Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Jiya Lal and Nisha Devi v. ATS Realty Private Limited
Complaint No. NCR144/06/96120/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- Not recorded
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- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
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Judgment text
English translation. Machine translation from the Hindi by AI (Claude Haiku), not reviewed. The original order below is the authoritative text.
U.P. Real Estate Regulatory Authority, Regional Office, Gautam Buddh Nagar Bench-2 Order passed under Section [?] of the Real Estate (Regulation and Development) Act 20:6 Present: Dr. Deepak Swaroop Saxena, Member | No. | Complaint No. | Complainant | Unit No. | Amount deposited as per receipt/evidence on file | Date of allotment | Date of possession | |---|---|---|---|---|---|---| | . | NCRI44/06/9620/2022 | Jiya Lal and Nisha Devi | 2025 | Rs. 8,77,734 | 06.2.207 | 30,06.208 | Versus ATS Realty Pvt. Ltd. The complainants have filed this complaint against the respondent seeking possession of the unit and interest for the delayed period. In brief, the complainant states that the unit no. 2025 mentioned in the above table was booked in the project ATS ALLURE run by the respondent, and against it the amount mentioned in the table, Rs. 48,77,734/—, was paid to the respondent. The complainant has requested possession of the unit and interest for the delayed period. In support of the complaint, the complainant has filed photocopies of the allotment letter and statement of account, which show payment of Rs. 48,77734 /. In its reply filed on behalf of the respondent, it is stated that the complainant has alleged that the respondent breached its contractual obligation, for which the jurisdiction to decide the matter lies with the civil court; the complaint should therefore be dismissed.
The Authority has no jurisdiction to decide the allegation made by the complainant. In support of this, the respondent cites the judgment passed by the Haryana Appellate Court, Chandigarh, in Appeal No. 6/2048, Sameer Mahawar v. MG Housing Pvt. Ltd. The present case has been filed by the complainant on false facts to harass the respondent. The complainant has also not paid the amount on time. The complainant filed cases in different benches of the Authority, which have already been dismissed. The respondent was bound to hand over possession of the unit to the complainant within the time period, but construction work in the project was obstructed by force majeure. It is wrong to say that the respondent caused the delay; rather, the complainant did not pay the amount on time. It is also stated that an offer of possession has already been issued to the complainant, but since the complainant did not come, several reminder letters were sent, and the complainant still did not come to take possession. In support of its objection, the respondent has filed photocopies of the offer of possession, reminder letters, [?] account, and the occupancy certificate dated 30.03.2022. The arguments of both parties were heard and the file examined; on that basis the following questions arise:- 4. Whether the project was delayed due to force majeure? 2. Whether the complainant should be awarded possession and interest for the delayed period? If yes, what rate of interest?
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-2 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 20:6 की aRI-3 के अन्तर्गत पारित आदेश उपस्थितिः- डा० दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य क्रम Wo शिकायत संख्या शिकायतकर्ता यूनिट न० | पत्रावली पर उपलब्ध | आवंटन की | कब्जा दिये जाने की रसीद /साक्ष्य के तिथि तिथि अनुसार जमा धनराशि रु . | NCRI44/06/9620/2022 जिया लाल व | 2025 BO 8,77,734/ 06.2.207 30,06.208 निशा देवी बनाम एटीएस रिएलटी प्रा0लि0 शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्ध यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु यह परिवाद संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना ATS ALLURE में उक्त तालिका में अंकित यूनिट संख्या 2025 बुक कराई गई, जिसके सापेक्ष तालिका में अंकित धनराशि Go 48,77,734/— विपक्षी को भुगतान की गई। शिकायतकर्ता ने यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया है। शिकायतकर्ता द्वारा परिवाद के समर्थन में आवंटन पत्र व स्टेटमेंट ऑफ एकाउंट जिसमें धनराशि रु० 48,77734 / का भुगतान होना प्रदर्शित है, की छाया प्रतियाँ दाखिल की गयी हैं। विपक्षी की ओर से जवाब दाखिल करते हुए यह अंकित किया गया है कि शिकायतकर्ता ने यह आरोप लगाया है कि विपक्षी ने अनुबंधात्मक दायित्व (contractual Obligation) का उल्लंघन किया है जिस कारण इसका निस्तारण किये आएगा > ool
जाने का क्षेत्राधिकार सिविल कोर्ट का है। इस कारण वाद को निरस्त किया जाए। शिकायतकर्ता द्वारा लगाये गये आरोप का निस्तारण करने का क्षेत्राधिकार प्राधिकरण को नहीं है, जिसके समर्थन में हरियाणा अपीलीय न्यायालय चण्डीगण द्वारा अपील संख्या 6/2048 समीर महावर बनाम एमजी हाउसिंग प्रा०लि0 में पारित निर्णय का संदर्भ अंकित किया है। वर्तमान प्रकरण शिकायतकर्ता ने गलत तथ्यों पर विपक्षी को परेशान किये जाने हेतु वाद दायर किया है। शिकायतकर्ता द्वारा समय से धनराशि भी भुगतान नहीं किया गया है। शिकायतकर्ता ने प्राधिकरण के भिन्न-भिन्न tet में वाद दायर किया जो निरस्त किया जा चुका है। विपक्षी शिकायतकर्ता को समय अवधि के अन्दर यूनिट का कब्जा दिये जाने के लिए बचनबद्ध था परन्तु फोर्स मैज्योर के कारण परियोजना में निर्माण कार्य बाधित हुआ है। यह कहना गलत है कि विपक्षी की ओर से विलम्ब किया गया है बल्कि शिकायतकर्ता की ओर से समय से धनराशि का भुगतान नहीं किया गया है। यह भी उल्लिखित किया गया है कि शिकायतकर्ता को ऑफर ऑफ पजेशन जारी किया जा चुका है परन्तु शिकायतकर्ता के न आने पर कई अनुस्मारक पत्र प्रेषित किये गये परन्तु शिकातकर्ता कब्जा लेने नहीं आया। विपक्षी द्वारा अपने आपत्ति के समर्थन में ऑफर ऑफ पजेशन, अनुस्मारक पत्र, Rete aie एकाउंट एवं अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30.03.2022 की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्न प्रश्न विचरित किये जाते हैं :- 4. क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है? 2. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलायी जाये? यदि हाँ तो ब्याज की gar दर होगी ?
निस्तारण प्रश्न WH यह प्रश्न इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई? यह प्रश्न > 2 विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से लिखित जवाब में यह उल्लेख किया गया है कि एन.जी. टी, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश व कोविड-49 FER के कारण निर्माण कार्य बंद था। उक्त के संदर्भ में यह उल्लेख करना आवश्यक है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील Wen-o40/20i7 “बिक्रम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य“ के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं TER 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया है:- "Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature."
उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स AIR वह स्थिति है, जिसमें युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्राकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में कोविड-49 महामारी के अतिरिक्त अन्य ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई है जिस कारण विपक्षी इस आधार पर लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। कोविड-49 महामारी के सम्बंध में उ0प्र0 रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनाक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता से कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। तद्नुसार प्रश्न We निस्तारित किया जाता है। a निस्तारण प्रश्न संख्या-2 प्रश्न संख्या-2 इस आशय का विचरित किया गया है कि an शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलायी जाये? यदि हाँ तो ब्याज की क्या दर होगी?
शिकायतकर्ता का कहना है कि विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसके उपरान्त उक्त यूनिट के सापेक्ष उभयपक्ष के मध्य दिनांक 06.42.2047 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ। आवंटन पत्र के अनुसार यूनिट का कब्जा 30.06.208 तक प्राप्त होना था। विपक्षी का कहना है कि परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है। विपक्षी का यह भी कथन है कि शिकायतकर्ता ने Pra fra पीठों में वाद दायर किया है जो निरस्त हो चुका है परन्तु विपक्षी द्वारा इस सम्बंध में पीठ द्वारा पारित आदेश की प्रति दाखिल नहीं की गई है। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की ओर से भुगतान की गई धनराशि पर कोई आपत्ति नहीं की गई है। पत्रावली पर उपलब्ध आवंटन पत्र के अनुसार शिकायतकर्ता को दिनांक 30.06.2048 तक यूनिट का कब्जा प्राप्त होना था परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। पत्रावली पर उपलब्ध प्रपत्रों के अनुसार यह भी स्पष्ट है कि परियोजना पूर्ण है और विपक्षी को अधिभोग प्रमाण पत्र दिनांक 30. 03,2022 को प्राप्त हो चुका है जो पत्रावली पर उपलब्ध है। तत्पश्चात विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को ऑफर आफ पोजेशन दिनांक 44.04.2022 को जारी भी किया जा चुका है। उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा दिये जाने में 5 वर्षों से अधिक का विलम्ब किया गया है परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है जिस कारण शिकायतकर्ता यूनिट का कब्जा व विलम्बित अवधि का ब्याज प्राप्त करने का अधिकारी है। =< ्_ब्क3.- जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील to 6649-50 /20:8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी
गोयल"'में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:- "the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent - Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. : उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल Raced सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section 8(l)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for
every month's delay till handing over of the possession,. The 5 SS requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 W के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा sad धनराशि का उपभोग किया गया है। जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2076 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय /पटटा के लिए करार) नियमावली ooi8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर o.2(ii) 4 प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- "The Allottee shall have the option of terminating the
Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +l% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:" यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। sat wer को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को ४८ 4१+]प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता 6 न लचचछछ2-- है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर 'से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(29)(0)में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। तदनुसार प्रश्न संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश l, विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट का कब्जा अनुबन्ध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर 3i दिसम्बर 2023 तक ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें।
2. विपक्षी शिकायतकर्ता को दिनांक 04.07.2048 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि रु0 48,77734/.पर MCLR+i प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। 3. विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 2046 की धारा A(zaS अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी ॥॥/207२+ प्रतिशत की ब्याज दर से 7 SS ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, ooi6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। — rns oi “कलम >2G&.\o-.29 > (डा०दीपक स्वरूप सक्सेना) सदस्य उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण