Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Veena Sharma and Ram Kishan Sharma v. PATEL ADVANCE JV Registered Office
Complaint No. NCR144/08/98137/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- Not recorded
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- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 3 Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
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Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-3 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थितः- Slo दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम शिकायत संख्या कं यूनिट | जमा धनराशि vo | आवंटन/ अनुबंधानुसार do 0 फ्लैट बायर | कब्जा दिये एग्रीमेंट की | जाने की तिथि तिथि ५ . | NCRI44/08/9837/2022 | वीना शर्मा व जी 4- | Bo 24,39,788 // | 8.07.20i4 | 40 माह + 06 | राम किशन शर्मा | 4702 माह अनुग्रह कब्जा व अवधि अर्थात | विलम्बित मई 2048 अवधि का ब्याज दिलाये | जाने का अनुरोध किया Pal गया है। बनाम पटेल: एडवांस जेवी वर्तमान प्रकरण में पीठ द्वारा दिनांक 44.:2.2024 को रेरा अधिनियम की धारा 34 के अन्तर्गत आदेश पारित किया गया था जिसमें पीठ द्वारा शिकायतकर्ता की शिकायत निरस्त कर दी गयी थी। शिकायतकर्ता द्वारा पीठ द्वारा दिनांक 44.42. 2024 को पारित आदेश के विरूद्ध अपील संख्या 64/2025 माननीय अपीलीय अधिकरण के समक्ष योजित की गयी जिसमें माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा दिनांक 20.08.2025 को शिकायतकर्ता की अपील स्वीकार करते हुए पीठ द्वारा दिनांक 44.42.2024 को पारित आदेश को निरस्त करते हुए प्रकरण पुनः पीठ को विपक्षी द्वारा जारी निरस्तीकरण पत्र दिनांकित 27.09.2022 की वैधता के सम्बन्ध में विचारणीय बिन्दु का निस्तारण किये जाने तथा प्रकरण में नये सिरे से निस्तारित किये जाने हेतु प्रेषित किया गया है। माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा दिनांक 20.08.2025 को पारित आदेश के क्रम. में उभयपक्षों को सुनकर पत्रावली आदेशरर्थ सुरक्षित की गयी। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्ध यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु यह शिकायत संस्थित की गयी है।
संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना NEOTOWN एप्त&87- में यूनिट संख्या जी 4-4702 बुक करायी गयी, जिसके ५ मै —_= सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि रु0 24,390,788 /-का भुगतान किया गया। शिकायतकर्ता की ओर से लिखित कथन दाखिल करते हुए यह तर्क उल्लिखित किया गया है कि प्रारम्भ में यूनिट संख्या ए4-604 बुक करायी गयी थी जिसके सापेक्ष दिनांक 26.03.2074 को फ्लैट बायर एग्रीमेंट निष्पादित हुए। विपक्षी द्वारा कब्जा दिये जाने की प्रस्तावित तिथि तक कार्य पूर्ण नही किया जा सका। तब शिकायतकर्ता द्वारा ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण से सम्पर्क किया गया तो ज्ञात हुआ कि टॉवर-ए में निर्माण कार्य बंद है। शिकायतकर्ता द्वारा 4 साल विपक्षी से प्रोविजनल बुकिंग को किसी अन्य टॉवर में शिफ्टिंग के लिए सम्पर्क किया गया। तत्पश्चात शिकायतकर्ता ने विपक्षी के प्रस्ताव पर आवंटित यूनिट को टॉवर ए से टॉवर जी में स्थानान्तारित करने की सहमति दी। वर्तमान प्रकरण में शिकायतकर्ता द्वारा टॉवर-जी में यूनिट आवंटित किये जाने के लिए पुनः आवेदन किया गया। यूनिट संख्या जी 4/7702 के के लिए दिनांक 8.07.20:4 को फ्लैट बायर एग्रीमेंट निष्पादित हुआ। फ्लैट बायर एग्रीमेंट के अनुसार शिकायतकर्ता को मई 208 तक यूनिट का कब्जा ग्राप्त होना था। शिकायतकर्ता ने विपक्षी से परियोजना में निर्माण कार्य की स्थिति व कब्जा दिये जाने के बारे में कई बार सम्पर्क किया। विपक्षी की परियोजना पूर्ण नहीं है और न ही विपक्षी को ओ.सी/ सी. सी प्राप्त हुआ है। अतः विपक्षी ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज 24 प्रतिशत तथा GO 5,00,000 / मानसिक उत्पीड़न व विधिक खर्च दिलाये जाने का अनुरोध किया है।
शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के समर्थन में मांग पत्र, आवंटन #फ्लैट बायर एग्रीमेंट व रसीदों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी हैं। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् है:- क्रम | a" भुगतान की गयी संख्या धनराशि (रु0) विपक्षी द्वारा जारी रसीद संख्या 6883 44.07.2044 BO 3,39,89/ रसीद संख्या 7098 22.09.204 रु0 4,00,000 / रसीद संख्या 7025 20.09.2044 BO 4,58,485 / रसीद संख्या 7432 47.04.2045 BO 2,24,594 / रसीद संख्या 679 44.06.2045 रु0 3,36,89 / 2 = जोक रसीद संख्या 6750 | 74.07.205 BO 2.26827 / रसीद संख्या 8573—/30.2.205 BO 2,25,487/ रसीद संख्या 9054. | 09.06.2046 BO 2,27,6i3/ कूल योग : | Bo 27,39,788 /
विपक्षी की ओर से लिखित आपत्ति दाखिल करते हुए यह उल्लिखित किया गया है कि शिकायतकर्ता को जुलाई 2044 में यूनिट आवंटित की गयी थी। आवंटन के क्लाज-24(ए) के अनुसार यूनिट का कब्जा 40 माह तथा 6 अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात मई 20i8 तक दिया जाना था। विपक्षी द्वारा वांछित एनओसी प्राप्त करते हुए ओ.सी/सी.सी के लिए आवेदन किया जा चुका है। विपक्षी ने शिकायतकर्ता द्वारा धनराशि का भुगतान न किये जाने पर आवंटित यूनिट निरस्त कर दी है जिस कारण शिकायतकर्ता आवंटी की श्रेणी में नहीं है और वर्तमान प्रकरण पोषणीय नहीं है क्योंकि विपक्षी ने रेश अधिनियम की धारा 4446) के अनुसार यूनिट निरस्त कर दी है। विपक्षी ने उल्लिखित किया है कि ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण से भूमि विवाद होने पर प्राधिकरण के पत्र दिनांक 34.05.2044 से निर्माण कार्य रोक दिया गया। भूमि से सम्बन्धित याचिका संख्या 27508 /20:0 माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन थी। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा याचिका का निस्तारण करते हुए भूमि पर कार्य प्रारम्भ किये जाने का आदेश पारित किया गया। विपक्षी को दिनांक 26.:4.20i5 को पत्र प्राप्त हुआ कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विवाद का निस्तारण करते हुए भूमि मालिक को अतिरिक्त कम्पनसेशन दिये जाने का आदेश पारित किया गया है। विपक्षी ने कथन किया कि भूमि विवाद, नोट बंदी, दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण होने से निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध, wifas—t9 महामारी के कारण परियोजना विलम्बित हुयी है। विपक्षी ने फोर्स मैज्योर के सम्बंध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बिक्रम चटर्जी व अन्य बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया व अन्य सिविल अपील संख्या 940/20I7 में पारित आदेश, उ.प्र.रेरा पीठ-4 द्वारा शिकायत संख्या एनसीआर445 /44 // 85434 /202 सुनील कुमार जैन बनाम एम आर मित्तल व शिकायत संख्या एनसीआर444 /09 /64244 / 2020 निखिल सिंघल बनाम मैसर्स गौर we हाई-टेक gorge प्रा.लि. में पारित आदेश का संदर्भ अंकित किया है। शिकायतकर्ता ने अवशेष देय धनराशि रु0 5,54,457 // का भुगतान नहीं किया जिसके लिए कई मांग पत्र दिनांक 07.42.2024
3 ——_ व 49.04.2022 को प्रेषित किये गये है। लेकिन शिकायतकर्ता ने आज तक धनराशि का भुगतान नहीं किया है। शिकायतकर्ता मांग पत्र के अनुसार धनराशि भुगतान करने में असफल रहा है जिस कारण दिनांक 27.09.2022 को आवंटित यूनिट निरस्त करते हुए शिकायतकर्ता को दिनांक 24.44.2022 को पत्र जारी किया गया कि वह चेक संख्या 264675 धनराशि Go 9,60,758 /T भुगतान ग्राप्त करें। अतः विपक्षी ने परिवाद को निरस्त करने तथा विपक्षी से शिकायतकर्ता को अवशेष धनराशि प्राप्त किये जाने हेतु निर्देशित किये जाने का अनुरोध किया है। विपक्षी द्वारा अपनी लिखित आपत्ति के समर्थन में विद्युत सुरक्षा प्रमाण पत्र दिनांक 03.09.2024, लिफ्ट सुरक्षा प्रमाण पत्र दिनांक 26.07.2027, अग्नि सुरक्षा प्रमाण पत्र दिनांक 06.08.2024, स्ट्रक्चरल सुरक्षा प्रमाण पत्र दिनांक 04.09.202, कम्पलीशन सर्टिफिकेट आवेदन हेतु 24.09.2024, मांग पत्र, अंतिम अनुस्मारक पत्र व यूनिट निरस्तीकरण पत्र की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है। विपक्षी की ओर अतिरिक्त जवाब दाखिल करते हुए यह उल्लिखित किया गया है कि शिकायतकर्ता को धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु दिनांक 07.42. 2024 व 9.04.2022 को अनुस्मरण पत्र भेजे गये परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा धनराशि का भुगतान न किये जाने पर आवंटित यूनिट दिनांक 27.09.2022 को निरस्त करते हुए दिनांक 25.0.2023 को तृतीय पक्ष (अनुजा सक्सेना व नवनीत कुमार सक्सेना) के अधिकार सृजित कर दिये गये जिसका साक्ष्य wear बी व सी है। अतः विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को टर्म्स एण्ड कंडीशन के अनुसार धनराशि फॉरफीट करके अवशेष धनराशि वापस करने की अनुमति दिये जाने तथा यूनिट पर तृतीय पंक्ष के अधिकार को कायम रखने का अनुरोध किया गया है।
विपक्षी द्वारा दिनांक 06.7.2025 को पारित आदेश के क्रम में अपना लिखित कथन दाखिल किया गया है जिसमें विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा अनुबंध पत्र के क्लाज 4 के अनुसार समय से देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया जिस कारण उनके द्वारा शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट निरस्त की गयी है। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि उनके द्वारा शिकायतकर्ता को निरंतर मांग पत्र व अनुस्मरण पत्र प्रेषित किये गये तथा अंतिम मांग पत्र दिनांक 29.47.2022 को प्रेषित किया गया परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा देय 4
धनराशि की अदायगी नहीं की गयी। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि रेरा अधिनिमय की धारा 446) के अनुसार विपक्षी को यह अधिकार है कि वह शिकायतकर्ता द्वारा डिफाल्ट किये जाने पर शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त कर सकता है। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि उनके द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट अंतिम रूप से दिनांक 27.09.2022 को निरस्त करते हुए शिकायतकर्ता को दिनांक 42.44.2022 को सूचित किया गया कि वह आकर अपना चेक प्राप्त कर ले। इसके पश्चात विपक्षी द्वारा यूनिट संख्या जी-4,/4702 सही तरीके से अन्य आवंटी जीवन ज्योति व दीपक चोपडा को विक्रय कर दी गयी तथा उक्त आवंटियों के पक्ष में दिनांक 22.03.2024 को सब-लीज-डीड निष्पादित करा दी गयी है। अतः विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की शिकायत निरस्त किये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रतिउत्तर दाखिल किया गया है जिसमें शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 06.4.2025 को पारित आदेश के क्रम में टेबुलर फार्म में विपक्षी को भुगतान की गयी धनराशि का विवरण प्रस्तुत किया है। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित किया गया है कि उनके द्वारा यूनिट की कुल कीमत Go 27,98,020/ के सापेक्ष रु० 24,39,788/or भुगतान किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा मई 2048 तक दिया जाना था परन्तु विपक्षी द्वारा दिनांक 07.2.2024 को शिकायतकर्ता पर रु0 345,744/or धनराशि अतिरिक्त चार्जेस के रूप में अधिरोपित की गयी है जो कि अवैधानिक है। इसके पश्चात शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 05.08.2022 को वर्तमान शिकायत पीठ के समक्ष कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु योजित की गयी जिसके पश्चात विपक्षी द्वारा मनमाने तरीके से तथा बिना किसी पूर्व सूचना के शिकायतकर्ता की यूनिट दिनांक 27.09.2022 को निरस्त कर दी गयी। इसके पश्चात विपक्षी द्वारा पीठ में प्रपत्र प्रस्तुत किये गये कि उनके द्वारा प्रश्नगत यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किये जा चुके है परन्तु न तो विपक्षी द्वारा दाखिल लिखित जवाब में और न ही प्रपत्रों में यह स्पष्ट किया गया है कि उनके द्वारा यूनिट संख्या जी-4,/4702 किसी अन्य व्यक्ति को आवंटित की गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किये जाने के सम्बन्ध में जो अनुबंध पत्र दाखिल किया गया है 5
Os वह अन्य यूनिट dea vis /i206 से सम्बन्धित है। जिस कारण शिकायतकर्ता द्वारा माननीय अपीलीय अधिकरण के समक्ष अपील संख्या 6t /2025 योजित की गयी तथा विपक्षी द्वारा प्रस्तुत प्रपत्रों के अवोकन से विदित हुआ कि उनके द्वारा प्रश्नगत यूनिट पर भी तृतीय पक्ष के अधिकार दिनांक 06.07.2024 को सृजित किये गये तथा तृतीय पक्ष जीवन ज्योति और दीपक चोपडा के पक्ष में दिनांक 22.03. 2024 को सब-लीज-डीड निष्पादित करा दी गयी है। उपरोक्त विपक्षी के कृत्य से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा रेश अधिनियम की धारा का उल्लंघन किया गया है तथा पीठ से तथ्य छिपाया गया है और अवैधानिक रूप से प्रश्नगत यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किये गये है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट पुर्नस्थापित किये जाने तथा तृतीय पक्ष के पक्ष में निष्पादित अनुबंध पत्र व सब-लीज-डीड निरस्त किये जाने तथा विपक्षी पर अर्थदण्ड अधिरोपित किये जाने का अनुरोध किया गया है। उभयपक्ष के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्न प्रश्न विरचित किये जाते हैं :- 4. क्या विपक्षी द्वारा यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नहीं? 2. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? 3. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी ? निस्तारण प्रश्न संख्या A संख्या । इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या विपक्षी द्वारा यूनिट का निरस्त किया जाना वैधानिक है अथवा नहीं? इसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि शिकायतकर्ता को देय धनराशि का भुगतान किये जाने के लिए दिनांक 07.42202i व 9.07.2022 को मांग पत्र भेजे गये परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया जिस कारण आवंटित यूनिट दिनांक 27.09.2022 को निरस्त कर दी गयी तथा शिकायतकर्ता को धनराशि वापस किये जाने के लिए चेक तैयार करके शिकायतकर्ता को सूचित भी किया गया कि धनराशि भुगतान हेतु चेक 6 oe प्राप्त कर ले परन्तु शिकायतकर्ता चेक लेने नहीं आये जिसके पश्चात शिकायतकर्ता द्वारा वैधानिक रूप से तृतीय पक्ष के अधिकार प्रश्नगत यूनिट पर सृजित करते हुए दिनांक 22.03.2024 को तृतीय पक्ष जीवन ज्योति और दीपक चोपडा के पक्ष में सब-लीज-डीड निष्पादित कर दी गयी। शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा आवंटित यूनिट का कब्जा मई 20:8 में दिया जाना था। यूनिट की कुल कीमत BO 22,98,020/ के सापेक्ष उनके द्वारा GO 24,39,788 ,/ का भुगतान किया गया है। विपक्षी द्वारा अवैधानिक रूप से शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त की गयी है तथा यूनिट निरस्त किये जाने पश्चात उक्त यूनिट पर तृतीय पक्ष का अधिकार सृजित किये जाने के गलत साक्ष्य पीठ में प्रस्तुत किये गये।
पत्रावली के अवलोकन से विदित है कि एलॉटमेंट / फ्लैट बायर एग्रीमेंट दिनांक 48.07.2044 से स्पष्ट है कि आवंटित यूनिट की कुल कीमत धनराशि रु0 24,98,020 / है जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा Bo 24,39,788 / का भुगतान किया गया है जो कि यूनिट की कुल कीमत का 95 प्रतिशत से अधिक है। विपक्षी द्वारा अनुबंध पत्र के अनुसार परियोजना पूर्ण करते हुए शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा मई 20i8 में दिया जाना था। विपक्षी द्वारा यह कथन किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा समय से देय धनराशि का भुगतान न किये जाने के कारण शिकायतकर्ता की आवंटित यूनिट दिनांक 27.09.2022 को अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी। शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का भुगतान न किये जाने के सम्बन्ध में भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) (विक्रय /पट्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 की धारा 9.3 (2) में यह प्राविधानित है कि :- धारा 9.3 ii. In case of Default by Allottee under the condition listed above continues for a period beyond 3 (three) consecutive months after notice from the Promoter in this regard, the Promoter may cancel the allotment of the [Apartment/Plot] in favour of the Allottee and refund the money paid to him by the Allottee by deducting the booking amount and the interest liabilities and this Agreement shall thereupon stand terminated. The 7 ८ al Promoter must not be in default to take this benefit; Provided that the Promoter shall intimate the Allottee about such termination at least thirty days prior to such termination. पत्रावली के अवलोकन से स्पष्ट है कि उभयपक्ष के मध्य दिनांक 78.07.20:4
को एलॉटमेंट /” फ्लैट बायर एग्रीमेंट निष्पादित किया गया था जिसके अनुसार यूनिट का कब्जा परियोजना पूर्ण कर मई 208 तक उपलब्ध कराया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु फ्लेक्सी पेमेंट प्लान का चयन किया गया था जिसके अनुसार शिकायतकर्ता द्वारा चरणबद्ध रूप से देय धनराशि का भुगतान किया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा पेमेंट प्लान के अनुसार यूनिट की कुल कीमत BO 2,98,020 / के सापेक्ष रु0 24,39,788 / का भुगतान किया जा चुका है जो कि यूनिट की कुल कीमत का लगभग 95 प्रतिशत से अधिक है जिस कारण विपक्षी द्वारा किया गया यह तर्क कि शिकातयकर्ता द्वारा समय से देय धनराशि का भुगतान नहीं किया गया है संधारणीय नहीं है। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को देय धनराशि का भुगतान किये जाने हेतु दिनांक 07.2.2020 व 26.09.2022 को दो मांग पत्र भेजे गये जिसके पश्चात विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को अंतिम मांग पत्र दिनांक ॥9.04.2022 को प्रेषित किया गया तथा उसके पश्चात विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट दिनांक 27.09.2022 को अंतिम रूप से निरस्त कर दी गयी जबकि उपरोक्त प्राविधानों के अनुसार विपक्षी द्वारा यूनिट निरस्त किये जाने से पूर्व प्री-कैंसिलेशन भेजकर सूचित किये जाने का प्राविधान है तथा शिकायतकर्ता द्वारा प्री-कैंसिलेशन के पश्चात 30 दिन के अन्दर देय धनराशि का भुगतान नहीं किया जाता है तो विपक्षी शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त कर सकता है परन्तु वर्तमान प्रकरण में विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किये जाने से पूर्व कोई प्री-कैंसिलेशन पत्र प्रेषित नहीं किया गया है और न ही विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किये जाने के पश्चात शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट के सापेक्ष जमा करायी गयी धनराशि शिकायतकर्ता को वापस नहीं की गयी है। उपरोक्त प्राविधानों में यह स्पष्ट उल्लिखित है कि यदि प्रमोटर स्वयं दोषी है तो वह उपरोक्त प्राविधानों के अनुसार शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त नहीं कर सकता है और न ही उपरोक्त
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प्राविधानों के अनुसार लाभ ले सकता है। अतः उक्त तथ्यों के आधार पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किया जाना वैधानिक नहीं है। यहाँ यह भी उल्लिखित किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्नगत शिकायत दिनांक 05.08.2022 को योजित की गयी थी तथा विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट पीठ के समक्ष विचारणीय रहने के दौरान दिनांक 27.09.2022 को निरस्त करते हुए उक्त यूनिट पर दिनांक 06.04.2024 को तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किये गये है तथा दिनांक 22.03.2024 को vad यूनिट के सम्बन्ध में सब-लीज-डीड तृतीय पक्ष के पक्ष में निष्पादित करा दी गयी। इस सम्बन्ध में माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा अपील संख्या 485 /2023 अलका ढींगरा एव तोशन ढींगरा बनाम गौरसन्स रियलटेक प्रा.लि. में दिनांक 48.02.2025 को पारित आदेश का उल्लेख किया जाना महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। माननीय अपीलीय अधिकरण द्वारा उक्त आदेश के प्रस्तर 28 व 29 में यह उल्लिखित किया गया है कि :- 28- It was held that lis pendens commences at the stage of institution of the petition and not at the stage when the notice is issued by the court. Thus, taking Review Petition pending, though defective, it was held that Section 52 of the Transfer of Property Act would apply to the third-party purchases, once the sale was executed after the review petition was instituted before the Court. In other words, the transfer of property that is made during the pendency of the suit/proceedings is subject to the final decision of the litigation. Paragraph 47 and 49 is extracted: “47. \n short, the doctrine of lis pendens that Section 52 of the Transfer of Property Act encapsulates, bars the transfer of a suit property during the pendency of litigation. The only exception to the principle is when it is transferred under the authority of the court and on terms imposed by
it. Where one of the parties to the suit transfers the suit property (or part of it) to a third-party, the latter is bound —==— 9 by the result of the proceedings even if he did not have notice of the suit or proceedings.....” “ 49. The purpose of lis pendens is to ensure that the process of the court is not subverted and rendered infructuous. In the absence of the doctrine of lis pendens, a defendant could defeat the purpose of the suit by alienating the suit property. This purpose of the provision is clearly elucidated in the explanation clause to Section 52 which defines “pendency”. Amending Act 20 of 929 substituted the word “pendency” in place of “active prosecution”. The amending Act also included the Explanation defining the expression “pendency of suit or proceeding”. “Pendency” is defined to commence from the “date of institution” until the “disposal”. The argument of the respondents that the doctrine of lis pendens does not apply because the petition for review was lying in the registry in a defective state cannot be accepted. The review proceedings were “instituted” within the period of limitation of thirty days.
. The doctrine of lis pendens kicks in at the stage of “institution” and not at the stage when notice is issued by this Court. Thus, Section 52 of the Transfer of Property Act would apply to the third-party purchases once the sale was executed after the review petition was instituted before this Court. Any transfer that is made during the pendency is subject to the final result of litigation.” [vide M/s. Siddamsetty Infra (supra)] 29 sassscteveess It is categorical and specific case of respondent that the unit came to be deemed cancelled on 02.09.20i9 during pendency of the complaint. Further, during pendency of the complaint, third party right was created by the respondent deliberately and willfully. Therefore, sale deed executed in favour of third party by the respondent is in the teeth of the principle of lis pendens. Sale deed in favour of third party would be subject to the outcome of this appeal, which is continuation 0 OSS of the complaint. The allotment/sale deed of the unit made to a third party during subsistence of the agreement and pendency of the complaint would be hit by Section 2(4)(h) and Section 2(5) of Act, 206. उपरोक्त VWI नजीर के अवलोकन से स्पष्ट है वाद पीठ के -समक्ष विचाराधीन होने के दौरान शिकायतकर्ता की शिकायत रेरा अधिनियम की धारा 44 (५)(एच) तथा धारा 446) में उल्लिखित प्राविधान उभयपक्षों पर बाध्य है तथा पीठ द्वारा शिकायत का निस्तारण करते समय जो निर्णय दिया जाएगा वह निर्णय उभयपक्षों के साथ-साथ तृतीय पक्ष पर भी बाध्यकारी होगा।
. उपरोक्त वर्णित तथ्यों के अवलोकन से यह विदित होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा प्रश्नगत यूनिट के सापेक्ष यूनिट की कीमत का लगभग सम्पूर्ण भुगतान किया गया है तथा विपक्षी द्वारा बिना किसी आधार के तथा उपरोक्त उल्लिखित प्राविधानों के विपरीत शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त करते हुए उक्त यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार वर्तमान शिकायत पीठ में लम्बित रहने के दौरान सृजित किये गये है जोकि विधि सम्मत तथा उपरोक्त न्याय नजीर एवं प्राविधानों के विपरीत है। अतः विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की यूनिट निरस्त किया जाना तथा vat यूनिट पर तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित किया जाना वैधानिक नहीं है। Taga प्रश्न संख्या 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या-2 प्रश्न संख्या-2 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने के कारण विलम्बित हुई? फोर्स मैज्योर के अधीन कब्जा उपलब्ध कराये जाने में हुए विलम्ब के सम्बन्ध में एस ओ पी दिनांकित 08.08.2024 के प्रस्तर 5.4 में यह प्राविधानित किया गया है कि = & ” प्रमोटर द्वारा बायर बिल्डर एग्रीमेंट में कब्जा देने की आश्वासित तिथि (Promised 090) से (फोर्स मैज्योर, माननीय एन.जी.टी, माननीय उच्च न्यायालय अथवा माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के कारण बाधित अवधि को घटाते हुए) पूर्णता प्रमाण पत्र अथवा अधिभोग प्रमाण पत्र प्राप्त होने अथवा ऑफर ऑफ पजेशन की तिथि (जो भी बाद में हो ) को विलम्ब की अवधि माना जाएगा।” # 4 ] OOS
पत्रावली पर दाखिल बिल्डर बायर एग्रीमेंट दिनांकित 04.40.20:5 के प्रस्तर 24. में फोर्स मैज्योर के सम्बन्ध में निम्नलिखित उल्लेख है कि :- The completion date is subject to force majeure conditions and/or subject to any other reasons beyond the control of the Developer, No claim by way of damages/compensation shall lie against the developer in case of delay in handing over the possession on account of any of the aforesaid reasons and the developer shall be entitled to a reasonable extension of time for the delivery of possession of the said Flat/Villa to the Allottee माननीय सर्वोच्च sara द्वारा सिविल अपील संख्या: 3029 /7985, M:C. Mehta Versus Union of India” में पारित आदेश, दिनांक 04—44-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place.” इसके अतिरिक्त उपर्युक्त सिविल अपील संख्या: 3029//985 में पारित आदेश दिनांक 09-42-2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये हैः- “In the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as u nder:-
"42. That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (2048) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the. situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated 2 aa in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist ws in severet+/emergency category for 48 hours or more. Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by Central Pollution Control Board (CPCB), as quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.” माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश,दिनांक 09-42-2049 में पूर्ण
प्रतिबन्ध को हटाते हुए, आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04-44-2049 से दिनांक 09-42-2049) एवं 33 दिन(66+2) (दिनांक 40-42-2049 से दिनांक 44-02-2020 तक aia 06 बजे से सुबह 06 बजे तक) की अवधि के. लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। इन तथ्यों के आलोक में यह स्पष्ट है कि उक्त अवधि विपक्षी के नियन्त्रण से बाहर थी तथा इसके लिए विपक्षी को उत्तरदायी ठहराना न्यायोचित नहीं होगा। अतः यह निष्कर्ष निकालना उचित होगा कि उपर्युक्त वर्णित तीनों अवधियों के लिए परियोजना को पूर्ण होने में हुए विलम्ब के लिए विपक्षी जिम्मेदार नहीं है और इस अवधि में कुल- 35 दिन+ 33 दिन अर्थात् 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण, विपक्षी इसका लाभ पाने का अधिकारी है। उपरोक्त तथ्यों व माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश को दृष्टिगत रखते हुये 68 दिन के अतिरिक्त विपक्षी कोविड-49 के कारण फोर्स मैज्योर का लाभ पाने का अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 3-: प्रश्न संख्या-3 इस आशय का विरचित किया गया है कि qa शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी? शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके उपरान्त उक्त यूनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य दिनांक 807.204 को एलॉटमेंट/फ्लैट बायर wie निष्पादित हुआ। एलॉटमेंट / फ्लैट बायर एग्रीमेंट के अनुसार यूनिट का कब्जा 40 माह तथा 6 माह अनुग्रह अवधि के साथ अर्थात मई 2048 तक प्राप्त होना था परन्तु अभी तक शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा प्राप्त नहीं हुआ है। 43 TS
पत्रावली पर उपलब्ध एलॉटमेंट,//फ्लैट me एग्रीमेंट के अनुसार शिकायतकर्ता को मई 2048 तक यूनिट का कब्जा प्राप्त होना था परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के अनुसार यह भी स्पष्ट है कि वांछित अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त हो चुके है तथा दिनांक 24.09.2024 को कम्पलीशन wife हेतु आवेदन भी किया जा चुका है जो पत्रावली पर उपलब्ध है। इस प्रकार विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 6 वर्ष का विलम्ब किया गया है परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित है। जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील to 6649-50 // 208 "'सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल"'में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:- "the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession.
उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी.//सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राललि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section 8()(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the 44 — _“— project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. se
अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20r6 के अधीन दिनांक 47.0.208 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें we o2(ii) 4 प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +]% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: पु
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+IUfcet की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+I प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2०)0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। अतः उक्त तथ्यों एवं नजीरों के आधार पर शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि i5 का ब्याज प्राप्त करने के अधिकारी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-3 निस्तारित किया जाता है। शिकायतकर्ता द्वारा प्रतिउत्तरं में जो क्षतिपूर्ति (compensation) दिलाये जाने सम्बंधी याचना की गयी है। इस सम्बंध में क्षतिपूर्ति (compensation) के प्रकरण पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार wi अधिनियम की धारा 74 के अन्तर्गत न्यायानिर्णायक अधिकारी (Adjudicating Officer) को है। अतः पीठ द्वारा इस सम्बंध में आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता है। आदेश ।. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश अपलोड होने की तिथि से 45 दिन में शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट को पुर्नस्थापित करते हुए, शिकायतकर्ता से यूनिट के सापेक्ष बिल्डर बायर एग्रीमेंट के अनुसार अवशेष देय धनराशि प्राप्त कर ओसी/सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें।
2. . विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक ot.0620:8 से ओ.सी/सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि GO 24,39,788,/ पर MCLR+I प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें| ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की जाने वाली धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। निस्तारण प्रश्न संख्या 2 के अनुसार फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए 68 दिन तथा दिनांक 95.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय ' (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। 3. विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 2076 की धारा 2(2४)()के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा 6 SS डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2076 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। ' विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। Siren
(डा०दीपक स्वरूप Seat ee ART उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर 37