Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Mithlesh Singh v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. NCR144/06/0183/2019
- Decision date
- 2019-11-18
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
| उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04ए श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत संख्या-एन.सी.आर444 / 06 /083 / 2049 मिथलेश सिंह बनाम मैसर्स उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL- 8०८०-॥7 Plots ¥ फ्लैट नं0-387 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर feel के आधार पर 49,28,847 //-रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को दिनांक 24.06.2008 तक परियोजना पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, परन्तु अभी तक कब्जा नहीं दिया गया। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि परियोजना WS अधिक विलम्ब है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के wel में प्लॉट आवंटी अनुबन्ध दिनांक 49.0.2042, पत्रों आदि की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं। विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि रेरा में परियोजना की पूर्णता की तिथि 34.07.2024 दी गयी है। शिकायतकर्ता को उनकी नामित परियोजना Wave City के 8८८०-॥7 Plots 4 यूनिट सं0-387 आवंटित की गयी। स्थानीय किसानों द्वारा धरना wea के कारण कार्य कराये जाने में बाधा उत्पन्न हुई। परियोजना फोर्स aca events के कारण विलम्बित हुई, जो कि उनके नियंत्रण में नही था। परियोजना में विकास कार्य कराये जा रहे है और शीघ्र ही कब्जे हेतु ऑफर कर दिया जायेगा। १/ 2
विपक्षी की ओर से अपने कथन के समर्थन में रेरा में परियोजना की पंजीकरण प्रमाण पत्र की छायाप्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचारणीय किये गये :- 4... क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते ? 2... क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? 3. क्या अनुबन्ध में आरबीट्रैशन क्लॉज होने के कारण वाद की सुनवाई का क्षेत्राधाकार इस पीठ को है ? 4... क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? निस्तारण बिन्दु संख्या-4 बिन्दु सं? 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या रेरा से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। इस सम्बंध में मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या- 2737 /20i7 नीलकमल Raced सबअर्बन प्राणलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है। जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि-:
The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)0)(0) he is not absolved of the liability under the agreement for sale. ¢ ? 3 उपरोक्त विधि व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधान के अनुसार अनुबन्ध में दिये गये पूर्णता एवं कब्जे देने के प्रस्तर का पुनर्लेखन नहीं किया जा सकता। धारा 4(2)0)(सी) के अन्तर्गत प्रोमोटर एक नई समय सीमा दे सकता है, जो कि अनुबन्ध पर निर्भर नहीं होगा किन्तु var समय सीमा रेरा में दिये गये “पीनल कन्सीक्वेसिज़” से बचा सकता है किन्तु उससे वह अनुबन्ध में दिये गये उत्तरदायित्वों से मुक्त नहीं होगा। इससे अवधारित किया जा सकता है कि प्रोमोटर अनुबन्ध में दिये गये कब्जे की तिथि के लिए उत्तरदायी बना रहेगा एवं विलम्ब की गणना अनुबन्ध की तिथि के अनुसार की जायेगी। वैसे भी ऑनगोईंग परियोजना रेरा की परिधि में आते है। dagen बिन्दु संख्या 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 2 बिन्दु सं० 2 इस आशय से विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure events) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक wer आदेश, निर्णय व डिकी से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, साथ ही यह भी कहा गया कि परियोजना किसानों के उग्र प्र्दशन, राष्ट्रीय हरित अधिकरण, नोट बंदी, के कारण परियोजना प्रभावित हुई | विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर इवेन्टस् की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है जिससे की विदित हो कि परियोजना की भूमि पर कार्य बाधित था | इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 ,/ 2047 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया है:- 9) Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature. उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तदनुसार बिन्दु सं० 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु सं0 3
विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आर्बट्रेशन का क्लाज है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एमआर एम.जी.एफ. बनाम आफताब सिंह में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- (i) the disputes which are to be adjudicated and governed by statutory enactments, established for specific public purpose to sub-serve 8 particular public policy are not arbitrable; (ii) there are vast domains of the legal universe that are non-arbitrable and kept at a distance from private dispute resolution; (iii) the subject amendment was meant for a completely different purpose, leaving status quo ante unaltered and subsequently reaffirmed and restated by the Hon'ble Supreme Court; माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि कुछ विवादों का निराकरण आर्बिट्रेटर द्वारा आर्बिट्रेशन अनुबन्ध के पश्चात् भी नहीं की जा सकती है। विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये है और इसका क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बट्रेटर सक्षम नहीं है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 20:6 की धारा 79, “के
आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल wee अधिनियम के तहत उक्त मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं बिल्डरों के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु to 3 Peake किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 4 शिकायतकर्ता का कहना है कि परियोजना 24.06.2008 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में प्लॉट आवंटी अरेन्जमेन्ट अनुबन्ध दिनांक 49.0.2042 की प्रति दाखिल की गयी है, जिसमें निर्माण एवं कब्जे के प्रस्तर 3.4 के अनुसार कब्जे हेतु सूचना दिये जाने से 3 वर्ष में कब्जा दिये जाने का उल्लेख है। प्रस्तुत प्रकरण में कब्जे हेतु सूचना अभी तक नहीं दी गयी है। ऐसे में यह कहना उचित नहीं होगा कि विपक्षी स्वेच्छानुसार कब्जा देगें और कब्जे की तिथि अंतहीन होगी। इस सम्बन्ध में माननीय उच्चतम न्यायालय के सिविल अपील संख्या 3533-3534/20i7 मैसर्स फार्च्यून इन्फास्ट्रक्चर्स एवं अन्य बनाम ट्रेवर डेलिमा एवं अन्य के प्रस्तर 45 में स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि-:
5.Moreover, a person cannot be made to wait indefinitely for the possession of the flats allotted to them and they are entitled to seek the refund of the amount paid by them, along with compensation. Although we are aware of the fact that when there was no delivery period stipulated in the agreement, a reasonable time has to be taken into consideration. In the facts and circumstances of this case, a time period of 3 years would have been reasonable for completion of the contract ie., the possession was required to be given by last quarter of 204. Further there is no dispute as to the fact that until now there is no redevelopment of the property. Hence, in view of the above discussion, which draw us to an irresistible conclusion that there is deficiency of service on the part of the appellants and accordingly the issue is answered. ay 6
उपरोक्त माननीय उच्चतम न्यायालय के आर््जैवेशन एवं विधि व्यवस्था के अनुसार फ्लैट के कब्जे हेतु किसी व्यक्ति को aad समय तक प्रतीक्षा नहीं करा सकता, जहाँ अनुबन्ध में कब्जे की तिथि नहीं दी गयी है वहाँ तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए 3 वर्ष का समयावधि इस कार्य को पूर्ण कराये जाने हेतु उचित समय माना है। प्रस्तुत प्रकरण में प्लॉट आवंटी अरेन्जमेन्ट अनुबन्ध में निष्पादन की तिथि t9.0.20i2 को की गई है। तथ्यों एवं परिस्थितियों को देखते हुए 3 वर्ष में शिकायतकर्ता को प्लॉट का कब्जा दिया जाना उचित समयावधि था। ऐसे में शिकायतकर्ता अपने प्लॉट का कब्जा दिनांक 49.40.2045 तक प्राप्त करने का अधिकारी था, परन्तु विपक्षी द्वारा निर्धारित समयावधि में कब्जा नहीं दिया गया। यह स्पष्ट है कि परियोजना विलम्बित है और ऐसे में शिकायतकर्ता दिनांक 20. 402045 से ओ.सी /सी.सी अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो तक की अवधि पर विलंबित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल Raced सबअर्बन wife. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 48(4)(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण
(Events of default) परिभाषित है, जिसमें were 9.2 (i) A प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर o.3G) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को McLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्ब के ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी McLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में सिविल अपील Wo 6649-50 /20:8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — a
Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20i6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो की तिथि तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता ओ.सी. मिलने अथवा कब्जा ऑफर किये जाने, जो भी बाद में हो तक की अवधि के लिए ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तद्नुसार बिन्दु सं०-5 निस्तारित किया जाता है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4... विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह दिनांक 34.2.2020 तक शिकायतकर्ता की सहमति से अपनी किसी अन्य विकसित परियोजना में समकक्ष इकाई का वैकल्पिक प्लॉट उपलब्ध कराकर ओ.सी / सी.सी सहित कब्जा दें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। 2... विपक्षी, शिकायतकर्ता को दिनांक 20.0.2045 से ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक विलम्ब के लिए MCLR+I प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये।
3. यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2076 के धारा 2 (2०)() के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर शितार प्रतिशत होनी चाहिए। 0 9 4. इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र०भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक 2 /!° /2049 af” (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण