Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Raghunandan Singh Rathore v. U.P. Awas Evam Vikas Parishad
Complaint No. LKO162/08/80457/2021
- Decision date
- 2026-07-24
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Lucknow
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
E-Court उ.प्र. भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण नवीन भवन, राज्य नियोजन संस्थान, कालाकाकर हाऊस, पुराना हैदराबाद, लखनऊ सुनवाई पीठ--न्यायनिर्णायक अधिकारी शिकायत सं0- LKO762/08/80457/202 सुनवाई तिथि: 24-07-2026 Raghunandan Singh Rathore V/S U.P. Awas Evam Vikas Parishad आदेश पत्र शिकायत वीडियो कान्फ्रेसिंग के माध्यम से सुनवाई हेतु प्रस्तुत की गयी। पुकार पर शिकायतकर्ता की ओर से विद्वान अधिवक्ता श्री कैलाश पाण्डेय उपस्थित | विपक्षी अनुपस्थित। विपक्षी पिछली 03 तिथियों से अनुपस्थित है। पूर्व में विपक्षी द्वारा कब्जा er /मांगपत्र दाखिल किया गया था। कब्जा प्रस्ताव / मांगपत्र के विरूद्ध शिकायतकर्ता द्वारा आपत्ति प्रस्तुत की गई। विपक्षी द्वारा संशोधित प्रदेशन पत्र जारी किया | शिकायतकर्ता ने संशोधित प्रदेशन पत्र को विधिविरूद्ध बताया। संशोधित प्रदेशन पत्र में 43.5 प्रतिशत की दर से विलम्ब ब्याज की गणना की गयी है, जो Rr अधिनियम » नियमावली के प्राविधानों एवं मा. पीठ द्वारा पारित आदेश के अनुरूप नहीं है। मा. पीठ द्वारा पारित आदेश में Mcir+i6 की दर से ब्याज गणना का आदेश किया गया है। यूनिट का विक्रय मूल्य रू. 30.00 लाख बताया गया है, जिस पर ig प्रतिशत की दर से est भी लगाया गया है। शिकायतकर्ता की आपत्ति के आधार पर विपक्षी को आदेशित किया गया कि वह स्पष्ट करें कि उसके द्वारा रेरा अधिनियम , नियमावली तथा मा. पीठ द्वारा दिए गये निर्देशों के विरूद्ध 43.5 प्रतिशत की दर से ब्याज किस आधार पर मांगा जा रहा है। यह भी स्पष्ट करने हेतु निर्देशित किया गया कि esta दर ie प्रतिशत किस आधार पर लगाई जा रही है |
दिनांक 45.40.2025 को विपक्षी को निर्देशित किया गया कि 40 दिन के अन्दर संशोधित प्रदेशन पत्र में अधिरोपित ब्याज की दर तथा GST की दर पर स्पष्टीकरण रेरा पोर्टल पर अपलोड कर उसकी एक प्रति ईमेल के माध्यम से शिकायतकर्ता को साझा करें। उराके उपरांत उसकी एक भौतिक प्रति रेरा मुख्यालय में जमा कराना सुनिश्चित करें। दिनांक 45.40.2025 के पश्चात दिनांक 03.42.2025, 30.42.2025, 29.04.2026, 43.02. 2026, 06.03.2026, 25.03.2026, 22.04.2026, 05.05.2026, 9.05.2026, 48.06.2026 की तिथियां नियत की गई परन्तु विपक्षी द्वारा आदेश का अनुपालन नहीं किया गया। दिनांक 48.03.2026 को विपक्षी को पुनः निर्देशित किया गया कि प्रदेशन पत्र के विरूद्ध शिकायतकर्ता की आपत्ति पर अपना स्पष्टीकरण 07 दिन के अन्दर मदवार ब्रेकअप के साथ रेरा पोर्टल पर अपलोड कर उसकी भौतिक प्रति कार्यालय में प्राप्त करायें। परन्तु विपक्षी न तो उपस्थित है और न ही उसकी ओर से आदेश के अनुपालन में कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया गया है। विपक्षी ने अपनी अनुपालन आख्या दिनांकित 0.06.2025 में इस न्यायालय की अधिकारिता को चुनौती दिया है। वियक्षी के अनुसार धारा-3॥ के अधीन प्राधिकरण द्वारा Paka शिकायत का निष्पादन न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा नहीं किया जा सकता। विपक्षी 37 E-Court का यह भी तर्क है कि प्राधिकरण रेरा अधिनियम की ares के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी को प्रत्यायोजन नहीं कर सकता। अधिकारिता को दी गई चुनौती के आधार पर विपक्षी न तो उपस्थित हो रहा है और न ही न्यायालय के आदेशों का अनुपालन कर रहा है।
अधिकारिता के सम्बन्ध में विधिक स्थिति को स्पष्ट किया जाना आवश्यक है। रेरा अधिनियम की oet के अधीन प्राधिकरण को सशक्त किया गया है कि वह, धारा-85 के अधीन विनियम बनाने की शक्ति को छोड़कर, अपनी किसी भी शक्ति अथवा कृत्यों को प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य व्यक्ति को प्रत्यायोजित कर सकता है। सिविल प्रकिया संहिता की धारा--38 के अनुसार डिकी का निष्पादन डिकी को पारित करने वाले न्यायालय द्वारा अथवा जिस न्यायालय को डिकी निष्पादन हेतु अंतरित गई है, SUG द्वारा किया जा सकेगा। इसका अभिप्राय यह है कि डिकी का निष्पादन डिकी को पारित करने वाले न्यायालय द्वारा किया जा सकता है और यदि डिकी पारित करने वाले न्यायालय ने डिकी को निष्पादन हेतु अन्य न्यायालय को अंतरित कर दिया है, तो अन्य न्यायालय द्वारा भी Sat का निष्पादन कराया जा सकता है। इसी प्रकार सिविल प्रकिया संहिता की धारा-42 के प्राविधानों के अनुसार जिस न्यायालय को feat निष्पादन हेतु अंतरित की गई है डिकी के निष्पादन में उसे भी वहीं शविततियां प्राप्त होंगी जो डिकी को पारित करने वाले न्यायालय को प्राप्त होंगी और यह माना जायेगा कि fear उसी न्यायालय (अंतरिती न्यायालय) ने पारित किया है। धारा-8 के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए प्राधिकरण द्वारा निष्पादन की कार्यवाही का कार्य न्यायनिर्णायक अधिकारी को प्रत्यायोजित किया गया है। मा. बाम्बे उच्च न्यायालय ने Marvel Landmarks Pvt. Ltd. Vs State of Maharastra writ petition no. 2424/2024 निर्णीत दिनांक 07-04-2026 के मामले में प्राधिकरण द्वारा धारा-84 के अधीन न्यायनिर्णायक अधिकारी को किये गये प्रत्यायोजन को विधिमान्य माना है।
मा. उच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन शिकायत से सम्बन्धित मामले में प्राधिकरण द्वारा धारा-8। के अधीन किये गये प्रत्यायोजन के आधार पर न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा ARI-3 के अधीन जमा धनराशि वापसी से सम्बन्धित शिकायत का निस्तारण किया गया था। विपक्षी प्रोमोटर द्वारा आदेश का अनुपालन न किये जाने पर शिकायतकर्ता द्वारा निष्पादन आवेदन प्रस्तुत किया गया था। निष्पादन आवेदन के आधार पर न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा धनराशि के वसूली हेतु वसूली प्रमाण-पत्र जारी किया गया था| विपक्षी प्रोमोटर ert asi के अधीन पारित आदेश एवं उसके परिणामस्वरूप जारी वसूली प्रमाण-पत्र के आदेश को मा. उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी गई थी। विपक्षी की चुनौती का मुख्य आधार यह था कि मा. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा न्यूटेक प्रोमोटर्स एवं डेवलपर्स के मामले में यह स्पष्ट अवधारित किया जा चुका है कि न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा जमा धनराशि वापसी का आदेश पारित नहीं किया जा सकता। यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया था कि ater के अधीन शिकायत के निस्तारण की शक्ति का प्रत्यायोजन न्यायनिर्णायक अधिकारी को नहीं किया जा सकता | मा. बाम्बे उच्च न्यायालय ने रेरा अधिनियम की धारा--28, 34, 74, 8i एवं मा. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ew प्रोमोटर्स एवं डेवलपर्स के मामले में पारित निर्णय पर व्यापक विचार एवं विश्लेषण करने के उपरांत न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा TAR के आधार पर धारा-3 के अधीन पारित आदेश व उसके निष्पादन हेतु ज़ारी वसूली प्रमाण-पत्र को वैध 38 E-Court SMT! मा. उच्च न्यायालय ने निर्णय के प्रस्तर-42 में विधिक स्थिति को स्पष्ट किया है। निर्णय का प्रस्तर-42 Pree ss
“42. Therefore, what an Adjudicating Officer alone is empowered by law to do, with a careful choice of who can be an Adjudicating Officer (a judicial officer), other Officers of RERA (who are not judicially trained) cannot be expected to do. On the other hand, a Judicially trained Adjudicating Officer, in whose domain a quasi-judicial adjudication would lie, would be able to undertake the lesser task of conducting a summary procedure to decide a refund. Therefore, delegation of the exercise of refund power to the Adjudicating Officer is not contrary to the scheme of the Act. It is the extrapolation of Section 77 “as prayed” that was commented upon by the Supreme Court, making it clear that any other manner of delegation can always be judicially reviewed when such a delegation is made.” उपरोक्त विधिक प्राविधानों, मा. सर्वोच्च न्यायालय एवं मा. बाम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णयों में प्रतिपादित विधिक स्थिति के प्रकाश में विपक्षी द्वारा इस न्यायालय की अधिकारिता को दी गई चुनौती में कोई विधिक बल प्रतीत नहीं होता | प्राधिकरण द्वारा धारा-84 के अधीन अपनी शक्तियों के किये गये प्रत्यायोजन के आधार पर इस न्यायालय द्वारा विधि के अनुसार निष्पादन की कार्यवाही की जा सकती है। विपक्षी को अंतिम अक्सर प्रदान करते हुए पुनः निर्देशित किया जाता है कि प्रदेशन पत्र के विरुद्ध शिकायतकर्ता की आपत्ति पर अपना स्पष्टीकरण 07 दिन के अन्दर मदवार ब्रेकअप के साथ रेरा पोर्टल पर अपलोड कर उसकी भौतिक प्रति कार्यालय में प्राप्त कराना सुनिश्चिः करें।
यदि विपक्षी द्वारा शिकायत्तकर्ता की आपत्ति के विरूद्ध कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया जाता तो शिकायतकर्ता द्वारा की गई आपत्तियों को सही मानते हुए तद्नुसार निष्पादन की अग्रिम कार्यवाही की जायेगी। पत्रावली सुनवाई हेतु दिनांक 25-08-2026 को पेश हो। ta é न्यायनिर्णायक 39