Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Saurabh Kumar Saxena v. ATS Realty Private Limited
Complaint No. NCR144/10/95785/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2024-01-05
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
English translation. Machine translation from the Hindi by AI (Claude Haiku), not reviewed. The original order below is the authoritative text.
Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority, Regional Office, Gautam Buddh Nagar Bench-2 Order passed under Section 34 of the Real Estate (Regulation and Development) Act, 2046 Present: Dr. Deepak Swaroop Saxena, Member Sr. No. | Complaint No. | Name of complainant | Unit No. | Amount deposited as per receipt/evidence | Date of allotment (as on file) | Date of possession (as on file) | Relief sought J. | Tar44/0/95785/2022 | Saurabh Kumar Saxena | 7022 | Rs. 7,57,560// | 76.02.208 | 30 June 2048 | Possession of the unit and interest for the delayed period Saurabh Kumar Saxena versus ATS Realty Pvt. Ltd. A complaint has been instituted by the complainant against the respondent seeking possession of the unit and interest for the delayed period. In brief, the complainant states that under the project ATS ALLURE run by the respondent, unit number 7022 shown in the table above was booked, against which the complainant paid Rs. 7,97,560/- to the respondent. The complainant has requested possession of the unit and interest for the delayed period. In support of the complaint, the complainant has filed photocopies of the allotment letter and receipts. The details of the amounts paid by the complainant to the respondent are as follows: Sr. No. | Date | Amount paid (Rs.) [?] | Receipt No. 00449, 24.02.2048 | Rs. 43,92,048/- [?] | Receipt No. 00045, 42.2.2047 | Rs. 3,65,572 Total | | Rs. 47,57,560/-
In its written reply, the respondent has stated that the complainant has alleged a breach of contractual obligation, and that jurisdiction to decide such matters therefore lies with the civil court. On this basis, the respondent has said the complaint should be dismissed. The respondent has further stated that the Authority has no jurisdiction to decide the allegations made by the complainant. In support of this, it has cited the judgment passed by the Haryana Appellate Court, Chandigarh, in Appeal [?] /20i8, Sameer Mahawar versus MG Housing Pvt. Ltd. The respondent says the present complaint has been filed by the complainant on false facts, in order to harass the respondent. The respondent says the complainant also has not paid the amount on time. The complainant filed cases before different benches of the Authority, which have already been dismissed. The respondent was committed to hand over possession of the unit to the complainant within the stipulated time, but construction work in the project was obstructed because of force majeure. The respondent sent several letters to the complainant asking for payment, dated 23.04.204, 7.02.2074, 40.4.2074, 05.0. 2045, 45.02.2045, 26.03.2045, 28.40.2045, 48.4.2045, 04.02.2046, 48.02.206, 25.02.2046, 04.03.2046, 07.06.206, 23.08.20i6 and 24.0.20i7.
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-2 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थितः- डा० दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम शिकायत संख्या a ~ पत्रावली पर आवंटन कब्जा वांछित अ न0 उपलब्ध तिथि जाने की तिथि द स0 रसीद /साक्ष्य के अनुसार जमा धनराशि रु0 J. | टार44/0/95785/2022 | सौरभ कुमार सक्सेना | 7022 | रु0 7,57,560// | 76.02.208 | 30 जून 2048 | यूनिट का कब्जा व विलम्बित staf का ब्याज दिलाये जाने व अनुरोध किया गया है। बनाम एटीएस रिएलटी प्राएलि0 शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्ध यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित की गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना ATS ALLURE में उक्त तालिका में अंकित यूनिट संख्या 7022 बुक कराया गया, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा धनराशि Go 7,97,560 /-विपक्षी को भुगतान की गई है। शिकायतकर्ता ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया है। शिकायतकर्ता द्वारा परिवाद के समर्थन में आवंटन पत्र व रसीद की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी हैं। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् है:- क्रम दिनांक भुगतान की [संख्या (रु0) | ire संख्या 00449 24.02.2048 GO 43,92,048 / ze | रसीद संख्या 00045 42.2.2047 रु0 3,65,572 BO 47,57,560 /
विपक्षी की ओर से लिखित जवाब दाखिल करते हुए यह अंकित किया गया है कि शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाया है कि विपक्षी ने अनुबंधात्मक दायित्व (Contractual Obligation) का उल्लंघन किया है इस कारण इसका निस्तारण किये जाने का क्षेत्राधिकार सिविल कोर्ट का है। इस प्रकार वाद को निरस्त किया जाए। शिकायतकर्ता द्वारा लगाये गये आरोप का निस्तारण करने का क्षेत्राधिकार प्राधिकरण को नहीं है, जिसके समर्थन में हरियाणा अपीलीय न्यायालय चण्ड़ीगण द्वारा अपील dene /20i8 समीर महावर बनाम एमजी हाउसिंग प्राएलि0 में पारित निर्णय का संदर्भ अंकित किया है। वर्तमान प्रकरण शिकायतकर्ता ने गलत तथ्यों पर विपक्षी को परेशान किये जाने हेतु दायर किया है। शिकायतकर्ता ने समय से धनराशि का भी भुगतान नहीं किया है। शिकायतकर्ता ने प्राधिकरण के भिन्न-भिन्न पीठों में वाद दायर किया जो निरस्त किये जा चुके है। विपक्षी शिकायतकर्ता को समय अवधि के अन्दर यूनिट का कब्जा दिये जाने के लिए बचनबद्ध था परन्तु फोर्स मैज्योर के कारण परियोजना में निर्माण कार्य बाधित हुआ है। विपक्षी ने शिकायतकर्ता को धनराशि भुगतान करने के लिए कई पत्र दिनांक 23.04.204, 7.02.2074, 40.4.2074, 05.0. 2045, 45.02.2045, 26.03.2045, 28.40.2045, 48.4.2045, 04.02.2046, 48.02.206, 25.02.2046, 04.03.2046, 07.06.206, 23.08.20i6 व 24.0.20i7 को प्रेषित किये गये। वर्तमान प्रकरण प्री-मैच्योर है क्योंकि फोर्स मैज्योर के कारण समय अवधि समाप्त नहीं हुई है। विपक्षी को अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुका है तथा शिकायतकर्ता को ऑफर ऑफ पजेशन भी जारी कर दिया गया है। शिकायतकर्ता ने समय से धनराशि का भुगतान नहीं किया है। परियोजना कब्जा दिये जाने के लिये तैयार है। शिकायतकर्ता कब्जा लेने नहीं आ रहा है। अतः विपक्षी ने परिवाद निरस्त किये जाने का अनुरोध किया है।
विपक्षी द्वारा लिखित जवाब के समर्थन में ऑफर ऑफ पजेशन, अनुस्मारक पत्र एवं अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किये जाते हैं :- 4. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? — a 2 2. क्या शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ? निस्तारण प्रश्न संख्या -: प्रश्न संख्या-4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से लिखित जवाब में यह उल्लेख किया गया है कि एन.जी.टी के आदेश व कोविड-49 महामारी के कारण परियोजना में निर्माण कार्य बंद था। उक्त के संदर्भ में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील Wen-o40/20:7 “बिक्रम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य“ के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया है:- "Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature." उपरोक्त फोर्स मैज्योर की परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्राकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में alfas-i9 महामारी के अतिरिक्त अन्य ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई है। कोविड-49 महामारी के सम्बंध में उ0प्र० रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.
2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनोक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये विपक्षी कोविड-49 के अतिरिक्त अन्य किसी आधार पर फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तद्नुसार प्रश्न de Pen किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 2 :- प्रश्न संख्या-2 इस आशय का विरचित किया गया है कि an शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके उपरान्त उक्त यूनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य दिनांक 6. 02.2048 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ। आवंटन पत्र के अनुसार यूनिट का कब्जा जून 2048 तक प्राप्त होना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। विपक्षी का कहना है कि फोर्स मैज्योर के कारण परियोजना विलम्बित हुई है। विपक्षी का यह भी तर्क है कि शिकायतकर्ता ने भिन्न भिन्न पीठों में वाद दायर किये थे जो निरस्त हो चुके हैं परन्तु विपक्षी द्वारा इस सम्बंध में पीठ द्वारा पारित ऐसे किसी आदेश की प्रति दाखिल नहीं की गई है।
वहीं दूसरी ओर विपक्षी का यह भी तर्क है कि विपक्षी को अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 को प्राप्त होने के उपरांत शिकायतकर्ता को ऑफर आफ पोजेशन दिनांक 44.04.2022 को प्रेषित किया गया जो अनुबंधानुसार कब्जा दिये जाने के तिथि से काफी पश्चात् का है। पत्रावली पर उपलब्ध आवंटन पत्र के अनुसार शिकायतकर्ता को जून 2048 तक यूनिट का कब्जा प्राप्त होना था परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के अनुसार यह भी. स्पष्ट है कि परियोजना पूर्ण है और विपक्षी को अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 को प्राप्त हैजो पत्रावली पर उपलब्ध है। इस प्रकार विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में लगभग 5 वर्ष से अधिक का fers किया गया है परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण oo > 4 शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित होगा। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील सं० 6649-50 /20i8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"'में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः- "the period of Interest should close on April 206 when the Full
Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant -Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20i6. The Respondent - Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./ सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section 8(0)0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty 5 _—_—_— OS?
as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 7.0.20:8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय ,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के force प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें TER 9200) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +I% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:"
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी mee 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते By आवंटी को MCLReIvftet की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+I प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की 6 भट्ट «जज धारा-2(2४)(0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। अतः उपरोक्त तथ्यों एवं न्याय नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज पाने के अधिकारी है। तद्नुसार प्रश्न संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता है। आदेश i, विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट अनुबन्ध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर फरवरी 2024 तक ail. सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें।
2. विपक्षी, शिकायतकर्ता को दिनांक 04.07.20i8 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि BO 47,57,560,/ पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। 3. विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 20.6 की धारा 2(29)0)के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी |/८7२+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से 7 विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2076 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये।
wa mele Prot oS SN Se STS Oe (डा०दीपक स्वरूप सक्सेना) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर