Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Vibhash Pandey v. La Residentia Developers Private Limited
Complaint No. NCR144/12/103592/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2023-06-05
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू--सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04ए आदेश अन्तर्गत ast श्री राजीव कुमार, माननीय अध्यक्ष कम संख्या शिकायत संख्या | Se । ॥ |] २८टा२44/09/]00780/2022 नीलम 2 NCRI44/09/9994/2022 नीरज कुमार 3 NCRI44/09/0084/2022 प्रवीन चौधरी 4 7८7९44/]2/03292/2022 मंजू गुप्ता 5 टा२44/ 2/03592/2022 विभाष पाण्डेय शिकायतकर्ता (नीलम) के साथ 04 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किये गये हैं। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान हैं और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें विपक्षी की परियोजना La Residentia से सम्बन्धित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत बनाम ला रेजिडेन्सिया डेवलपर्स io feo संख्या :- NCR44/09/00780/2022, नीलम अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्द जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में अग्रणी शिकायतकर्ता (NCR44/09/00780/2022, नीलम) का कथन है कि उनके द्वारा दिनांक 49.02.2043 को विपक्षी की परियोजना La Residentia 4 फ्लैट संख्या-प-37-703 बुक कराया गया था, जिसकी कुल कीमत 47,04,420 /— Qv 2
रूपये थी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा 38,70,8i2/— रूपये की धनराशि का भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट का कब्जा अक्टूबर, 20I6 में दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा 40 वर्ष उपरान्त भी अभी तक प्रश्नगत यूनिट का कब्जा नहीं दिया गया, जबकि शिकायतकर्ता द्वारा वर्ष, 2048 में ही 80 प्रतिशत धनराशि का भुगतान किया जा चुका है। विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना स्थल पर कोई निर्माण कार्य नहीं किया जा रहा है। अतः शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में आवेदन फार्म दिनांकित 49.02.2043 की प्रति, एलॉटमेन्ट कम फ्लैट बायर एग्रीमेन्ट दिनांकित 44.04.2043 की प्रति, जमा धनराशि की रसीदों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है। विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दिनांकित 25.04.2023 दाखिल करते हुए कहा गया है कि प्राधिकरण द्वारा प्लॉट नं०-06प्त-06, क्षेत्रफल 97,226.62 वर्ग मीटर आवंटित किया गया, जिसको बाटते हुए मैसर्स लॉ रेसीडेन्सिया डेवलपर्स प्रा0 लि0 को प्लॉट *O-GH-06A, क्षेत्रफल 80026.62 वर्ग मीटर आवंटित किया गया। परियोजना दिनांक 76.03.204 को लॉन्च की गयी थी। परियोजना में कुल 39 टॉवर्स है।
परियोजना के फेज-4 में कुल is cad (टॉवर-4 से 48 तक) हैं, जिसमें 7408 यूनिटस् हैं। उक्त टॉवर्स में से 42 टॉवर्स का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है और अवशेष टॉवर्स का ओ.सी. प्राप्त किये जाने हेतु ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के समक्ष आवेदन किया जा चुका है। जिन टॉवरों का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है, उसमें यूनिटों का कब्जा दिया जा रहा है और वर्तमान में 4255 यूनिटों का कब्जा दिया जा चुका है। परियोजना के फेज़-2 में कुल 44 टॉवर्स (टॉवर-49 से 29 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2024 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना के फेज़-3 में कुल 40 टॉवर्स (टॉवर-30 से 39 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2025 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा और सभी सुविधाओं सहित दिसम्बर, 2025 तक कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना विभिन्न न्यायालय के आदेशों के कारण विलम्बित हुई। दिनांक 9.07.2044 से दिनांक 24.0820I2 तक निर्माण कार्य बन्द रहा। इस अवधि में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष किसानों द्वारा कई Re याचिकायें योजित की गयी। मार्च 203 के बाद निर्माण कार्य धीमी गति से शुरू हुआ। मार्च 2044 से वर्ष 2043 तक निर्माण कार्य की गति बहुत धीमी रही। arta: दिनांक 44.05.2045 को माननीय सर्वोच्च. न्यायालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को Re याचिका 98 3 संख्या-4506 /“ 2045 “सावित्री देवी बनाम उ0प्र0 सरकार एवं आदि” में स्वीकृति दी गयी। ऐसे में 4 वर्ष विलम्ब को शून्य पीरियड माना जाना चाहिए ।
विपक्षी की परियोजना रेरा में पंजीकृत है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 23.07.209 को 632 यूनिटों को आम्रपाली ग्रुप को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। विपक्षी कंपनी ने Re याचिका संख्या o40/20:7 “flea चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य" में एक हस्तक्षेप आवेदन दायर किया, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कम्पनी ला रेजिडेन्सिया को दिनांक 44.0.2049 के आदेश के माध्यम से किसी भी संपत्ति को अलग करने से रोक दिया। अतः विगत 22 माह से इसकी पुनर्विक्रय पर रोक के कारण कंपनी परियोजना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और इसने कंपनी को संकट में डाल दिया है, इस कारण कंपनी का नकदी प्रवाह भी प्रभावित होता है। इस सुस्त कारोबारी माहौल के साथ कंपनी / परियोजना को और अधिक प्रभावित किया है, फिर भी कंपनी निर्माण कार्य को प्रारम्भ करने का प्रबंधन कर रही है, निषेधाज्ञा आदेश के कारण निर्माण धीमा हो गया है, अनुपालन बाधा आदेश में विपक्षी ने पहले ही एक हलफनामा दायर किया है।
शिकायतकर्ता द्वारा उनकी परियोजना के टॉवर-'-37 के 7वें तल पर फ्लैट संख्या-703 बुक कराया गया था। शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं 32,68,439 /- रूपये एवं 8,98,i56/— रूपये बैंक से गृह ऋण का भुगतान किया गया। अनुबन्ध दिनांक 44.04.2043 के अनुसार यूनिट का कब्जा 42 माह + 6 माह ग्रेस पीरियड दिया जाना था। यदि यूनिट का कब्जा दिये जाने में देरी की जाती है, तो वह अनुबन्ध के प्रस्तर-49(०) के अनुसार क्षतिपूर्ति अदा करेगें। wea परियोजना में फिनिशिंग का कार्य तीव्र गति चल रहा है और जून, 2025 + 6 माह ग्रेस पीरियड में शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। रेरा प्राधिकरण द्वारा दिनांक 49.04.2023 को रेरा अधिनियम की धारा-6 सपठित धारा-8, धारा-7 तथा उ0प्र0 रेरा नियमावली के नियम-7 के अन्तर्गत आदेश पारित करते हुए प्रश्नगत परियोजना को पूर्ण करने हेतु जून, 2025 तक का समय प्रदान किया गया है। इन आधारों पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को जून, 2025 + 6 माह ग्रेस पीरियड सहित कब्जा दिये जाने हेतु समय प्रदान किये जाने का अनुरोध किया गया है। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में रेरा प्राधिकरण द्वारा दिनांक 49.04.2023 को रेरा अधिनियम की धारा-6 सपठित धारा-8, धारा-7 तथा उ0प्र0 रेरा नियमावली के नियम-7 के अन्तर्गत पारित आदेश की प्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के caf को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किये गये Ty 0 क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते हैं ? व क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ?
2. क्या force majeure events होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलम्बित हुई? यदि हाँ तो प्रभाव? 3. क्या शिकायतकर्तागण की जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलायी जा सकती है? निस्तारण बिन्दु संख्या-4 बिन्दु संख्या gu तथ्य पर विचरित है कि क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते है तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? इस सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-6745--6749 /202 “मैसर्स =H प्रोमोटर्स एंड डेवलपर्स प्रा० लि0 बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य” में दिये गये निर्णय में स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि :- 54. From the scheme of the Act 20I6, its application is retroactive in character and it can safely be observed that the projects already completed or to which the completion certificate has been granted are not under its fold and therefore, vested or accrued rights, if any, in no manner are affected. At the same time, it will apply after getting the on-going projects and future projects registered under Section 3 to prospectively follow the mandate of the Act 206."
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा अधिनियम लागू होने से पूर्व जो भी अनुबन्ध हस्ताक्षरित हुए या अधिनियम लागू होने से पूर्व की परियोजनाओं, जहाँ पर पूर्णता प्रमाण पत्र सम्प्रवर्तक द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वहाँ पर अधिनियम का प्रवर्तन पूर्वव्यापी प्रभाव रहेगा। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन गोईंग” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते हैं। उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आर्ब्जेवेशन से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि रेरा YY पंजीकरण से पूर्व प्रोमोटर एवं आवंटी के मध्य अनुबन्ध निष्पादित हुए हैं, परन्तु यदि परियोजना को रेरा में पंजीकरण कराया जाता है, तो रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। विपक्षी द्वारा wera परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया है। अतः वर्णित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना वर्तमान में “ऑनगोइईंग प्रोजेक्ट” की श्रेणी में आती है। ऐसी दशा में रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। इसके अतिरिक्त Re याचिका संख्या-2737,// 2047 “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन wo feo बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” के उद्धरत प्रकरण में माननीय बम्बई उच्च न्यायालय द्वारा कहा गया है कि :-
"The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(l)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale." उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के Te का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता और किसी आवंटी विशेष के प्रकरण में विलम्ब की गणना बी.बी.ए. के प्राविधानानुसार गणना होगी। रेरा पंजीकरण के समय दी गई नई समय-सीमा केवल रेरा अधिनियम के अधीन “पीनल कॉन्सीक्वेसिज” से ही बचा सकता है। स्पष्टतया विलम्ब की गणना आवंटन /अनुबन्ध के अधीन होगी एवं वह प्राविधान रेरा में दी गई तिथि से “ओवररिटिन” नहीं होगी। तद्नुसार बिन्दु संख्या-4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2 बिन्दु संख्या-2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई ? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि परियोजना विभिन्न न्यायालय के आदेशों के कारण विलम्बित हुई | मार्च 2044 से वर्ष 2043 तक निर्माण कार्य की गति >
बहुत धीमी रही। अन्ततः माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को Re याचिका संख्या-4506 /20i5 “सावित्री देवी बनाम उ0प्र0 सरकार एवं आदि” में स्वीकृति दी गयी। ऐसे में 4 वर्ष विलम्ब को शून्य पीरियड माना जाना चाहिए। यद्यपि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या निर्माण पर कोई स्थगनादेश था तथापि प्रस्तुत प्रकरण में अनुबन्ध af 20:7 का है एवं तब तक भूमि सम्बन्धी प्रकरण निर्णीत हो चुके थे। इस सम्बन्ध में अनुबन्ध के TER %(a) निम्नलिखिल उल्लेखित है:- 79(4)... एमद्वा the Developer shall complete the development/construction of the flat within 42 months from the date of signing of agreement which may very for + 6 months. That the Developer shall not be held responsible or liable for not performing any of its obligations or undertakings provided for in this Agreement if such performance is prevented, delayed or hindered by act of God, fire, storm, flood, explosion, war, riot, terrorist act, sabotage, court cases, injunctions not within the reasonable control of the Developer. The completion date is subject to force majeure conditions. No claim by way of damages/ compensation shall lie against the Developer in case of delay in handing over the possession on account of the force majeure condition and the Developer shall be entitled to a reasonable extension of time for the delivery of possession of the flat to the allottee. माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील Weet-73029/985 “एम. सी. मेहता बनाम भारत सरकार” में पारित आदेश दिनांक 04.4.2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है :-
With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place. ay इसके अतिरिक्त उपरोक्त सिविल अपील संख्या-43029 / 4985 में पारित आदेश दिनांक 09.42.2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है :- In the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:-
॥]2., That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more." Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक 04.44.209 से दिनांक 44.02.2020) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश दिनांक 09.42.2049 में पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04.4.2049 से दिनांक 09.220I9) एवं 33 दिन (6652) (दिनांक 70.2.209 से दिनांक 44.02.2020 तक साँय 6 बजे से सुबह 6 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। अतः उपरोक्त उल्लेखित आदेशों के कम में कुल 68 दिनों में निर्माण प्रभावित रहा। विपक्षी ऐसी दशा में कुल 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण आंशिक रूप से लाभ पाने का अधिकारी है। oly” 8 समस्त सुसंगत तथ्यों पर विचारोपरान्त उ0प्र0 रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनाक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता के अतिदेय पर कोई fers ब्याज लिया जायेगा। तदूनुसार बिन्दु संख्या-2 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या--3
निस्तारण बिन्दु संख्या-3 इस आशय से विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्तागण की जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलायी जा सकती है? यह वाद बिन्दु शिकायतकर्तागण के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्तागण पर है। शिकायतकर्ता (नीलम) द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट का कब्जा अक्टूबर, 2046 में दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा to वर्ष उपरान्त भी अभी तक प्रश्नगत यूनिट का कब्जा नहीं दिया गया, जबकि शिकायतकर्ता द्वारा वर्ष, 2048 में ही 80 प्रतिशत धनराशि का भुगतान किया जा चुका है। विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना स्थल पर कोई निर्माण कार्य नहीं किया जा रहा है। अतः शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है।
इस पर विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दिनांकित 25.04.2023 दाखिल करते हुए कहा गया है कि परियोजना के फेज़-4 में कुल t8 cad (टॉवर-4 से 48 तक) हैं, जिसमें 4,408 यूनिटस् हैं। उक्त टॉवर्स में से 42 टॉवर्स का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है और अवशेष टॉवर्स का ओ.सी. प्राप्त किये जाने हेतु ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के समक्ष आवेदन किया जा चुका है। जिन टॉवरों का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है, उसमें यूनिटों का कब्जा दिया जा रहा है और वर्तमान में 4255 यूनिटों का कब्जा दिया जा चुका है। परियोजना के फेज-2 में कुल 44 टॉवर्स (टॉवर-49 से 29 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2024 + 6 माह da पीरियड में यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना के फेज-3 में कुल ॥0 टॉवर्स (टॉवर-30 से 39 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2025 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा और, सभी सुविधाओं सहित & दिसम्बर, 2025 तक कब्जा दे दिया जायेगा। रेरा प्राधिकरण द्वारा दिनांक 49.04.2023 को रेरा अधिनियम की धारा-6 सपठित धारा-8, धारा-7 तथा उ0प्र0 रेरा नियमावली के नियम-7 के अन्तर्गत आदेश पारित करते हुए प्रश्नगत परियोजना को पूर्ण करने हेतु जून, 2025 तक का समय प्रदान किया गया है। इन आधारों पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को जून, 2025 + 6 माह ग्रेस पीरियड सहित कब्जा दिये जाने हेतु समय प्रदान किये जाने का अनुरोध किया गया है। पत्रावली पर शिकायतकर्ता (नीलम) द्वारा दाखिल एलॉटमेन्ट कम फ्लैट बायर Wire दिनांक 44.04.2043 के प्रस्तर-9() में निम्नलिखित उल्लेख किया गया a
I9(a). That the Developer shall complete the development/construction of the flat within 42 months Jrom the date of signing of agreement which may very for + 6 months. अत: उपरोक्तानुसार शिकायतकर्ता को अनुबन्ध निष्पादित किये जाने की तिथि 4.04.20i3 से 42 + 6 माह (भ्रेस पीरियड) अर्थात् दिनांक t4.04.20:7 + 68 दिन (इसके अतिरिक्त फोर्स मैज्योर के मद में विपक्षी कुल os दिन की अवधि के लिए लाभ पाने का अधिकारी है, जैसा कि निस्तारण बिन्दु संख्या-2 में वर्णित है|) अर्थात् दिनांक 24.06.2047 तक प्रश्नगत यूनिट का कब्जा दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। वर्णित स्थिति में यह स्पष्ट है कि विपक्षी की प्रश्ननत परियोजना लगभग 5.5 वर्ष विलम्बित है। एलॉटीज़ द्वारा धनराशि वापस किए जाने व परियोजना में बने रहने वाले एलॉटीज के हितों में ager के प्रसंग में “चित्रा शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया“ (744 /2047) के निर्णय में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय के प्रस्तर-40 में निम्न ऑ्ब्जेवेशन किया है :- "As we have stated earlier, an amount of Rs 750 crores is lying in deposit before this Court pursuant to the interim directions, on which interest has accrued. The home buyers have earnestly sought the issuance of interim directions to facilitate a pro-rata disbursement of this amount to those of the home buyers who seek a refund. "We are keenly conscious of the fact that the claim of the home buyers who seek a refund of monies deserves to be considered with empathy. Yet, having given our anxious consideration to the plea and on the balance, we are not oo 0
inclined to accede to it for more than one reason. Firstly मिमी Secondly, the figures which have been made available presently, following the opening of the Web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund." इसके अतिरिक्त रेरा के गठन के सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940,/2047 “बिकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य” में दिनांक 23.07.209 को परित आदेश के पृष्ठ संख्या-244 के प्रस्तर-420 में निम्नवत् उल्लेख किया है:-
"Tt is apparent that RERA intends protection of home- buyers and aims at completion of the buildings. The buildings have to be completed, for that, we are required to pass orders. We have already assigned the task to NBCC for completion of buildings as the promoters/builders have failed to complete the building within the time fixed and the time which could have been extended. Now, more than 0 years have passed and buyers were given the assurances that they would get flats within three years period by the promoter/builder. The maximum time fixed in RERA has also expired and extension could not have been beyond | year." उक्तानुसार यह स्पष्ट किया गया है कि रेरा आवंटियों के हितों को संरक्षित करने के लिए है और उसका लक्ष्य यह है कि प्रोमोटर्स द्वारा बिल्डिंग के समस्त विकास कार्यों को पूर्ण कराते हुए गृहकेताओं को उनका आवास, फ्लैट मिल सके। तत्कमानुसार आदेश के पृष्ठ संख्या-255 के प्रस्तर-437 में निम्नवत् उल्लेख किया है:- "The provisions of RERA are beneficial to the home buyers and are intended to insulate them from s 4 4 fraudulent action, ensures completion of the building and it is the duty of the court to protect and ensure the home buyers’interest and at the same time to hold them responsible for the duties enjoined upon them under the said statute. We are not absolving the home buyers from the discharge of their liability if any. At the same time, they have the right of enforcement of their right for compensation due to undue delay in completion of the project."
उक्त आब्जर्वेशन में यह भी we किया गया है कि रेरा के प्राविधान गृहकेताओं के लिए लाभकारी हैं और किसी प्रकार के विश्वासघात होने से आवंटियों के हितों को संरक्षित करने के लिए हैं एवं बिल्डिंग को पूर्ण कराने हेतु निगरानी का कार्य रेरा का है और wert के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व अधिनियम में तय किये गये हैं। यह भी लाभ दिया गया है कि परियोजना विलम्ब होने पर गृहकेताओं का यह अधिकार होगा कि वह विलम्ब के लिए परियोजना पूर्ण होने तक नियमानुसार ब्याज पा सके। प्रश्नगत प्रकरणों में विपक्षी द्वारा पत्रावलियों पर प्रश्नगत परियोजना "La Residentia", जिसका पंजीकरण GAI-UPRERAPRI9357 में सचिव, रेरा द्वारा अधिनियम की धारा-6 सपठित धारा-8, धारा-7 तथा उ0प्र0 रेरा नियमावली के नियम-7 के अन्तर्गत पारित आदेश दिनांक 49.04.2023 की प्रतिलिपि दाखिल की गयी है, जिसके पृष्ठ संख्या-4 पर निम्नवत् उल्लिखित है :- “eee ERY BRT समस्त POT HMA एवं प्रोग्रोटर के मौखिक अभिकथनों पर wo उच्चतम न्यायात्रय को roe दिनांक 20.05.2022, रेश अधिनियम तथा उग्र OT नियमावली के आविधानों तथा प्राधिकरण स्तर पर प्ररियोजनाओं को पंजीकरण विस्तार eg निर्धारित व्यवस्थाओं को आलोक में were विचार किया गया तथा आवूर्टियों के हितों का सरक्षण सुनिश्चित करने एवं tr अधिनियम के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अधिनियम की धार--6 सपठित धारा 8 तथा 37 एवं TH. रेय नियमावली के नियम-7 में Ted शक्तियों का उपयोग करते हुए परियोजना का पंजीकरण निम्नवत विस्तारित करने का निर्णय लिया गया -- (#) ग्राधिकरण द्वारा परियोजना का पंजीकरण विस्तार दिनांक 30.06.2025 तक सैद्धांतिक रूप से agra क्रिया यया परन्तु यह Wares लगाया गया te आरम्भ में परियोजना का विस्तार हि 2
प्रमाण पत्र मात्र 08 माह अर्थात् दिनांक 30.06.2023 के लिए निर्ग किया जाएगा और परियोजना में निर्माण तथा विकास कार्य संतोषजनक होने पर अग्रतर पंजीकरण (विस्तार FAT पत्र 6-6 WE के अन्तराल पर जारी किए जाएंगे/................. “ उपरोक्त आदेश के अनुसार प्रश्नगत परियोजना के पूर्णता की तिथि दिनांक 30.06.2025 अंकित की गयी है। प्रकरणों में वर्तमान में विपक्षी द्वारा न तो शिकायतकर्तागण को acy का कब्जा अनुबन्धानुसार समय से प्रदान किया गया और न ही विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण की जमा धनराशि वापिस की गयी है। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण से प्राप्त धनराशि का उक्त अवधि में उपभोग किया गया है। चूंकि शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि मय ब्याज वापस प्राप्त किये जाने हेतु आवेदन किया गया है, परन्तु विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण की जमा धनराशि वापिस नहीं की गयीं। समस्त तथ्यों वर्णित परिस्थितियों में यह उचित होगा कि विपक्षी, शिकायतकर्तागण की जमा धनराशि मय ब्याज सहित वापिस करें। इस सम्बन्ध में रेशा अधिनियम के oeesia(t) J स्पष्ट रूप vec है कि :- 48. (0) If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,— (a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason,
he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the Vr 3) handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. उपरोक्तानुसार यदि प्रोमोटर करार के निबन्धों के अनुसार उसमें दिये गये अवधि तक समय से किसी अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन को पूरा करने में असफल रहता है या कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो वह उपलब्ध किसी अन्य उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना आवंटी की मांग पर यदि आवंटी परियोजना से बाहर होना चाहता है, तो प्रकरण के अनुसार, उस अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन के सम्बन्ध में उसके प्राप्त धनराशि ब्याज सहित लौटाने का दायी होगा। यह भी स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण को एक निर्धारित अवधि तक कब्जा देना था, जिसको विपक्षी द्वारा पूर्ण करने का दायित्व था, परन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक शिकायतकर्तागण को प्रश्नगत यूनिट का कब्जा नहीं दिया गया और प्रश्नगत परियोजना विलम्बित है। अतः शिकायतकर्तागण रेरा अधिनियम की धारा-48()(ए) के अन्तर्गत वह परियोजना से बाहर आने का अधिकारी है।
इसके अतिरिक्त इस सम्बन्ध में माननीय उच्चतम न्यायालय के सिविल अपील संख्या-3482 / 2049 “कोलकाता बेस्ट इंटरनेशनल सिटी प्राणलिए0 बनाम देवाशीष war’ में स्पष्ट रूप से अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "It would be manifestly unreasonable to construe the contract between the parties as requiring the buyer to wait indefinitely for possession. By 20l6, nearly seven years had elapsed from the date of the agreement. Even according to the developer, the completion certificate was received on 29 March 20I6. This was nearly seven years after the extended date for the handing over of possession prescribed by the agreement. A buyer can be expected to wait for possession for a reasonable period. A period of seven years is beyond what is reasonable. Hence, it would have been manifestly unfair to non-suit the buyer merely on the basis of the first prayer in the reliefs sought before the SCDRC. There was in any event a prayer for refund. In the circumstances, we are of the view that the orders passed by the SCDRC and by the NCDRC for refund of moneys were justified." साथ ही इसी कम में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सिविल अपील संख्या-42238 / 2048 “पायनियर ada लैन्ड एवं इन्फास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गोविन्द राघवन“ में भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- x 34
"9, We see no illegality in the Impugned Order dated 23.0.208 passed by the National Commission. The Appellant — Builder failed to fulfill his contractual obligation of obtaining the Occupancy Certificate and offering possession of the flat to the Respondent — Purchaser within the time stipulated in the Agreement, or within a reasonable time thereafter. The Respondent - Flat Purchaser could not be compelled to take possession of the flat, even though it was offered almost 2 years after the grace period under the Agreement expired. During this period, the Respondent - Flat Purchaser had to service a loan that he had obtained for purchasing the flat, by paying Interest @0% to the Bank. In the meanwhile, the Respondent — Flat Purchaser also located an alternate property in Gurugram. In these circumstances, the Respondent — Flat Purchaser was entitled to be granted the relief prayed for i.e. refund of the entire amount deposited by him with Interest." उपरोक््तानुसार दी गयी विधि व्यवस्था में गृहक़ेता को एक उचित समय तक प्रतीक्षा कराया जा सकता है। पूर्णता प्रमाण पत्र प्राप्त होने के उपरान्त भी शिकायतकर्तागण जमा धनराशि पाने के अधिकारी हैं। चूंकि परियोजना समय से पूर्ण नहीं की गयी है। ऐसी दशा में शिकायतकर्तागण जमा धनराशि मय ब्याज पाने का अधिकारी है।
जहाँ तक शिकायतकर्तागण को मय ब्याज धनराशि वापस किये जाने का प्रश्न है, तो इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय के सिविल अपील संख्या-2737 /2047 “नीलकमल रियलटर्स सबशअर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent aol dls} withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable" अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
WI एक्ट की धारा 2(2०) में प्राविधान है कि :- (za) "interest" means the rates of interest payable by the promoter or the allottee, as the case may be. Explanation.—For the purpose of this clause— (i) the rate of interest chargeable from the allottee by the promoter, in case of default, shall be equal to the rate of interest which the promoter shall be liable to pay the allottee, in case of default; (ii) the interest payable by the promoter to the allottee shall be from the date the promoter received the amount or any part thereof till the date the amount or part thereof and interest thereon is refunded, and the interest payable by the allottee to the promoter shall be from the date the allottee defaults in payment to the promoter till the date it is paid; जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 7.:0.20I8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के WN 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, 26 जिसमें प्रस्तर 927i) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी eg प्राविधानित है किः-
"The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:" यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी were 9.3(प) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को sar प्रतिशत की ब्याज दर पर धनराशि वापस दिलाये जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा Re याचिका संख्या-सी-3289 /2020 “wal festa कस्ट्रक््शन्स प्रा.लि. बनाम पूनम सूद एवं अन्य“ में दिनांक 06.02.2020 को पारित निर्णय में यह उल्लेखित किया गया है कि:-
Coming to the next ground of challenge to the impugned order by the petitioner's counsel that the interest awarded by respondent no.l (MCLR+l) is excessive, is also without any merit. It is an admitted fact to the petitioner that respondent no.! had booked a flat and till the filing of the writ petition, the possession of the flat has not been given to him. The interest had been awarded in terms of Clause 9.2(ii) of the form of agreement contained in the U.P. Real Estate (Regulation and Development) (Agreement for Sale/Lease) Rules, 208. The respondent no.2 has given cogent reasons in the impugned order. Respondent no.2 has rightly placed reliance on Clause 9 sub-clause(ii) of the Rules, 208 which provides that in the event of default on the part of the promotor, the allottee shall have the option of terminating the agreement in which case the promoter shall be liable to refund the entire money paid by the allottee under any head whatsoever, towards the purchase of the flat at the rate of MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided os हक otherwise under the Rules within forty-five days of receiving the termination notice. Learned counsel for the petitioner has failed to bring to our notice any Rule in the Rules, 206, providing otherwise. तत्पश्चात् रिट याचिका derwi-920/2020 “हैबीटेक इंफास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम उ0प्र0 राज्य सरकार एवं अन्य“ में दिनांक 06.07.2020 को महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन देते हुए यह उल्लेखित किया है कि:-
On 2.09.20l9 the respondent authority directed the petitioner to refund the entire amount alongwith interest @ MCLR + [% from the date of deposit till the date of order. Thereafter, recovery certificate and citation was issued on 07.02.2020...................---००००-०००-- and only on complaint under Section 8 authority proceeded to direct for the refund of the money alongwith payment of interest @ MCLR + %, which was in view of Real Estate (Regulation & Development) (Agreement to Sale) Regulations, 208.......ccccseeseeeeeseees Thus power of refund of amount along with interest which has been provided under Section 48, with the authority was rightly exercised by it in the interest of justice. माननीय उच्च न्यायालय द्वारा भी रेरा प्राधिकरण के पीठ द्वारा नियमावली के अन्तर्गत MCLR+% की वार्षिक ब्याज दर से दिये गये आदेश को उचित एवं सही माना है। अतः उपरोकतानुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से यह अवधारित किया जा सकता है कि राज्य सरकार द्वारा नियमावली के अन्तर्गत निर्धारित की गयी ब्याज दर उचित एवं सही है। ब्याज दर को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के MCLR+ प्रतिशत से सम्बद्ध करने के सिद्धान्त को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी स्वीकारा गया है और न्यायोचित ठहराया है।
ऐसे में उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गयी भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास), (विकय पट्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 के अन्तर्गत निर्धारित की गयी वार्षिक ब्याज दर MCLR+ प्रतिशत, जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अधिकतम ब्याज दर से १ प्रतिशत ज्यादा है, उचित एवं सही है। तद्नुसार बिन्दु संख्या-3 निस्तारित किया जाता है। 9 48 उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश प्रस्तुत प्रकरणों में विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्तागण द्वारा दी गयी समस्त धनराशि दिनांक 30.06.2025 के बाद 45 दिनों के अन्दर MCLR+% की ब्याज दर सहित वापिस अदा करना सुनिश्चित करें। शिकायतकर्तागण यदि चाहे तो दिनांक 30.06.2025 तक विपक्षी को कब्जे हेतु लिखित पत्र देकर अनुबन्धानुसार अकाउन्ट सैटेल कर यूनिटस् का भौतिक कब्जा प्राप्त कर सकते हैं। इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बन्धित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस आदेश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। इस आदेश का Verda भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20:6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। यदि विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्तागण को यह अधिकार होगा कि रेरा प्राधिकरण के माध्यम से अपने आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। दिनांक :--5 / 06 / 2023 ऊना peer arile (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण