Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Mona Chandra v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. 9201817366
- Decision date
- 2019-07-27
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत संख्या : 920847366 मोना चंद्रा बनाम उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड, प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध सी.सी. सहित कब्जा दिलाये जाने एवं अनुचित मांगों को हटाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL Sec-5, Wave floor में यूनिट Ho 4297-ए बुक करायी गयी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा अंकन 24,48,258 //- रूपये जमा कराये गये और यूनिट का कब्जा दिनांक 48.08.2046 तक दिया था, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नही दिया गया, बिल्डर द्वारा यूनिट का एरिया बढा दिया गया है और इस मद में अतिरिक्त धनराशि की मांग कर रहा है, इसके अतिरिक्त बिजली, पानी, गैस, इंटरनेट व अन्य कई मदों में अतिरिक्त धनराशि की मांग की जा रही है, जबकि वह अनुबन्ध का हिस्सा हैं, जिस कारण शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में पोजेशन ऑफर, ई-मेल्स की छायाप्रतियां, गाजियाबाद विकास प्राधिकरण से प्राप्त सूचना, परियोजना के फोटो, की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं। विपक्षी की ओर से मौखिक रूप से कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अपनी परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया और पजीकरण के समय पूर्णता की तिथि दी गयी थी, जो अभी आनी शेष है और उससे पूर्व यह वाद पोषणीय नही है, क्योंकि te अधिनियम पूर्ववर्ती नही है बल्कि भविष्यवर्ती है। शिकायतकर्ता द्वारा क्षतिपूर्ति की मांग की गयी है, जिसको देने का अधिकार एडजूटिकेटर को है। यदि (0
2 शिकायतकर्ता को विकल्प दिया जाता है, तो वह क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है। इसके अतिरिक्त आवंटन पत्र में आरबीट्रेशन ait होने के कारण इस पीठ को सुनवाई का क्षेत्राधिकार नही है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी और परियोजना पूर्ण है और शिकायतकर्ता को ऑफर ऑफ पोजेशन भेजा जा चुका है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के मध्य निम्न बिन्दु विवादय है — 4... क्या प्रश्नगत वाद रेरा दी गयी तिथि के बाद ही पोषणीय है? 2 क्या अनुबन्ध में आरबीद्रैशन ait होने के कारण वाद की सुनवाई का क्षेत्राधिकार इस पीठ को नहीं है? 3... क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है? 4. क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? 5, क्या शिकायतकर्ता विलंबित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? निस्तारण बिन्दु to 4 बिन्दु सं० 4 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या प्रश्नगत वाद रेरा दी गयी तिथि के बाद ही पोषणीय है? यह वाद बिन्दु विपक्षी के अभिकथन पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी का कहना है कि उसके द्वारा रेरा में अपनी परियोजना पंजीकरण के समय की पूर्णता की तिथि 34.42.2078 दी गयी है, उससे पूर्व शिकायतकर्ता का वाद पोषणीय नही है। इसके विपरीत शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता के साथ एक अनुबन्ध निष्पादित किया गया है, जिसमें विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा निर्माण शुरू होने से 30 माह में कब्जा दिये जाने का कथन किया गया था। विपक्षी की ओर से अनुबन्ध की प्रति दाखिल की गयी है, जिसके अवलोकन से विदित है कि अनुबन्ध के प्रस्तर 4. में यूनिट का कब्जा अनुबन्ध के निष्पादन से 30 माह में दिये जाने का उल्लेख है, विपक्षी की ओर से निर्माण कार्य शुरू होने की जानकारी की बाबत कोई प्रपत्र पत्रावली पर दाखिल नही किया गया है, किन्तु रेरा की वेबसाईट पर विपक्षी की ओर से परियोजना के शुरू होने की तिथि 34.7.2042 दी गयी है, चूंकि उक्त सूचना विपक्षी द्वारा स्वयं प्राधिकरण को दी गयी a है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि विपक्षी द्वारा दी गयी उक्त सूचनायें विपक्षी को स्वीकृत है। इस प्रकार कब्जे की विलंबतम तिथि 34.7.20:5 थी, किन्तु विपक्षी की ओर से रेरा में परियोजना के पंजीकरण के समय दी गयी पूर्णता की तिथि को माने का कथन किया गया है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale." उपरोक्त से ere है कि विपक्षी द्वारा रेरा में परियोजना के पंजीकरण के समय दी गयी पूर्णता की तिथि विपक्षी को रेरा के दंडात्मक प्राविधानों से बचा सकता है, किन्तु इससे आवंटी एवं प्रमोटर के मध्य निष्पादित अनुबन्ध को समाप्त नहीं माना जा सकता | विपक्षी उक्त ager की अनदेखी नही कर सकता है। उपरोक्त विधि व्यवस्था के प्रकाश में विपक्षी की आवंटी को यूनिट देने की उत्तरदायिता अनुबन्ध के अनुसार ही होगी। अतः विपक्षी का यह तर्क बलहीन है कि रेरा में पूर्णता की दी गयी तिथि के उपरान्त ही शिकायतकर्ता किसी अनुतोष को प्राप्त करने का अधिकारी है। तदनुसार बिन्दु सं० 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Ho 2
विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आर्बीट्रेशन का क्लाज है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एमआर एम. जी.एफ. बनाम आफताब सिंह में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- OQ (i) the disputes which are to be adjudicated and governed by statutory enactments, established for specific public purpose to sub-serve 8 particular public policy are not arbitrable; (ii) there are vast domains of the legal universe that are non-arbitrable and kept at a distance from private dispute resolution; (ii) the subject amendment was meant for a completely different purpose, leaving status quo ante unaltered and subsequently reaffirmed and restated by the Hon'ble Supreme Court,
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्था के आलोक में यह स्पष्ट है कि विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये है और इसका क्षेत्राधिधार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बीट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्था के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 2046 की धारा 79, आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में उक्त दिए तर्क को लागू कर यह निष्कर्ष निकाला है कि यही सिद्धांत रियल एस्टेट अधिनियम के तहत उक्त मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं fost के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु vo 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 3 बिन्दु Wo 3 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि जहां आवंटी को कोई अन्य विकल्प दिया जाये, वहां शिकायतकर्ता /आवंटी किसी अन्य क्षतिपूर्ति को पाने का अधिकारी नही है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में शिकायतकर्ता द्वारा बैंगलोर डेवलेपमेन्ट एथारिटी बनाम सिंडीकेट बैंक 2007 सी.टी.जे. 689 (एस.सी.) >
प्रस्तुत किया गया है, जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि +- " Where an alternative site is offered or delivered (at the agreed price) in view of its inability to deliver the earlier allotted plot/flat/house, or where the delay in delivering possession of the allotted plot/flat/house is for justifiable reasons, ordinarily the allottee will not be entitled to any interest or compensation. This is because the buyer has the benefit of appreciation in value. " उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह wre किया गया है कि यदि आवंटी को अन्य कोई विकल्प दिया जाता है, तो वह अन्य किसी ब्याज अथवा क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है, यदि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को कोई वैकल्पिक अनुतोष प्रदान किया गया होता, तो वह उपरोक्त विधि व्यवस्था का लाभ पाने का अधिकारी होता, किन्तु प्रश्नगत प्रकरण में विपक्षी की ओर से शिकायतकर्ता को कोई विकल्प नही दिया गया है, ऐसी दशा में तथ्यों एवं परिस्थितियों की भिन्नता के कारण उपरोक्त विधि व्यवस्था प्रश्नगत प्रकरण पर लागू नही होती है। तदनुसार बिन्दु सं० 3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु tio 4 बिन्दु do 3 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या force majeure events होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure events) (जैसे दंगा, आंदोलन, हडताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, सरकार का नीति परिवर्तन, न्यायिक स्थगन आदेश, निर्णय व डिकी से कार्य बाधित होना, अनुज्ञप्ति व संस्तुतियों में होने वाला विलंब आदि) के कारण परियोजना विलंबित हुई, जिसके सम्बंध में विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध में शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित कराया गया था। विपक्षी की ओर से जो साक्ष्य के रूप में उत्तर के साथ War बी दिया गया है उससे न तो यह स्पष्ट है कि वह किस भूमि से सम्बन्धित है व नहीं यह बताता है कि कब से कब तक स्थांगनादेश लागू रहा। अतः साक्ष्य के अभाव में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नही है। तदनुसार बिन्दु सं० 4 निस्तारित किया जाता निस्तारण बिन्दु vo 5 बिन्दु do 5 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता विलंबित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? यह वाद बिन्दु भी शिकायतकर्ता के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है। शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अनुबंधित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है, जिस कारण वह परियोजना के साथ नही रहना चाहता है और उसकी जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलायी जाये, जिस पर विपक्षी की ओर से कहा गया कि निर्माण कार्य पूर्ण है और शिकायतकर्ता को पोजेशन ऑफर किया जा चुका है। इस स्तर पर धनवापस किया जाना विपक्षी के लिए संभव नही है।
यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना फ्लैट बुक कराया था। इस तथ्य पर भी कोई विवाद नही है कि विपक्षी अनुबंधित अवधि में कब्जा प्रदान करने में असमर्थ रहा है। शिकायतकर्ता की ओर से अनुबन्ध की प्रति दाखिल की गयी है, जिसमें यूनिट का कब्जा निर्माण शुरू होने से 30 माह में कब्जा देने का कथन किया गया है। यद्यपि पत्रावली पर ऐसा कोई प्रपत्र दाखिल नही है, जिसमें निर्माण शुरू होने की तिथि अंकित हो, किन्तु यह तथ्य भी विचारणीय है कि रेरा की वेबसाईट पर उक्त परियोजना के शुरू होने की तिथि 34.07.2042 है, जो कि स्वयं विपक्षी द्वारा दी गयी है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि परियोजना दिनांक 34.7.20I2 को शुरू हो चुकी थी और कब्जा देने की तिथि 34.7.20i5 होनी चाहिये, किन्तु परियोजना को शुरू हुए लगभग 7 वर्ष का समय हो चुका है और रेरा की वेबसाईट पर ही प्रस्तावित पूर्णता की तिथि 34.22. 2048 दी गयी है, जो कि व्यतीत हो चुकी है, विपक्षी का कहना है कि पोजेशन ऑफर किया जा चुका है, किन्तु विपक्षी की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उसे ओसी./ सीसी. प्राप्त हुई है अथवा नही। उक्त प्रमाण पत्रों की अनुपलब्धता में परियोजना को पूर्ण नही माना जा सकता। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 78()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह sane किया जा सकता है कि उभयपक्ष को उक्त अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के अनुसार परियोजना के विलंब की अवधि में 5 रूपये प्रतिवर्ग फुट प्रतिमाह की दर से क्षतिपूर्ति का प्राविधान है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता क्षततिपूर्ति पाने का अधिकारी है, किन्तु शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आपत्ति की गयी है कि उक्त क्षतिपूर्ति अत्यंत कम है और रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा क्षतिपूर्ति प्राप्त की गयी है उसी दर से क्षतिपूर्ति देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. i] have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 8, 38, 59, 60, 64, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक .5.20१6) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 4.5.2046 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध 8
निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा aT (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2076 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय / पटटा के लिए करार) नियमावली coi8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के WK 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +4% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर o(iii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज सहित धनवापसी किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि देय है, तो विपक्षी भी MCLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त सकता है।
जहां तक ब्याज की अवधि का प्रश्न है, उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को 32.2.205 तक यूनिट का कब्जा देना था और शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा दिये जाने तक ब्याज दिलाये जाने की याचना की गयी है। इस सम्बंध में सिविल अपील Wo 6649-50 /2078 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि +- " the period of Interest should close on April 20i6 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing “O) ) 9 possession. The Respondent - Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने व कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। अतः शिकायतकर्ता ओ.सी./ सी.सी. प्राप्त होने अथवा कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। शिकयातकर्ता की ओर से यह भी कथन किया गया है कि मौके पर बेसिक सुविधायें नही है। इस सम्बंध में विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह ब्रोशर में प्रस्तावित सभी सुविधायें उपलब्ध कराते हुए शिकायतकर्ता को कब्जा देना सुनिश्चित करें। तदनुसार बिन्दु to 5 निस्तारित किया जाता है।
जहां तक कक्षतिपूर्ति (0ण0फ॒आाब्थांणा) देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अतः इस बिन्दु पर पीठ द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा रहा है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है आदेश 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह, यदि कोई धनराशि बकाया है, तो उसे प्राप्त कर, आदेश अपलोड होने की तिथि से 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता को ओ.सी./सी.सी. सहित कब्जा दें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। 2... विपक्षी अनुबंधित अवधि से दिनांक 304.206 तक 5/- रूपये प्रति वर्गफूट प्रतिमाह की दर से व दिनांक 04.05.206 से ओ.सी./सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर करने, जो भी बाद में हो, तक की अवधि के लिए शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर MCLR+I प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चितकरें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। 3. विपक्षी यदि अनुतोष wo 4 को प्रदान करने में असफल रहते हैं, तो 45 दिन के पश्चात शिकायतकर्ता द्वारा जमा कुल धनराशि जमा करने की तिथि से भुगतान की तिथि तक McLRH प्रतिशत ब्याज सहित दो किश्तों में अदा करना सुनिश्चित करें व अन्य शिकायतकर्तागण को उनके द्वारा भुगतान के अनुसार धनराशि वापस की जाये। 50 प्रतिशत धनराशि आदेश अपलोड 40 होने के 90 दिन के अन्दर व शेष 50 प्रतिशत धनराशि दिनांक 34.42.209 तक प्राप्त कराना सुनिश्चित करें। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20I6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये।
x > Tal ae कुमार re ) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण