Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Yasir Husain Khan v. La Residentia Developers Private Limited
Complaint No. 9201819750
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- Counsel
- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
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Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष | कम सं० | शिकायत vo | _ शिकायतकर्ता | | 4 | 920:89750 | यासिर हुसैन 2 4220827774 | नीरज शम 3 42204827249 | नीरज राठौर बनाम ला रेजीडेंसिया डेवलपर्स प्रा.लि. आदेश 24.04.2049 शिकायतकर्ता ake हुसैन के साथ 2 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा तीन शिकायतें विपक्षीगण के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें La Residentia परियोजना से सम्बंधित है। अत: एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत Ho 920:8:9750 यासिर हुसैन अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत वाद शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध जमा धनराशि वापस दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी की परियोजना La Residentia ¥ फ्लैट सं. टी-29,/ 4906 बुक कराया था और अंकन 37,42,200 /- रूपये की धनराशि विपक्षी को अदा की गयी। यूनिट का कब्जा दिनांक 46.04.209 को दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नहीं दिया गया। निर्माण स्थल पर कोई निर्माण कार्य नही हो रहा है, काफी समय से निर्माण बंद है और विपक्षी द्वारा सबवेंशन की feet भी अदा नही की जा रही हैं। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी से जमा धनराशि दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। yO शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में छायाप्रति त्रिपक्षीय अनुबन्ध, खाता विवरण, डिमांड लैटर, जमा धनराशि की रसीदें, दाखिल की गयीं हैं।
विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि परियोजना आम्रपाली ग्रुप की है, जिसका उल्लेख अनुबन्ध में किया गया है और शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी ला रेजीडेंसिया डेवलपर्स से यूनिट कय की गयी है, इस प्रकार विपक्षी द्वारा धोखाघडी का कार्य किया गया है। अनुबन्ध दिनांक 44. 6.2045 के अनुसार यूनिट का कब्जा 42+6 अर्थात 48 माह में दिया जाना था, अनुबन्ध के अनुसार विपक्षी द्वारा 24 माह का ई.एम.आई का भुगतान किया गया है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। शिकायतकर्तागण की सामूहिक शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए निम्न बिन्दु विचारणीय है :- 4... क्या अनुबन्ध में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने के कारण इस पीठ को सुनवाई का क्षेत्राधिकार प्राप्त नही है? 2... क्या शिकायतकर्ता जमा धनराशि को वापस पाने का अधिकारी है? 3. क्या शिकायतकर्ता विलंबित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? निस्तारण बिन्दु सं० 4 विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आर्बट्रेशन का Fest है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध की बिन्दु 35 में कथन किया गया है कि :-
"४ की or any disputes/disagreements/grivances arising out of in connections with or in relation to this booking and this allotment shall tried to be mutually discussed and settle between the paritcs. However if the disputes could not be settled amicably then the Allottees undertakes to refer its dispute firstly to the Consummer Grivance Redressal Cell (CGRC) of CREDAI Western U.P. The cell has been set up by DREDAI Western U.P. and operates > from Gaur Biz Park, Plot-l, Abhay Khand-II Indirapuram Ghaziabad. The cell shall work as a fair and impartial arbitrator as per the Indian Arbitration and Conciliation Act, 996 or any amendment thereof accordingly. Incase of disagreement with the decision of Cell, the dispute shall be forwarded to High Level Committee of CREDAI Western U.P. Whose decision shall be final and binding on both the parties in this regard. " जिससे fea है कि अनुबन्ध के अनुसार दोनो पक्षों के मध्य किसी भी विवाद का निस्तारण परस्पर सहमति से Indian Arbitration and Conciliation Act 996 के अन्तर्गत किया जायेगा, जिसका क्षेत्राधिकार दिल्ली होगा। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बूज एलन व हेमिल्टन इंक आदि बनाम एस.बी.आई. होम फाईनेंस लि0 व अन्य गें अभिनिर्धारित किया गया है कि +-
" all aspects of arbritrability have to be decided by the court seized of the suit, and cannot be left to the decision of the Arbitrator. Even if an arbitration agreement exists and the dispute is covered therein, the court will refuse to refer the parties to arbitration - if the subject matter of the suit is capable of adjucdication only by a public forum or the relief clamied can only be granted by a special court or Tribunal." इसके अतिरिक्त ए.अय्यास्वाभी बनाम ए परमाशिवम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " there are classes of disputes that fall within the exclusive domain of special bodies created under legislation that confers jurisdiction ot the exclusion of ordinary civil courts. Such disputes would not then be capable of resolution by arbitration," साथ माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा भी यह निर्णीत किया गया है कि
The NCDRC finally held that in light of the overall architecture of the CPA and Court-evolved jurisprudence, amended sub-section (I) of Section 8 cannot be construed as a mandate to the Consumer Fora, constituted under the CPA, to refer the parties to arbitration in terms of the Arbitration Agreement. the principle that - jurisdiction of specially constituted judicial authorities cannot be ousted by a blanket mandate to refer disputes to arbitration under the umbrella of Section 8, A&C Act. On the ground level, it provides relief to a party to avail special remedies available under a statute, despite presence of an arbitration clause. This serves to protect parties from lop- oO) sided and sparely-negotiable standard form agreements. From another angle, parties will no longer be mandated to adopt the relatively long and expensive process of arbitration - in disputes arising under specific statutes having specific dispute redressal mechanisms. This judgment could also be used to interpret Section 79 of the Real Estate (Regulation and Development) Act 206 (“Real Estate Act”) which bars the jurisdiction of civil courts in matters involving real estate. The NCDRC applied the reasoning in Ayyaswamy to conclude that the same principles could apply to cases under the Real Estate Act, which provides a special mechanism for resolution of disputes between buyers and builders.
माननीय उच्चतम न्यायालय एवं माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नहीं किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये हैं और दीवानी न्यायालय के अतिरिक्त क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बट्रिटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि yaa विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 20:6 की धारा 79, आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल wee अधिनियम के तहत उक्त मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं बिल्डरों के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु to 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु सं० 2 व 3 यह दोनो वाद बिन्दु परस्पर सम्बंधित होने के कारण इनका निस्तारण एक साथ किया जाना उचित प्रतीत होता है।
शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया है कि विपक्षी द्वारा जनवरी 2049 तक कब्जा दिया जाना था, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया है, जिस कारण जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है, जिस पर विपक्षी का कहना है कि अनुबन्ध के अनुसार कब्जा आवंटन पत्र निष्पादित होने से 42+6 माह अर्थात 48 माह में दिया जाना था, जिस कारण कब्जे की तिथि 23.0.20I9 है, जबकि शिकायतकर्ता द्वारा अनुबधित अवधि से पूर्व शिकायत योजित की गयी है, जिस कारण स्पष्ट है कि शिकायत अपरिपक्व है, और वर्तमान में पोषणीय नहीं है। विपक्षी की ओर से कहा गया कि यदि शिकायतकर्ता अपना आवंटन निरस्त कराकर अपनी जमा धनराशि वापस चाहता है तो इस सम्बंध में अनुबन्ध के प्रस्तर 0 A उपबन्ध है कि :- " That 0% of the total price of the unit shall be treated to tbe the Earnest Money, In the event of failure of the allottee to pay the installments in the time as agreed herein, the Developer shall have the right to terminate this agreement and forfeit the earnest money together with any interest on delayed installments/payment due or payable out of the amounts paid by him and the allotments of the flat shall stand cancelled."
जिसके अनुसार शिकायतकर्ता अपनी जमा धनराशि वापस ले सकता है। यह स्पष्ट है कि अभी अनुबंधित अवधि शेष है और शिकायतकर्ता अपनी जमा धनराशि वापस चाहता है, विपक्षी अनुबन्ध के अनुसार धनराशि वापस करने को तैयार है, शिकायतकर्ता के अनुसार यूनिट की कुल कीमत 44,42,750/- रूपये है और अनुबन्ध के अनुसार यदि १0 प्रतिशत धनराशि की कटौती की जाती है, तो उक्त धनराशि 444,75/— रूपये होती है, जो कि एक बहुत बडी धनराशि है, जिससे शिकायतकर्ता के हित प्रतिकूलतः प्रभावित हो सकते हैं । इस सम्बंध में तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40208 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय ,पटटा के लिए करार) नियमावली 2078 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 7 में अनुबंधित यूनिट का कब्जा के नियम व शर्तों का उल्लेख है, जिसमें wee 75 में आवंटित के द्वारा यूनिट कैंसल कराने के सम्बंध में प्राविधानित है कि:-
Cancellation by Allottee — The Allottee shall have the right to cancel/withdraw his allotment in the Project as provided in the Act: Provided that where the Allottee proposes to cancel/withdraw from the Project without any fault of the Promoter, the Promoter herein is entitled to forfeit the booking amount paid for the allotment. The promoter shall return 50% (fifty percent) of the balance amount of money paid by the allottee within 45 (forty five) days of such cancellation / withdrawal and the remaining 50% (fifty percent) of the balance amount on reallotment of the apartment / plot or at the end of one year from the date of cancellation / withdrawal by the allottee, whichever is earlier. The promoter shall inform the previous allottee the date of re-allotment of the said apartment / plot and also display this information on the official website of UP RERA on the date of re-allotment. जिससे स्पष्ट है कि जहां प्रमोटर की गलती के बिना शिकायतकर्ता अपना आवंटन निरस्त कराता है, तो वहां पर प्रमोटर बुकिंग धनराशि को समायोजित कर लेगा और Os 6 शेष बकाया धनराशि में से आधी धनराशि निरस्तीकरण के 45 दिन के अन्दर अदा करेगा और शेष धनराशि उक्त यूनिट के पुनः आवंटन अथवा एक वर्ष की अवधि, जो भी पहले हो, पर अदा करेगा। चूंकि प्रश्नगत प्रकरण में अनुबंधित अवधि अभी शेष है और शिकायतकर्ता अपना आवंटन स्वेच्छा से निरस्त कराना चाहता है। ऐसी दशा में वह उक्त प्राविधान के अन्तर्गत अपनी धनराशि पाने का अधिकारी है।
विपक्षी की ओर से यह भी कहा गया है कि निर्माण कर आवंटियों को कब्जा दे देगा। रेरा की वेबसाईट के अनुसार 5.6.209 पूर्णता की तिथि है, जो कि निकट है, यदि शिकायतकर्ता Ww की wie की तिथि तक रूकता है, तो इससे शिकायतकर्ता एवं विपक्षी दोनो के हित संरक्षित होते हैं और समस्या का सार्थक निराकरण संभव प्रतीत होता है। जहां तक विलंब की अवधि का प्रश्न है, तो यदि शिकायतकर्ता विपक्षी के प्रस्ताव के अनुसार कब्जे दिये जाने की तिथि i56.209 TH VHT है, तो वह अपनी जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विक।स) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 7.70.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय //पटटा विलेख के प्रारूप के we 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें we 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर ofii) ¥ निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता हैकि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी ४टाक+ा प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक ब्याज की अवधि का प्रश्न है, तो इस सम्बंध में सिविल अपील Ho ee4o-50/20i8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने व कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में wat शिकायतकर्तागण मात्र ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तदनुसार बिन्दु सं? 2 व 3 निस्तारित किये जाते हैं।
इसी कम में यह भी ज्ञातव्य है कि “क्षतिपूर्ति” दिया जाना रेरा अधिनियम में “एडजूडिकेटर” के कार्य क्षेत्र में है। इस सम्बंध में पीठ द्वारा कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। तदनुसार शिकायतकर्ता का प्रार्थनापत्र fren किया जाता है | शिकायतकर्ता यदि अपना आवंटन निरस्त कराना चाहता है, तो विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह उपरोक्ताअनुसार बुकिंग धनराशि को समायोजित करते हुए, शेष धनराशि में 50 प्रतिशत आदेश अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के अन्दर अदा करना सुनिश्चित करें और शेष 50 प्रतिशत धनराशि उक्त यूनिट के पुनः आवंटन के पश्चात अथवा आदेश की तिथि से एक वर्ष पवश्चात, जो कि पहले हो, तक अदा करना सुनिश्चित करें। शिकायतकर्ता यदि विपक्षी की परियोजना के साथ दिनांक 5.6.2049 तक बना रहता है, तो, विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह ओ.सी./ सी.सी. सहित 4506.2099 से पूर्व तक यदि कोई देय धनराशि बकाया है, तो उसे प्राप्त कब्जा देना सुनिश्चित करें और नियमानुसार स्टाम्पशुल्क प्राप्त कर पंजीयकरण कराना सुनिश्चित करें। विपक्षी, शिकायतकर्ता को ग्रेस पीरियड के साथ अनुबंधित अवधि जून 20i9 से ओसी./सी.सी. अथवा मांग पत्र जारी होने की तिथि, जो भी बाद mM 8 में हो तक, शिकायतकर्ता की जमा धनराशि पर MCLRH प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये।
यदि विपक्षी दिनांक 45.06.2049 तक शिकायतकर्ता को कब्जा देने में असफल रहता है, तो दिनांक i50620I9 के पश्चात 45 दिन के अन्दर शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि MCLRH प्रतिशत की दर से जमा करने की तिथि से भुगतान करने की तिथि तक मय ब्याज अदा करना सुनिश्चित करें। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0मू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 206 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। न ही बलि Hatt OAR (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण