Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Himanshu Bhardwaj v. Project Category-Un-Register Yamuna Expressway Industrial
Complaint No. 9201818110
- Decision date
- 2019-06-18
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 1 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04, श्रीमती कल्पना मिश्रा, सदस्य | कम सं0 शिकायत to शिकायतकर्ता 4 9204848093 पवन कुमार 2 9204848448 राजेन्द्र सिंह मानव 3 9204848407 भूप सिंह यादव 4 9204848440 हिमांशु भारद्वाज बनाम यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण, आदेश 29.05.2049 शिकायतकर्ता शिकायतकर्ता पवन कुमार के साथ 03 अन्य शिकायकतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन दोनो शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें YEA Residential-20090l) से सम्बंधित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत wo 9204849093 पवन कुमार अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलंबित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की स्कीम YEA Residential-2009() 4 tee नं० 334 पोकेट 5 डी Go 48, बुक कराया था और अनुबन्ध के अनुसार 75 प्रतिशत धनराशि जमा करने पर कब्जा दिया जाना था। शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया कि प्लॉट की कीमत 47,74,607/— रूपये थी, किन्तु विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता से अतिरिक्त धनराशि की मांग की गयी, जो कि शिकायतकर्ता द्वारा जमा की गयी, इस प्रकार शिकायतकर्ता विपक्षी को 24,70,607,//- रूपये की धनराशि दे चुका है, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया। अतः शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा दिलाये जाने एवं क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का अनुरोध किया गया। 2
शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, जमा धनराशि की रसीदें, अतिरिक्त जमा धनराशि की रसीद, छायाप्रति ब्रोशर प्रस्तुत किये गये । विपक्षी द्वारा प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया कि शिकायतकर्ता को ड्रा के जरिये प्लॉट आवंटित किये गये थे और ग्रेशर के अनुसार कब्जे की संभावित तिथि अक्टूबर ,/नवम्बर 20:3 थी, किन्तु आवासीय परियोजना जिन १4 गामों के अन्तर्गत थी, उसमें 347 याचिकायें दायर की गयी, जो कि माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं, जिन पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा waa आदेश पारित किये गये हैं, जो वर्तमान तक प्रभावी हैं। याचिका do 37443 / 2044 में आदेश पारित होने के पश्चात उक्त कृषकों ने भी अतिरिक्त 64.7 प्रतिशत प्रतिकर की मांग की जाने लगी और निर्माण कार्य अवरूद्ध कर दिया, जिस कारण समय से कब्जा दिया जाना संभव नही हो worl माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में किसानों को अतिरिक्त प्रतिकर देने हेतु आवंटियों से धनराशि की मांग की गयी तो आवंटी सहमत नही हुए, तो विपक्षी द्वारा कहा गया कि जो आवंटी सहमत नही है, वह 90 दिन में अपनी जमा धनराशि वापस ले सकते हैं। लीज डीड हेतु कुछ आवंटियों की चैकलिस्ट जारी की जा चुकी है, जिन्हे मार्च 209 तक कब्जा देना है, किन्तु अभी शिकायतकर्ता की चैकलिस्ट जारी नही की गयी है। आवंटियों के पास विकल्प होगा कि यदि वह अपने भूखण्ड को समर्पण करता है, तो और आवंटी ने लीज रेंट जमा कर रखा है, तो वह लीज डीड की तिथि से सरेंडर की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अपनी धनराशि वापस ले सकता है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया।
शिकायतकर्तागण का मुख्य अनुतोष कब्जा दिलाये जाने व विलंबित अवधि के लिए विलंब धनराशि,ब्याज दिलाये जाने का है। विपक्षी द्वारा स्वयं प्रतिवादपत्र में यह स्वीकार किया गया है कि उनका ब्रोशर ही अनुबन्ध है और ब्रेशर /अनुबन्ध के अनुसार कब्जा दिये जाने की तिथि अक्टूबर /नवम्बर 2043 थी, स्वयं शिकायतकर्ता द्वारा धनराशि जमा करायी जा चुकी है, यहां तक कि शिकायतकर्ता द्वारा किसान प्रतिकर की धनराशि भी जमा करायी जा चुकी है। विपक्षी द्वारा स्वयं कहा गया है कि कुछ आवंटियों की चेकलिस्ट जारी हो चुकी है और मार्च 20I9 तक कब्जा दे दिया जायेगा, किन्तु शिकायतकर्ता की चैक लिस्ट जारी नही की गयी है, लेकिन ऐसी दशा में जबकि इसी परियोजना से सम्बंधित अन्य आवंटियों की चेकलिस्ट जारी की गयी है, तो यह अपेक्षा की जा सकती है कि अन्य आवंटियों की भी चेकलिस्ट जल्दी ही जारी की जायेगी और कब्जा दिया जायेगा। यद्यपि प्रतिवादपत्र में मार्च 209 में कब्जा दिये जाने का कथन किया गया है, किन्तु मार्च 209 व्यतीत हो चुकी है और शिकायतकर्तागण को कब्जा नही दिया गया है। अतः विपक्षी को यथाशीघ्र कब्जा दिये जाने हेतु आदेशित किया जाना विधिसंगत प्रतीत होता है और चूंकि अभी Yar तक कब्जा नही मिला है और विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण की धनराशि का उापभोग किया गया है, ऐसी दशा में शिकायतकर्ता जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि —
Section 4(2)()(c) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)()(c) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In othe words, by giving opertunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(4)(०), he is not absolved of the liability under the agreement for sale.
Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व Sa के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल Ge धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
अनुबन्ध के अनुसार विपक्षी को कब्जा अक्टूबर नवम्बर 2043 में देना था, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया। विपक्षी द्वारा कहा गया है कि कृषकों द्वारा परियोजना की भूमि की बाबत माननीय उच्च न्यायालय में याचिकायें योजित की गयी हैं, जिन पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश पारित किये गये हैं, जो कि वर्तमान तक प्रभावी हैं, किन्तु विपक्षी की ओर से माननीय उच्च न्यायालय के किसी आदेश की कोई प्रति पत्रावली पर दाखिल नही की गयी हे, ऐसी दशा में विपक्षी को माननीय उच्च न्यायालय के स्थगन आदेशों का कोई लाभ दिया जाना संभव नही है। विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि विलंबित अवधि के लिए विपक्षी की प्राविधानों के अनुसार 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के लिए तैयार है, किन्तु शिकायतकर्तागण द्वारा मौखिक रूप से कहा गया है कि विपक्षी द्वारा 24 प्रतिशत की दर से ब्याज लिया जाता है, अत: शिकायतकर्ता को भी रेरा के प्राविधानों के अनुसार 24 प्रतिशत की दर से ही ब्याज दिलाया जाये। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 48, 38, 59, 60, 64, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों
के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 4.5.206 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20r6 के अधीन दिनांक 7.0.20:8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के wr प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें WER 9 (0) में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी uae oliii) F निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को mcie+i प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। ज्हां तक किसान प्रतिकर की धनराशि का प्रश्न है, तो विपक्षी की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया कि उक्त धनराशि माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार विपक्षी द्वारा प्राधिकरण को दी जा रही है, जिस कारण वह उक्त विपक्षी उसे आवंटियों से प्राप्त करने का अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि Savitri devi vs State of U.P. SC 507 में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सावित्री देवी बनाम उ0प्रणसरकार के मामले में किसानों को अतिरिक्त 64.07 प्रतिशत मुआवजा देने हेतु प्राधिकरण को आदेशित किया गया था, जिस कारण vat अधिभार अधिरोपित किया गया है, किन्तु यह विपक्षी का दायित्व है कि वह यह स्पष्ट करें कि उसके द्वारा कितनी धनराशि प्राधिकरण को इस मद में दी गयी है और उक्त दी गयी धनराशि को किस प्रकार अनुपातिक रूप में आवंटियों पर समान रूप से अधिरोपित किया गया है। तदोपरांत प्रूफ ऑफ पेमेन्ट के साथ विपक्षी उक्त धनराशि को प्राप्त करने का अधिकारी है, यदि कोई भुगतान बाद में किया जाता है, तो यथासमय विपक्षी उसे प्राप्त कर सकता है। जहां तक मुआवजा देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अत: इस बिन्दु पर प्राधिकरण द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा सकता है। तदनुसार वाद निस्तारित किया जाता हैं। विपक्षी को आदेशित किया जाता है वह :- (ग) 6
आदेश अपलोड होने से 60 दिन के अन्दर शिकायतकर्तागण को कब्जा प्रदान करें और विलंबित अवधि तिथि में नवम्बर 2043 से 30.4.2046 तक, ब्रोशर की शर्तों के अनुसार 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से व रेरा की विज्ञप्ति जारी होने के बाद से अर्थात i520I6 से कब्जा दिये जाने के ऑफर तक MCLR+ प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे। Vad अवधि में कब्जा ऑफर नही किया जाता तथा यदि आवंटी कब्जा प्राप्त नही करना चाहता है, तो शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि नवम्बर 2043 से भुगतान की तिथि तक एम.सी.एल.आर.+ की दर से ब्याज सहित वापस की जाये। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20i6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। Ky na (कल्पना मिश्रा) (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण