Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Piyush Gupta v. ATS Realty Private Limited
Complaint No. NCR144/12/103470/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2026-03-19
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
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Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर ह पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थित:-- sto दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम ज्ञकायत den | शिकायतकर्ता | a जमा घनराशि रु० | आवंटन की अनुबंधानुसार | | ष सं०0 न0 तिथि कब्जा दिये जाने | | की तिथि T,_ ग्टर44/2/03470/2022 पीयूष गुप्ता 4042 | G0 38,37,304/ | 4.02.2074 | 42 माह + 03 यूनिट का माह अनुग्रह कब्जा व | अवधि अर्थात | विलम्बित नवम्बर 2077.. | अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। | बनाम एटीएस रिएलटी प्रा. लि. शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्ध यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतुल्यह शिकायत संस्थित की<गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना ATS ALLURE में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि Go 33,37,300/ oT भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत पृष्ठ पर उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा सेक्शन प्लान के अनुसार निर्धारित अवधि में निर्माण कार्य पूर्ण नहीं किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष धनराशि का भुगतान किया जा चुका है। अतः शिकायतकर्ता ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के समर्थन में आवंटन पत्र, ओ.सी व रसीदों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी हैं। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् है:- क्रम विवरण दिनांक भुगतान की गई धनराशि संख्या (रु0)
4 विपक्षी द्वारा जारी रसीद संख्या 0704 02.44.2043 BO 6,43,989 / रसीद संख्या 0705 02.7.203 रु0 5,00,000 / रसीद सख्या 6020 23.44.2045 रु0 4,6,59 / रसीद संख्या 0058 34.05.2046 BO 2,35,772/ रसीद संख्या 2430 20.03.2045 रु0 ,6,058 / रसीद संख्या 3845 25.07.2045 रु0 7,6,549 / रसीद संख्या 4447 26.08.2045 रु0 4,46,58/ रसीद सख्या 4883 23.09.2045 BO ,6,548 / रसीद संख्या 5648 23.0.2048 BO ,6,548 / रसीद संख्या 6908 30.2.2045 BO 4,6,800 / रसीद संख्या 7667 03.02.206 BO 2,33,39 / रसीद संख्या 8337 09.03.2046 PO ,6,656 / रसीद संख्या 8883 34.03.206 GO 4,6,659 / रसीद संख्या 9777 26.04.2046 BO 4,6,662/ रसीद संख्या 0660 29.06.2046 BO 2,35,284/ रसीद संख्या 4302 30.07.2046 BO 2,35,289 / रसीद संख्या 0420 06.09.2046 BO 2,35,288 / रसीद संख्या 2256 28.09.2046 BO 2,35,288 / रसीद संख्या 2545 49.40.206 BO 4,7,645 / कुल योग : रु० 387,.30/.__
विपक्षी की ओर से जवाब दाखिल करते gy यह अंकित किया गया है कि शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाया है कि विपक्षी ने अनुबंधात्मक दायित्व (Contractual Obligation) का उल्लंघन किया है जिस कारण इसका निस्तारण किये जाने का क्षेत्राधिकार सिविल कोर्ट का है। इस कारण वाद को निरस्त किया जाए। शिकायतकर्ता द्वारा लगाये गये आरोप का निस्तारण करने का क्षेत्राधिकार प्राधिकरण को नहीं है, जिसके समर्थन में हरियाणा अपीलीय न्यायालय चण्ड़ीगण द्वारा अपील संख्या 6 /20i8 समीर महावर बनाम एमजी हाउसिंग प्रा. लि. में पारित निर्णय का संदर्भ अंकित किया है। वर्तमान प्रकरण शिकायतकर्ता ने गलत तथ्यों पर विपक्षी को परेशान किये जाने हेतु दायर किया है। शिकायतकर्ता ने समय से धनराशि का भी भुगतान नहीं किया है। विपक्षी शिकायतकर्ता को समय अवधि के अन्दर यूनिट का कब्जा दिये जाने के लिए बचनबद्ध था परन्तु फोर्स मैज्योर के कारण परियोजना में निर्माण कार्य बाधित हुआ है। यह कहना गलत है कि विपक्षी की ओर से विलम्ब किया गया है बल्कि विपक्षी की परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है। शिकायतकर्ता को धनराशि भुगतान किये जाने के लिए कई अनुस्मारक पत्र प्रेषित किये गये परन्तु शिकायतकर्ता ने धनराशि का भुगतान नहीं किया और न ही कब्जा लेने आये। 2 eee विपक्षी को परियोजना के सापेक्ष अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है। विपक्षी द्वारा लिखित जवाब में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 43029 /t985 एम.सी मेहता बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया पारित आदेश oT de अंकित किया गया है। अतः विपक्षी ने शिकायत को निरस्त किये जाने का अनुरोध किया है।
विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03. 2022, अंतिम ऑफर ऑफ पजेशन 4.04.2022 की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के तर्कों के आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किया जाता हैं :- 4. क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते हैं ? तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? 2. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? 3. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज. की कया दर होगी ? निस्तारण प्रश्न संख्या-4 :- प्रश्न Wee इस तथ्य पर विरचित है कि क्या रेरा आने से पूर्व के ages रेरा के दायरे में नहीं आते है तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? इस सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या--68745-6749 / 2024 “मैसर्स न्यूटेक प्रोमोटर्स एंड डेवलपर्स प्रा० लि0 बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य“ में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि :- “"S4. From the scheme of the Act 20I6, its application is retroactive in character and it can safely be observed that the projects already completed or to which the completion certificate Carts a Fe 0 मकर has been granted are not under its fold and \ A. @\ therefore, vested or accrued rights, if any, in no manner are affected. At the same time, it will apply after getting the on-going projects and re_projects registered _under Section 3 to
\) 3. prospectively follow the mandate of the Act 206." उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा अधिनियम लागू होने से पूर्व जो भी अनुबन्ध हस्ताक्षरित हुए या अधिनियम लागू होने से पूर्व की परियोजनाओं, जहाँ पर पूर्णता प्रमाण पत्र सम्प्रवर्तक द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वहाँ पर अधिनियम का प्रवर्तन पूर्वव्यापी प्रभाव रहेगा। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन गोईंग” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते हैं। उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आर्ब्जेवेशन से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि रेरा पंजीकरण से पूर्व प्रोमोटर एवं आवंटी के मध्य अनुबन्ध निष्पादित हुए हैं, परन्तु यदि परियोजना को रेरा में पंजीकरण कराया जाता है, तो रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया है, जिसका पंजीकरण संख्या- UPRERAPRIING है। अतः वर्णित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना वर्तमान में “ऑनगोईंग प्रोजेक्ट” की श्रेणी में आती है। ऐसी दशा में रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। तद्नुसार प्रश्न We निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 2--: प्रश्न संख्या-2 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर gece होने के कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी द्वारा परियाजना विलम्बित होने का कारण माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्माण कार्य पर लगायी गयी रोक के आदेश, एनजीटी द्वारा जारी आदेश व कोविड-49 महामारी को बताया गया है। शिकायतकर्ता ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है।
फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 के प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है कि :- “ प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर Wie में कब्जा देने की आश्वासित तिथि epee Date) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय “ /०| अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को 4 — OO घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ पजेशन की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवधि माना जाएगा I" माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या: 43029 /7985, “MC. Mehta Versus Union of India” में पारित आदेश, दिनांक 04-4॥-20॥9 में निम्नलिखित निर्देश दिये है:- “With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place.” इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: t3029/t985 में पारित आदेश दिनांक 09-42-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “In the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:-
"42. That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last-year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+t/emergency category for 48 hours or more. "” Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.” orn सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक o4-it-20i9 से दिनांक 5 —_ SS जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक o9—i2-20:9 4 पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च
न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04-7:-20:9 से दिनांक 09--2--2049) एवं 33 दिन(66+2) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक साय 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवधि विपक्षी कें नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी को उत्तरदायी ठहराना न््यायोचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि उपर्युक्त वर्णित दोनो अवधियों के लिए परियोजना को पूर्ण होने में हुए विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल-35 दिन+ 33 दिन अर्थात् 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त कोविड-49 महामारी के सम्बंध में उ0प्र0 रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनाक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.092020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के-कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी wfas—i9 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 3-: प्रश्न संख्या-3 इस आशय का विचरित किया गया है
कि क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट दिनांक 44.02.2074 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ। आवंटन पत्र के अनुसार यूनिट 6 >> बल - का कब्जा 42 माह तथा 03 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात नवम्बर 2047 में प्राप्त होना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। विपक्षी का कहना है कि फोर्स मैज्योर के कारण परियोजना विलम्बित हुई है तथा विपक्षी का यह भी तर्क है कि परियोजना पूर्ण है और विपक्षी को अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि विपक्षी को यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण द्वारा जारी अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 प्राप्त हो चुका है तथा शिकायतकर्ता को ऑफर ऑफ पजेशन दिनांक 44.04.2022 को जारी किया जा चुका है जिसकी प्रति पत्रावली पर उपलब्ध है। | उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 05 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है। चूंकि शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने को-अनुरोध किया गया है जिस कारण शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित होगा | जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील to 6649-50 /20t8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"'में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः-
"the period of Interest should close on April 20I6 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर or ५" —— किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का 2. ae eT OO 7 जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया”के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि —
"Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में-यह स्पष्ट है कि उ.प्र. रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता-के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप flrs तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 7.0.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर o2(i) ¥ प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the VEIN Promoter shall be liable to refund the entire miuney paid by te Alluttee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless 8 OS provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:" यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+ LHI की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+H प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(28)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। उपरोक्त तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-8 Peake किया जाता है।
उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता है। आदेश duet को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश पोर्टल पर अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता से अवशेष धनराशि प्राप्त कर, शिकायतकर्ता की यूनिट आवंटन पत्र/अनुबंध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराएं। >. विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक 04.2.2047 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि WO 38,37,30I/ पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें| ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की ८- #ैके---जायेगी।--निल्तारण-मश्न-संख्य-2-के-अनुसार- फोर्स -मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए (माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 9 7 43029 / 4985 के अनुसार ) 68 दिन तथा दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा।
विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 20:6 की धारा 2(७)() के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी Mcrae प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश का vera भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन 45 दिन में नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें | आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। ae SS अपर (=) HV: O%- 2.5 2& (डा०दीपक स्वरूप सक्सेना) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर — |