Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Binod Kumar v. Newtech Promoters and Developers Pvt. Ltd
Complaint No. NCR144/05/0632/2019
- Decision date
- 2019-11-18
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 2 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
] उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04, श्रीमती कल्पना मिश्रा,सदस्य कम सं0 शिकायत do | शिकायत्तकर्ता | एन.सी.आर।44 / 040392 / 2049 अजय कुमार शम एन.सी.आर।44 / 040462 / 2049 नितेश शर्मा एन.सी.आर444 /04/0755/20i9 =| सचिन वम | एन.सी.आर44,//05 / 0032/ 2009 | बिनोद कुमार बनाम न्यूटेक प्रमोटर और डेवलपर्स प्रा.लि. शिकायतकर्ता अजय कुमार शर्मा व 03 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान हैं और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें “La-Galaxia" से सम्बंधित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत Wo एन.सी.आर444,/040392,//2049 अजय कुमार शर्मा अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्र विलम्बित अवधि के ब्याज सहित कब्जा दिलाने अथवा कुछ शिकायतकर्तागण द्वारा समस्त धनराशि ब्याज सहित वापस दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना ला गैलैक्सिया में फ्लैट संख्या एफ-402 बुक कराया था तथा विपक्षी को समय-समय पर किश्तों के आधार पर कुल GO 5,t6,892/— अदा किये गये, किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कोई कब्जा नहीं दिया गया है, जबकि विपक्षी को अनुबन्ध के अनुसार दिनांक 09.0:.2046 तक हर 2 कब्जा दिया जाना था। अतः शिकायतकर्तागण द्वारा भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण अधिनियम की धारा 34 के अन्तर्गत विपक्षी के विरूद्ध शिकायत दर्ज करायी गयी है।
शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, फ्लैट बायर THK, धनराशि की अदायगी की रसीदें व अन्य प्रपत्रों की छायाप्रति दाखिल की गई है। विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुये कथन किया गया, कि शिकायतकर्ता द्वारा न्यूटेक प्रमोटर और डेवलपर्स प्रालि. की परियोजना ला गैलैक्सिया में फ्लैट संख्या एफ-402 बुक कराया था। शिकायतकर्ता की यूनिट तैयार है और कब्जा दिया जा सकता है। विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र में कहा गया कि शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी की परियोजना में फ्लैट बुक कराया गया था, जिसका कब्जा 30+6 माह (ग्रेस पीरियड) सहित 36 माह में देना था। विपक्षी का कहना है कि टॉवर संख्या ई, एफ व जी तैयार है और और शिकायकर्तागण को नवम्बर 20:9 तक ओ.सी के साथ कब्जा दे दिया जायेगा, और टॉवर संख्या ए, बी, सी और डी का कार्य पूर्ण और आवंटियों को फिट आउट लेटर जारी किया जा चुका है। प्रतिवाद पत्र में अंकित किया गया कि कुछ Force Majeure के कारण परियोजना में विलम्ब हुआ है, अनुबंध में विलम्बित अवधि के भुगतान के लिए प्राविधान है अतः: शिकायतकर्ता को विलम्बित अवधि की धनराशि को अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित कर दिया जायेगा। शिकायतकर्ता यदि चाहे तो वह कंपनी की किसी अन्य परियोजाना में स्थानांतरित कर सकता है। विपक्षी की ओर से यह भी कहा गया कि उसके द्वारा परियोजना का सी.सी. के लिए आवेदन किया जा चुका है। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में प्रतिवादपत्र, खाताविवरण व अन्य प्रपत्रों की छायाप्रति दाखिल की गई है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किये गये :- ee 3
क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव ? क्या शिकायतकर्तागण की समस्त जमा धनराशि ब्याज सहित वापस दिलायी जा सकती है? क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये ? यदि हाँ तो ब्याज का दर क्या होगा ? निस्तारण बिन्दु सं0 4 fag to 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक. wer आदेश, निर्णय व feat से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, जिसके सम्बंध में विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध के में उल्लिखित किया गया था, जिसे शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था, ऐसी दशा में शिकायतकर्ता किसी ब्याज को पाने का अधिकारी नही है, किन्तु विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही किसी फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नही किया गया है। इसके अतिरिक्त wha माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 /20:7 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं WHR 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया हैः- a 4
"Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature." उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तदनुसार बिन्दु सं०-4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता की जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? यह वाद बिन्दु भी शिकायतकर्ता के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है। शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अनुबंधित अवधि में कब्जा नही दिया गया -है, जिस कारण वह परियोजना के साथ नही रहना चाहता है और उसकी जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलायी जाये, जिस पर विपक्षी द्वारा कहा गया है कि टॉवर संख्या ई, एफ व जी तैयार है और शिकायकर्तागण को नवम्बर 20:9 तक ओ.सी के साथ कब्जा दे दिया जायेगा, और टॉवर संख्या ए, बी, सी और डी का कार्य पूर्ण और आवंटियों को फिट आउट लेटर जारी किया जा चुका है।
यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना फ्लैट बुक कराया था। पत्रावली के अवलोकन से विदित है कि दिनांक 09.04.2043 को फ्लैट केता अनुबन्ध निष्पादित किया गया उक्त अनुबन्ध के प्रस्तर 49 के अनुसार कब्जा 30 माह एवं 6 माह की अनुग्रह अवधि के साथ दिनांक 09.07.20i6 तक दिया जाना था। विपक्षी के अधिवक्ता द्वारा कथन प्रस्तुत किया गया कि परियोजना में फिनिशिंग कार्य चल रहा है और टॉवर संख्या ई, एफ व जी तैयार है और शिकायकर्तागण को नवम्बर 209 तक ओ.सी के साथ कब्जा दे दिया जायेगा, जबकि टॉवर संख्या ए, बी, सी और डी का कार्य पूर्ण और आवंटियों को फिट आउट लेटर जारी किया जा चुका है। er a See 5 जहाँ तक dat err रिफण्ड के अनुरोध का प्रश्न है, इस विषय में रेरा अधिनियम के प्राविधानों को समग्र रूप से पढा जाना आवश्यक है ताकि सभी पक्षों के मत को दृष्टिगत रखते हुए एक संतुलित निर्णय लिया जा सकें। रेरा एक्ट की धारा is (॥) में प्राविधान है कि :- "Section 78 (7) “If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building, in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or
revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: _ Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed." ९ soi — es | इस प्रकार da को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नही मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा मासिक दर से ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें। रेरा अधिनियम की धारा 34(0 में रेरा के अन्य “HRT” के साथ-साथ " to ensure compliance of the obligations cast upon the promoters, the allottees and the real _ न कक्>+ीविनलसनतचचतततततततततततत estate agents under this Act and the rules and regulations made thereunder " का भी उल्लेख है। इसी प्रकार धारा 32 में रियल ge सेक्टर के विकास हेतु अथॉरिटी के उत्तरदायित्वों में निम्न भी सम्मिलित हैं :- “39 The Authority shall in order to facilitate the growth and promotion of a healthy, transparent, efficient and competitive real estate sector make recommendations to
. the appropriate Government of the competent authority, as the case may be, on,— (a)protection of interest of the allottees, promoter and real estate agent.,....... (Jany other issue that the Authority may think necessary for the promotion of the real estate sector.” ————— नमन न नमन मन मनमनन-न+नकनमकककनममनन मनन मन न ानकऊ-नन मन नममंक नमन —— उक्त प्राविधानों से यह स्पष्ट है कि “रियल एस्टेट सेक्टर” के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करने के लिए इसके सभी wo होल्डर्स के हितों को समग्र रूप से देखते हुए समुचित निर्णय लेने का उत्तरदायित्व इस ऑथरिटी का है। इस .कम में मा. मुम्बई उच्च न्यायालय द्वारा नीलकमल रियलटर्स सबअरबन प्रा.लि. बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया, जिसमें रेरा अधिनियम की वैद्यानिकता के सम्बंध में निर्णय दिया गया था, के प्रस्तर 424 में मा. उच्च न्यायालय द्वारा निम्न संवीक्षण किया :- QT “24, The entire scheme of the RERA is required to be kept in
mind. It is already submitted during the course of hearing that in many cases helpless allottees had approached consumer forum, High Courts, Apex Court in a given fact situation of the case. The courts have been passing orders by moulding ’ reliefs by granting interest, compensation to the allottees, and issuing directions for timely completion of project, transit accommodation during completion of project, so on and so forth. Under RERA now this function is assigned to the authority, tribunal. An appeal lies to the High Court. Under one umbrella, under one regulation and one law all the issues are tried to be resolved. Provisions of Section 77 refers to power to adjudicate. A District Judge is conferred with the power to adjudicate compensation under Sections /2, 44, /6 and /9, A promoter could very well put up his case ' before the adjudicator who deals with the issues in the light of the fact situation of each case. Therefore, there should not be any apprehension that mechanically compensation would be awarded against a promoter on failure to complete the development work.” उक्त से स्पष्ट है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद, यद्यपि समय से इकाई न मिलने की दशा में आवंटी का अपनी धनराशि ब्याज सहित मांगने का अधिकार है, तथापि उक्त वर्णित संवीक्षा को देखते हुए अथॉरिटी, प्रकरण के समस्त तथ्यों, के आधार पर ‘by moulding reliefs by granting interest, compensation to the allottees, ranting interest, compensation to the allottees, and issuing
directions for timely completion of project, transit_ accommodation during completion of project, so on and so forth’ के अनुरूप आदेश पारित किए जा सकते हैं। Qo 8 एलोटीज द्वारा धनराशि वापस किए जाने व परियोजना में बने रहने वाले एलोटीज के हितों में ager के प्रसंग में “चित्रा शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया” (744 /2047) के निर्णय में मा. सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय के TEX 40 में निम्न ऑबजरवेशन किया है :- "40. As we have stated earlier, an amount of Rs 750 crores is lying in deposit before this Court pursuant to the interim directions, on which interest has accrued. The home buyers have earnestly sought the issuance of interim directions to facilitate a pro-rata disbursement of this amount to those of the home buyers who seek a refund. "We are keenly conscious of the fact that the claim of the home buyers who seek a refund of monies deserves to be considered with empathy. Yet, having given our anxious consideration to the plea and on the balance, we are not inclined to accede to it for more than
have been made available presently, following the opening "of the Web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund." | | | one reason. Firstly... Secondly, the figures which | | | | मा. है उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च. न्यायालय द्वारा उक्त प्रस्तरों में उद्धरत । “ऑबजरवेशनस्” एवं रेरा एक्ट की समग्र व्यवस्था को देखते हुए यह भी स्पष्ट है कि यदि विलम्ब के प्रत्येक मामले में धनराशि लौटाने का ही निर्णय लिया जाये तो निश्चय ही यह रा | —$——$— मनन । 9
अधिनियम के “ऑबजेक्टिव” तथा “स्कीम” के अनुरूप न होगा। Revs का निर्णय लेते समय प्रत्येक मामले की “यूनीकनेस” प्रकरण के समस्त तथ्यों यथा “कन्सट्रक्शन” की स्थिति, कम्पलीशन की “टाईम aga’, प्रोमोटर्स के द्वारा ऑफर ऑफ पजेशन के “कमिटमेन्ट” की स्थिति, अन्य “ea dest’, विशेष रूप से परियोजना के साथ बने रहने वाले “एलॉटीज” पर प्रभाव, “प्रस्तावित पज़ेशन डेट” के विषय में “Hany” आदि पर विचार किया जाना mata में होगा। चूंकि विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया कि टॉवर संख्या ई, एफ व जी तैयार है और शिकायकर्तागण को नवम्बर 200 तक ओ.सी के साथ कब्जा दे दिया जायेगा, और टॉवर संख्या ए, बी, सी और डी का कार्य पूर्ण और आवंटियों को फिट आउट लेटर जारी किया जा चुका है। शिकायतकर्तागण को परियोजना पूर्ण कर कब्जा दे दिया जायेगा। निश्चय ही परियोजना में बने रहने की दशा में एलॉटीज़ को विलम्ब हेतु नियमानुसार ब्याज प्रोमोटर्स द्वारा देय होगा। फ्लैट के पूर्णता के लिए प्रतीक्षारत फ्लैट बायर्स व धनराशि वापिस प्राप्त करने की अपेक्षा करने वाले एलॉटीज़ के हितों arora स्थापित करते हुए रिफण्ड के आदेश टॉवर्स (A,B,C,D,E,F&G) की पूर्णता तिथि अर्थात् दिसम्बर के 45 दिन के भीतर आदेशित करना उचित होगा। निस्तारण बिन्दु सं०-2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु eo 3
यह भी स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा अनुबन्ध में शिकायतकर्ता को अनुबन्ध निष्पादित करने से 30+6 माह (a पीरियड) में कब्जा दिया जाना था। फ्लैट बायर एग्रीमेन्ट दिनांक 09.04. 2043 को निष्पादित किया गया एवं अनुबन्ध के प्रस्तर 49 के अनुसार विपक्षी को 09.0.2046 तक कब्जा देना था, किन्तु विपक्षी आज तक कब्जा नहीं दिया गया है। चूंकि विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया कि टॉवर संख्या ई, एफ व जी तैयार है और शिकायकर्तागण को नवम्बर 2049 तक ओ.सी के साथ कब्जा दे दिया जायेगा, और टॉवर संख्या ए, बी, सी और डी का कार्य पूर्ण और आवंटियों को फिट आउट लेटर जारी किया जा चुका है। शिकायतकर्तागण को परियोजना पूर्ण कर कब्जा दे दिया जायेगा। ऐसे में ies ]0 शिकायतकर्ता को यूनिट पर दिनांक 09.0.2046 से ओ.सी /सी.सी सहित कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक का विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
"Section 70(7)(8) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The ‘requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable." अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। सिख Ee ] जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के
डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +7% unless provided otherwise under the Rules, within forty-five days of receiving the termination notice:" यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर o(fiii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि में विलम्ब है, तो विपक्षी भी MciR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त सकता है। जहां तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है, तो इस सम्बंध में सिविल अपील to 6649-50,/ 2048 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "the period of Interest should close on April 2076 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 46) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Qe 94
Certificate as late as April 2076, The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 2076 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने या कब्जा ऑफर होने, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। तद्नुसार बिन्दु सं०-3 निस्तारित किया जाता है। जहां तक क्षतिपूर्ति ((!ण॥एथ54४०7) देने का प्रश्न है, तो यह एडणज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अतः इस बिन्दु पर पीठ द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा रहा है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किया जाते है। आदेश विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह ओ.सी./सी.सी. सहित 34.42.209 तक, यदि कोई देय धनराशि बकाया है, तो उसे प्राप्त कर कब्जा देना सुनिश्चित करें और नियमानुसार स्टाम्पशुल्क प्राप्त कर पंजीयकरण कराना सुनिश्चित करें। विपक्षी, शिकायतकर्तागण को ग्रेस पीरियड के साथ धनराशि का ब्याज रेरा आने के पूर्व अनुबन्ध के अनुसार देय होगा एवं रेरा आने के उपरांत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित MCLR+2 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर पर देय होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्तागण को वापस की जाये। ee 3
यदि विपक्षी अनुतोष सं० 4 देने में असफल रहता है, तो दिनांक 34.42.2049 के पश्चात 45 दिन के अन्दर शिकायतकर्तागण की धनराशि जमा करने की तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक धटा॥स््का प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित वापस करना सुनिश्चित ay यदि इस इकाई हेतु बैंक से ऋण लिया हो, तो इस धनराशि का उपयोग पहले बैंक का ऋण व देय ब्याज लौटाने के बाद शेष धनराशि शिकायतकर्तागण को दी जायेगी। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 20:6 के धारा 2 (2०)0) के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि यंदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस आदेश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गंणना की जाये। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। यदि विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्ता को यह अधिकार होगा कि रेरा प्राधिकरण के माध्यम से अपने आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। दिनांक|5/। /2049 ८ ३५३.2०५०- a ४७१)१ (कल्पना मिश्रा) ४७१४१) (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण ee — al i