Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Satish Chand Mittal v. La Residentia Developers Private Limited
Complaint No. NCR144/01/88457/2022
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2022-10-17
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू--सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04ए आदेश अन्तर्गत aRI34 श्री राजीव कुमार, माननीय अध्यक्ष कम शिकायत संख्या |. | टॉवर एवं संख्या यूनिट संख्या | फ्लराबब/088457/2022 सतीश चन्द्र मित्तल प्-3903 | + | ग्रटर44/05/94559/2022 रचना AAR T-34/902 3. | NCR44/02/89622/2022 | शिव ज्ञान शर्मा एवं Gey | T-24/50i शर्मा बनाम ला रेजिडेन्सिया डेवलपर्स प्रा0 लि0 शिकायतकर्ता सतीश चन्द्र मित्तल के साथ 02 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किये गये हैं। प्रस्तुत प्रार्थना पत्रों में निम्नलिखित शिकायतकर्तागण द्वारा मूल रूप से जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। lL. सतीश चन्द्र मित्तल 2. शिव ज्ञान शर्मा एवं सौरभ शर्मा इसके अतिरिक्त निम्न शिकायतकर्ता द्वारा मूल रूप से कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया था, जिसको बाद में शिकायतकर्ता लिखित प्रार्थना पत्र दाखिल करते हुए जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है, जो कि स्वीकार किया जाता है। l. रचना भटद्नागर / 8 उपरोक्त सभी शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें विपक्षी की परियोजना La Residentia से सम्बन्धित है। अतः एक ही निर्णण से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत संख्या :+- NCRI44/0I/88457/2022 सततीश चन्द्र मित्तल अग्रणी वाद रहेगा।
संक्षेप में शिकायतकर्ता (सतीश चन्द्र मित्तल) का कथन है कि उनके द्वारा दिनांक 34.03.2043 को विपक्षी की परियोजना La Residentia 4 यूनिट संख्या-7-39/03 बुक करायी गयी थी, जिसकी कुल कीमत 69,55,842/— रूपये थी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा 56,96,544/— रूपये की धनराशि का भुगतान किया गया है। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि पक्षकारों के मध्य प्रश्नगत यूनिट के सम्बन्ध में अनुबन्ध दिनांक 20.06.2043 को निष्पादित कराया गया, जिसके अनुसार विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा 42 माह अर्थात् दिनांक 20.2.2046 तक दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा उक्त निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। विपक्षी द्वारा बिना किसी कारण के wera परियोजना स्थल पर कार्य बन्द करते हुए बायर्स को सूचना दी और धनराशि का भुगतान करने हेतु माँग पत्र प्रेषित किया। विपक्षी द्वारा वचन के अनुसार परियोजना स्थल पर मूल सुविधाओं का निर्माण कार्य नहीं किया गया है। विपक्षी द्वारा गलत रूप से विज्ञापन जारी करते हुए प्रश्नगत यूनिट आम्रपाली के नाम से बेची गयी, परन्तु वास्तव में कुछ और है। इन आधारों पर शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि मय 42 प्रतिशत ब्याज सहित वापस दिलाये जाने तथा अतिरिक्त 40 लाख रूपये की धनराशि क्षतिपूर्ति के रूप में दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में एप्लीकेशन कम रजिस्ट्रेशन फार्म दिनांकित 34.03.2043 की प्रति, आवंटन कम फ्लैट बायर Wr दिनांक 20.06.2043 की प्रति, जमा धनराशि की रसीदें, चेक की प्रतियाँ, माँग पत्रों की प्रतियाँ, बैंक ऋण सम्बन्धी खाता विवरण, लिखित सबमिशन दिनांकित 07.05.2022 एवं दिनांकित 47.05.2022 आदि अभिलेखों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है।
विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दिनांकित 05.05.2022 दाखिल करते हुए कहा गया है कि प्राधिकरण द्वारा प्लॉट नं०-0प्त-06, क्षेत्रफल 97,226.62 वर्ग मीटर आवंटित किया गया, जिसको sed हुए मैसर्स ला रेसीडेन्सिया डेवलपर्स प्रा0 लि0 को प्लॉट नं०-6प्-06%, क्षेत्रफल 80026.62 वर्ग मीटर आवंटित किया गया। परियोजना दिनांक 76.03.204 को लॉन्च की गयी थी। परियोजना में कुल 39 टॉवर्स है। परियोजना के फेज़-4 में कुल ia टॉवर्स (टॉवर-4 से 48 तक) हैं, जिसमें 4,408 यूनिटस् हैं। उक्त cad में से 42 टॉवर्स का ओ.सी. प्राप्त किया -जा gars और अवशेष टॉवर्स का ओ.सी. प्राप्त किये जाने हेतु ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास हि 3 प्राधिकरण के समक्ष आवेदन किया जा चुका है। जिन cial का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है, उसमें यूनिटों का कब्जा दिया जा रहा है और वर्तमान में 425 यूनिटों का कब्जा दिया जा चुका है। परियोजना के फेज-2 में कुल 44 टॉवर्स (टॉवर-49 से 29 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और दिसम्बर, 2022 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना के फेज़-3 में कुल 40 टॉवर्स (टॉवर-30 से 39 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा और सभी सुविधाओं सहित दिसम्बर, 2023 तक कब्जा दे दिया जायेगा।
परियोजना विभिन्न न्यायालय के आदेशों के कारण विलम्बित हुई। दिनांक 9.07.20 से दिनांक 24.08.20I2 तक निर्माण कार्य बन्द vet] इस अवधि में माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष किसानों द्वारा कई Re याचिकायें योजित की गयी। मार्च 2043 के बाद निर्माण कार्य धीमी गति से शुरू हुआ। मार्च 2044 से वर्ष 2043 तक निर्माण कार्य की गति बहुत धीमी रही। अन्ततः दिनांक 44.05.2045 को माननीय सर्वोच्च. न्यायालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को रिट याचिका संख्या-4506 / 2045 “सावित्री देवी बनाम उ0प्र0 सरकार एवं आदि“ में स्वीकृति दी गयी। ऐसे में 4 वर्ष विलम्ब को शून्य पीरियड माना जाना चाहिए। विपक्षी की परियोजना रेरा में पंजीकृत है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 23.07.2049 को 632 यूनिटों को आम्रपाली ग्रुप को स्थानांतरित करने का निर्देश far) वर्तमान में कम्पनी यूनिटों का छांटने में लगी है, ताकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश का अनुपालन किया जा सके।
विपक्षी कंपनी ने Re याचिका संख्या 940,/2047 "बिकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य" में एक हस्तक्षेप आवेदन दायर किया, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कम्पनी ला रेजिडेन्सिया को दिनांक 44.0.2049 के आदेश के माध्यम से किसी भी संपत्ति को अलग करने से रोक दिया। अतः विगत 4 माह से इसकी पुनर्विक्रय पर रोक के कारण कंपनी परियोजना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और इसने कंपनी को संकट में डाल दिया है, इस कारण कंपनी का नकदी प्रवाह भी प्रभावित होता है। इस सुस्त कारोबारी माहौल के साथ कंपनी / परियोजना को और अधिक प्रभावित किया है, फिर भी कंपनी निर्माण कार्य को प्रारम्भ करने का प्रबंधन कर रही है, निषेधाज्ञा आदेश के कारण निर्माण धीमा हो गया है, अनुपालन बाधा आदेश में विपक्षी ने पहले ही एक हलफनामा दायर किया है। परियोजना में फिनिशिंग का कार्य तीव्र गति चल रहा है और जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड में शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। शिकायतकर्ता द्वारा उनकी परियोजना के cfax-T-39 के प्रथम तल पर फ्लैट PAN-T39/03 बुक कराया गया था। शिकायतकर्ता द्वारा फ्लैट की कुल कीमत nue 4 69,55,842 //- रूपये + कर आदि के सापेक्ष 55,03,375 /— रूपये की धनराशि का भुगतान किया गया। अनुबन्ध दिनांक 20.06.2043 के अनुसार यूनिट का कब्जा 42 माह + 6 माह ग्रेस पीरियड दिया जाना था। यदि यूनिट का कब्जा दिये जाने में देरी की जाती है, तो वह अनुबन्ध के प्रस्तर-49(०) के अनुसार क्षतिपूर्ति अदा करेगें।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने इस परियोजना, “ला रेज़िडेन्सिया” में, आम्रपाली समूह की “इक्विटी” होने के आधार पर विपक्षी को 632 फ्लैट सौंपने के निर्देश दिये गये, जिस पर विचार करने के लिए विपक्षी ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष एक आवेदन दायर किया है। “ला रेज़िडेन्सिया” को स्वतंत्र परियोजना के रूप में मानने और सभी समर्पित किए गए 632 फ्लैटस् के निर्माण एवं भूमि की लागत की vat उन्हें रु. 445 करोड़ विपक्षी के पक्ष में दिए जाने चाहिए। इन आधारों पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड सहित कब्जा दिये जाने हेतु समय प्रदान किये जाने का अनुरोध किया गया है।
प्रश्नगत प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 23.07.20:9 को 632 यूनिटों को आम्रपाली ग्रुप को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। विपक्षी द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि शिकायतकर्ता का फ्लैट माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अधीन 632 यूनिटों में से है अथवा नहीं। इसके अतिरिक्त माननीय सर्वोच्च न्यायालय सिविल अपील संख्या-940,/2047 "flea चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य" में आई.ए. नं0--468486 ,// 208, आई.ए. नं0--409882 / 2020, आई.ए.... H0-4865 /2020, 38. = नं०-453344 / 2049, आई.ए. नं0-420307 / 2020, आई.ए. नं०-423299 / 2020 एवं आई.ए. नं0--6397 / 2024 (लॉ रेसीडेन्सिया प्रोजेक्ट के सम्बन्ध में) में दिनांक 29.06.2024 को पारित आदेश में उ0प्र0 रेरा को आदेश पारित करने में wer नहीं लगाया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय में प्रकरण लगभग 2 वर्ष विचारार्थ था तथा आम्रपाली ग्रुप के 632 फ्लैटस् के लिए पृथक अनुश्रवण व्यवस्था के अतिरिक्त माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अन्तिम आदेश में वर्तमान प्रमोटर्स द्वारा ही अब परियोजना पूर्ण की जानी है। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में माननीय सर्वोच्च न्यायालय सिविल अपील संख्या-940 ,// 2047 "बिकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य" में पारित आदेश आदि अभिलेखों की छायाप्रतियाँ दाखिल की गयी है। उभयपक्ष के तर्कों को सुना गया व पत्रावली का अवलोकन किया गया, जिसके आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किये गये :- 4. क्या force majeure events होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? . f a= 2... क्या शिकायतकर्ता की जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? यदि नहीं तो क्या अनुतोष अनुमन्य होगा ?
निस्तारण बिन्दु संख्या-4 बिन्दु e- इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या वास्तव में परियोजना फोर्स मैज्योर इवेन्टस होने कारण विलम्बित हुई ? यह बिन्दु विपक्षी के अभिकथनों पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि परियोजना विभिन्न न्यायालय के आदेशों के कारण विलम्बित हुई। मार्च 2044 से वर्ष 2043 तक निर्माण कार्य की गति बहुत धीमी रही। अन्ततः माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भूमि अधिग्रहण को fe याचिका संख्या-4506 //205 “सावित्री देवी बनाम उ0प्र० सरकार एवं आदि” में स्वीकृति दी गयी। ऐसे में 4 वर्ष विलम्ब को शून्य पीरियड माना जाना चाहिए। यद्यपि यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि क्या निर्माण पर कोई स्थगनादेश था तथापि प्रस्तुत प्रकरण में अनुबन्ध वर्ष 20:7 का है एवं तब तक भूमि सम्बन्धी प्रकरण निर्णीत हो चुके थे। इस सम्बन्ध में अनुबन्ध के weck—a) निम्नलिखिल उल्लेखित हैः-
49(6)... That the Developer shall complete the development/construction of the flat within 42 months Jrom the date of signing of agreement which may very for + 6 months. That the Developer shall not be held responsible or liable for not performing any of its obligations or undertakings provided for in this Agreement if such performance is prevented, delayed or hindered by act of God, fire, storm, flood, explosion, war, riot, terrorist act, sabotage, court cases, injunctions not within the reasonable control of the Developer. The completion date is subject to force majeure conditions. No claim by way of damages/ compensation shall lie against the Developer in case of delay in handing over the possession on account of the force majeure condition and the Developer shall be entitled to a reasonable extension of time for the delivery of possession of the flat to the allottee. V2 ) माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील Wear-73029 / 4985 “एम. सी. मेहता बनाम भारत सरकार” में पारित आदेश दिनांक 04.44.2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है :-
With respect to demolition and construction activities we direct that no demolition and construction activities take place in Delhi and NCR region. In case it is found that such activity is done, the local administration as well as the municipal authorities including the Zonal Commissioners, Deputy Zonal Commissioners shall be personally held responsible for all such activities. They have to act in furtherance of the Court’s order and to ensure that no such activity takes place. इसके अतिरिक्त salad सिविल अपील संख्या-43029 ,/ 4985 में पारित आदेश दिनांक 09.42.2049 में निम्नलिखित निर्देश दिये है :- In the affidavit dated 05.2.209, the Central Pollution Control Board (CPCB) has stated as under:-
7|2, That it is respectfully submitted that it is normally experienced that in month of December depending upon Climatic Condition the AQI category varies. As a matter of fact, last year (208) 8 days in the month of December were in severe AQI category. Presently the situation not being severe, CPCB is of considered opinion that partial ban could be in place of construction activities in as much as no construction should be permitted during night time (6.00 pm to 6.00 am). The ban imposed could be partially lifted by permitting activities during day time (6.00 am to 6.00 pm), subject to the criteria stipulated in GRAP, wherein strict emforcement of rules for dust control in construction activities and closure of non-compliant sites is mandated in moderate to poor AQI category and further a bank on construction activities may be imposed by EPCA if Ambient AIR quality levels persist in severe+/emergency category for 48 hours or more." Hence, the ban is relaxed in terms of the recommendations made by, Central Pollution Control Board (CPCB), as ae quoted above. However, conditions for raising construction be scrupulously followed.
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा (दिनांक 04.4.2049 से दिनांक 44.02.2020) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर रोक लगायी गयी है, जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश दिनांक 09.42.2049 में पूर्ण प्रतिबन्ध को हटाते हुए आंशिक प्रतिबन्ध लगाया गया। ऐसे में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 35 दिन (दिनांक 04.44.2049 से दिनांक 09.2.2049) एवं 33 दिन (6+2) (दिनांक 0.42.2049 से दिनांक 44.02.2020 तक Wa 6 बजे से सुबह 6 बजे तक) की अवधि के लिए निर्माण कार्य पर प्रतिबन्ध लगाया गया। अत: उपरोक्त Vested आदेशों के कम में कुल 68 दिनों में निर्माण प्रभावित रहा। विपक्षी ऐसी दशा में कुल 68 दिन निर्माण कार्य प्रभावित रहने के कारण आंशिक रूप से लाभ पाने का अधिकारी है। समस्त सुसंगत तथ्यों पर विचारोपरान्त उ0प्र0 रेरा अथॉरिटी द्वारा दिनांक 06.06.2020 को कोविड-49 (Corona Virus Disease) के प्रभाव के कारण सभी परियोजनाओं को पूर्ण करने हेतु दिनांक 25.03.2020 से 6 माह की अतिरिक्त अवधि अर्थात् दिनांक 25.09.2020 तक की अवधि दे दी गयी है और यह अतिरिक्त अवधि फोर्स मैज्योर इवेन्टस् के कारण मानी जायेगी। इसको दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु कोई ब्याज प्रोमोटर द्वारा आवंटियों को नहीं दिया जाएगा और न ही शिकायतकर्ता के अतिदेय पर कोई विलम्ब ब्याज लिया जायेगा। तदूनुसार बिन्दु संख्या-4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2
निस्तारण बिन्दु संख्या-2 इस आशय से विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? यदि नहीं तो क्या अनुतोष sya होगा ? यह वाद बिन्दु शिकायतकर्तागण के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्तागण पर है। शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि पक्षकारों के मध्य प्रश्नगत यूनिट के सम्बन्ध में अनुबन्ध दिनांक 20.06.2043 को निष्पादित कराया गया, जिसके अनुसार विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा 42 माह अर्थात् दिनांक 20.2.20I6 तक दिया जाना था, परन्तु विपक्षी द्वारा उक्त निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। विपक्षी द्वारा बिना किसी कारण के प्रश्नगत परियोजना स्थल पर हि कार्य बन्द करते हुए बायर्स को सूचना दी और धनराशि का भुगतान करने हेतु माँग पत्र प्रेषित किया। विपक्षी द्वारा ववन के अनुसार परियोजना स्थल पर मूल सुविधाओं का निर्माण कार्य नहीं किया गया है। विपक्षी द्वारा गलत रूप से विज्ञापन जारी करते हुए werd यूनिट आम्रपाली के नाम से बेची गयी, परन्तु वास्तव में कुछ और है। इन आधारों पर शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि मय 42 प्रतिशत ब्याज सहित वापस दिलाये जाने तथा अतिरिक्त 40 लाख रूपये की धनराशि क्षतिपूर्ति के रूप में दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है।
इस पर विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि परियोजना के Go- में कुल ia clad (टॉवर-4 से 48 तक) हैं, जिसमें 4,408 यूनिटस् हैं। उक्त टॉवर्स में से 42 cad का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है और अवशेष टॉवर्स का ओससी. प्राप्त किये जाने हेतु ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण के समक्ष आवेदन किया जा चुका है। जिन टॉवरों का ओ.सी. प्राप्त किया जा चुका है, उसमें यूनिटों का कब्जा दिया जा रहा है और वर्तमान में 4254 यूनिटों का कब्जा दिया जा चुका है। परियोजना के फेज़-2 में कुल 44 टॉवर्स (टॉवर-49 से 29 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और दिसम्बर, 2022 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना के फेज-3 में कुल 0 टॉवर्स (टॉवर-30 से 39 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा और सभी सुविधाओं सहित दिसम्बर, 2023 तक कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना में फिनिशिंग का कार्य तीव्र गति चल रहा है और जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड में शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। इन आधारों पर विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड सहित कब्जा दिये जाने हेतु समय प्रदान किये जाने का अनुरोध किया गया है। जहाँ तक केता द्वारा रिफण्ड के अनुरोध का प्रश्न है, इस विषय में रेरा अधिनियम के प्राविधानों को समग्र रूप से पढा जाना आवश्यक है ताकि सभी पक्षों के मत को दृष्टिगत रखते हुए एक संतुलित निर्णय लिया जा सकें। WI एक्ट की धारा ia () में प्राविधान है कि :- Section 78 (7) “If the promoter fails to complete or is unable to give posteusession of an apartment, plot or building,-
(a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or है (2) due to discontinuance of his. business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the Promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. इस प्रकार Sa को यह अधिकार है कि यदि उन्हें एग्रीमेंट के अनुरूप कब्जा नही मिलता तो वह अपनी जमा धनराशि को ब्याज सहित वापिस माँग सकते हैं अथवा प्रत्येक माह के विलम्ब के लिए ब्याज प्राप्त करते हुए परियोजना में बने रहें। रेरा अधिनियम की धारा 34 में रेरा के अन्य “फंग्शन्स” के साथ-साथ सब-क्लॉज (9 में "to ensure compliance of the obligations cast upon the promoters, the allottees and the real estate agents under this Act and the rules and regulations made thereunder" का भी उल्लेख & | इसी प्रकार धारा 32 में रियल इस्टेट सेक्टर के विकास हेतु अथॉरिटी के उत्तरदायित्यों में निम्न भी सम्मिलित हैं :-
“The Authority shall in order to facilitate the growth and promotion of a healthy, transparent, efficient and competitive real estate sector make recommendations to the appropriate Government of the competent authority, as the case may be, on,— (a)protection of interest of the allottees, promoter and real estate agent,....... (@Jany other issue that the Authority may think necessary for the promotion of the real estate sector.” 0 उक्त प्राविधानों से यह स्पष्ट है कि “रियल wee सेक्टर” के स्वस्थ विकास को सुनिश्चित करने के लिए इसके सभी wo होल्डर्स के हितों को समग्र रूप से देखते हुए समुचित निर्णय लेने का उत्तरदायित्व इस ऑथरिटी का है। इस कम में मा. बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा Re याचिका संख्या- 2737 /20i7 “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राणलि0 एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” जिसमें रेरा अधिनियम की वैद्यानिकता के सम्बंध में निर्णय दिया गया था, के प्रस्तर 424 में मा. उच्च न्यायालय द्वारा निम्न संवीक्षण किया :-
“The entire scheme of the RERA is required to be kept in mind. It is already submitted during the course of hearing that in many cases helpless allottees had approached consumer forum, High Courts, Apex Court in a given fact situation of the case. The courts have been passing orders by moulding reliefs by granting interest, compensation to the allottees, and issuing directions for timely completion of project, transit accommodation during completion of project, so on and so forth. Under RERA now this function is assigned to the authority, tribunal. An appeal lies to the High Court. Under one umbrella, under one regulation and one law all the issues are tried to be resolved. Provisions of Section 77 refers to power to adjudicate. A District Judge is conferred with the power to adjudicate compensation under Sections 72, 74, 768 and 49, A promoter could very well put up his case before the adjudicator who deals with the issues in the light of the fact situation of each case. Therefore, there should not be any apprehension that mechanically compensation would be awarded against a promoter on failure to complete the development work.”
उक्त से स्पष्ट है कि सभी पक्षों को सुनने के बाद, यद्यपि समय से इकाई न मिलने की दशा में आवंटी का अपनी धनराशि ब्याज ' सहित मांगने का अधिकार है, तथापि उक्त वर्णित संवीक्षा को देखते हुए अथॉरिटी, प्रकरण के समस्त तथ्यों, के आधार पर ‘by moulding reliefs by granting interest, compensation /0 the allottees, and issuing directions for timely completion of project, transit accommodation during completion of project, so on and so forth’ के अनुरूप आदेश पारित किए जा सकते हैं। i4 एलोटीज़ द्वारा धनराशि वापस किए जाने व परियोजना में बने रहने वाले एलोटीज के हितों में wget के प्रसंग में “चित्रा शर्मा बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया” (744 /2047) के निर्णय में मा. सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय के प्रस्तर 40 में निम्न ऑबजरवेशन किया है :-
"As we have stated earlier, an amount of Rs 750 crores is lying in deposit before this Court pursuant to the’ interim directions, on which interest has accrued. The home buyers have earnestly sought the issuance of interim directions to facilitate a pro-rata disbursement of this amount to those of the home buyers who seek a refund. "We are keenly conscious of the fact that the claim of the home buyers who seek a refund of monies deserves to be considered with empathy. Yet, having given our anxious consideration to the plea and on the balance, we are not inclined to accede to it for more than one reason. Firstly ee Secondly, the figures which have been made available presently, following the opening of the Web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession’ of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund." इसके अतिरिक्त रेरा के गठन के सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 // 2047 “बिकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य“ में दिनांक 23.07.2049 को परित आदेश के पृष्ठ Wea के प्रस्तर-420 में निम्नवत् उल्लेख किया हैः-
"It is apparent that RERA intends protection of home- buyers and aims at completion of the buildings. The buildings have to be completed, for that, we are required to pass orders. We have already assigned the task to NBCC_ for completion of buildings as _ the promoters/builders have failed to complete the building 02 32 within the time fixed and the time which could have been extended. Now, more than l0 years have passed and buyers were given the assurances that they would get flats within three years period by the promoter/builder. The maximum time fixed in RERA has also expired and extension could not have been beyond ] year." उक्तानुसार यह स्पष्ट किया गया है कि रेरा आवंटियों के हितों को संरक्षित करने के लिए है और उसका लक्ष्य यह है कि प्रोमोटर्स द्वारा बिल्डिंग के समस्त विकास कार्यों को पूर्ण कराते हुए गृहकेताओं को उनका आवास,/ फ्लैट मिल सके। तत्कमानुसार आदेश के पृष्ठ संख्या-255 के प्रस्तर-437 में निम्नवत् उल्लेख किया हैः- "The provisions of RERA are beneficial to the home buyers and are intended to insulate them from fraudulent action, ensures completion of the building and it is the duty of the court to protect and ensure the home buyers’interest and at the same time to hold them responsible for the duties enjoined upon them under the said statute. We are not absolving the home buyers from the discharge of their liability if any. At the same time, they have the right of enforcement of their right for compensation due to undue delay in completion of the project." :
उक्त आब्जर्वेशन में यह भी we किया गया है कि रेरा के प्राविधान गृहकेताओं के लिए लाभकारी हैं और किसी प्रकार के विश्वासघात होने से आवंटियों के हितों को संरक्षित करने के लिए हैं एवं बिल्डिंग को पूर्ण कराने हेतु निगरानी का कार्य रेरा का है और पक्षकारों के कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व अधिनियम में तय किये गये हैं। यह भी लाभ दिया गया है कि परियोजना विलम्ब- होने पर गृहकेताओं का यह अधिकार होगा कि वह विलम्ब के लिए परियोजना पूर्ण होने तक नियमानुसार ब्याज पा Ue | इसी के पश्चात् पुनः रेरा के सम्बन्ध में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-43 /2049 “पायनियर ada aes एंड इन्फास्ट्रक्चर लिमिटेड एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य” में दिनांक 09.08.20I9 को आदेश के पृष्ठ संख्या-86 के प्रस्तर-29 में निम्नवत् उल्लेख किया है:- कै? 43 "The object of RERA is to see that real estate projects come to fruition within the stated period and to see that allottees of such projects are not left in the lurch and are finally able to realise their dream of a home, or be paid compensation if such dream is shattered, or at least get back monies that they had advanced towards the project with interest. At the same time, recalcitrant allottees are not to be tolerated, as they must also perform their part of the bargain, namely, to pay instalments as and when they become due and payable."
उक्त आदेश में महत्वपूर्ण आब्जर्वेशन यह दिया गया है कि रेरा का लक्ष्य है कि वह अपनी निगरानी एवं देखरेख में प्रोमोटर्स द्वारा भू-सम्पदा परियोजना को एक निर्धारित अवधि में फलस्वरूप पूर्ण करा ली जाये, जिससे कि आवंटी अपने फ्लैटस पाने से वंचित न हो जाये और oe अपने सपनों का घर मिल सके, साथ ही साथ दुर्दम्य (Recalcitrant) आवंटियों को भी परियोजना पूर्ण कराने का सहयोग न करने में उत्तरदायित्व माना है। यह भी कहा गया है कि आवंटी अपने कर्तव्यों को सम्यक रूप से पूर्ण करें, मुख्य रूप से जैसे कि किश्तों का समय से भुगतान करना सुनिश्चित कर लें, जिससे कि परियोजना को पूर्ण किया जा aa | ऐसे में उपरोक्त माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित की गयी विधि व्यवस्था के अनुसार यह स्पष्ट है कि रेरा का मुख्य उद्देश्य, परियोजना को फलस्वरूप प्रोमोटर्स द्वारा पूर्ण कराना और आवंटियों द्वारा सम्यक रूप से अपनी किश्तों का भुगतान सुनिश्चित कर लिया जाना, जिससे कि परियोजना को निर्धारित अवधि में पूर्ण कराया जा सके। आवंटियों के हितों को संरक्षित करने के लिए परियोजना विलम्ब होने पर ब्याज का लाभ भी आवंटियों को देय होगा, परन्तु इससे पूर्व शिकायतकर्ता का यह भी उत्तरदायित्व होगा कि वह अपनी किश्तों का समय से भुगतान करें।
मा. उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा vad wel में उद्धरत “ऑबजरवेशनस्” एवं RI एक्ट की समग्र व्यवस्था को देखते हुए यह भी स्पष्ट है कि यदि विलम्ब के प्रत्येक मामले में धनराशि लौटाने का ही निर्णय लिया जाये तो निश्चय ही यह अधिनियम के “ऑबजेक्टिव” तथा “स्कीम” के अनुरूप न होगा। रिफण्ड का निर्णय लेते समय प्रत्येक मामले की “यूनीकनेस” प्रकरण के समस्त तथ्यों यथा “कन्सट्रक्शन” की स्थिति, कम्पलीशन की “टाईम asa’, Waleed के द्वारा ऑफर ऑफ पजेशन के “कमिटमेन्ट” की स्थिति, अन्य “स्टेक होल्डर्स”, विशेष रूप से परियोजना के साथ बने रहने वाले “एलॉटीज“ पर प्रभाव, “प्रस्तावित पजेशन डेट” है) 4 के विषय में “कन्सेन्सस्” आदि पर विचार किया जाना न्यायहित में होगा। चूंकि विपक्षी द्वारा दाखिल प्रतिवाद पत्र में कहा गया है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 23.07.20I9 को 632 यूनिटों को आम्रपाली ग्रुप को स्थानांतरित करने का निर्देश दिया। वर्तमान में कम्पनी यूनिटों को छांटने में लगी है, ताकि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश का अनुपालन किया जा सके।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय सिविल अपील संख्या-940 ,/“207 "बिकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य" में आई.ए. नं0--68486 /208, आई. ए. Ao—i09882 / 2020, आई.ए. नं0-444865 // 2020, आई.ए. नं0-453344 / 2049, aS. नं०-420307 /2020, आई.ए..._ नं०-423299 / 20220 एवं. आई.ए. नं0--.6397 /202 (लॉ रेसीडेन्सिया प्रोजेक्ट के सम्बन्ध में) में दिनांक 29.06.202 को पारित आदेश में उ0प्र0 Ww को आदेश पारित करने में wee नहीं लगाया है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में आम्रपाली ग्रुप की पूँजी निवेश के सापेक्ष देय 632 फ्लैटस् के लिए पृथक अनुश्रवण व्यवस्था के अतिरिक्त वर्तमांन प्रमोटर्स को ही अब परियोजना पूर्ण की जानी है। ऐसा आदेश दिये हैं। विपक्षी द्वारा कहा गया है कि परियोजना के Gore में कुल 44 टॉवर्स (टॉवर-49 से 29 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और दिसम्बर, 2022 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। परियोजना के फेज़-3 में कुल 0 टॉवर्स (टॉवर-30 से 39 तक) हैं, जिसमें फिनिशिंग कार्य चल रहा है और जून, 2023 + 6 माह ग्रेस पीरियड में यूनिट का कब्जा और सभी सुविधाओं सहित दिसम्बर, 2023 तक कब्जा दे दिया जायेगा। अत: यह उचित होगा कि शिकायतकर्तागण अपनी यूनिटस् का कब्जा लेने पर विचार करें| उसके बाद यूनिटस् के भविष्य में उपयोग के सम्बन्ध में वे स्वयं निर्णय ले सकते है। वैसे भी शिकायतकर्तागण द्वारा परियोजना में यूनिट के कब्जे हेतु धनराशि का निवेश किया गया था, जिसका उपयोग परियोजना के निर्माण में किया गया है। निश्चय ही परियोजना में बने रहने की दशा में एलॉटी को विलम्ब हेतु नियमानुसार ब्याज प्रोमोटर्स द्वारा देय होगा।
पत्रावली पर विपक्षी द्वारा दाखिल अनुबन्ध दिनांक 20.06.2043 के Wee 9(a) में निम्नलिखित उल्लेख किया गया है :- 49(०)... That the Developer shall complete the development/construction of the flat within 42 months Jrom the date of signing of agreement which may very for + 6 months. ay i5 अतः: उपरोक्तानुसार शिकायतकर्ता को अनुबन्ध निष्पादित किये जाने की तिथि 20.06.2043 से 42 + 6 माह a पीरियड) अर्थात् दिनांक 20.06.2047 तक फ्लैट का कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा उक्त निर्धारित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है। यह भी विचारणीय है कि प्रकरण दिनांक 23.07.2049 से दिनांक 29.06.2024 के बीच माननीय सर्वोच्च न्यायालय में विचारणीय रहा। इस दृष्टि से परियोजना अत्यधिक विलम्बित श्रेणी में नहीं कही जा सकती | इसके अतिरिक्त फोर्स मैज्योर के मद में विपक्षी कुल 68 दिन की अवधि के लिए लाभ पाने का अधिकारी है। (जैसा कि निस्तारण बिन्दु संख्या-4 में वर्णित 8) जहाँ तक किस अवधि तक का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बन्ध में सिविल अपील do 6649-50 /20i8 "सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल" में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि:-
"the period of Interest should close on April 20l6 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20l6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20l6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार sie. / सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को दिनांक 20.06.2047 + 68 दिन अर्थात् दिनांक 28.08.2047 से ओ.सी »/सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। जहाँ तक ब्याज देयता का प्रश्न है, माननीय बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा “नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रा.ललि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया” के वाद में अभिनिर्धारित किया गया है कि — "Section 8(l)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment १) 46
due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. " अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 Ww के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
इसके अतिरिक्त अन्य प्रकरणों के अनुबन्धों के wea-9(b) में परियोजना के विलम्ब की अवधि में 5,/- रूपये प्रतिवर्ग फुट प्रतिमाह की दर से धनराशि का प्राविधान रहता है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता धनराशि पाने का अधिकारी है, .रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा धनराशि प्राप्त की गयी है उसी दर से धनराशि देने का प्राविधान है। इस सम्बन्ध में भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2046 का प्रवर्तन दिनाक 04.05.2047 को हुआ, जिसके सम्बन्ध में उ0प्र0 आवास एवं शहरी नियोजन अनुभाग-2 की अधिसूचना दिनांक 03.05.2047 से Boro में रेगुलेटरी अथॉरिटी के रूप मे कार्य करने की स्वीकृति राज्यपाल, महोदय ने दिनांक 04.05.2047 से प्रदान की अर्थात् दिनांक 04.05.2077 से भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2046 का प्रवर्तन उ0प्र0 में प्रारम्भ हुआ अर्थात् उ0प्र0 में यह अधिनियम दिनांक 0.05.2047 से लागू हुआ है। इस अधिनियम का प्रवर्तन प्रोस्पेक्टिव है। अतः दिनांक 04.05.2047 से पूर्व की अवधि के लिए प्रतिकर की गणना आवंटन पत्र/अनुबन्ध के प्रावधानों के अन्तर्गत की जायेगी और दिनांक 04.05.2047 से आगे की अवधि के लिए ब्याज की गणना अधिनियम के प्रावधानों के अन्तर्गत की जायेगी | रेरा एक्ट की धारा 2(29) में प्राविधान है कि ) 7 (za) "interest" means the rates of interest payable by the promoter or the allottee, as the case may be. Explanation.—F or the purpose of this clause— (i) the rate of interest chargeable from the allottee by the promoter, in case of default, shall be equal to the rate of interest which the promoter shall be liable to pay the allottee, in case of default;
(ii) the interest payable by the promoter to the allottee shall be from the date the promoter received the amount or any part thereof till the date the amount or part thereof and interest thereon is refunded, and the interest payable by the allottee to the promoter shall be from the date the allottee defaults in payment to the promoter till the date it is paid; जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 7.020I8 को year (विनियमन और विकास) (विकय,पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय //पटटा विलेख के प्रारूप के WR 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण Events of default) परिभाषित है, जिसमें wR 9.20) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में add हेतु प्राविधानित है कि:- "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:"
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी wee 9.30) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई धनराशि अतिदेय हे 48 है, तो उस पर विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकता है। रेरा की धारा-2(2०)0) में भी यही ब्याज की परिभाषा दी गयी है। माननीय. उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा Re याचिका संख्या-सी-3289 /2020 “wal बिल्डवेल कंस्ट्रक्शन्स प्रा.लि. बनाम पूनम सूद एवं अन्य” में दिनांक 06.02.2020 को पारित निर्णय में यह उल्लेखित किया गया है किः-
Coming to the next ground of challenge to the impugned order by the petitioner's counsel that the interest awarded by respondent no.l (MCLR+l) is excessive, is also without any merit. It is an admitted fact to the petitioner that respondent no. had booked a flat and till the filing of the writ petition, the possession of the flat has not been given to him. The interest had been awarded in terms of Clause 9.2(ii) of the form of agreement contained in the U.P. Real Estate (Regulation and Development) (Agreement for Sale/Lease) Rules, 208. The respondent no.2 has given cogent reasons in the impugned order. Respondent no.2 has rightly placed reliance on Clause 9 sub-clause(ii) of the Rules, 208 which provides that in the event of default on the part of the promotor, the allottee shall have the option of terminating the agreement in which case the promoter shall be liable to refund the entire money paid by the allottee under any head whatsoever, towards the purchase of the flat at the rate of MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India + % unless provided otherwise under the Rules within forty-five days of receiving the termination notice. Learned counsel for the petitioner has failed to bring to our notice any Rule in the Rules, 206, providing otherwise. तत्पश्चात् Re याचिका derx-9i20/2020 “हैबीटेक इंफास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम उ0प्र0 राज्य सरकार एवं अन्य” में दिनांक 06.07.2020 को महत्वपूर्ण ऑब्जर्वेशन देते हुए यह उललेखित किया है किः-
On 2.09.209 the respondent authority directed the petitioner to refund the entire amount alongwith interest @ MCLR + % from the date of deposit till the date of order. Thereafter, recovery certificate and citation was issued on (0/60222020 5: and only on complaint D i9 under Section 8 authority proceeded to direct for the refund of the money alongwith payment of interest @ MCLR + %, which was in view of Real Estate (Regulation & Development) (Agreement to Sale) Regulations, 208 00... eseeseeeeseeees Thus power of refund of amount along with interest which has been provided under Section 8, with the authority was rightly exercised by it in the interest of justice. माननीय उच्च न्यायालय द्वारा भी रेरा प्राधिकरण के पीठ द्वारा नियमावली के अन्तर्गत MCLR+% की वार्षिक ब्याज दर से दिये गये आदेश को उचित एवं सही माना है। अतः उपरोकक्तानुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से यह अवधारित किया जा सकता है कि राज्य सरकार द्वारा नियमावली के अन्तर्गत निर्धारित की गयी ब्याज दर उचित एवं सही है। ब्याज दर को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के MCLRH प्रतिशत से सम्बद्ध करने के सिद्धान्त को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी स्वीकारा गया है और न्यायोचित ठहराया है।
ऐसे में उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गयी भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास), (विकय /पट्टा के लिए करार) नियमावली, 2048 के अन्तर्गत निर्धारित की गयी वार्षिक ब्याज दर MCLR+ प्रतिशत, जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अधिकतम ब्याज दर से | प्रतिशत ज्यादा है, उचित एवं सही है। तदनुसार बिन्दु संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। जहाँ तक शिकायतकर्तागण द्वारा क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का प्रश्न है, जिसका निर्धारण एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर द्वारा किया जाना है। अतः शिकायतकर्तागण आवश्यक साक्ष्यों सहित किराये के मद में क्षतिपूर्ति के निर्धारण हेतु अपने वाद एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के समक्ष योजित करने के लिए स्वतनत्र है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश L. प्रस्तुत प्रकरणों में विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्तागण द्वारा दी गयी धनराशि दिनांक 30.06.2023 के बाद 45 दिन में MCLR+% की ब्याज सहित रिफण्ड कर दें। )) (ग) 20 इस अवधि में शिकायतकर्तागण यदि कब्जा लेने का निर्णय लेते हैं, तो ऐसी स्थिति में :- विपक्षी, शिकायतकर्तागण को दिनांक 30.06.2023 तक ओ.सी/सी.सी. सहित फ्लैटस् का कब्जा दें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराना सुनिश्चित करें।
विपक्षी, शिकायतकर्ता (सतीश चन्द्र मित्तल) को दिनांक 28.08.2047 से ओ.सी. /सी.सी. प्राप्त किये जाने की तिथि अथवा कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक की अवधि पर शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं जमा धनराशि पर विलम्ब ब्याज के रूप में MCLRH प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की देय धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। फोर्स मैज्योर पीरियड को दृष्टिगत रखते हुए दिनांक 25.03.2020 से दिनांक 25.09.2020 तक परियोजना में हुए विलम्ब हेतु ब्याज की गणना नहीं की जायेगी। साथ ही इस अवधि में शिकायतकर्ता द्वारा यदि कोई अतिदेय (Over Dues) है, तो उस पर भी इस अवधि का ब्याज देय न होगा। अन्य शिकायतकर्तागण के प्रकरणों में उपरोक्तानुसार अनुबन्ध के अनुरूप विलम्ब ब्याज की गणना की जायेगी। विपक्षी को यह निर्देशित किया जाता है कि रेरा अधिनियम, 20I6 की धारा 2(2०)0) के अनुसार यदि रेरा लागू होने के बाद कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। अतः विलम्बित भुगतान पर शिकायतकर्ता द्वारा भी MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर से ब्याज देय होगा। यदि इससे अधिक दर से कोई धनराशि रेरा लागू होने के बाद आवंटी से विलम्ब हेतु ली गयी है, तो विलम्बित अवधि हेतु ब्याज -की धनराशि की भी उसी दर से गणना की जायेगी। इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बन्धित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस आदेश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। 9) 24
4. इस आदेश का उल्लघंन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। 5. यदि विपक्षी द्वारा इस आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, तो शिकायतकर्तागण को यह अधिकार होगा कि रेरा प्राधिकरण के माध्यम से अपने आदेश का कियान्वयन करा सकेगें। दिनांक न 46 2022 ae a) i (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण