Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Rajendra Prasad v. Swastik Multitrade Private Limited
Complaint No. LKO162/11/0188/2019
- Decision date
- 2026-07-14
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Lucknow
Source: UP RERA order
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Judgment text
E-Court उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण नवीन भवन, राज्य नियोजन संस्थान, कालाकाकर हाऊस, पुराना हैदराबाद, लखनऊ सुनवाई पीठ-न्यायनिर्णायक अधिकारी शिकायत सं0- LKOi62/44/0I88/2049 दिनांक 74-07-2026 Rajendra Prasad V/S_ Swastik Multitrade Private Limited आदेश पत्र मान. पीठ संख्या-02 द्वारा पारित आदेश दिनांक 3-0l-2024 G द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) नियमावली के नियम-24 में निहित शक्तियों के अर्न्तगत यूनिट की रजिस्ट्री व कब्जे की कार्यवाही कराने हेतु पत्रावली इस न्यायालय में दिनांक 0i-02-2024 को प्राप्त हुई | शिकायत वीडियो कॉनर्फेसिंग के माध्यम से सुनवाई हेतु प्रस्तुत की गयी। पुकार पर शिकायतकर्ता की ओर से विद्वान अधिवक्ता सौरभ मिश्रा उपस्थित हुए। विपक्षी की ओर से विद्वान अधिवक्ता आलोक कुमार पाण्डेय उपस्थित हुए। उभयपक्षों को मान. पीठ द्वारा धारा-34 के अधीन पारित आदेश 9-0-2020 के अनुपालन में रजिस्ट्री निष्पादित करते हुए कब्जा दिये जाने के बिन्दु पर सुना गया। मान. पीठ संख्या-02 (पूर्व में मान. पीठ-04) ने रेरा अधिनियम की धारा-34 के अधीन उभयपक्षों के सुनने के पश्चात दिनांक i9-0-2020 को निम्नवत् आदेश पारित कियाः- “विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश की तिथि से 60 दिन के अन्दर शिकायतकर्तागण से शेष विधिक धनराशि प्राप्त कर आवंटित इकाई की रजिस्ट्री कराकर कब्जा प्रदान करना सुनिश्चित करें|”
विपक्षी ने मान. पीठ द्वारा निर्धारित समय के अन्दर कब्जा प्रदान नहीं किया इसलिए शिकायतकर्ता द्वारा आदेश के क्रियान्वयन / निष्पादन हेतु मान. पीठ के समक्ष धारा-38/ 40(2) / 63 के अधीन आवेदन प्रस्तुत किया गया। उभयपक्षों को सुनने के पश्चात् मान. पीठ ने अपने आदेश दिनांक 3i-0:-2024 & द्वारा शिकायत रजिस्ट्री व कब्जें की कार्यवाही हेतु इस न्यायालय को संदर्भित किया है। शिकायतकर्ता को कब्जा दिये जाने के प्रश्न पर विपक्षी की ओर से इस न्यायालय के समक्ष आवेदन के साथ शपथ पत्र दिनांक 07-05-2024, 25-08-2025 & 28-03-2026 प्रस्तुत कर यह कथन किया गया कि विपक्षी द्वारा पूर्व में जिला पंचायत से अनुमोदन प्राप्त कर परियोजना का निर्माण कार्य किया जा रहा था बाद में परियोजना लखनऊ विकास प्राधिकरण के अधीन आ गयी | लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा दिनांक 6-09-20:5 को विकास कार्य की अनुमति प्रदान की wet) दिनांक 26-09-20॥7 को लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा मानचित्र स्वीकृत कर परमिट जारी किया गया। परियोजना का अनुमोदन करते समय लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा परियोजना के क्षेत्रफल में कटौती कर दी गयी। जिसके कारण परियोजना की भूमि कम हो गयी और इस कारण विपक्षी शिकायतकर्ता को कब्जा देने की स्थिति में नहीं हैं। संविदा ae धारा--32 व 56 pet of 6 E-Court के प्राविधानों के अनुसार संविदा का अनुपालन किया जाना सम्भव नहीं रह गया है। इसलिए शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत निष्पादन आवेदन खारिज किये जाने योग्य है। विपक्षी जमा धनराशि ब्याज सहित वापस करने के लिए तैयार है।
विपक्षी के शपथ पत्र के कथनों का खण्डन करते हुए शिकायतकर्ता ने यह कथन किया है कि मान. पीठ द्वारा निर्णय की तिथि से 60 दिन के अन्दर बकाया विधिक धनराशि प्राप्त कर शिकायतकर्ता के पक्ष में विक्रय पत्र निष्पादित कर कब्जा दिये जाने का निर्देश दिया गया था। शिकायतकर्ता द्वारा समस्त देय धनराशि का भुगतान किया जा चुका है। विपक्षी दुर्भावनापूर्वक जानबूझकर कब्जा प्रदान नहीं कर रहा है। विपक्षी द्वारा क्षेत्रफल में कटौती का जो आधार इन आवेदनों में लिया गया है, उस आधार का उल्लेख धारा-34 के अधीन कार्यवाही में प्रस्तुत लिखित कथन में भी किया गया था। लिखित कथन में विपक्षी ने ऐसा कोई कथन नहीं किया है कि परियोजना भूमि के क्षेत्रफल में कटौती के कारण वह कब्जा देने की स्थिति में नहीं है। विपक्षी ने अपने लिखित कथन में यह कहा है कि परियोजना का निर्माण कार्य पूर्ण है। विपक्षी कब्जा देने के लिए तैयार है। शिकायतकर्ता को निर्देशित किया जाये की वह बकाया धनराशि का भुगतान कर कब्जा प्राप्त करें। जिन बिन्दुओं को विपक्षी धारा-34 की कार्यवाही में उठा चुका है और जिस पर मान. पीठ द्वारा विचार किया जा चुका है, उन्ही बिन्दुओं को पुनः निष्पादन की कार्यवाही में नहीं उठाया जा सकता।
शिकायतकर्ता का यह भी कथन है कि विपक्षी ने रेश अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन किया है इसलिए उस पर शास्ति अधिरोपित की जानी चाहिए। मान. पीठ द्वारा कब्जे का आदेश पारित किया गया है इसलिए इस न्यायालय द्वारा जमा धनराशि वापसी का आदेश पारित नहीं किया जा सकता, क्योंकि निष्पादन न्यायालय Rar के पीछे नहीं जा सकता। डिक्री जिस रूप में है उसका उसी रूप में seer निष्पादन कराया जाना चाहिए। आदेश पारित होने के 06 वर्ष बाद भी विपक्षी ने शिकायतकर्ता को कब्जा प्राप्त नहीं कराया है। शिकायतकर्ता को पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 39-0-2020 के अनुपालन में कब्जा दिलाया जाय। अभिलेख क॑ अवलोकन से परिलक्षित होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट आवंटित करायी गयी। निर्धारित समय में कब्जा न दिये जाने पर शिकायतकर्ता ने Rr अधिनियम की asi के अधीन मान. पीठ संख्या-02 (पूर्व मान. पीठ संख्या-04) के समक्ष शिकायत प्रस्तुत किया। मान. पीठ संख्या-02 (पूर्व मान. पीठ संख्या-04) ने उभयपक्षों को सुनने के पश्चात दिनांक 39-0-2020 को निम्नवत् आदेश पारित किया — “विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश की तिथि से 60 दिन के अन्दर शिकायतकर्तागण से शेष विधिक धनराशि प्राप्त कर आवंटित इकाई की रजिस्ट्री कराकर कब्जा प्रदान करना सुनिश्चित He |” मा. पीठ के निर्णय एवं आदेश दिनांक 9-0-2020 के अवलोकन से प्रकट होता है कि विपक्षी द्वारा मान. पीठ के समक्ष यह तथ्य रखा गया था कि पूर्व में परियोजना जिला पंचायत से अनुमति प्राप्त कर विकसित की जा रही थी। बाद में लखनऊ विकास प्राधिकरण के सीमाक्षेत्र का विस्तार OF परियोजना प्राधिकरण की अधिकारिता में आ गयी। प्राधिकरण द्वारा मानचित्र समय भूमि की कटौती कर दी गयी। J Page 2 of 6
E-Court निर्णय के पृष्ठ-5 के प्रथम प्रस्तर के अवलोकन से यह प्रकट होता है कि मान. पीठ के समक्ष विपक्षी द्वारा यह निवेदन किया गया था कि शिकायतकर्ता को यह निर्देशित किया जाय कि वह क्रेता-विक्रेता अनुबंध पत्र के अनुसार विकास शुल्क तथा बाहरी विकास शुल्क अदा कर कब्जा प्राप्त करे। यदि शिकायतकर्ता अपनी जमा धनराशि वापस चाहतें हैं, तो अग्रिम धनराशि की कटौती कर शेष धनराशि प्राप्त कर सकते हैं। निर्णय के पृष्ठ-4 पर ऊपर से ग्यारवीं लाईन के अवलोकन से प्रकट होता है कि मान पीठ के समक्ष विपक्षी द्वारा यह भी कथन किया गया कि विपक्षी द्वारा परियोजना का विकास कार्य पूर्ण कर लिया गया है तथा शिकायतकर्ता को कब्जा प्रदान करने के लिए तैयार है। विपक्षी द्वारा मान. पीठ के समक्ष इस आशय का कथन किया गया कि परियोजना का विकास कार्य पूर्ण है तथा कब्जा प्रदान करने के लिए तैयार है। मान. पीठ ने लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा भूमि में कटौती किये जाने के तथ्य पर तथा विपक्षी द्वारा किये गये इस अभिकथन “fer परियोजना Raters हो बुकी है और विपक्षी कब्जा देने के लिए तैयार है” पर सम्यक विचार करते हुए शिकायतकर्ता के पक्ष में कब्जें का आदेश पारित किया है। मान. पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक i9-20-2020 के अनुसार विपक्षी द्वारा आदेश की तिथि से 60 दिन के अन्दर शिकायतकर्ता से शेष विधिक धनराशि प्राप्त कर रजिस्ट्री व कब्जें की कार्यवाही किया जाना था। शिकायतकर्ता के अनुसार मान. पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक i9-20-2020 के अनुपालन में उसने कई बार विपक्षी के कार्यालय से सम्पर्क कर बकाया धनराशि के संबंध में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास किया गया, परन्तु विपक्षी की ओर से बकाया धनराशि की कोई जानकारी नहीं दी गयी |
शिकायतकर्ता के उपरोक्त कथनों का खण्डन करते हुए विपक्षी की ओर से यह कहा गया कि मान. पीठ के आदेश दिनांक 9-:0-2020 के अनुपालन में विपक्षी ने दिनांक 23-]-2020 एवं iI-I2-2020 को पंजीकृत पत्र के माध्यम से अतिरिक्त शुल्क जमा करने हेतु शिकायतकर्ता को सम्पर्क किया, परन्तु शिकायतकर्ता द्वारा अतिरिक्त शुल्क का भुगतान नहीं किया गया। अपने कथन के समर्थन में उपरोक्त पत्रों की छाया प्रतियां दाखिल की गयी हैं। विपक्षी द्वारा प्रस्तुत इन दोनों ही पत्रों दिनांकित 23-4:-2020 एवं I-42-2020 के अवलोकन से प्रकट होता है कि इन दोनों ही पत्रों में शिकायतकर्ता द्वारा देय किसी भी धनराशि का उल्लेख नहीं किया गया हैं। शिकायतकर्ता को कितना अतिरिक्त शुल्क जमा करना है यह बताने का विधिक दायित्व विपक्षी का ही है। यदि वास्तव में विपक्षी मान. पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 9-0-2020 का अनुपालन करना चाहता तो वह इन पत्रों में शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का विनिर्दिष्ट रूप से उल्लेख करता। इन दोनों ही पत्रों को विधिक रूप से बकाया धनराशि के संबंध में मांग पत्र नहीं कहा जा सकता। मान. पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 9-0-2020 के अनुपालन में विपक्षी के लिए यह आवश्यक था कि उसके द्वारा आदेश की तिथि से co दिन के अन्दर शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का विनिर्दिष्ट रूप से उल्लेख करते हुए मांग पत्र प्रेषित eo all Page 3 of 6 E-Court
उभयपक्षों को सुनने तथा सुनवाई के दौरान प्रारम्भ से लेकर अब तक के विपक्षी के आचरण से यह प्रतीत होता है कि विपक्षी वास्तव में बाहयेतर कारणों (Extraneous Reasons) से जानबूझकर मान. पीठ द्वारा पारित आदेश का अनुपालन नहीं करना चाहता है, क्योंकि विपक्षी द्वारा इस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किये गये शपथ पत्र दिनांक 07-05-2024 में कब्जा न दे पाने का जो आधार बताया गया है वह आधार शिकायतकर्ता द्वारा शिकायत प्रस्तुत किये जाने के पूर्व उत्पन्न होने वाला आधार है। विपक्षी के अनुसार लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा भूमि में कटौती कर दिये जाने के कारण विपक्षी के पास जमीन शेष नहीं बची है इसलिए वह शिकायतकर्ता को कब्जा नहीं दे सकता। शिकायतकर्ता यदि चाहे तो जमा धनराशि ब्याज सहित वापस प्राप्त कर सकता है। उल्लेखनीय है कि क्षेत्रफल में कमी से सम्बन्धित अभिकथन ora के अधीन शिकायत की सुनवाई के दौरान विपक्षी द्वारा पहले भी मान. पीठ के समक्ष किया जा चुका है। धारा-3। के अधीन शिकायत की सुनवाई के समय विपक्षी ने मान. पीठ के समक्ष जो लिखित कथन प्रस्तुत किया है उस लिखित कथन के प्रस्तर-45 में विपक्षी ने यह स्वीकार किया है कि परियोजना का विकास कार्य पूर्ण कर लिया गया है तथा वह शिकायतकर्ता को कब्जा प्रदान करने के लिए तैयार है।
स्वयं विपक्षी के शपथ पत्र दिनांक 07-05-2024 के अनुसार लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा दिनांक 26-09-20I7 को मानचित्र स्वीकृत कर विपक्षी के पक्ष में परमिट जारी किया गया। इसका अभिप्राय यह है कि शिकायतकर्ता द्वारा मान. पीठ के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करने के 02 वर्ष पूर्व ही लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा भूमि में कथित कटौती की जा चुकी थी, भूमि में इस कथित कटौती के पश्चात् विपक्षी द्वारा मान. पीठ के समक्ष अपने लिखित कथन में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि परियोजना का विकास कार्य पूर्ण कर लिया गया है तथा वह शिकायतकर्ता को कब्जा प्रदान करने के लिए तैयार है। यदि लिखित कथन प्रस्तुत करते समय विपक्षी की परियोजना पूर्ण हो चुकी थी और वह शिकायतकर्ता को कब्जा देने के लिए तैयार था, तो उसके पश्चात विपक्षी किस आधार पर अब यह कह सकता है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा भूमि में कटौती कर दिये जाने के कारण वह शिकायतकर्ता को कब्जा नहीं दे सकता। स्वीकृत रूप से लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा विपक्षी के लिखित कथन दाखिल करने के पश्चात् भूमि में कोई कटौती नहीं गयी है। विपक्षी का कथन है कि संविदा अधिनियम की धारा-32 व 56 के प्राविधानों के अनुसार इस मामले में भूमि में कटौती के कारण आदेश दिनांक 9-:0-2020 का निष्पादन असम्भव हो गया है। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि विपक्षी ने ana के अधीन कार्यवाही के दौरान अपने लिखित कथन में ऐसा कोई अभिवचन नहीं किया कि संविदा अधिनियम की arse व 56 के प्राविधानों के अनुसार कब्जा देना असम्भव हो गया है। इसके विपरीत लिखित कथन में विपक्षी ने स्पष्ट कथन किया है कि परियोजना का निर्माण कार्य पूर्ण है और वह कब्जा देने के लिए तैयार है।
विपक्षी द्वारा मान. पीठ के आदेश दिनांक i9-0-2020 का अनुपालन न किये जाने पर शिकायतकर्ता ने कल 05-94-2023 को धारा-38 /40,/63 के अधीन निष्पादन» कियान्वयन आवेदन प्रस्तुत इस fears आवेदन को खारिज किये जाने की Page 4 of 6 E-Court प्रार्थना के साथ विपक्षी द्वारा एक आवेदन दिनांकित 30-2-2023 प्रस्तुत किया गया, जिसमें यह कथन किया गया है कि मान.पीठ द्वारा पारित आदेश के अनुपालन में वह शिकायतकर्ता से विभिन्न प्रभारों के मद में अवशेष धनराशि प्राप्त करने का अधिकारी है। शिकायतकर्ता को आदेश दिनांक 9-0-2020 की पूर्ण जानकारी है परन्तु शिकायतकर्ता स्वयं मान. पीठ के आदेश के अनुपालन में अवशेष धनराशि का भुगतान कर कब्जा नहीं ले रहा हैं। इसलिए निष्पादन आवेदन खारिज किया जाना चाहिए। इस आवेदन में भी विपक्षी ने संविदा अधिनियम की धारा-32 व 56 का कोई उल्लेख नहीं किया है। धारा-24 के अधीन रजिस्ट्री व कब्जे की कार्यवाही के दौरान विपक्षी द्वारा आवेदन दिनांकित 07-05-2024 के साथ संलग्न शपथ-पत्र में भी विपक्षी ने संविदा अधिनियम की धारा-32 व 56 के आधार पर निष्पादन की कार्यवाही असम्भव होने का कोई कथन नहीं किया है। दिनांक 25-08-2025 को प्रस्तुत शपथ-पत्र में सर्वप्रथम विपक्षी की ओर से कथन किया गया कि संविदा अधिनियम की धारा-32 व 56 के प्राविधानों के अनुसार निष्पादन असम्भव हो जाने के कारण संविदा शून्य हो गयी है। प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या इस मामले में संविदा अधिनियम की धारा-32 व 56 के प्राविधानों के आधार पर आदेश दिनांक 9-0-2020 का निष्पादन कराया जाना असम्भव हो गया है?
इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि धारा-32 व 56 के प्राविधान इस मामले में लागू नहीं होते। इस मामले में विपक्षी धारा-34 के अधीन प्रस्तुत अपने प्रतिवाद पत्र में स्पष्ट रूप से स्वीकार कर चुका है कि परियोजना का निर्माण कार्य पूर्ण है और वह कब्जा देने के लिए तैयार है। इसलिए विपक्षी अब निष्पादन की कार्यवाही में यह नहीं कह सकता कि भूमि में कटौती के कारण कब्जा दिया जाना असम्भव हो गया है क्योंकि विपक्षी विबन्ध के सिद्धांत (Principle of estoppel) के आधार पर ऐसा कहने से विवर्जित है। विपक्षी द्वारा लिया गया यह तर्क पश्चातवर्ती विचार (After thought) का परिणाम प्रतीत होता है। विधि में पश्चातवर्ती विचार विश्वसनीय व स्वीकार्य नहीं होते। विपक्षी की ओर से प्रस्तुत किया गया असम्भवता का तर्क मात्र मान. पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 9-0-2020 के निष्पादन को विफल करने के उद्देश्य से पश्चातवर्ती विचार के परिणामस्वरूप दिया गया तर्क प्रतीत होता है। विपक्षी की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि शिकायतकर्ता ने विपक्षी द्वारा प्रस्तुत शपथ-पत्र के कथनों का कोई खण्डन नहीं किया है। इसलिए शपथ-पत्र में कथित तथ्यों को स्वीकार माना जाना चाहिए। विपक्षी के इस तर्क के प्रकाश में यह उल्लेखनीय है कि शपफ्थ-पत्र में संविदा अधिनियम की धारा--32 व धारा-56 का उल्लेख करते हुए कहा गया कि क्षेत्रफल में कटौती के कारण आदेश का निष्पादन असम्भव हो गया है। इस शपथ-पत्र में विपक्षी ने कोई नया तथ्य उल्लिखित नही किया है। क्षेत्रफल में कटौती का तथ्य विपक्षी ने अपने प्रतिवाद पत्र में अभिकथित किया था, जिस पर मान. पीठ द्वारा विचार करते हुए निष्कर्ष दिया जा चुका है। इसलिए कटौती के तथ्य का शिकायतकर्ता द्वारा पुनः खण्डन किये जाने
का कोई औचित्य नहीं रहा जाता है। जहां तक BE व धारा-56 के Vy का Page 5 of 6 ——— सम्बन्ध है तो इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि विधिक प्राविधानों का अभिवचनों में खण्डन किया जाना अपेक्षित नही होता। मान. पीठ द्वारा पत्रावली इस न्यायालय को रजिस्ट्री व कब्जे की कार्यवाही हेतु संदर्भित की गयी है। विपक्षी शिकायतकर्ता को बकाया धनराशि की जानकारी भी नहीं दे रहा है और उल्टा शिकायतकर्ता पर ही मान. पीठ के आदेश का अनुपालन न करने का आरोप लगा रहा है। जब विपक्षी ने शिकायतकर्ता को बकाया धनराशि की जानकारी ही नहीं दी गयी तो शिकायतकर्ता किस आधार पर भुगतान कर सकता। विपक्षी द्वारा जमा धनराशि वापस करने का कथन किया जा रहा है, जबकि विपक्षी को पूरी तरह पता है कि मान. पीठ द्वारा शिकायतकर्ता के पक्ष में रजिस्ट्री व कब्जें का आदेश दिया गया है। उपरोक्त परिस्थितियों में विपक्षी को निर्देशित किया जाता है कि वह 07 दिन के अन्दर शिकायतकर्ता द्वारा देय धनराशि का विनिर्दिष्ट रूप से उल्लेख करते हुए मांग पत्र शिकायतकर्ता को प्राप्त कराये। मांग पत्र की एक प्रति इस न्यायालय के पोर्टल पर भी दाखिल करें। शिकायतकर्ता को निर्देशित किया गया कि वह मांग पत्र प्राप्त होने के 07 दिन के अन्दर बकाया धनराशि का भुगतान कर समुचित स्टाम्प, पंजीयन शुल्क तथा प्रकीर्ण व्यय के साथ रजिस्ट्री व कब्जें की कार्यवाही के लिए विपक्षी के कार्यालय से सम्पर्क He शिकायतकर्ता द्वारा बकाया धनराशि का भुगतान कर विपक्षी के कार्यालय पर सम्पर्क किये जाने के 07 दिन के अन्दर विपक्षी विक्रय विलेख की औपचारिकताएं पूर्ण कर विक्रय विलेख निष्पादित व पंजीकृत कराकर शिकायतकर्ता को भौतिक कब्जा प्राप्त कराकर विक्रय पत्र व कब्जा पत्र की प्रति न्यायालय में प्रस्तुत करे।
विपक्षी को सतर्क किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता के पक्ष में रजिस्ट्री निष्पादित कर कब्जा प्रदान कराते हुए निष्पादन की कार्यवाही को पूर्ण नहीं किया जाता है तो शिकायतकर्ता की शास्ति की प्रार्थना पर विचार करते हुए रेरा अधिनियम की धारा--63 के अधीन शास्ति अधिरोपित करने की कार्यवाही भी प्रारम्भ की जायेगी। पत्रावली सुनवाई हेतु दिनांक 2-08-2026 को पेश किया जाय। ly 426६ 42 (हरीश त्रिपाठी) CA न्यायनिर्णायक अधिकारी Page 6 of 6