Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Rahul Yadav v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. NCR144030738/2019
- Decision date
- 2019-09-26
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 1 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
ह॥ उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04ए श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत संख्या-एन.सी.आर444030738 / 2049 राहुल यादव बनाम उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL Sec-I7, Plots + प्लॉट नं०-483 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर किस्तों के आधार पर 9,74,750/— रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को कब्जा दिनांक 28.0.20i3 तक दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कब्जा नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि विपक्षी द्वारा किये गये वादे के अनुसार प्लॉट विकसित नहीं है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में जमा धनराशि की wie, खाता विवरण की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं। विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि शिकायतकर्ता को उनकी नामित परियोजना वेवसिटी के Waex-i7 F यूनिट संख्या-483 आवंटित की गयी। परियोजना रेरा में पंजीकृत है, जिसमें कि पूर्णता तिथि 34.07.209 दी गयी है। परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई, जो कि उनके नियंत्रण में नहीं थी। शिकायतकर्ता को शीघ्र ही कब्जे हेतु ऑफर कर दी जायेगी। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा पीठ के समक्ष दिनांक 28.05.2049 को बताया गया कि जुलाई 202 तक कब्जा दे दिया जायेगा। ag
विपक्षी की ओर से अपने कथन के समर्थन में परियोजना के पंजीकरण प्रमाण पत्र की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विरचित किये गये :- 4... क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते ? 2... क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव 3. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये ? यदि हाँ तो ब्याज दर ? निस्तारण बिन्दु Wet बिन्दु vo 7 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। इस सम्बंध में मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या- 2737 /20i7 नीलकमल Raced सबअर्बन प्राणलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है। जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि-: The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale.
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह we है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के प्रस्तर का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता। धारा 4Q ORM के अन्तर्गत प्रोमोटर एक नई समय सीमा दे > सकता है, जो कि अनुबन्ध पर निर्भर नहीं होगा किन्तु ver समय सीमा रेरा में दिये गये “पीनल कन्सीक्वेसिज़” से बचा सकता है किन्तु उससे वह अनुबन्ध में दिये गये उत्तरदायित्वों से मुक्त नहीं होगा। इससे अवधारित किया जा सकता है कि प्रोमोटर अनुबन्ध में दिये गये कब्जे की तिथि के लिए उत्तरदायित्व है एवं विलम्ब की गणना अनुबन्ध की तिथि के अनुसार की जायेगी। वैसे भी ऑनगोईंग परियोजना रेरा की परिधि में आते है। तद्नुसार बिन्दु संख्या 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 2 बिन्दु to 2 ga आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure events) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक स्थगन आदेश, निर्णय व डिकी से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, साथ ही यह भी कहा गया कि परियोजना किसानों के उग्र प्रर्दशन, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, नोट बंदी, के कारण परियोजना प्रभावित हुई | विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है जिससे की विदित हो कि परियोजना की भूमि पर कार्य बाधित था | इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 /20:7 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में अभिनिर्धारित किया गया है:-- 4I. On behalf of Amrapali group, learned senior counsel submitted that there were force majeure conditions in completing the projects. There were legal impediments in the completion of projects within the period given in the flat-buyers agreement during the period from 20-5. The submission is baseless, It is apparent that the Full Bench of the High Court though held that the land acquisition was vitiated
but still it was upheld. The High Court did not quash it for the reason that development has taken place. Higher compensation was ordered to be paid. That order was affirmed by this Court in 20I5 in Savitri Devi v. State of U.P. (20I5) 7 SCC 2l. There was no interim stay granted by the High Court on construction work, is made clear by the Noida and Greater Noida authorities. There was no room to entertain any doubt as to the fact whether for a particular village the acquisition had been quashed. There was no quashing of land acquisition and moreover, there was no stay. Only higher compensation was ordered to be paid. There was no force majeure condition or any legal impediment as such the period from 20I to 205 cannot be treated as a moratorium period vis-a-vis the dues of Noida and Greater Noida authorities. The submission made as to the farmers’ agitation etc. is too vague and 30% of the projects have come up; whereas 70% have not yet come up, out of the projects in Noida and Greater Noida alone. उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि वर्ष 2044 से वर्ष 2045 के मध्य निर्माण कार्य पर कोई स्थगन आदेश नहीं थे, जो कि नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण द्वारा दर्शित किया गया और इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2044 से वर्ष 205 के बीच कोई फोर्स मैज्योर कारण या विधिक रूप से रोक नहीं था। जहाँ तक किसानों का उग्र ude की बात है, वह निराधार है। चूंकि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी यह स्पष्ट किया जा चुका है कि वर्ष 2044 से वर्ष 205 के बीच कोई फोर्स मैज्योर नहीं था।
इसके अतिरिक्त इसी आदेश में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 /20:7 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया हैः- Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature. उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तदनुसार बिन्दु wo 2 निस्तारित किया जाता है। »; निस्तारण बिन्दु to 3 शिकायतकर्ता का कहना है कि परियोजना दिनांक 28.04.2043 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। विपक्षी प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कहा गया कि रेरा में परियोजना की पूर्णता तिथि 34.07.2024 दी गयी है। इसके अतिरिक्त पीठ के समक्ष विपक्षी द्वारा कहा गया कि जुलाई 2024 तक कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना की पूर्णता तिथि निकट की तिथि नहीं है। ऐसे में यह उचित होगा कि विपक्षी, शिकायतकर्ता को वैकल्पिक यूनिट उपलब्ध करायें अन्यथा उनकी जमा धनराशि मय ब्याज सहित वापस करें। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स en vat धनराशि का उपभोग किया गया है। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20:6 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को ali
भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (fea ,/पटटा के लिए करार) नियमावली ros अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के we 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें wee 9 (7) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर offi) F निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को ॥४टा॥+ प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्ब के लिए ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी McLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में सिविल अपील Wo 6649-50 ,/2048 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो की तिथि तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी रे 7 होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तद्नुसार बिन्दु सं0-3 निस्तारित किया जाता है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि शिकायतकर्ता की सहमति से अपने किसी अन्य परियोजना में पूर्व में तय दरों पर समकक्ष इकाई का वैकल्पिक यूनिट का दिसम्बर 20i9 तक ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराये।
2. विपक्षी को यह भी आदेशित किया जाता है कि अनुबन्धित अवधि के पश्चात् से दिनांक 30.4.20i6 तक अनुबन्ध के अनुसार व दिनांक 04.05. 2046 से ओ.सी./ सी.सी. या कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक की अवधि के लिए शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर ८,२+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें| ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर निमयानुसार वापस की जायेगी | 3. यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2046 के धारा 2 (za)(i) के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज दर MCLR+I प्रतिशत होनी चाहिए। 4... विपक्षी, शिकायतकर्ता को दिनांक 34.42.209 तक कब्जा देने में असफल रहता है, तो दिनांक 34.42.2049 के पश्चात् 30 दिनों के अन्दर शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि 9,74,750/— रूपये MCLR+I प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर सहित अदा करना सुनिश्चित करें। यदि इस इकाई पर बैंक ऋण बैंक ऋण लिया गया हो, तो पहले भुगतान बैंक को की जाये और शेष धनराशि शिकायतकर्ता को वापस की जाये है“ 8 5... इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0मू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक | /op/ 2049 9 a Se een (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण