लाभ दिये जाने का अनुरोध किया गया है।
उक्त के अतिरिक्त विपक्षी द्वारा लिखित बहस के रूप में अनुपालन आख्या दाखिल की गयी है जिसमें यह उल्लिखित है कि शिकायतकर्ता को यूनिट संख्या पी-5//704 आवंटित की गयी थी। आवंटित यूनिट की कुल कीमत vo 58,87,220 /e जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा रु० 50,46,794/ का भुगतान किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का भुगतान न करके रेरा अधिनियम की धारा i9(6) का उल्लंघन किया गया है। विपक्षी को दिनांक 06.t0.2022 को अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुके है। विपक्षी द्वारा दिनांक 03.06.2025 को | शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का भुगतान न किये जाने पर प्री-कैंसिलेशन 2 —_—e नोटिस जारी किया गया जिसमें देय धनराशि का भुगतान किये जाने का निर्धारित समय दिया गया परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया जिस कारण विपक्षी द्वारा दिनांक 2.06.2025 को आवंटित यूनिट अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी। अतः विपक्षी द्वारा उपरोक्त तथ्यों के आधार पर वर्तमान शिकायत निरस्त किये जाने का अनुरोध किया गया है। उभयपक्षों के तर्को को सुना गया। उभयपक्षो के अभिवचनों के आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किये गये :- 4. क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते हैं ? तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? 2. क्या विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नही? 3. क्या परियोजना फोर्स मैज़्योर के कारण विलम्बित हुई है? 4. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ?
निस्तारण प्रश्न संख्या-4 :- प्रश्न HeN- इस तथ्य पर विरचित है कि क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते है तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? इस सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-6745-6749 /202 “मैसर्स न्यूटेक प्रोमोटर्स एंड डेवलपर्स wo feo बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य” में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि — "54. From the scheme of the Act 206, its application is retroactive in character and it can safely be observed that the projects already completed or to which the completion certificate has been granted are not under its fold and therefore. vested or accrued rights, if any, in no manner are affected. At the same time, it will apply after getting the on-going projects and future 3 == projects registered under Section 3 to prospectively follow the mandate of the Act 206."
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा अधिनियम लागू होने से पूर्व जो भी अनुबन्ध हस्ताक्षरित हुए या अधिनियम लागू होने से पूर्व की परियोजनाओं, जहाँ पर पूर्णता प्रमाण पत्र सम्प्रवर्तक द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वहाँ पर अधिनियम का प्रवर्तन पूर्वव्यापी प्रभाव रहेगा। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन गोईंग” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते हैं। उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आर्ब्जेवेशन से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि रेरा पंजीकरण से पूर्व प्रोमोटर एवं आवंटी के मध्य अनुबन्ध निष्पादित हुए हैं, परन्तु यदि परियोजना को रेरा में पंजीकरण कराया जाता है, तो रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया है, जिसका पंजीकरण संख्या- UPRERAPRIII33 है। अतः वर्णित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना वर्तमान में-“ऑनगोईग प्रोजेक्ट” की श्रेणी में आती है। ऐसी दशा में रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। तद्नुसार प्रश्न संख्या-॥ निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 2 -:. प्रश्न संख्या 2? इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या विपक्षी द्वारा Rowand? की आवंटित यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नही? इसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा अवशेष देय धनराशि का भुगतान न किये जाने के कारण दिनांक 03.06.2025 को प्री-कैंसिलेशन नोटिस भेजा गया जिसमें io दिन में धनराशि का भुगतान का समय दिया गया परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि नहीं किया गया जिस कारण विपक्षी द्वारा दिनांक 42.06.2025 को शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों का अवलोकन किया। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के अवलोकन से विदित है कि उभयपक्षों के मध्य निष्पादित अनुबंध पत्र दिनांकित 29.:2204 के अनुसार विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा ard 208 तथा 06 माह अनुग्रह अवधि के राथ अर्थात सितम्बर 2048 में उपलब्ध 4 OTS कराया जाना था। शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट की बेसिक सेल प्राइस रु0 48,47,300 / थी जिसके क्रम में शिकायतकर्ता द्वारा रु० 50,46,794/ का भुगतान किया गया है। अनुबंध पत्र के अनुसार चरणबद्ध रूप से शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को देय धनराशि का भुगतान किया जाना था। विपक्षी द्वारा दिनांक 03.06.2025 को प्री-कैंसिलेशन नोटिस जारी किया गया। उसके पश्चात विपक्षी द्वारा दिनांक 42.06. 2025 को आवंटित यूनिट निरस्त कर दी गयी। विपक्षी द्वारा जारी प्री-कैंसिलेशन नोटिस दिनांक 03.06.2025 के अवलोकन से विदित है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को नोटिस की तिथि से io दिन में विलम्ब ब्याज के साथ अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने का समय अंकित किया गया है। यहां यह स्पष्ट किया जाता है कि विपक्षी द्वारा प्रेषित प्री-निरस्तीकरण पत्र किस माध्यम से शिकायतकर्ता को प्रेषित किये गये है इसका कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नहीं किया गया है।
इसके अतिरिक्त सामान्यतः यदि शिकायतकर्ता द्वारा समय से देय धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो विपक्षी का यह उत्तरदायी है कि वह भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) (विक्रय /पद्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 की धारा धारा 9.3 में उल्लेखित प्राविधानों के अनुसार कार्यवाही कर सकता है। धारा 9.3 में यह प्राविधानित है कि :- धारा 9.3 The Allottee shall be considered under a condition of Default, on the occurrence of the following events: i. In case the Allottee fails to make payments for 2 (two) - consecutive demands made by the Promoter as per the Payment Plan annexed hereto, despite having been issued notice in that regard the Allottee shall be liable to pay interest to the promoter on the unpaid amount at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. The Promoter must not be in default to take this benefit; ii. In case of Default by Allottee under the condition listed above continues for a period beyond 3 (three) consecutive months after notice from the Promoter in this regard, the Promoter may cancel the allotment of the [Apartment/Plot] in favour of the Allottee and refund the money paid to him by the Allottee by deducting the booking amount and the interest liabilities and this Agreement shall thereupon stand terminated. The Promoter must not be in default to take this (> & »\
benefit; Provided that the Promoter shall intimate the Allottee about such termination at least thirty days prior to such termination. उक्त प्राविधानों के अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष बकाया धनराशि का भुगतान न किये जाने पर अनुस्मरण पत्र तथा प्री-निरस्तीकरण पत्र प्रेषित किये जाने का प्राविधान है। वर्तमान प्रकरण में विपक्षी द्वारा देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु शिकायतकर्ता को दिनांक 03.06.2025 को प्री-कैंसिलेशन नोटिस की प्रति दाखिल की गयी है। विपक्षी द्वारा उपरोक्त प्राविधानों के अनुसार 2 मांग पत्र व अनुस्मरण पत्र प्रेषित किये जाने का कोई साक्ष्य दाखिल नहीं किया 4) गया है। वर्तमान प्रकरण में शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट की बेसिक प्राइस 48,47,300 / के सापेक्ष wo 50,46,794,/ का भुगतान किया गया है जो कि यूनिट की सेल प्राइस से अधिक है। उपरोक्त उल्लिखित प्राविधानों के अनुसार यदि विपक्षी द्वारा वैधानिक रूप से शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त की गय्यी है तो विपक्षी का यह दायित्व है कि वह शिकायतकर्ता द्वारागजमा की गयी धनराशि वापस शिकायतकर्ता को उपलब्ध करायें परन्तु वर्तमान प्रकरणमें विपक्षी द्वारा यूनिट के सापेक्ष शिकायतकर्ता से प्राप्त धनराशि यूनिट निरस्त कियें जाने के उपरांत शिकायतकर्ता को वापस नहीं की गयी है। इसके अतिरिक्त उपरोकत-प्राविधानों-में यह स्पष्ट-उल्लिखित है कि विपक्षी स्वयं दोषी होने की स्थिति में शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त नहीं कर सकता है। वर्तमान प्रकरण में विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा सितम्बर 2048
तक उपलब्ध कराया जाना था परन्तु विपक्षी द्वारा ऐसा कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नहीं किया गया है कि उनके द्वारा निर्धारित समय अवधि में परियोजना पूर्ण कर ओ.सी /सी.सी प्राप्त कर लिया गया हो जिस कारण विपक्षी स्वयं के दोष का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। उपरोक्त वर्णित तथ्यों के आधार पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट निरस्त किया जाना अवैधानिक है। TAG प्रश्न संख्या 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 3-: प्रश्न संख्या-3 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने के कारण विलम्बित हुई? यह प्रश्न विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी द्वारा फोर्स मैज्योर के सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण होने के कारण निर्माण कार्य दिनांक 04.44.2079 से 09. 422049 तक बंद किये ज़ाने का आदेश पारित किया गया। इसके उपरांत माननीय न्यायालय द्वारा फरवरी 2020 तक निर्माण कार्य बंद किये जाने का आदेश पारित किया गया। तत्पश्चात् BeS—t9 महामारी के कारण निर्माण कार्य बाधित होने का तर्क अंकित कियागया है। फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 के प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है कि :-
+ प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर एग्रीमेंट में कब्जा देने की आश्वासित तिथि (Promised Date) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ पजेशन की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवधि माना जाएगा।" माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या: 3029/ 985, “MLC. Mehta Versus Union of India” में पारित आदेश, दिनांक 04—74-2079 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place. id इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: 73029 /985 में पारित आदेश दिनांक 09-42-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “in the affidavit dated 05.42,.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:- 7 —S
"१2, That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (2048) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQ category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more. "” Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.”
माननीय water न्यायालय द्वारा (दिनांक 04-:-20:9 से दिनांक 44-02-2020 तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक 09-2-2049 में पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04--209 से दिनांक 09-2-2049) एवं 33 दिन(6652) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक ae 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवधि विपक्षी के नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी को उत्तरदायी ठहराना न््यायोचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकालना उचित--होगा -कि-उपर्युक्त --वर्णित- “दोनो अवधियों के लिए परियोजना को पूर्ण होने में हुए विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल-35 feat 33 दिन अर्थात् 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त कोविड-49 महामारी के सम्बंध में उ.प्र. Be अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड--49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनांक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर seq के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। 8 —_——— बच्यय्क
उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी wifas—i9 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 4 -: प्रश्न संख्या-4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता को विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जा सकता है? यदि हाँ तो ब्याज दर क्या होगी? इसे साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है। शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके उपरान्त उक्त यूनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य आवंटन पत्र दिनांक 29.2204 को निष्पादित हुआ। आवंटन पत्र के अनुसार यूनिट मार्च 20I8 तथा 06 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात् सितम्बर 2078 तक प्राप्त होना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। विपक्षी द्वारा कहा गया गया कि अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त किये जाने हेतु दिनांक 04.022024 को आवेदन किया गया। विपक्षी की ओर से ओ.सी /सी.सी प्राप्त होने का कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है। पत्रावली के अवलोकन से विदित है कि शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य दिनांक 29.:2204 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ जिसके अनुसार विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा मार्च 2048 तथा 06 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात सितम्बर 20:8 में दिया जाना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। उपरोक्त से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 07 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण
शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील wo 6649-50 /20I8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"ें ‘on उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:- का the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance afier April 20I6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
हि Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,, The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it, The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him onal is not unreasonable. अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ.प्र. रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा PAT (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40.20i8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली coors अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9.2(0) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- 30 a ——— "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along, with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +]% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को धटा॥स्+प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी merry प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2४)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। उपरोक्त तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-4 निस्तारित किया जाता है।
उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता है। | आदेश विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश पोर्टल पर अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट पुर्नस्थापित करते हुए शिकायतकर्ता से यूनिट के सापेक्ष अवशेष बची धनराशि प्राप्त कर, शिकायतकर्ता को आवंटन पत्र/अनुबंध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर यूनिट का कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय KM शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराएं। विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक ott0208 से ओ.सी /सी.सी प्राप्त होने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि BO 50,46,794/ पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। निस्तारण प्रश्न संख्या 3 के अनुसार फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए (माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 44 — =
43029 /4985 के अनुसार ) 68 दिन तथा दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 20:6 की धारा aza\(i) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी curt प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के-माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। प्रश्नगत शिकायत में इस पीठ द्वारा यथास्थिति बनाये रखने हेतु पारित आदेश को तदनुसार समाप्त किया जाता है। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। (sj @ 83 2826 3 (डा०दीपक स्वरूप WRT) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर