Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Aditya Kumar Garg v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. 8201814888
- Decision date
- 2019-05-07
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 2 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत संख्या : 820:874888 आदित्य कुमार बनाम उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड, आदेश 48.04.2049 प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध जमा धनराशि दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL Sec-I5, Plots 4 यूनिट Wo 748 बुक करायी गयी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा अंकन 2,32,777/- रूपये जमा कराये गये, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नही दिया गया, शिकायतकर्ता द्वारा यह भी कहा गया कि मौके पर खेती हो रही है और विपक्षी कब्जा देने में असमर्थ है, जिस कारण शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि वापस दिलाये जाने का अनुरोध किया गया। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में चैक, भुगतान की रसीद, आवंटन पत्र, प्रस्तुत की गयीं। विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अपनी परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया और पजीकरण के समय पूर्णता की तिथि दी गयी थी, जो अभी आनी शेष है और उससे पूर्व यह वाद पोषणीय नही है, क्योंकि रेरा अधिनियम पूर्ववर्ती नही है बल्कि भविष्यवर्ती है। शिकायतंकर्ता द्वारा क्षतिपूर्ति की मांग की गयी है, जिसको देने का अधिकार एडजूटिकेटर को है। यदि शिकायतकर्ता को विकल्प दिया जाता है, तो वह क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी थी और विपक्षी द्वारा परियोजना को दिनांक 30..2020 तक पूर्ण कर कब्जा दे
विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में फार्म सी प्रति दाखिल की गयी है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया पक्षकारों के मध्य निम्न बिन्दु विवादय है :- 4. क्या प्रश्नगत वाद रेरा दी गयी तिथि के बाद ही पोषणीय है? 2... क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है? 3... क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? 4, aa शिकायतकर्ता की जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? निस्तारण बिन्दु to 4 बिन्दु सं) । इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या प्रश्नगत वाद रेरा दी गयी, तिथि के बाद ही पोषणीय है? यह वाद बिन्दु विपक्षी के अभिकथन पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी का कहना है कि उसके द्वारा रेरा में अपनी परियोजना पंजीकरण के समय की पूर्णता की तिथि 30.44.2020 दी गयी है, उससे पूर्व शिकायतकर्ता का वाद पोषणीय नही है। इसके विपरीत शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता द्वारा केवल एक्सप्रैशन ऑफ इंटरेस्ट किया गया था, कोई अनुबन्ध हस्ताक्षरित नही किया गया है। विपक्षी की ओर से कहा गया है कि रेरा में पंजीयन का दिनांक 30.4.2020 है, तब तक परियोजना पूर्ण कर कब्जा दे दिया जायेगा, यदि पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि विपक्षी आवंटी को अंतहीन समय तक लंबित रखेगा। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स wards wife. anf बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in ०9) the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I\(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale." उपरोक्त से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा रेरा में परियोजना के पंजीकरण के समय दी गयी पूर्णता की तिथि विपक्षी को रेरा के दंडात्मक प्राविधानों से बचा सकता है, किन्तु इससे आवंटी एवं प्रमोटर के मध्य निष्पादित अनुबन्ध को समाप्त नही माना जा सकता | विपक्षी उक्त अनुबन्ध की अनदेखी नही कर सकता है। उपरोक्त विधि व्यवस्था के प्रकाश में विपक्षी की आवंटी को यूनिट देने की उत्तरदायिता अनुबन्ध के अनुसार ही होगी। अतः विपक्षी का यह तर्क बलहीन है कि रेरा में पूर्णता की दी गयी तिथि के उपरान्त ही शिकायतकर्ता किसी अनुतोष को प्राप्त करने का अधिकारी है। तदनुसार बिन्दु to 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 2 बिन्दु सं० 2 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही हैं? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि जहां आवंटी को कोई अन्य fac fear जाये, वहां शिकायतकर्ता /आवंटी किसी अन्य क्षतिपूर्ति को पाने का अधिकारी नही है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में शिकायतकर्ता द्वारा बैंगलोर डेवलेपमेन्ट एथारिटी बनाम सिंडीकेट बैंक 2007 सी.टी.जे. 689 (एस.सी.) प्रस्तुत किया गया है, जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " Where an alternative site is offered or delivered (at the agreed price) in view of its inability to deliver the earlier allotted plot/flat/house, or where the delay in delivering possession of the allotted plot/flat/house is for justifiable reasons, ordinarily the allottee will not be entitled to any interest or compensation. This is because the buyer has the benefit of appreciation in value. " उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि आवंटी को अन्य कोई विकल्प दिया जाता है, तो वह अन्य किसी ब्याज अथवा क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी ने 4 नही है, यदि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को कोई वैकल्पिक अनुतोष प्रदान किया गया होता, तो वह उपरोक्त विधि व्यवस्था का लाभ पाने का अधिकारी होता, किन्तु प्रश्नगत प्रकरण में विपक्षी की ओर से शिकायतकर्ता को कोई विकल्प नही दिया गया है, ऐसी दशा में तथ्यों एवं परिस्थितियों की भिन्नता के कारण उपरोक्त विधि व्यवस्था प्रश्नगत प्रकरण पर लागू नही होती है। तदनुसार बिन्दु सं० 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Ho 3
बिन्दु Wo 3 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure) के कारण परियोजना विलंबित हुई, जिसके सम्बंध में विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध के WER 25 में उल्लिखित किया गया था, जिसे शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था, ऐसी दशा में शिकायतकर्ता किसी ब्याज को पाने का अधिकारी नही है, किन्तु विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही किसी फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नही किया गया है, ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नही है। तदनुसार बिन्दु do 3 Prema किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 4 बिन्दु do 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता की जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? यह वाद बिन्दु भी शिकायतकर्ता के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है।
शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अनुबंधित अवधि में कब्जा नही दिया गया है, जिस कारण वह परियोजना के साथ नही रहना चाहता है और उसकी जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलायी जाये, जिस पर विपक्षी की ओर से कहा गया कि निर्माण कार्य पूर्ण है और दिनांक 30.44.2020 तक कार्य पूर्ण कर कब्जा दे दिया जायेगा। इस स्तर पर धनवापस किया जाना विपक्षी के लिए संभव नही है। यह तथ्य भी विचारणीय है कि रेरा की वेबसाईट पर उक्त परियोजना के शुरू होने की तिथि 0.07.2009 है, अर्थात परियोजना को शुरू हुए लगभग ॥0 वर्ष Y से अधिक का समय हो चुका है और रेरा की वेबसाईट पर ही प्रस्तावित पूर्णता की तिथि 30.4.2020 दी गयी है, जो कि निकट भविष्य की तिथि नही है। ऐसी दशा में जबकि परियोजना को शुरू हुए दस वर्ष हो चुके हैं और परियोजना पूर्ण नही है और न ही निकट भविष्य में पूर्ण होने की संभावना है, शिकायतकर्ता द्वारा धनवापसी की मांग उचित है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील to 3482 / 2049 कोलकाता वेस्ट इंटरनेशनल सिटी प्रा.लि. बनाम देवाशीष रूद्रा में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" Tt would be manifestly unreasonable to construe the contract between the parties as requiring the buyer to wait indefinitaly for possession.by 206, nearly seven year has elapsed from the date of agreement. Even according to the developer, the completion certificate was received on 29 March 206. This was nearly seven years after the extended date for the handing over of possession prescribed by the agreement. A buyer can be expected to wait for possession for a reasonable period. A period of seven years is beyond what is reasonable. Hence, it would have been manifestly unfair to non-suit the buyer merely on the basis of the first prayet in the reliefs sought before the SCDRC. There was in any event a prayer for refund. " ऐसी दशा में जबकि शिकायतकर्ता को बुकिंग कराये हुए लगभग 7 वर्ष हो चुके हैं माननीय उच्चतम न्यायालय की उपरोक्त विधि व्यवस्था के प्रकाश में शिकायतकर्ता की धनराशि वापस किये जाने योग्य है। चूंकि विपक्षी द्वारा var अवधि में शिकायतंकर्ता की जमा धनराशि का उपभोग किया गया है। अतः शिकायतकर्ता उक्त धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है।
जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.0.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,पटटा के लिए करार) नियमावली 20i8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) 4 प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, S/ along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर o(iii) F निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MciR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज सहित धनवापसी किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि देय है, तो विपक्षी भी McLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त सकता है। जहां तक मुआवजा देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अतः इस बिन्दु पर प्राधिकरण द्वारा कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। तदनुसार शिकायतकर्ता का निस्तारित किया जाता है।
4. faualt को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्ता की सहमति से उन्हे पूर्व में बुकिंग के समय तय दरों व समकक्ष क्षेत्रफल की, मूल इकाई के नजदीक, रेडी टू मूव यूनिट आगामी 45 दिन में उपलब्ध कराकर सूचित करें| अन्यथा विपक्षी शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि जमा करने की तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक McLR+ प्रतिशत की दर से ब्याज ‘aa धनराशि वापस करना सुनिश्चित करें। 2. इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20i6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। a. a (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण