Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Nitin Kumar v. La Residentia Developers Private Limited
Complaint No. NCR144/05/94715/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2022-06-02
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
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Judgment text
॥॥ उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04ए आदेश अन्तर्गत धारा-34 श्री राजीव कुमार, माननीय अध्यक्ष कम शिकायत dea | =" | टॉवर एवं संख्या यूनिट संख्या T फिल्राब4/05947292022 | Gay प्रकाश सिंह T-23/602 2 | NCRI44/04/93666/2022 हुमायूँ अख्तर | कुठ॥502 | 3. क्लराब4/05/9475/2022 नितिन कुमार T-32/604 बनाम ला रेजिडेन्सिया डेवलपर्स wo feo शिकायतकर्ता पुरनेन्दु प्रकाश सिंह के साथ 02 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किये गये हैं। इन तीनों शिकायतों के तथ्य समान हैं और एक समान साक्ष्य हैं। यह तीनों शिकायतें विपक्षी की परियोजना La Residentia से सम्बन्धित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत संख्या —NCRI44/05/94729/2022 FAs प्रकाश सिंह अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता Gers प्रकाश सिंह) का कथन है कि उनके द्वारा विपक्षी की परियोजना La Residentia में यूनिट संख्या-7-23/602 बुक करायी गयी थी, जिसकी कुल कीमत 32,46,325,/- रूपये थी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा 29,84,854 /- रूपये की धनराशि का भुगतान किया गया है। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट का कब्जा देने में 4 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है, जिससे शिकायतकर्ता को मानसिक उत्पीड़न एवं वित्तीय हानि ahs 2
हुई है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा शीघ्र प्रश्नगत यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने तथा मानसिक उत्पीड़न व वित्तीय हानि हेतु क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में आवंटन कम फ्लैट बायर एग्रीमेन्ट दिनांक 20.02.2044 की प्रति, स्टेटमेन्ट ऑफ अकाउन्ट आदि अभिलेखों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है। प्राधिकरण की ओर से विपक्षी को दिनांक 02.06.2022 को नोटिस जारी करते हुए सूचित किया गया था कि सुनवाई हेतु तिथि नियत है, जिसमें विपक्षी अपना पक्ष रख सकते हैं। प्रथम सुनवाई दिनांक 42.07.2022 को की गयी, जिसमें विपक्षी उपस्थित हुए, परन्तु उनके द्वारा कोई प्रतिवाद पत्र/ साक्ष्य रेरा कम्पलेन्ट पेज पर अपलोड नहीं किये गये। इस पर पीठ द्वारा विपक्षी को अग्रिम नियत तिथि से पूर्व अपना प्रतिवाद पत्र दाखिल करने हेतु आदेशित किया गया। द्वितीय/अंतिम सुनवाई दिनांक .40.2022 को की गयी, जिसमें विपक्षी अनुपस्थित रहे। इसके बाद भी उभय पक्ष को लिखित बहस दिनांक 25.0.2022 तक रेरा कम्पलेन्ट पेज पर अपलोड करने हेतु निर्देश दिये गये, परन्तु विपक्षी द्वारा कोई प्रतिवाद पत्र/लिखित बहस एवं साक्ष्य रेरा कम्पलेन्ट पेज पर अपलोड नहीं किये गये हैं। इसी प्रकार अन्य शिकायतकर्तागण के प्रकरणों में भी समान कार्यवाही की गयी। उपरोक्त तथ्य ऑर्डरशीट पर अंकित हैं और कम्पलेन्ट पेज पर अपलोडेड है। वर्णित स्थिति में एक पक्षीय आदेश पारित करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है। शिकायतकर्तागण के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किया जाता है :-
॥५ क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की दर क्या होगी ? निस्तारण बिन्दु de बिन्दु wert इस आशय से विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये? यदि हाँ तो ब्याज की दर क्या होंगी ? यह वाद बिन्दु शिकायतकर्तागण के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्तागण पर है। १५ शिकायतकर्ता (पुरनेन्दु प्रकाश सिंह) का कहना है कि विपक्षी द्वारा प्रश्नगत यूनिट का कब्जा देने में 44 वर्ष से अधिक का विलम्ब किया गया है, जिससे शिकायतकर्ता को मानसिक उत्पीड़न एवं वित्तीय हानि हुई है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा शीघ्र प्रश्नगत यूनिट का कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने तथा मानसिक उत्पीड़न व वित्तीय हानि हेतु क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। रेरा एक्ट की धारा 48 (3) में प्राविधान है कि :- Section 74 (0) “If the promoter fails to complete or is unable to give posteusession of an apartment, plot or building, - (a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (2) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason,
he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. इस प्रकार So को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नहीं मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा प्रत्येक माह के विलम्ब के लिए ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें, परन्तु प्रश्नगत प्रकरणों में शिकायतकर्तागण द्वारा कब्जा एवं विल्म्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। 0, 4 है पत्रावली पर विपक्षी द्वारा दाखिल अनुबन्ध दिनांक 20.02.204 के weae—-9(a) में निम्नलिखित seers किया गया है :- 99)... That the Developer shall complete the development/construction of the flat within 30 months Jrom the date of signing of agreement which may very for + 6 months. अतः उपरोक्तानुसार शिकायतकर्ता को अनुबन्ध निष्पादित किये जाने की तिथि 20.02.2044 से 30 + 6 माह Gra पीरियड) अर्थात् दिनांक 20.02.2044 तक फ्लैट का कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा उक्त निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है।
जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील Wo 6649-50, 2048 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल" में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:- "the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4G) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20l6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी. / MA. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को दिनांक 24.02.2044 से ओ.सी /सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राललि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- aN
"Section 8(l)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
इसके अतिरिक्त अन्य प्रकरणों के अनुबन्धों के प्रस्तर-9(9) में परियोजना के विलम्ब की अवधि में 5,//- रूपये प्रतिवर्ग फुट प्रतिमाह की दर से धनराशि का प्राविधान रहता है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता धनराशि पाने का अधिकारी है, रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा धनराशि प्राप्त की गयी है उसी दर से धनराशि देने का प्राविधान है। इस सम्बन्ध में भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 206 का प्रवर्तन दिनाक 04.05.2047 को हुआ, जिसके सम्बन्ध में उ0प्र0 आवास एवं शहरी नियोजन अनुभाग-2 की अधिसूचना दिनांक 03.05.2047 से उ0प्र0 में रेगुलेटरी अथॉरिटी के रूप मे कार्य करने की स्वीकृति राज्यपाल, महोदय ने दिनांक 04.05.2047 से प्रदान की अर्थात् दिनांक 04.05.20i7 से yaar (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2046 का प्रवर्तन उ0प्र0 में प्रारम्भ हुआ अर्थात् उ0प्र0 में यह अधिनियम दिनांक 04.05.2047 से लागू हुआ है। इस अधिनियम का प्रवर्तन प्रोस्पेक्टिव है। अतः दिनांक 02.05.20:7 से पूर्व की अवधि के लिए विलम्ब ब्याज की गणना आवंटन पत्र/अनुबन्ध के प्रावधानों के अन्तर्गत की जायेगी और दिनांक 07.05.20i7 से आगे की अवधि के लिए विलम्ब ब्याज की गणना अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत की जायेगी। a रेरा एक्ट की धारा 2(za) में प्राविधान है कि :- (za) "interest" means the rates of interest payable by the promoter or the allottee, as the case may be. Explanation.—Fotr the purpose of this clause— (i) the rate of interest chargeable from the allottee by the promoter, in case of default, shall be equal to the rate of interest which the promoter shall be liable to pay the allottee, in case of default;
(ii) the interest payable by the promoter to the allottee shall be from the date the promoter received the amount or any part thereof till the date the amount or part thereof and interest thereon is refunded, and the interest payable by the allottee to the promoter shall be from the date the allottee defaults in payment to the promoter till the date it is paid; जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.40.20i8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय ,पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय ,पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9.20) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:" यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLRHI प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता 3) ्े
है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+I प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2)0) में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा रिट याचिका संख्या-सी--3289 /2020 “wal बिल्डवेल amare wife. बनाम पूनम सूद एवं अन्य” में दिनांक 06.02.2020 को पारित निर्णय में यह उललेखित किया गया है कि:-
Coming to the next ground of challenge to the impugned order by the petitioner's counsel that the interest awarded by respondent no.l (MCLR+l) is excessive, is also without any merit. It is an admitted fact to the petitioner that respondent no.! had booked a flat and till the filing of the writ petition, the possession of the flat has not been given to him. The interest had been awarded in terms of Clause 9.2(ii) of the form of agreement contained in the U.P. Real Estate (Regulation and Development) (Agreement for Sale/Lease) Rules, 208. The respondent no.2 has given cogent reasons in the impugned order. Respondent no.2 has rightly placed reliance on Clause 9 sub-clause(ii) of the Rules, 20l8 which provides that in the event of default on the part of the promotor, the allottee shall have the option of terminating the agreement in which case the promoter shall be liable to refund the entire money paid by the allottee under any head whatsoever, towards the purchase of the flat at the rate of MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules within forty-five days of receiving the termination notice. Learned counsel for the petitioner has failed to bring to our notice any Rule in the Rules, 206, providing otherwise. तत्पश्चात् Re याचिका den-9i20/2020 “हैबीटेक इंफास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम उ0प्र0 राज्य सरकार एवं अन्य” में दिनांक 06.07.2020 को महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन देते हुए यह उललेखित किया है किः-
On 2.09.20l9 the respondent authority directed the petitioner to refund the entire amount alongwith interest @ MCLR + [% from the date of deposit till the date of order. Thereafter, recovery certificate and citation was issued on » 07,02.2020...............५०५०-०«««-न्न्->->>- and only on complaint under Section 8 authority proceeded to direct for the refund of the money alongwith payment of interest @ MCLR + %, which was in view of Real Estate (Regulation & Development) (Agreement to Sale) Regulations, 20i8 Thus power of refund of amount along with interest which has been provided under Section 48, with the authority was rightly exercised by it in the interest of justice. माननीय उच्च न्यायालय द्वारा भी रेरा प्राधिकरण के पीठ द्वारा नियमावली के अन्तर्गत MCLR+% की वार्षिक ब्याज दर से दिये गये आदेश को उचित एवं सही माना है। अतः CREAR माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से यह अवधारित किया जा सकता है कि राज्य सरकार द्वारा नियमावली के अन्तर्गत निर्धारित की गयी ब्याज दर उचित एवं सही है। ब्याज दर को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के MCLR+I प्रतिशत से सम्बद्ध करने के सिद्धान्त को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी Mont गया है और न्यायोचित ठहराया है। जग 50
ऐसे में उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गयी भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास), (विकय,पढ्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 के अन्तर्गत निर्धारित की गयी वार्षिक ब्याज दर /९॥२+ प्रतिशत, जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अधिकतम ब्याज दर से i प्रतिशत ज्यादा है, उचित एवं सही है। तदूनुसार बिन्दु संख्या-4 Peake किया जाता है। जहाँ तक शिकायतकर्तागण द्वारा द्वारा मानसिक उत्पीड़न एवं वित्तीय हानि हेतु क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का प्रश्न है, तो Rr अधिनियम की धारा-74 के अनुसार धारा-42,44,48 व 4१9 में क्षतिपूर्ति के आधार दिये गये है, जिनमें मानसिक उत्पीड़न एवं वित्तीय हानि सम्मिलित नहीं है। अतः क्षतिपूर्ति निर्धारण हेतु प्रकरण को एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर को सन्दर्भित करने का कोई औचित्य नहीं है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश l. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्तागण की यूनिटस् की अनुबन्ध के अनुसार समस्त सुविधाओं को पूर्ण कराकर दिनाक 34.04.2023 तक ओ.सी / सी.सी. सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें और ca KIT शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री निष्पादित कराना सुनिश्चित करें। aK
, विपक्षी, शिकायतकर्ता (पुरनेन्दु प्रकाश सिंह) को दिनांक 24.02.204 से दिनांक 30.04.20:7 तक 5/- रूपये प्रति वर्ग फुट प्रतिमाह की दर से व दिनांक 04.05.2047 से ओ.सी./सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर विलम्ब ब्याज के रूप में MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की देय धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही यदि शिकायतकर्ता का कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। अन्य शिकायतकर्तागण के प्रकरणों में उपरोक्तानुसार अनुबन्ध के अनुरूप विलम्ब ब्याज की गणना की जायेगी। , विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 2046 की धारा Ai) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्तागण द्वारा भी MCLRH प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। | विपक्षी को यह भी आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्तागण को यूनिटस् का कब्जा देते समय सभी चार्जेज़ अनुबन्ध के अनुरूप अधिरोपित करेगें |
_ इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बन्धित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस आदेश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। . इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20:6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। A! 7. यदि विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्तागण को यह अधिकार होगा कि रेरा प्राधिकरण के माध्यम से अपने आदेश का कियान्वयन करा सकेगें | दिनांक / A /2022 dae पका: वि LP. Uh We (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण