Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
S Swaminathan v. Logix Infrastructure Pvt.ltd
Complaint No. NCR144/07/0268/2019
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2019-09-17
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
English translation. Machine translation from the Hindi by AI (Claude Haiku), not reviewed. The original order below is the authoritative text.
U.P. Real Estate Regulatory Authority, Regional Office, Gautam Buddh Nagar. Hearing Bench-04A Shri Balvinder Kumar, Member Sr. 4: Complaint No. Wa.3iI844 / 07 / 0268 / 209 - S. Swaminathan Sr. 2: Complaint No. vataniaa / 07 / 2340 / 20:9 - Girish Singh and Aishwarya Singh Sr. 3: Complaint No. Vara 44 / 07 / (344 / 20:9 - Ravi Sharma and Anita Sharma Complainants Versus M/s Logix Infrastructures Pvt. Ltd. Along with complainant S. Swaminathan, 02 other complainants have filed a complaint against the opposite party. The facts of all these complaints are the same and the evidence is common. All these complaints relate to Blossom County, Phase-4. Therefore, they are being disposed of together in a single manner. Complaint No. NCR. 3R44 / 07 // 0268 , / 2049, S. Swaminathan, will be the lead case. The complainants have instituted this complaint against the opposite party seeking possession, correction of demands, interest for the delayed period, and compensation. In brief, the complainant states that the complainant booked flat -o-t608[?] in Tower- of the opposite party's project Blossom County, Phase-4, against which the complainant paid Rs. 33,92,557/- from time to time in instalments. The opposite party was to complete the flat and hand over possession by 05.2.206, but the opposite party has not yet handed over possession.
The complainant also states that the project has been delayed by more than 2 years [awe?]. The unit was booked on 06.:2.203, and possession was due within 24 months. Therefore, the complainant has requested possession against the opposite party, correction of demands, interest for the delayed period, and compensation. In support of the statement, the complainant has filed a photocopy of the flat buyer agreement. The opposite party, filing its written reply, has stated that the complainant has filed this case by misusing the law. The project Blossom County, Phase-4 is registered with RERA under registration No. UPRERAPRJ4466, and its validity is only up to 34.08.209. In that case, under the said rules, it will complete the development and construction work by 34.08.2049. The complainant had booked residential unit No. 704, which is in Tower- of the project; an allotment letter was issued on 5.2.203 and the flat buyer agreement was executed on 06.:2.20:3. Construction was delayed due to force majeure. The delay in handing over possession was mainly caused by notices, orders, rules, government notifications, court laws and other reasons, which were beyond its control. Several unforeseen events, such as farmers' dharna [weer?], work on the project being obstructed by the Hon'ble NGT, and acquisition-related cases pending in courts caused the delay. Further, the opposite party stated before the Bench on 2.0920I9 that possession would be given by June 2020.
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04ए श्री बलविन्दर कुमार, सदस्य Saree do शिकायत Ho शिकाय 4 Wa.3iI844 / 07 / 0268 /209 | एस. स्वामीनाथन 2 | vataniaa /07/2340/20:9 | गिरिश सिंह व एश्वरया सिंह 3 Vara 44 /07/(344/20:9 | रवि शर्मा व अनीता शम eee शिकायतकर्तागण बनाम मैसर्स लॉजिक्स इन्फास्ट्रक्चर्स प्रा.लि. शिकायतकर्ता एस.स्वामीनाथन के साथ 02 अन्य शिकायकतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें Blossom County, Phase-4 से सम्बंधित है। अतः एक ही fia से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत सं० एनसी. 3R44 / 07 // 0268 ,/ 2049 एस.स्वामीनाथन अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्द कब्जा, मांगों को सही किये जाने एवं विलम्बित अवधि का ब्याज, क्षतिपूर्ति दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना Blossom County, Phase-4 के टॉवर- में फ्लैट -o-t608 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर किश्तों के आधार पर 33,92,557/- रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को कब्जा दिनांक 05.2.206 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कब्जा नहीं दिया गया शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि परियोजना 2 वर्ष से अधिक विलम्ब awe 2
द्वारा यूनिट दिनांक 06.:2.203 को बुक करायी गयी, जिसका कब्जा 24 माह में मिलना था। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्द कब्जा, मांगों को सही किये जाने एवं विलम्बित अवधि का ब्याज, क्षतिपूर्ति दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया a शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में फ्लैट केता अनुबन्ध की छायाप्रति दाखिल की गयी है। विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा विधि का दुरूपयोग करते हुए वाद योजित किया गया है, परियोजना Blossom County, Phase-4 रेरा में पंजीकृत है, जिसका पंजीकरण संख्या- UPRERAPRJ4466 है और बैद्यता दिनांक 34.08.209 तक ही है। ऐसे में उक्त नियमों के अनुसार वह विकास एवं निर्माण कार्य दिनांक 34.08.2049 तक पूर्ण कर लेगें। शिकायतकर्ता द्वारा आवासीय यूनिट संख्या-704 जो कि परियोजना के टॉवर- में है बुक करायी गयी थी और आवंटन पत्र दिनांक 5.2.203 को जारी किया गया और फ्लैट केता अनुबन्ध दिनांक 06.:2.20:3 को निष्पादित कराया गया। निर्माण कार्य में विलम्ब फोर्स मैज्योर के कारण हुआ। कब्जे में हुए विलम्ब के कारण मुख्यतः नोटिस, आदेश, नियम, सरकार की अधिसूचना, न्यायालयों के कानून एवं अन्य कारणों से हुआ, जो कि उनके नियंत्रण में नहीं था। कई अप्रत्याशित घटनायें जैसे कि किसानों द्वारा धरना weer, माननीय एन.जी,टी द्वारा परियोजना पर कार्य बाधित किया जाना, न्यायालयों में लंबित अधिग्रहण सम्बन्धित मामले के कारण विलम्ब हुआ। इसके अतिरिक्त पीठ के समक्ष दिनांक 2.0920I9 को विपक्षी द्वारा कहा गया कि जून 2020 तक कब्जा दे दिया जायेगा। विपक्षी की ओर से अपने कथन के समर्थन में परियोजना के विवरण की छायाप्रति दाखिल की गयी है।
उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किये गये :- 4... क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते है ? 2 क्या force majeure events होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई यदि हां तो प्रभाव? 3. क्या अनुबन्ध में आरबीट्रैशन क्लॉज होने के कारण वाद की सुनवाई का क्षेत्रिधिकार इस पीठ को नहीं है ? 4. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये ? यदि हाँ तो ब्याज का दर क्या होगा ? निस्तारण बिन्दु Wo 4 ५3) बिन्दु संख्या 4 इस तथ्य पर विचरित है क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते है? इस सम्बंध में मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या- 2737 /20:7 नीलकमल रियलटर्स सबशर्बन प्राणलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि-: The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale.
उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के प्रस्तर का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता। धारा 4(2)0)(सी) के अन्तर्गत प्रोमोटर एक नई समय सीमा दे सकता है, जो. कि अनुबन्ध पर निर्भर नहीं होगा और उक्त धारा रेरा में दिये गये प्राविधान के परिणाम स्वरूप केवल अर्थदंड से बचाया जा सकता है। अतः इससे अवधारित किया जाता है कि प्रोमोटर अनुबन्ध में दिये गये कब्जे की तिथि के लिए उत्तरदायी है। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन wea” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते है। तद्नुसार बिन्दु संख्या 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु wo 2 बिन्दु vo 2 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure events) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक wr आदेश, निर्णय व at से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी eer विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है।
इसके अतिरिक्त माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 / 20॥7 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में अभिनिर्धारित किया गया हैः-
I4l. On behalf of Amrapali group, learned senior counsel submitted that there were force majeure conditions in completing the projects. There were legal impediments in the completion of projects within the period given in the flat-buyers agreement during the period from 20i-I5. The submission is baseless. It is apparent that the Full Bench of the High Court though held that the land acquisition was vitiated but still it was upheld. The High Court did not quash it for the reason that development has taken place. Higher compensation was ordered to be paid. That order was affirmed by this Court in 20I5 in Savitri Devi v. State of U.P. (20I5) 7 SCC 2). There was no interim stay granted by the High Court on construction work, is made clear by the Noida and Greater Noida authorities. There was no room to entertain any doubt as to the fact whether for a particular village the acquisition had been quashed. There was no quashing of land acquisition and moreover, there was no stay. Only higher compensation was ordered to be paid. There was no force majeure condition or any legal impediment as such the period from 204 to 205 cannot be treated as a moratorium period vis-a-vis the dues of Noida and Greater Noida authorities. The submission made as to the farmers’ agitation etc. is too vague and 30% of the projects have come up; whereas 70% have not yet come up, out of the projects in Noida and Greater Noida alone.
उपरोक्त अबज़रवेशन से यह स्पष्ट है कि वर्ष 2044 से वर्ष 20i5 के मध्य निर्माण कार्य पर कोई स्थगन आदेश नहीं थे, जो कि नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण द्वारा दर्शित किया गया और इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2044 से वर्ष 20i5 के बीच कोई फोर्स मैज्योर कारण या विधिक रूप से रोक नहीं था। चूंकि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी यह स्पष्ट किया जा चुका है कि वर्ष 2044 से वर्ष 20i5 के बीच कोई फोर्स मैज्योर इवेन्ट नहीं था, ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तद्नुसार बिन्दु सं? 2 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 3 विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबचन्ध में आर्बट्रेशन का ger है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नहीं है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एमआर एम. जी.एफ. बनाम आफताब सिंह में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- (i) the disputes which are to be adjudicated and governed by statutory enactments, established for specific public purpose to sub-serve a particular public policy are not arbitrable; (ii) there are vast domains of the legal universe that are non-arbitrable and kept at a distance from private dispute resolution; (iii) the subject amendment was meant for a completely different purpose, leaving status quo ante unaltered and subsequently reaffirmed and restated by the Hon'ble Supreme Court;
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि कुछ विवादों का निराकरण आबिंट्रेटर द्वारा आर्बिट्रेशन अनुबन्ध के पश्चात् भी नहीं की जा सकती है। विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये है और इसका क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 2046 की धारा 79, आर्बिट्रिशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल wee अधिनियम के तहत vad मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं बिल्डरों के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु wo 3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु tio 4 vee 6 यह भी स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा अनुबच्ध में शिकायतकर्ता को अनुबन्धनिष्पादित करने से tate माह a पीरियड) में कब्जा दिया जाना था। फ्लैट बायर एग्रीमेन्ट दिनांक 06.2.2043 को निष्पादित किया गया एवं अनुबन्ध के TER 6.4 के अनुसार विपक्षी को 06.:2.205 तक कब्जा देना था, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नहीं दिया गया है। विपक्षी का कहना है कि जून 2020 तक परियोजना को पूर्ण कर कब्जा दें दिया जायेगा।
ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को अनुबन्धित अवधि के पश्चात् से ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन wife. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- Section 48(॥)(9) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable.
अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा sad धनराशि का उपभोग किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक aI निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता हैं Ko कि उभयपक्ष को उक्त अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के WAR 6.6 के अनुसार परियोजना के विलंब की अवधि में 5 रूपये प्रतिवर्ग फुट प्रतिमाह की दर से धनराशि का प्राविधान है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता धनराशि पाने का अधिकारी है, रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा धनराशि प्राप्त की गयी है उसी दर से धनराशि देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. / have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 8, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के
प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 4.5.206 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय /पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के war 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (i) 4 प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at “yaee Uae rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर oliii) 4 निर्धारित है। saa प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को टाए+ प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज सहित विलम्ब के लिए धनराशि वापस किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि में ara है, तो विपक्षी भी McLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त सकता है। जहां तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में सिविल अपील Ho 6649-50 /20i8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission ofthe Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent - Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने या कब्जा ऑफर होने, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता ओ.सी. मिलने, कब्जा ऑफर होने, जो भी बाद में हो के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तद्नुसार बिन्दु सं०-4 निस्तारित किया जाता है।
जहां तक क्षतिपूर्ति (Compensation) देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अत: इस बिन्दु पर पीठ द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा रहा है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश ye" 9 विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि शिकायतकर्तागण की सहमति से पूर्व में तय दरों पर समकक्ष इकाई का अपने किसी अन्य परियोजना में वैकल्पिक यूनिट का ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा दें अन्यथा पूर्व में आवंटित यूनिट का कब्जा जून 2020 तक ओ.सी /सी.सी सहित दें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराये। विपक्षी, अनुबन्धित अवधि के पश्चात् से दिनांक 30.4.206 तक 5/- रूपये प्रति वर्गफुट प्रतिमाह की दर से व दिनांक 04.05.2046 से ओ.सी. JOR. सहित कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक की अवधि के लिए शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर MCLR+I प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर निमयानुसार वापस की जायेगी। अन्य शिकायतकर्तागण के मामलों में अनुबन्ध के अनुरूप गणना की जायेगी। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2046 के धारा 2 (2०)() के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर |श८।३+१ प्रतिशत होनी चाहिए | विपक्षी उपरोक्तानुसार संशोधित मांग पत्र जारी करना सुनिश्चित करें |
इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस ओदश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। विपक्षी भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 20:6 की धारा-37 के अन्तर्गत यह निर्देश दिये जाते है कि वह धारा-6 के अन्तर्गत परियोजना के रजिस्ट्रीकरण का विस्तारण हेतु आवेदन करें अन्यथा धारा-8 के अन्तर्गत उचित कार्यवाही कर दी जायेगी | इस आदेश की एक प्रति सचिव, wr को परियोजना की अग्रेस्तर कार्यवाही हेतु प्रेषित की जाये। ०७८८०: i0 3 इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण दिनांक |") / 20% 2049