Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Shashi Manral v. Ansal Hi-Tech Townships Ltd
Complaint No. NCR144/05/108591/2023
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2026-09-16
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Counsel
- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर पीठ-3 भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2046 की धारा-34 के अन्तर्गत पारित आदेश क्रम सं0 उपस्थित - Slo दीपक स्वरूप सक्सेना, सदस्य [Resse शिकायत संख्या यूनिट न0. | जमा धनराशि Go | आवंटन पत्र | वांछित ष की तिथि पटरा44/0570859/2023 | शशी मनराल LO-5027 | रु0 3.79,558 / | 08.08.20i6 | जमा धनराशि वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। बनाम अंसल हाई-टेक टाउनशिप्स लिमिटेड शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरुद्ध परियोजना विलम्बित होने के कारण जमा धनराशि वापस दिलाये जाने हेतु यह शिकायत संस्थित की गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कहना है कि-विपक्षी द्वारा संचालित परियोजना LIG ZONE (LOI-L06) 4% यूनिट>संख्या ॥0०-5027 बुक कराई गई थी जिसके एवज में शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को धनराशि wo 39,558 // का भुगतान किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत पृष्ठ पर यह उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा वर्ष 20i9 4 दिया जाना था। लेकिन विपक्षी निर्धारित अवधि में यूनिट का कब्जा उपलब्ध कराये जाने में असमर्थ रहा है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत के समर्थन में आवंटन पत्र व रसीदों की छायाप्रतियां दाखिल की गई है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी को भुगतान की गई धनराशि का विवरण निम्नवत् हैः- क्रम विवरण दिनांक भुगतान की गई धनराशि [संख्या का (रु0)
: क्षी द्वारा जारी रसीद संख्या 50604 20.06.206 रु0 77,200/ रसीद संख्या 40578 23.03.2046 रु0 67,440 / रसीद संख्या 50853 23.06.2046 BO 5,465 / रसीद संख्या 50244 43.05.2046 रु0 80,000/ रसीद संख्या 50776 43.05.2046 रु0 26,253 / रसीद संख्या 4864 24.42.206 रु0 35,000 / रसीद संख्या 50765 22.08.206 BO 42,200 / कुल योग : रु० 3,79,558 / 4 SS
विपक्षी द्वारा लिखित आपत्ति दाखिल करते हुए यह उल्लिखित किया गया है कि विपक्षी कम्पनी रेरा अधिनियम की धारा 3 के अन्तर्गत पंजीकृत है। विपक्षी का मुख्य कार्य परियोजना में बुक्ड यूनिट का विकास कार्य करने का है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी से पैसा लेने के लिए दबाव बनाकर प्रयास किया जा रहा है। विपक्षी द्वारा स्वीकृत प्लान के अनुसार परियोजना में विकास कार्य किया जा रहा है। विपक्षी द्वारा परियोजना में वर्ष 2007 में कार्य प्रारम्भ किया गया परन्तु वर्ष 2042 में क्षेत्रीय किसान व आसामाजिक तत्वों द्वारा विकास कार्य में अवरूद्द उत्पन्न किया गया। इसकी सूचना प्रशासन को समय समय पर दिया गया। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि नोटबंदी, किसान आन्दोलन, माननीय उच्च न्यायालय, एनजीटी के आदेश व कोविड-49 महामारी के कारण परियोजना विलम्बित हुई जो विपक्षी के fraser से बाहर था। विकासकर्ता उक्त कारणों से समय से विकास कार्य नहीं कर सका। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है-कि-परियोजना में विकास कार्य पूर्ण न होने के कारण कुछ आवंटियों, को .उनकी ger के अनुसार अन्य परियोजना में वैकल्पिक यूनिट के लिए शिफ्ट की गयी है। शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट की कुल कीमत GO 9,85,000 / है: जिसके एवज में शिकायतकर्ता ने रु० 3,35,357 / का भुगतान किया गया है। विपक्षी द्वारा उल्लिखित किया गया है कि वह शिकायतकर्ता को धनराशि वापस करने को तैयार है। अतः विपक्षी ने शिकायतकर्ता को मूल धनराशि वापस प्राप्त करने के लिए निर्देशित करने तथा वर्तमान शिकायत निरस्त किये जाने का अनुरोध किया है। पीठ-3 में कार्यरत् लॉ-रिसर्चर की आख्या दिनांक 45.09.2026 के अनुसार विपक्षी प्रमोटर के विरूद्ध एनसीएलटी से कोई आदेश पारित नहीं हुआ है।
Braue द्वारा दाखिल प्रपत्रों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्न विरचित किये गये :- 4 क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते हैं ? तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? —_—_—_—— 2 2. क्या शिकायतकर्ता को जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? निस्तारण प्रश्न संख्या-4 :- प्रश्न T+ इस तथ्य पर विरचित है कि क्या रेरा आने से पूर्व के अनुबन्ध रेरा के दायरे में नहीं आते है तथा क्या पक्षकारों के मध्य रेरा लागू होने से पूर्व अनुबन्ध निष्पादित किये जाने पर रेरा के प्राविधान लागू नहीं होगें ? इस सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-6745--6749 / 2024 “मैसर्स wea प्रोमोटर्स एंड डेवलपर्स प्रा0 लि0 बनाम उ0प्र0 राज्य व अन्य” में दिया गया आब्जर्वेशन महत्वपूर्ण है, जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित किया गया है कि :-
"54. From the scheme of the Act 206, its application is retroactive in character and it can safely be observed that the projects already completed or to which the completion certificate has been granted are not under its fold and.therefore, vested or accrued rights, if any, in no»manner arevaffected. At the same time, it will apply after getting the-on-going projects and futures projects registered under Section 3 to prospectively follow the mandate of the Act 206." उपरोक्त विधि व्यवस्था-से यह स्पष्ट है कि रेरा अधिनियम लागू होने से पूर्व जो भी अनुबन्ध हस्ताक्षरित हुए या अधिनियम लागू ert से पूर्व की परियोजनाओं, जहाँ पर पूर्णता प्रमाण पत्र सम्प्रवर्तक द्वारा प्राप्त नहीं किया गया है, वहाँ पर अधिनियम का प्रवर्तन पूर्वव्यापी प्रभाव रहेगा। यह भी रेरा अधिनियम में स्पष्ट है कि “ऑन गोईंग” परियोजनायें निश्चित रूप से रेरा अधिनियम की परिधि में आते हैं। उपरोक्त माननीय उच्च न्यायालय के आर्ब्जेवेशन से यह भी स्पष्ट है कि यद्यपि रेरा पंजीकरण से पूर्व प्रोमोटर एवं आवंटी के मध्य अनुबन्ध निष्पादित हुए हैं, परन्तु यदि परियोजना को रेरा में पंजीकरण कराया जाता है, तो रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। विपक्षी द्वारा प्रश्नगत परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया है, जिसका पंजीकरण संख्या- UPRERAPRIS490 है। अतः वर्णित तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना वर्तमान में “ऑनगोईंग प्रोजेक्ट” की श्रेणी में आती है। ऐसी दशा में रेरा के सभी प्राविधान लागू होगें। तद्नुसार प्रश्न We निस्तारित किया जाता है। निस्तारण प्रश्न संख्या 2-: प्रश्न संख्या 2? इस आशय का विरचित किया गया है
कि क्या शिकायतकर्ता को जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? शिकायतकर्ता की ओर से कथन किया गया है कि विपक्षी की परियोजना विलम्बित है जिस कारण वह जमा धनराशि वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया है। विपक्षी की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया है कि विपक्षी द्वारा स्वीकृत प्लान के अनुसार परियोजना में विकास कार्य किया जा रहा है। विपक्षी द्वारा परियोजना में वर्ष 2007 में कार्य प्रारम्भ किया गया था परन्तु वर्ष 2042 में क्षेत्रीय किसान व आसामाजिक तत्वों द्वारा विकास कार्य में अवरूद्द उत्पन्न किया गया जिस कारण विपक्षी समय से परियोजना मे विकास कार्य नहीं कर सका। इसके अतिरिक्त विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को धनराशि वापस करने का तर्क भी लिखित जवाब में अंकित किया गया है। ॥ पत्रावली पर उपलब्ध. Ws oT saciid far जिससे यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता व विपक्षी के-मध्य feain.08.08.20i6 को आवंटन पत्र निष्पादित हुआ। उभयपक्षों के मध्य निष्पादित आवंटन पत्र में यूनिट का कब्जा दिये जाने की समय अवधि अंकित नहीं है. ऐसी स्थिति में माननीय उच्चतम न्यायालय के सिविल अपील संख्या 3533-3534 / 2047 M/s. Fortune Infrastructure (now known as M/s. Hicon Infrastructure) & ANR. Vs. Trevor D'lima & Ors ¥ स्पष्ट रूप से निर्धारित किया गया है कि-:
Moreover, a person cannot be made to wait indefinitely for the possession of the flats allotted to them and they are entitled to seek the refund of the amount paid by them, along with compensation. Although we are aware of the fact that when there was no delivery period stipulated in the agreement, a reasonable time has to be taken into consideration. In the facts and circumstances of this case, a time period of 3 years would have been reasonable for completion of the contract i.e., the possession was required to be given by last quarter of 204. Further there is no dispute as to 4 the fact that until now there is no redevelopment of the property. Hence, in view of the above discussion, which draw us to था irresistible conclusion that there is deficiency of service on the part of the appellants and accordingly the issue is answered.
उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार फ्लैट के कब्जे हेतु किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय तक प्रतीक्षा नहीं करायी जा सकती है, जहाँ अनुबन्ध में कब्जे की तिथि नहीं दी गयी है वहाँ एक रीज़नेवल समयावधि 3 वर्ष कब्जे हेतु अवधारित की जानी होगी। प्रस्तुत शिकायत में उभयपक्ष के मध्य दिनांक 08.08.206 को आवंटन पत्र निष्पादित हुए परन्तु आवंटन पत्र में कब्जा दिये जाने की तिथि अंकित नहीं है। ऐसी स्थिति में उपरोक्त माननीय उच्चतम न्यायालय की न्याय नजीरों के अनुसार कब्जा देने की अवधि 3 वर्ष मानी गयी है | इस प्रकार आवंटन पत्र की तिथि 08.08.2046 से 3 वर्ष अर्थात अगस्त 2049 में विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को आवंटित यूनिट का कब्जा उपलब्ध कराया-जाना था परन्तु अभी तक विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा उपलेब्धे नहीं" कराया गया है। बल्कि विपक्षी द्वारा लिखित जवाब में शिकायतकर्ता को धनराशि वापस किये जाने का उल्लेख उपरोक्त से स्पष्ट है कि विपक्षी की परियोजना अभी पूर्ण नहीं है और लगभग 06 वर्ष से अधिक विलम्बित है। विपक्षी की ओर से परियोजना के सापेक्ष ओ.सी /सी.सी प्राप्त होने का भी कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नहीं किया गया है। बल्कि विपक्षी के लिखित कथनानुसार विपक्षी शिकायतकर्ता को धनराशि वापस करने को तैयार है। चूंकि विपक्षी की परियोजना विलम्बित है जिस कारण शिकायतकर्ता भी परियोजना में बने रहना नहीं चाहता है। ऐसी स्थिति में ta अधिनियम की धारा-48() में यह प्राविधानित है कि :-
"Section 8 (]) “If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building, in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall 5 —__—os be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed". उपरोक्तानुसार यदि प्रोमोटर करार के निबन्धों के अनुसार उसमें दिये गये अवधि तक समय से किसी अपार्टपेन्ट, भू-खण्ड या भवन को पूरा करने में असमर्थ रहता है या कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो वह उपलब्ध किसी अन्य उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना आवंटी की मांग पर यदि आवंटी परियोजना से बाहर होना चाहता है, तो प्रकरण के अनुसार, sree, भू-खण्ड या भवन के सम्बन्ध में उससे प्राप्त धनराशि ब्याज.सहितः लौटाने का.दायी होगा। इसके अतिरिक्त इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि “माननीय उच्चतम
न्यायालय द्वारा सिविल अपील-सं० 3482 /2049 कोलकाता वेस्ट इंटरनेशनल सिटी प्रा.लि. बनाम देवाशीष war में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "It would be manifestly unreasonable to construe the contract between the parties as requiring the buyer to wait indefinitaly for possession.by 206, nearly seven year has elapsed from the date of agreement. Even according to the developer, the completion certificate was received on 29 March 206., This was nearly seven years after the extended date for the handing over of possession prescribed by the agreement. A buyer can be expected to wait for possession for a reasonable period. A period of seven years is beyond what is reasonable. Hence, it would have been manifestly unfair to non-suit the buyer merely on the basis of the first prayet in the reliefs sought before the SCDRC. There was in any event a prayer for refund. " इसी क्रम में “माननीय सर्वोच्च न्यायालय के सिविल अपील संख्या-42238 / 2048 पायनियर अर्बन aes एवं इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गोविन्द wean’ में भी अभिनिर्धारित किया गया है कि-:
"We see no illegality in the Impugned Order dated 23.0.20l8 passed by the National Commission. The Appellant - Builder failed to fulfill his contractual obligation of obtaining the Occupancy Certificate and offering possession of the flat to the Respondent — Purchaser within the time stipulated in the Agreement, or within a reasonable time thereafter. The Respondent — Flat Purchaser could not be compelled to take possession of the flat, even though it was offered almost 2 years after the grace period under the Agreement expired. During this period, the Respondent — Flat Purchaser had to service a loan that he had obtained for purchasing the flat, by paying Interest @l0% to the Bank. In the meanwhile, the Respondent — Flat Purchaser also located an alternate property in Gurugram. In these circumstances, the Respondent — Flat Purchaser.wwas entitled to be granted the relief prayed for i.e. refund of the entire amount deposited by him with Interest." उपरोकतानुसार दी गयी विधि व्यवस्था में गृहक्रेता को एक उचित समय तक प्रतीक्षा करायी जा सकती है व लम्बे विलम्ब की स्थिति में पूर्णता प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के उपरान्त भी शिकायतकर्ता जमा धनराशि पाने का अधिकारी है क्योंकि अनुबन्ध में दी गयी अवधि के अनुसार शिकायतकर्ता को कब्जा नहीं मिला है व प्रकरण में अत्यधिक विलम्ब हुआ है। उपरोक्त तथ्यों एवं वर्णित न्याय नजीरों तथा विपक्षी के द्वारा शिकायतकर्ता की धनराशि वापस लौटा दिये जाने के आदेश पारित कर दिये जाने के अनुरोध को दृष्टिगत रखते हुए शिकायतकर्ता जमा धनराशि प्राप्त करने का अधिकारी है।
जहां तक शिकायतकर्ता को मय ब्याज धनराशि वापस किये जाने का प्रश्न है, तो इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि बॉम्बे उच्च न्यायालय के “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया“ की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "Section 8(l)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of 7 in © suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable." अतः: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व क्रेता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
इसके अतिरिक्त Re संख्या-0.४० .3289/2020 दिनांक 06.02.2020 “रूद्रा बिल्डवेल कस्ट्रक्शन्स प्रा० लि0 बनाम पूनम सूद एवं अन्य“ में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित्र॒-किया wars कि soyo भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) नियमावली, 2048ल्«की«प्रस्तर-9:269)-के-अनसार प्रोमोटर की ओर से विलम्ब किये जाने की स्थिति में आवंटी के पास aged को समाप्त करने का विकल्प होगा एवं इस स्थिति में ग्रोमोटर “भारतीय-<स्टेट-बैंक”-के होम लोन दर MCLRH प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर से 45 दिनों में समस्त जमा धनराशि वापस करने के लिए उत्तरदायी होगा। साथ ही साथ उच्च न्यायालय द्वारा McCLR+I प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर को उचित एवं मान्य माना गया है। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विक्रय,/पट्टा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें दिये गये विक्रय ,/ पट्टा विलेख के प्रारूप के TR 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण Events of default) परिभाषित है, जिसमें ER 9.26) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है fre "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable 8 —_—_—= to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +l% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:"
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर धनराशि वापस दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। तदनुसार प्रश्न संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। 4 उपरोक्त प्रश्नों का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाता हैं :- आदेश विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह रेरा पोर्टल पर आदेश अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के अन्दर अग्रणी शिकायतकर्ता द्वारा भुगतान की गई धनराशि vo 3,79,558./ (रु० तीन लाख. wait हजार पाँच सौ अटठावन) जमा किये जाने की तिथि से भुगतान किये जाने की तिथि तक मय ध८ा॥२+ प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से शिकायतकर्ता को वापस भुगतान करना सुनिश्चित करें।... ः इस आदेश का vera भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। विपक्षी द्वारा यदि इस आदेश का 45 दिन में अनुपालन नहीं किया जाता है तो शिकायतकर्ता रेरा प्राधिकरण के माध्यम से आदेश का क्रियान्वयन करा सकेंगे। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाए। AAA १७-०५. २-७० 26 (डा०दीपक स्वरूप सक्सेना) सदस्य उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण गौतमबुद्धनगर 9