Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Mr. Ginesh Agrawal v. Greater NOIDA Industrial Development Authority
Complaint No. NCR144/09/1436/2019
- Decision date
- 2019-12-19
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 1 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04ए श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष कम सं0 शिकायत सं0 शिकायतकर्तागण Wa.aiR44 /09/436/20i9 | गिनेश अग्रवाल 2 Vaeiam44 /09 /749 /20:9 _ | अनिल अरोड़ा व सुप्रिया अरोड़ा 3 | एन.सी.आर।44 /20/0783/20i9 | शशि गुप्त _} ansscesal sae SSSORS ERS TET शिकायतकर्तागण बनाम ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण, गौतमबुद्धनगर शिकायतकर्ता गिनेश अग्रवाल के साथ 02 अन्य शिकायकतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन तीनों शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह तीनों शिकायतें BHS-I7 LOHIYA ENCLAVE 0भाटारणरष-] से सम्बंधित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत Yo एन.सी.आर444 /09 / 4436 / 2049 गिनेश अग्रवाल अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध जमा धनराशि मय ब्याज वापस, मांगो को सही किये जाने एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना फछप्नड-व7 LOHIYA ENCLAVE 0शाटारएर- में यूनिट संख्या-430,//0 आवंटित की गयी थी, जिसके सापेक्ष उनके द्वारा 25,26,700/— रूपये की धनराशि अदा की गयी। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता »
को दिनांक 29.04.2047 तक परियोजना को पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, परन्तु आज तक कब्जा नहीं दिया गया है। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि परियोजना 32 माह से अधिक विलम्ब है। प्राधिकरण से ओ.सी /सी.सी प्राप्त नहीं किया गया है। प्राधिकरण द्वारा अनुचित रूप से 5,48,895 //- रूपये की अतिरिक्त धनराशि की मांग की जा रही है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध जमा धनराशि मय ब्याज वापस, मांगो को सही किये जाने एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में परियोजना का विवरण, फ्लैट के फोटो, पत्र दिनांक 04.07.2049, ऋण पत्र, आवेदन फार्म, चैक, आवंटन पत्र, ब्रोशर आदि की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं। विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि face अप हाउसिंग योजना diva के अन्तर्गत आवेदन संख्या-43034 के माध्यम से पंजीयन धनराशि 2,57,000/-रूपये का भुगतान करते हुए 58.48 वर्ग मीटर के भवन हेतु आवेदन किया गया। आवंटन पत्र दिनांक 29.07.204 को जारी किया गया। आवंटी को कब्जा ऑफर पत्र दिनांक 04.07.2049 को जारी किया गया, जिसके अनुसार आवंटी को 6 माह में बिना विलम्ब शुल्क के आवंटित भवन की लीज डीड निष्पादित कराते हुए भवन का कब्जा प्राप्त किया जाना है। ब्रोशर में भवनों की सम्भावित लागत अंकित किया गया था। निर्मित भवनों का मूल्यांकन anata व्यय / प्रत्याशित व्यय आंकलित कर तैयार किया जाता है। ब्रोशर में कब्जा दिये जाने की तिथि सम्भावित तिथि थी, इसके अतिरिक्त विभिन्न कारणों से परियोजना का कार्य बाधित रहा। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवेदन फार्म, आवंटन पत्र, पत्र दिनांक 04.07.2049 की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है।
उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। शिकायतकर्ता की शिकायत को दृष्टिगत रखते हुए निम्न बिन्दु विचारणीय है। 4... क्या परियोजना “फोर्स मैज्योर इवेन्टस्” व अन्य कारणों से विलम्बित हुई एवं क्या इसका लाभ विपक्षी को दिया जा सकता है ? 2... कया शिकायतकर्तागण को जमा धनराशि वापस दिलायी जाये ? > 3. क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये। यदि हाँ, तो किस ब्याज दर से ? निस्तारण बिन्दु to 4 बिन्दु vo 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना विभिन्न कारणों से विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि विभिन्न कारणों से परियोजना में विलम्ब हुआ। विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन कारणों की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही अपने कथन के बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है। इस सम्बन्ध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 / 2047 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया है:- Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature.
उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तद्नुसार बिन्दु Ho ॥ निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु सं0 2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्तागण की जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? यह वाद बिन्दु भी शिकायतकर्तागण के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्तागण पर है। शिकायतकर्ता द्वारा अपनी जमा धनराशि की मांग की गयी है, जिस पर विपक्षी द्वारा कहा गया कि आवंटी को कब्जे हेतु ऑफर दिनांक 04.07.20I9 को किया जा चुका है। है जहाँ तक केता द्वारा रिफण्ड के अनुरोध का प्रश्न है, उनके द्वारा साथ ही में आवंटन के समय बताये मूल्य के सापेक्ष बढ़े मूल्य को वापिस लेने व 32 माह से अधिक विलम्ब व इकाई की गुणता उपयुक्त न होने के आधार पर दण्ड अधिरोपित करने का भी अनुरोध किया गया है। साथ ही यह वाद कब्जा ऑफर करने के बाद दायर किया गया है। इस विषय में रेरा अधिनियम के प्राविधानों को समग्र रूप से पढा जाना आवश्यक है ताकि सभी पक्षों के मत को दृष्टिगत रखते हुए एक संतुलित निर्णय लिया जा सकें। रेरा एक्ट की धारा i8 (4) F प्राविधान है कि :- Section 78 (7) “If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,
in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. इस प्रकार Sal को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नहीं मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा मासिक दर से ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें। रेरा अधिनियम की धारा 34 में रेरा के अन्य “फंग्शन्स” के साथ-साथ " to ensure compliance of the obligations cast upon the promoters, the allottees and the real estate agents under this Act and the rules and regulations made thereunder " का भी उल्लेख @ | > इसी प्रकार धारा 32 में रियल gee सेक्टर के विकास हेतु अथॉरिटी के उत्तरदायित्यों में निम्न भी सम्मिलित हैं :-
“32. The Authority shall in order to facilitate the growth and promotion of a healthy, transparent, efficient and competitive real estate sector make recommendations to the appropriate Government of the competent authority, as the case may be, on,— (a)protection of interest of the allottees, promoter and real estate agent,....... (any other issue that the Authority may think necessary for the promotion of the real estate sector.” उक्त प्राविधानों से यह स्पष्ट है कि “रियल एस्टेट सेक्टर” के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करने के लिए इसके wih ee होल्डर्स के हितों को समग्र रूप से देखते हुए समुचित निर्णय लेने का उत्तरदायित्व इस ऑथरिटी का है। इस कम में मा. मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा नीलकमल रियलटर्स सबअरबन प्रालि. बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, जिसमें Rr अधिनियम की वैद्यानिकता के सम्बंध में निर्णय दिया गया था, के प्रस्तर 424 में मा. उच्च न्यायालय द्वारा निम्न संवीक्षण किया :-
“24, The entire scheme of the RERA is required to be kept in mind. It is already submitted during the course of hearing that in many cases helpless allottees had approached consumer forum, High Courts, Apex Court in a given fact situation of the case. The courts have been passing orders by moulding reliefs by granting interest, compensation to the allottees, and issuing directions for timely completion of project, transit accommodation during completion of project, so on and so forth. Under RERA now this function is assigned to the authority, tribunal. An appeal lies to the High Court. Under one umbrella, under one regulation and one law all the issues are tried to be resolved.” उक्त से स्पष्ट है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद, यद्यपि समय से इकाई न मिलने की दशा में आवंटी का अपनी धनराशि ब्याज सहित मांगने का अधिकार है, तथापि उक्त वर्णित संवीक्षा को देखते हुए अथॉरिटी, प्रकरण के समस्त तथ्यों, के आधार पर ‘by moulding reliefs by granting interest, compensation to compensation to the allottees, and issuing directions for timely completion of project, issuing directions for timely completion of project, transit. accommodation during completion of project, so on and so roject, so on and so forth’ के अनुरूप आदेश पारित किए जा सकते हैं। एलोटीज़ द्वारा धनराशि वापस किए जाने व परियोजना में बने रहने वाले एलोटीज के हितों में agers के प्रसंग में “चित्रा शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया” (744 / 207) के निर्णय में मा. सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय के प्रस्तर 40 में निम्न ऑबजरवेशन किया है :-
40. As we have stated earlier, an amount of Rs 750 crores is lying in deposit before this Court pursuant to the interim directions, on which interest has accrued. The home buyers have earnestly sought the issuance of interim directions to facilitate a pro-rata disbursement of this amount to those of the home buyers who seek a refund. "We are keenly conscious of the fact that the claim of the home buyers who seek a refund of monies deserves to be considered with empathy. Yet, having given our anxious consideration to the plea and on the balance, we are not inclined to accede to it for more than one reason. Firstly... Secondly, the figures which have been made available presently, following the opening of the Web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund. "
मा. उच्च eee एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उक्त प्रस्तरों में उद्धरत “ऑबजरवेशनस्” एवं रेरा एक्ट की समग्र व्यवस्था को देखते हुए यह भी स्पष्ट है कि यदि विलम्ब के प्रत्येक मामले में धनराशि लौटाने का ही निर्णय लिया जाये तो निश्चय ही यह अधिनियम के “ऑबजेक्टिव” तथा “स्कीम” के अनुरूप न होगा। Rove का निर्णय लेते समय प्रत्येक मामले की “यूनीकनेस” प्रकरण के समस्त तथ्यों यथा “eee” की स्थिति, कम्पलीशन की “टाईम लाईन“, प्रोमोटर्स के द्वारा ऑफर ऑफ पजेशन के “कमिटमेन्ट” की स्थिति, अन्य wa होल्डर्स”, विशेष रूप से परियोजना के साथ बने रहने वाले “एलॉटीज” पर प्रभाव, “प्रस्तावित पज़ेशन डेट” के विषय में “कन्सेन्सस्” आदि पर विचार किया जाना न्यायहित में होगा। समस्त परिस्थितियों को देखते हुए विशेष रूप से यह कि जब शिकायतकर्तागण को कब्जे हेतु ऑफर किया जा चुका है, जिससे विदित है कि परियोजना पूर्ण है। अतः इस स्तर पर धनवापस किया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। वैसे भी शिकायतकर्ता द्वारा परियोजना में निवेश कब्जे हेतु किया गया था। ऐसे दशा में वह कब्जा प्राप्त करने के उपरान्त यूनिट के भविष्य में उपयोग के सम्बन्ध में स्वयं निर्णय ले सकते dD है। निश्चय ही परियोजना में बने रहने की दशा में एलॉटीज़ को विलम्ब हेतु नियमानुसार ब्याज प्रोमोटर्स द्वारा देय होगा। निस्तारण बिन्दु सं०-2 fren किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 3
पत्रावली पर दाखिल ब्रोशर के प्रस्तर-एन में आवंटन पत्र जारी होने से 3 वर्ष में कब्जा दिये जाने का उल्लेख है। प्रश्नगत प्रकरण में आवंटन पत्र दिनांक 29.04. 2044 को जारी किया गया, जिसके अनुसार दिनांक 29.04.2047 तक कब्जा दिया जाना था। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता दिनांक 30.0:.20i7 से कब्जा ऑफर किये जाने की अवधि अर्थात् दिनांक 04.07.20:9 तक विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 8(4)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा sar धनराशि का उपभोग किया गया है। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20:6 के अधीन दिनांक 47.40.208 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय /पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण
(Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9.2 (ii) FY प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि में विलम्ब है, तो विपक्षी भी McLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त सकता है। जहाँ तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है, तो इस सम्बन्ध में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा सी.सी 739/2047 विकास गर्ग बनाम एम.आर.एम.जी.एफ लैन्ड लिमिटेड एवं अन्य में निम्नवत निर्णित किया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से उललेखित है किः-
The contention of the learned counsel is that having taken possession of the plot and got the conveyance deed executed in his favour, the complainant is estopped from raising any claim against the opposite party. I however, find no merit in the contention, as far as the compensation for the delay in delivery of possession of the plot is concerned. While, taking possession, the complainant inter-alia stated that he had no claim with respect to the size, dimension, area, location and legal status of the plot. He did not say that he had no claim with respect to the delay in delivery of possession of the plot to him. While executing the conveyance deed, he recorded his satisfaction about the plot, area, dimension, Ps boundaries etc. and stated that he had no claim of any nature regarding the same, meaning thereby that he had no claim with respect to the plot, area, dimension, boundaries etc. He did not say that he did not have claims of any nature whatsoever. Use of the words “regarding the same” qualified the claim, which he confirmed having not been left against the vendor. Therefore, neither the possession letter nor the conveyance deed would come in way of the complainant claiming possession for the delay in delivery of the plot to him. उपरोक्त माननीय राष्ट्रीय writen विवाद निवारण आयोग के आब्जर्वेशन से स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक विलम्बित अवधि के ब्याज की धनराशि पाने का अधिकारी है। तद्नुसार बिन्दु सं0-3 निस्तारित किया जाता है।
उपरोक्त बिन्दु का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4... शिकायतकर्तागण को निर्देश दिया जाता है कि वह दिनांक 34.04.2020 से पूर्व कब्जा प्राप्त करें और देय vera शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराये। 2... विपक्षी दिनांक 30.04.2047 से कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि अर्थात् दिनांक 04.07.20i9 तक की अवधि के लिए शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी | ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर निमयानुसार वापस की जायेगी। अन्य शिकायतकर्तागण के प्रकरण में अनुबन्ध के अनुरूप CRIT गणना की जायेगी। 3, विपक्षी परियोजना के ब्रोशर/आवंटन पत्र के अनुरूप सभी सुविधायें दिनांक 34.04.2020 से पूर्व उपलब्ध करायें | 4... यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2046 के धारा 2 (za)(i) के अन्तर्गत ब्याज को परिभाषित किया गया है कि यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर MCLR+I प्रतिशत होनी चाहिए | की 30 5. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि बढ़े हुए की कीमत का कारण बताते हुए Aga विवरण, साक्ष्यों सहित शिकायतकर्तागण को उपलब्ध कराना सुनिश्चित करें। 6... इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस ओदश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी।
7. इस आदेश का उल्लघंन उ0फप्र/भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक /6/ /2-/20:9 Qe (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) नी उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण