Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Rakesh Sachdeva v. ATS Realty Private Limited
Complaint No. NCR144/10/95716/2022
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- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
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Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-02 आदेश अन्तर्गत धारा-34 उपस्थिति:-- sto दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य टी० वेंकटेश, सदस्य शिकायत संख्या:- NCR44/0/9576/2022 राकेश सचदेवा A बनाम ए.टी.एस. Raedct प्रा0 लि0 प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना ATS Allure 4 यूनिट संख्या- 54I, 7-5 बुक करायी गयी थी, जिसकी कुल कीमत 50,97,747,/- रूपये थी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर किश्तों के आधार पर 49,29,746,/- रूपये का भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना में दिनांक 06.06.20i5 को यूनिट बुक कराये जाने हेतु आवेदन किया गया था, जिसके उपरान्त विपक्षी द्वारा यूनिट आवंटित की गई और उभयपक्ष के मध्य दिनांक i4.08.20i9 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ, जिसके अनुसार विपक्षी द्वारा 42 माह एवं 3 माह की अनुग्रह अवधि के साथ यूनिट का कब्जा दिया जाना था। विपक्षी द्वारा दिनांक 44.06.2022 एवं 02. 08.2022 को अंतिम मांग पत्र प्रेषित किया गया है जबकि उनके द्वारा परियोजना का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं किया गया है और न ही परियोजना से सम्बन्धित ओ.सी a. सी. प्राप्त नहीं किया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में अनुबंध दिनांकित 44.08.2045, अनुस्मारक पत्र, खाता विवरण, आवेदन फार्म, शपथ पत्र, जमा धनराशि की रसीद आदि की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी।
विपक्षी की ओर से प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया है कि प्राधिकरण द्वारा परियोजना का निर्माण कार्य पूर्ण किये जाने हेतु आवंटित भूमि का कब्जा पूर्ण रूप से प्रदान नहीं किया गया, जिस कारण विपक्षी द्वारा निर्माण कार्य de ee नहीं किया जा सका। इस सम्बन्ध में विपक्षी द्वारा प्राधिकरण को विभिन्न दिवसों पर पत्र के माध्यम से अवगत कराया जा चुका है। प्राधिकरण द्वारा कोई कार्यवाही न किये जाने पर विपक्षी द्वारा मा0 उच्च न्यायालय इलाहाबाद में Re योजित की गई है, जिसमें सुनवाई करते हुए न्यायालय द्वारा दिनांक 28.05.2020 को आदेश पारित किया गया। विपक्षी की परियोजना का निर्माण कार्य कोविड-49 के कारण भी विलम्बित रहा है। उक्त को दृष्टिगत रखते हुए शिकायतकर्ता की प्रश्नगत शिकायत प्री-मैच्योर है। विपक्षी द्वारा परियोजना से सम्बन्धित ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है और शिकायतकर्ता को ऑफर ऑफ पजेशन प्रेषित किया जा चुका है। शिकायतकर्ता द्वारा भी अपनी देयता का भुगतान समय से नहीं किया गया एवं उनके द्वारा यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं किया जा रहा है। अतः genta शिकायत को खारिज किये जाने का अनुरोध किया गया है। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में Ho उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश की प्रति, प्राधिकरण को प्रेषित पत्रों की प्रति, अधिभोग पत्र दिनांक 30.03. 2022, अनुस्मारक पत्र, ऑफर ऑफ पजेशन, खाता विवरण आदि की छायाप्रतियां दाखिल की गई है। उभयपक्ष के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्न बिन्दु विचरित किये जाते हैं :- 4. कया force majeure events होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव ?
2. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ? निस्तारण बिन्दु det बिन्दु veri इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई ? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि परियोजना की भुमि का पूर्ण कब्जा प्राप्त नहीं होने एवं क्रोविड-49 महामारी के कारण भी विलम्बित रहा है। इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 /20:7 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 40 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया हैः- du 2 =a Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature. उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तद्नुसार बिन्दु संख्या- ॥ निस्तारित किया जाता है।
समस्त सुसंगत तथ्यों पर विचारोपरान्त उ0प्र0 Rr अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड--49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनाक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। तद्नुसार बिन्दु संख्या-4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2 बिन्दु संख्या-2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना में दिनांक 06.06.2045 को यूनिट बुक कराये जाने हेतु आवेदन किया गया था, जिसके उपरान्त विपक्षी द्वारा यूनिट आवंटित की गई और उभयपक्ष के मध्य दिनांक 44.08.2045 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ, जिसके अनुसार विपक्षी द्वारा 42 माह एवं 3 माह की अनुग्रह अवधि के साथ यूनिट का कब्जा दिया जाना था। विपक्षी द्वारा दिनांक 4.06. 2022 एवं 02.08.2022 को अंतिम मांग पत्र प्रेषित किया गया है जबकि उनके द्वारा परियोजना का निर्माण कार्य पूर्ण नहीं किया गया है और न ही परियोजना से सम्बन्धित ओ.सी /सी.सी. प्राप्त नहीं किया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है।
दूसरी ओर विपक्षी द्वारा प्रतिवाद पत्र में अंकित किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा अपनी देय धनराशि का भुगतान समय से नहीं किया गया है। विपक्षी द्वारा परियोजना से सम्बन्धित अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त किया जा चुका है और शिकायतकर्ता को कब्जा पत्र प्रेषित किया जा चुका है। _ — पत्रावली पर उभयपक्षों द्वारा अनुबन्ध दिनांक 44.08.2045 के प्रस्तर-20 के अनुसार यूनिट का कब्जा अनुबन्ध निष्पादित किये जाने की तिथि से 42 माह एवं 03 माह की aque अवधि के साथ 45 माह अर्थात् दिनांक 44.05.2049 तक यूनिट का कब्जा दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील Yo 6649-50 /20i8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है किः- "the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 40) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20l6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी.//सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा।
ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को दिनांक 45.05.2049 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक विलम्बित अवधि का ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल Raced सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section 8(l)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter lo Se interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. "
aa: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 7.0.20I8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2078 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9.20) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:"
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(०४)() में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। तद्नुसार बिन्दु संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। om oe उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश . विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्ता की यूनिट को अनुबन्ध पत्र के अनुसार पूर्ण कराकर दिनांक 34.07.2023 तक ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। 2. विपक्षी, शिकायतकर्ता को दिनांक 45.05.2049 से ओ.सी.सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर विलम्ब ब्याज के रूप में McLRt+H प्रतिशत की दर से ब्याज की धनराशि अदा करना सुनिश्चित करें। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये। फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय.न होगा।
3. विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 2046 की धारा 2(2०)0)के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। 4. इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 206 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। che ~ 5. यदि विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता को यह अधिकार होगा कि रेरा प्राधिकरंण के माध्यम से अपने आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। ह। ——— मे] r— a Sa Slo दीपक स्वरूप WR (सदस्य) (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण