Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Vimal Kumar Jain v. ATS Realty Private Limited
Complaint No. NCR144/11/114659/2023
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2025-11-14
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Counsel
- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थित:ः- Slo दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य | क्रम शिकायत सं पर यूनिट | जमा धनराशि vo | आवंटन पत्र | अनुबंधानुसार वांछित | me ee 70 की तिथि | कब्जा दिये जाने अनुतोष की की तिथि ; _ | प्टराबका॥46592025 | विमल कुमार i रु0 32,8,32/ | 2.0:.204 | 42 माह तथा 03 | यूनिट का जैन माह अनुग्रह कब्जा व अवधि के साथ विलम्बित अर्थात अक्टूबर. | अवधि का 2047 ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। बनाम एटीएस रियलटी प्रा.लि. शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु यह शिकायत संस्थित की गयी है।
संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना ATS ALLURE में यूनिट संख्या 3i86 बुक कराई गई, आवंटित यूनिट की कुल कीमत BO WO 37,85,432/en जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि रु0 32,8:,432/ का भुगतान किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत पृष्ठ पर यह उल्लिखित किया गया है कि आवंटित यूनिट के सापेक्ष दिनांक 24.04. 2044 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ। विपक्षी द्वारा आवंटन पत्र दिनांक 24.04. 2044 के deals 7.2 के अनुसार यूनिट का कब्जा 42 माह तथा 03 माह अनुग्रह अवधि के साथ अक्टूबर 20:7 तक दिया जाना था। परन्तु विपक्षी अनुबध की शर्तों के अनुसार परियोजना पूर्ण करने तथा कब्जा उपलब्ध कराने में असमर्थ रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित किया गया है कि परियोजना पूर्ण नहीं है और न ही विपक्षी को सीसी प्राप्त है। विपक्षी द्वारा बिना सी.सी प्राप्त किये हुए ऑफर ऑफ पजेशन भेजा गया है। विपक्षी द्वारा दिनांक 02.08.2022 को ईमेल के माध्यम से शिकायतकर्ता को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु मांग पत्र प्रेषित किया गया जिस पर शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को कुछ बिन्दु पर स्पष्टीकरण हेतु पत्र भेजा गया परन्तु विपक्षी द्वारा स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। विपक्षी द्वारा दिनांक 4. कान
07.0.2022 को पुनः रु0 4,74,902,/का भुगतान किये जाने हेतु अनुस्मरण पत्र प्रेषित किया गयां। इसके पश्चात विपक्षी द्वारा दिनांक 46.:4.2022 को अवशेष देय धनराशि wo 5,04,000,/ का भुगतान किये जाने हेतु मांग पत्र प्रेषित किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 77.06.2023 व 24.06.2023 को विपक्षी को पेमेंट सेटल किये जाने हेतु पत्र प्रेषित किया गया परन्तु विपक्षी द्वारा कोई जवाब नहीं दिया गया। विपक्षी द्वारा दिनांक 4.07.2023 को शिकायतकर्ता को ईमेल किया गया कि अवशेष देय धनराशि का भुगतान करके यूनिट का कब्जा प्राप्त कर सकते है। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित fear गया है कि विपक्षी द्वारा दिनांक 29.09.2023 को शिकायतकर्ता को नोटिस फार टर्मिनेशन प्रेषित करते हुए अवशेष देय धनराशि wo 5,59,934,/का भुगतान किये जाने हेतु सूचित किया गया जिस पर शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी से पुनः प्रेषित मांग का विस्तारित विवरण उपलब्ध कराये जाने हेतु अनुरोध किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 07.0.2023 को विपक्षी के कार्यालय में विजिट किया गया जिस पर विपक्षी के कर्मचारी द्वारा शिकायतकर्ता को अनुस्मरण पत्र व मांग पत्र के अनुसार अवशेष देय धनराशि GO 5,59,934 / का भुगतान किये जाने हेतु कहा गया जिसके पश्चात् शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को विलम्बित अवधि का ब्याज समायोजित करते हुए अवशेष देय धनराशि को सेटल किये जाने हेतु ईमेल प्रेषित किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा दिनांक 49.0.2023 को अंतिम रूप से यूनिट निरस्त करते हुए sites ऑफ एलॉटमेंट नोटिस भेजा गया। इसके उपरांत शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 24.0.2023 को पुनः सम्पर्क किया गया लेकिन विपक्षी की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता द्वारा उलिलखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा आज की तिथि तक यूनिट का कब्जा दिये जाने हेतु ऑफर ऑफ पजेशन जारी नहीं किया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को दिनांक 49.0.2023 को प्रेषित टर्मिनेशन नोटिस को निरस्त किये जाने के लिए निर्देशित किये जाने, यूनिट का कब्जा ओी के साथ दिलाये जाने तथा रेरा अधिनियम के अनुसार विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है।
शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के समर्थन में आवंटन पत्र, एप्लिकेंट लेजर, अनुस्मरण पत्र, नोटिस फार टर्मिनेशन व टर्मिनेशन ऑफ एलॉटमेंट की छायाप्रतियाँ 2 3 दाखिल की गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् है:- क्रम विवरण दिनांक भुगतान की गई घनराशि (रु0) संख्या । | विपक्षी द्वारा जारी एप्लिकेंट लेजर 48.07.208..._ [रु0 32,84,432/
विपक्षी की ओर से लिखित आपत्ति दाखिल करते हुए यह उल्लिखित किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा परियोजना एटीएस wei में age लिंक प्लान के अन्तर्गत यूनिट संख्या संख्या 3i86 बुक करायी गयी थी। आवंटन पत्र के FAM 7.2 के अनुसार यूनिट का कब्जा 03 माह अनुग्रह अवधि के साथ 24.40. 20:7 में दिया जाना था। विपक्षी को दिनांक 30.03.2022 को परियोजना के सापेक्ष अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को दिनांक 02.08.2022, 07.0.2022 व 6.44.2022 को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु मांग पत्र भेजकर धनराशि का भुगतान किये जाने व कब्जा लिये जाने हेतु सूचिंत किया गया परन्तु शिकायतकर्ता अवशेष देय धनराशि का भुगतान करने में असफल रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा orga लिंक पेमेंट प्लान की शर्तों के अनुसार अवशेष देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया जिस कारण विपक्षी द्वारा दिनांक 29.09.2023 को शिकायतकर्ता को फाइनल नोटिस फार टर्मिनेशन भेजा गया तथा विपक्षी द्वारा दिनांक 49.0.2023 को शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी। तत्पश्चात विपक्षी द्वारा दिनांक 24.06.2024 को आवंटित यूनिट पर तृतीय पक्ष विजय लक्ष्मी का अधिकार सृजित किया जा चुका है। इसके उपरांत तृतीय पक्ष विजय लक्ष्मी द्वारा यूनिट किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय कर दी गयी है। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि बिल्डर बायर एग्रीमेंट के क्लाज 5.5 के अनुसार यदि शिकायतकर्ता द्वारा पेमेंट शैड्यूल के अनुसार निर्धारित अवधि में धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो यूनिट की कुल कीमत का 45 प्रतिशत धनराशि कटौती किये जाने का प्राविधान है।
विपक्षी द्वारा यूपी रेरा we 20:8 की रुल 9.3 का संदर्भ अंकित करते हुए उल्लिखित किया गया है कि यदि आवंटी द्वारा धनराशि का भुगतान किये जाने में 3 — SS डिफाल्ट किया जाता है तो धनराशि जब्त कर ली जाएगी। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 7588 //2042 adler बत्रा बनाम सुधीर रावल व श्री हनुमान कॉटन fies बनाम टाटा एयरक्राफ्ट (4970एससीआर(3)427) का संदर्भ अंकित किया गया है। विपक्षी द्वारा अर्नेस्ट मनी कटौती किये. जाने के सम्बन्ध में शिकायत संख्या Waits 44 /40 ,/ 83450 /202 मीनाक्षी सिंह बनाम एआर लैण्डक्राफ्ट में पारित आदेश का उल्लेख किया गया है। अतः विपक्षी द्वारा वर्तमान वाद अर्थदण्ड के साथ निरस्त किये जाने व बिल्डर बायर Witte के अनुसार अर्नेस्ट मनी की कटौती उपरांत धनराशि शिकायतकर्ता को वापस किये जाने की अनुमति दिये जाने का अनुरोध किया गया है। विपक्षी की ओर से लिखित आपत्ति के समर्थन में ओ.सी दिनांक 30.03.2022, अनुस्मरण पत्र दिनांकित 02.08.2022, 07.0.2022, व 46.4.2022 तथा टर्मिनेशन ऑफ एलॉटमेंट दिनांक 9.0.2023 की छायाप्रतियां दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के अभिवचनों के आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किया जाता हैं :- 4. क्या विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट का निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नही? 2. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? 3. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ? निस्तारण प्रश्न He- यह प्रश्न इस आशय का विरचित किया गया है कि
क्या शिकायतकर्ता को प्रश्नगत यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जा सकता है? इस प्रश्न को साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना एटीएस एलौर में यूनिट संख्या 3i86 बुक करायी गयी थी। आवंटित यूनिट की कुल कीमत BO 37,85,432,/ थी जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि vo 32,84,32,/ का भुगतान किया जा चुका है। विपक्षी द्वारा दिनांक 02.08.2022 को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु मांग पत्र भेजा गया था। इस मांग 4 —— पत्र पर शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी से कुछ स्पष्टीकरण चाहा गया परन्तु विपक्षी द्वारा जवाब नहीं दिया गया। विपक्षी द्वारा दिनांक 07.:0.2022 व 76.4.2022 को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु पुनः रिमाइन्डर भेजे गये तथा विपक्षी द्वारा नोटिस फॉर टर्मिनेशन दिनांक 29.09.2023 को भेजा गया तथा विपक्षी द्वारा दिनांक 49.0.2023 को शिकायतकर्ता की यूनिट अंतिम रूप से निरस्त करते हुए टर्मिनेशन पत्र प्रेषित किया गया। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी द्वारा किया गया यूनिट निरस्तीकरण को निरस्त करते हुए यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है।
विपक्षी द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी को दिनांक 30.03.2022 को परियोजना के सापेक्ष अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को दिनांक 02.08.2022, 07.0.2022 व 46.4.2022 को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु मांग पत्र भेजकर धनराशि का भुगतान किये जाने व कब्जा लिये जाने हेतु सूचित किया गया परन्तु शिकायतकर्ता अवशेष देय धनराशि का भुगतान करने में असफल रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा pager लिंक पेमेंट प्लान की शर्तों के अनुसार अवशेष देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया जिस कारण विपक्षी द्वारा दिनांक 29.09.2023 को शिकायतकर्ता को फाइनल नोटिस फार टर्मिनेशन भेजा गया | इसके उपरांत विपक्षी द्वारा दिनांक 49.0.2023 को शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी। तत्पश्चात विपक्षी द्वारा दिनांक 24.06.2024 को आवंटित यूनिट पर तृतीय पक्ष विजय लक्ष्मी का अधिकार सृजित किया जा चुका है। तृतीय पक्ष विजय लक्ष्मी द्वारा भी यूनिट .किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय कर दी गयी है। अतः विपक्षी द्वारा वर्तमान वाद अर्थदण्ड के साथ निरस्त किये जाने व बिल्डर बायर एग्रीमेंट के अनुसार अर्नेस्ट मनी की कटौती उपरांत धनराशि शिकायतकर्ता को वापस किये जाने की अनुमति दिये जाने का अनुरोध किया गया है। पत्रावली के अवलोकन से यह विदित है कि उभयपक्षों के मध्य दिनांक 24. 04.20i4 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ और आवंटन पत्र के FAT 7.2 के अनुसार विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा 42 माह तथा 03 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात अक्टूबर 20:7 तक दिया जाना था परन्तु शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा 5 _—SS
निर्धारित अवधि में प्राप्त नही हुआ है। विपक्षी द्वारा परियोजना पूर्ण कर सक्षम प्राधिकरण “यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण” से दिनांक 30.03.2022 को अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त किया जा चुका है। विपक्षी द्वारा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने के उपरांत शिकायतकर्ता को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु दिनांक 02.08.2022, 07.0.2022 व 76.4.2022 को मांग पत्र व अनुस्मरण पत्र भेज कर यूनिट के सापेक्ष अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने का अनुरोध किया गया परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा अवशेष देय धनराशि का भुगतान न किये जाने पर विपक्षी द्वारा दिनांक 29.09.2023 को अंतिम नोटिस फॉर टर्मिनेशन प्रेषित कर अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु शिकायतकर्ता को पुनः नोटिस प्रेषित किया गया जिसके पश्चात विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को अवशेष देय धनराशि का भुगतान न किये जाने के कारण शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट दिनांक 9.0.2023 को अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी जिसके पश्चात शिकायतकर्ता द्वारा वर्तमान शिकायत योजित की गयी है। सामान्यतः: यदि शिकायतकर्ता द्वारा समय से देय धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो विपक्षी की जिम्मेदारी बनती है कि वह vat के सम्बन्ध में भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) (विक्रय / पट्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 की धारा 9.3 में उल्लिखित प्राविधानों के तहत नियमानुसार कार्यवाही करें :- धारा 9.3 The Allottee shall be considered under a condition of Default, on the occurrence of the following events:
i. In case the Allottee fails to make payments for 2 (two) - consecutive demands made by the Promoter as per the Payment Plan annexed hereto, despite having been issued notice in that regard the Allottee shall be liable to pay interest to the promoter on the unpaid amount at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. The Promoter must not be in default to take this benefit; ii. In case of Default by Allottee under the condition listed above continues for a period beyond 3 (three) consecutive months after notice from the Promoter in this regard, the Promoter may cancel the allotment of the [Apartment/Plot] in favour of the Allottee and refund the money paid to him by the Allottee by deducting the booking amount and the interest liabilities and this Agreement shall thereupon stand terminated. The Promoter must not be in default to take this benefit; Provided that the Promoter shall 6 —__—_sS intimate the Allottee about such termination at least thirty days prior to such termination. उक्त प्राविधानों के अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष बकाया धनराशि का भुगतान न किये जाने पर मांग पत्र, अनुस्मरण पत्र तथा प्री-निरस्तीकरण पत्र प्रेषित किये जाने का प्राविधान है तथा शिकायतकर्ता द्वारा यदि उपरोक्त के पश्चात भी यूनिट के सापेक्ष अवशेष देय धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो विपक्षी उपरोक्त प्राविधानों के अनुसार शिकायतकर्ता की आवंटित अंतिम रूप से निरस्त कर सकता है।
वर्तमान प्रकरण में विपक्षी द्वारा अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 को प्राप्त करने के उपरांत शिकायतकर्ता को अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु दिनांक 02.08.2022, 07.0.2022 व 6.4.2022 को मांग पत्र व अनुस्मरण पत्र भेज कर यूनिट के सापेक्ष अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने का अनुरोध किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा भी विपक्षी द्वारा प्रेषित उपरोक्त सभी मांग पत्र व अनुस्मरण vat की प्राप्ति होने की अपने कथन में सहमति व्यक्त की गयी है परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा उक्त मांग पत्र व अनुस्मरण के प्राप्त होने पर कोई अवशेष देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया जिस कारण विपक्षी द्वारा दिनांक 29.09.2023 को अंतिम नोटिस फॉर टर्मिनेशन प्रेषित कर अवशेष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु शिकायतकर्ता को पुनः नोटिस प्रेषित किया गया जिसके पश्चात शिकायतकर्ता द्वारा पुन: धनराशि का भुगतान न किये जाने के कारण विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट दिनांक 49.0.2023 को अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी है। unter mart के अनुसार यदि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट विधिक रूप से निरस्त की जाती है तो शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष भुगतान की गयी धनराशि वापस किये जाने का प्राविधान है परन्तु विपक्षी द्वारा यूनिट निरस्त किये जाने के उपरांत शिकायतकर्ता को धनराशि वापस नहीं की गयी है। इसके अतिरिक्त यह भी उल्लिखित किया जाना महत्वपूर्ण प्रतीत होता है कि विपक्षी द्वारा अनुबंध पत्र के अनुसार परियोजना पूर्ण करते हुए शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा अक्टूबर 20:7 तक उपलब्ध कराया जाना था परन्तु विपक्षी द्वारा परियोजना के सापेक्ष सक्षम प्राधिकरण से अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 को प्राप्त किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि परियोजना
vd —_— पूर्ण होने तथा ओ.सी प्राप्त करने में विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि से 05 वर्ष का विलम्ब किया गया है। उपरोक्त प्राविधानों में स्पष्ट उल्लिखित किया गया है कि यदि विपक्षी दोष पर है तो वह उपरोक्त उल्लिखित प्राविधानों का लाभ नहीं ले सकता है। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा पीठ के समक्ष प्रस्तुत किये गये लिखित जवाब में पीठ को इस तथ्य से भी अवगत कराया गया है कि उनके द्वारा प्रश्नगत यूनिट पर दिनांक 24.06.2024 को तृतीय पक्ष विजय लक्ष्मी के अधिकार सृजित किये जा चुके है तथा तृतीय पक्ष द्वारा भी wera यूनिट किसी अन्य व्यक्ति को इन्डोरस्मेंट के माध्यम से विक्रय कर दी गयी है। इस सम्बन्ध में माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा अपील संख्या 485 / 2023 अलका ढींगरा एव तोशन ढींगरा बनाम गौरसन्स रियलटेक प्रा.लि. में दिनांक 48.02. 2025 को पारित आदेश का उल्लेख किया जाना महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा Gat आदेश के प्रस्तर 28 व 29 में यह उल्लिखित किया गया है कि — ह 28- It was held that lis pendens commences at the stage of institution of the petition and not at the stage when the notice is issued by the court. Thus, taking Review Petition pending, though defective, it was held that Section 52 of the Transfer of Property Act would apply to the third-party purchases, once the sale was executed after the review petition was instituted before the Court. In other words, the transfer of property that is made during the pendency of the suit/proceedings is subject to the final decision of the litigation. Paragraph 47 and 49 is extracted:
“47. \n short, the doctrine of lis pendens that Section 52 of the Transfer of Property Act encapsulates, bars the transfer of a suit property during the pendency of litigation. The only exception to the principle is when it is transferred under the authority of the court and on terms imposed by it. Where one of the parties to the suit transfers the suit property (or part of it) to a third-party, the latter is bound by the result of the proceedings even if he did not have notice of the suit or proceedings...” “
49. The purpose of lis pendens is to ensure that the process of the court is not subverted and rendered infructuous. In the absence of the doctrine of lis pendens, a defendant could defeat the purpose of the suit by alienating the suit property. This purpose of the provision is clearly elucidated in the explanation clause to Section 52 which defines “pendency”. Amending Act 20 of 929 substituted the word “pendency” in place of “active prosecution”. The amending Act also included the Explanation defining the expression “pendency of suit or proceeding”. “Pendency” is defined to commence from the “date of institution” until the “disposal”. The argument of the respondents that the doctrine of lis pendens does not apply because the petition for review was lying in the registry in a defective state cannot be accepted. The review proceedings were “instituted” within the period of limitation of thirty days. The doctrine of lis pendens kicks in at the stage of “institution” and not at the stage when notice is issued by this Court. Thus, Section 52 of the Transfer of Property Act would apply to the third-party purchases once the sale was executed after the review petition was instituted before this Court. Any transfer that is made during the pendency is subject to the final result of litigation.” [vide M/s. Siddamsetty Infra (supra)]
मा लि It is categorical and specific case of respondent that the unit came to be deemed cancelled on 02.09.20i9 during pendency of the complaint. Further, during pendency of the complaint, third party right was created by the respondent deliberately and willfully. Therefore, sale deed executed in favour of third party by the respondent is in the teeth of the principle of lis pendens. Sale deed in favour of third party would be subject to the outcome of this appeal, which is continuation of the complaint. The allotment/sale deed of the unit made to a 9 a third party during subsistence of the agreement and pendency of the complaint would be hit by Section (4)(h) and Section 2(5) of Act, 206. उपरोक्त न्याय नजीर के अवलोकन से स्पष्ट है वाद पीठ के समक्ष विचाराधीन होने के दौरान शिकायतकर्ता की शिकायत रेरा अधिनियम की धारा 4 (4)(एच) तथा धारा 44(5) में उल्लिखित प्राविधान उभयपक्षों पर बाध्य है तथा पीठ द्वारा शिकायत का निस्तारण करते समय जो निर्णय दिया जाएगा वह निर्णय तृतीय पक्ष पर भी बाध्यकारी होगा। ह
उपरोक्त वर्णित तथ्यों के अवलोकन से यह विदित होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्नगत यूनिट के सापेक्ष यूनिट. की कीमत का 80 प्रतिशत से अधिक धनराशि का भुगतान किया गया है तथा विपक्षी द्वारा बिना किसी आधार के तथा उपरोक्त उल्लिखित प्राविधानों के विपरीत शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त करते हुए उक्त यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार वर्तमान शिकायत में पीठ में लम्बित रहने के दौरान सृजित किये गये है जोकि विधि सम्मत तथा उपरोक्त न्याय नजीर एवं प्राविधानों के विपरीत है। अतः विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किया जाना तथा शिकायत के लम्बित रहने के दौरान wat यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार सूजित किया जाना वैधानिक नहीं है। तद्नुसार प्रश्न संख्या 4 Paka किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 2-: प्रश्न संख्या-2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने के कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी द्वारा परियाजना विलम्बित होने का कारण माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्माण कार्य पर लगायी गयी रोक के आदेश, एनजीटी द्वारा जारी आदेश व कोविड-49 महामारी को बताया गया है। शिकायतकर्ता ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 के प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है कि :-
/ प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर एग्रीमेंट में कब्जा देने की आश्वासित तिथि (Promised Date) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ पजेशन की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवधि माना जाएगा |” माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या: 43029 / 4985, ‘M.C. Mehta Versus Union of India” में पारित आदेश, दिनांक 04-44-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये &— “With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place.” इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: 43029 / 4985 में पारित आदेश दिनांक 09-42-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “in the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:- .
"2. That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more. "” Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.” 44
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक o4-4:-20:9 से दिनांक 44-02--2020 तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक 09-42-209 में पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04-44-2049 से दिनांक 09-42-2049) एवं 33 दिन(66+2) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक Bia 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवधि विपक्षी के नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी को उत्तरदायी ठहराना न््यायोचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि उपर्युक्त वर्णित दोनो अवधियों के लिए परियोजना को पूर्ण होने में हुए विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल-35 दिन+ 33 दिन अर्थात् 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकारी है। इसके अतिरिक्त कोविड-49 महामारी के सम्बंध में उ0प्र0 रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनांक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर grey के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा।
उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी कोविड-49 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। तद्नुसर प्रश्नग सख्या 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 3-: प्रश्न संख्या-3 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? i2 शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके उपरान्त उक्त यूनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य दिनांक 24.04.2044 को अनुबंध पत्र निष्पादित हुआ। अनुबंध पत्र के अनुसार यूनिट का कब्जा 42 माह तथा 03 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात अक्टूबर 20:7 F दिया जाना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। वर्तमान प्रकरण में विपक्षी को अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 को प्राप्त हो चुका है जो पत्रावली पर उपलब्ध है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 08 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है। चूंकि शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित होगा। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील tio 6649-50 /20:8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी Trae" माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः-
"the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " हु उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी.,/सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया”के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section | 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of 2: | a - _ जय his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing
over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ.प्र. रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व Sar के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2oi6 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,पटटा के लिए करार) नियमावली 20:8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें wee o.2(ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +!% unless provided otherwise under the Rules
within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को ४८ा,१+ प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+I प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। WW की धारा-2(28)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। उपरोक्त तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित 34 TS अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है। तदूनुसार प्रश्न संख्या-3 निस्तारित किया जाता है। है। उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता आदेश
विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश पोर्टल पर अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट को पुर्नस्थापित करते हुए शिकायतकर्ता से अवशेष धनराशि प्राप्त कर, शिकायतकर्ता की यूनिट आवंटन पत्र/अनुबंध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय : स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराएं। विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक 04.:4.20:7 से ओ.सी/सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि WO 32,87,432/ पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगताने की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। निस्तारण प्रश्न संख्या 2 के अनुसार फोर्स मैज्योर ' पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए (माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 43029 //4985 के अनुसार ) 68 दिन तथा दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। 3. विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 20:6 की धारा zai) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को fear जायेगा। अतः विलम्बित 35 ——S—
भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी Mcir+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। 4. इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। 5. विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन 45 दिन में नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। 6. आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। _... 5० +्+१-८ Sy Ses (डा0 दीपक स्वरूप WRT) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर