Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Gyan Prakash v. Newtech La Palacia Private Limited
Complaint No. 6201811405
- Decision date
- 2019-05-22
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्रीमती कल्पना मिश्रा,सदस्य कम do शिकायत सं०__|__ शिकायतकर्ता | | 4 | 420489856 [चित्रसेन यादव | 2 40204820590 गौड़ |_३3_|220487403 अभिषेक गोय 4 6204844405 ज्ञान प्रकाश | _ 5 [| 620484396 जलन दू-5 दत्त 6 220487243 जसप्रीत सिंह दिन मिनिशिभिभिभि लि लि शत शिकायतकर्तागण बनाम न्यूटेक प्रमोटर और डेवलपर्स प्रा.लि. मुकेश कुमार रॉय पुत्र मिस्टर मैनेजर रॉय आर /ओ सीए -52, पीपुल्स को-ऑपरेटिव कॉलोनी, कंकरबाग, पटना -80 ला गलक्सिया | आदेश 30.04.2049 शिकायतकर्ता चित्रसैन यादव के कुछ 06 अन्य शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें 'NewTech La-Palacia" से सम्बंधित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत Wo 420:80856 चित्रसैन यादव अग्रणी वाद रहेगा। शिकायतकर्तागण द्वारा प्राधिकरण से विपक्षी से अविलम्ब कब्जा दिलाये जाने एवं विलंबित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है, तथा कुछ शिकातयकर्तागणों ने ई.एम.आई. की याचना की है \e— 2
संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना "NewTech La-Palacia" के में फ्लैट संख्या डी 208 में बुक कराया था किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कोई कब्जा शिकायतकर्ता को नहीं दिया गया है, जबकि विपक्षी को अनुबन्ध के अनुसार दिनांक 29.2205 तक कब्जा देना था। अतः शिकायतकर्तागण द्वारा प्राधिकरण से विपक्षी से अविलम्ब कब्जा दिलाये जाने एवं विलंबित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है, तथा कुछ शिकातयकर्तागणों ने ई.एम.आई. की याचना की है शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में छायाप्रति चैक, फ्लैट बायर एग्रीमेन्ट, छायाप्रति wie प्रस्तुत किया गया। विपक्षी की ओर से प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में सी.एल.पी. के अर्न्तगत यूनिट बुक करायी गयी, और अनुबन्ध निष्पादित किया गया और अनुबन्ध के अनुसार विपक्षी द्वारा बैंक की अदायगी की गयी, विपक्षी वर्तमान धन वापसी करने की स्थिति में नहीं है और उसके द्वारा नवम्बर 2049 तक शीघ्र ही निर्माण कार्य पूर्ण कर कब्जा दे दिया जायेगा। विपक्षी द्वारा दिनांक 24.04.209 को दाखिल शपथ के अनुसार नवम्बर 2049 को कब्जा देने को अंकित है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया।
शिकायतकर्तागण का कहना है कि शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी और विपक्षी को उक्त आवंटन के सापेक्ष धनराशि भी अदा की गयी थी, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नहीं दिया गया। लंबे समय से निर्माण कार्य बंद है और विपक्षी की परियोजना का पैसा दूसरी परियोजनाओं मे 'हस्तांरित किया जा चुका है, इसके विपरीत विपक्षी का कहना है कि निर्माण कार्य चल रहा है ओर जून 2020 तक कब्जा दे देगा, उक्त कथन की विश्वसनीयता हेतु शपथपत्र दिया गया है। जिसमें कब्जा प्राप्त करने कराना नवम्बर 2049 बताया गया। यद्यपि शिकायतकर्ता द्वारा परियोजना में बने रहने तथा आवंटित यूनिट का कब्जा लेने का इच्छुक है। आवंटी उत्पीड़ित है,उन््हे न तो मकान ही मिल पा रहा है और उन्हें बैंक की किस्तों की अदायगी भी करनी पड़ रही हैं। ऐसी दशा में यदि शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा तथा प्री-ई0एम0०आई की मांग उचित है। यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी और विपक्षी उसे अनुबंधित अवधि (अर्थात ग्रेस पीरियड सहित दिसम्बर 2045) में यूनिट का कब्जा देने में असमर्थ रहा है। ef शिकायतकर्तागण की सामूहिक शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए निम्न बिन्दु विचारणीय है :- 4. अनुबन्ध में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने के कारण इस पीठ की क्षेत्राधिकारिता न होना। 2. विषक्षी द्वारा अनुबन्ध में सबवेंशन स्कीम होने के बावजूद भी ई.एम.आई. का भुगतान न किया जाना। 3. विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये। निस्तारण बिन्दु सं० 4
विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि agra में आर्बट्रेशन का क्लाज है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध की बिन्दु 44 में कथन किया गया है कि :- " That all the disputes or disagreements arising out of in connections with or in relation to this allotment shall be mutually discussed and settled between the parties. However the disputes which cannot be amecably settled shall be finally decided by artitration and the sole atbitrator in such a case shall be appointed by the company. the arbitral proceedings shall take place as per the Indian Arbitration and Conciliation Act 996 or any amendement thereof shall be applicable. " जिससे विदित है कि अनुबन्ध के अनुसार दोनो पक्षों के मध्य किसी भी विवाद का निस्तारण परस्पर सहमति से Indian Arbitration and Conciliation Act 996 के अन्तर्गत किया जायेगा, जिसका क्षेत्राधिकार दिल्ली होगा। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बूज एलन व हेमिल्टन इंक आदि बनाम एस.बी.आई. होम फाईनेंस fio व अन्य में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" all aspects of arbritrability have to be decided by the court seized of the suit, and cannot be left to the decision of the Arbitrator. Even if an arbitration agreement exists and the dispute is covered therein, the court will refuse to refer the parties to arbitration — if the subject matter of the suit is capable of adjucdication only by a public forum or the relief clamied can only be granted by a special court or Tribunal." इसके अतिरिक्त ए.अय्यास्वामी बनाम ए परमाशिवम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " there are classes of disputes that fall within the exclusive domain of special bodies created under legislation that confers jurisdiction ot the exclusion of ordinary civil courts. Such disputes would not then be capable of resolution by arbitration," साथ माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा भी यह निर्णीत किया गया है किः-
The NCDRC finally held that in light of the overall architecture of the CPA and Court-evolved jurisprudence, amended sub-section () of Section 8 cannot be construed as a mandate to the Consumer Fora, constituted under the CPA, to refer the parties to arbitration in terms of the Arbitration Agreement. the principle that - jurisdiction of specially constituted judicial authorities cannot be ousted by a blanket mandate to refer disputes to arbitration under the umbrella of Section 8, A&C Act. On the ground level, it provides relief to a party to avail special remedies available under a statute, despite presence of an arbitration clause. This serves to protect parties from lop- sided and sparely-negotiable standard form agreements. From another angle, parties will no longer be mandated to adopt the relatively long and expensive process of arbitration - in disputes arising under specific statutes having specific dispute redressal mechanisms. This judgment could also be used to interpret Section 79 of the Real Estate (Regulation and Development) Act 206 (“Real Estate Act”) which bars the jurisdiction of civil courts in matters involving real estate. The NCDRC applied the reasoning in Ayyaswamy to conclude that the same principles could apply to cases under the Real Estate Act, which provides a special mechanism for resolution of disputes between buyers and builders.
माननीय उच्चतम न्यायालय एवं माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन ai के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये हैं और दीवानी न्यायालय के अतिरिक्त क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बीट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 20:6 की धारा 79, आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल wee अधिनियम के तहत उक्त \o” 5 मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं बिल्डरों के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु wo 4 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु tio 2
कुछ शिकायतकर्तागण द्वारा यह भी कहा गया कि उनके द्वारा सबवेंशन स्कीम में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसकी ई.एम.आई. का भुगतान कब्जे मिलने तक विपक्षी द्वारा किया जाना था, किन्तु अब विपक्षी द्वारा ई.एम.आई. का भुगतान नही किया जा रहा है, जिस कारण शिकायतकर्ता को उक्त ई.एम.आई. का भुगतान करना पड रहा है, जिससे वह विषय आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा है। इस पर विपक्षी की ओर से मौखिक तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध के अनुसार 24 माह तक ई.एम.आई. का भुगतान विपक्षी द्वारा किया गया है एवं वर्तमान में रियल एस्टेट मार्केट मंदी के दौर से गुजर रहा है। ऐसी दशा में विपक्षी स्वयं विषम आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा है और वर्तमान में वह पूर्ण रूप से परियोजना को पूर्ण करने में तत्पर है, ऐसी दशा में वह ई.एम.आई. का भुगतान करने में असमर्थ है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि रेरा के गठन का मूल उददेश्य से गृहकेताओं के हितों को दृष्टिगत रखते हुए रियल एस्टेट सैक्टर का विकास करना है। ऐसी परिस्थितियों में पीठ को दोनो पक्षों के आर्थिक हितों को दृष्टिगत रखते हुए सामंजस्य स्थापित करना है। ऐसी दशा में चूंकि विपक्षी परियोजना पूर्ण करने में तत्पर है और ऐसी स्थिति में यदि वह धनराशि को परियोजना से निकालता है, तो इससे अनेको ऐसे गृहकेताओं के हित प्रभावित होना अधिसंभावित हैं, जो अपने घरों के लिए प्रतीक्षारत हैं, किन्तु अनुबन्ध के विपरीत यदि गृहकेताओं द्वारा यदि ई.एम.आई. का भुगतान किया जा रहा है, तो शिकायतकर्ता इसका लाभ पाने का अधिकारी है। शिकायतकर्ता को उसके द्वारा भुगतान की जा रही ई.एम.आई. का लाभ अंतिम भुगतान में समायोजित कर दिया जाये। तद्नुसार बिन्दु सं०-2 Prema किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 3
शिकायतकर्ता का कहना है कि परियोजना दिसम्बर 20I5 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। अतः विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये। प्रपत्रों के अवलोकन से विदित है कि विपक्षी को चित्रसेन यादव को दिसम्बर 2045 तक कब्जा देना था, किन्तु विपक्षी अनुबंधित अवधि में कब्जा देने में असमर्थ रहा है। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को अनुबंधित अवधि के पश्चात शिकायतकर्ता को ओ.सी.,/सी.सी. सहित कब्जा दिये जाने तक की अवधि पर ब्याज दिलाया जाना है न्यायोचित है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन wife. aft बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 48()(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि उभयपक्ष को उक्त अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के WAR 3 अनुसार अगर 24 माह में कब्जा देने में असफल रहता है तो विपक्षी कब्जा मिलने तक प्री.एम.आई का भुगतान करेगा । इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. / have already indicated that the Provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 48, 38, 59, 60, 64, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, Prospectively and not retrospectively. VS अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नहीं, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक .5.2076 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा।
जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा HUA (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20ie के अधीन दिनांक 47.0.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,पटटा विलेख के प्रारूप के wero में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें we 9 (i) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +4% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर ofiii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को McLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी MCLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। तद्नुसार बिन्दु सं0 3 निस्तारित किया जाता है। जहां तक क्षतिपूर्ति का प्रश्न है, तो रेशा अधिनियम के अन्तर्गत इसका क्षेत्राधिकार एडज्यूडिकेटर का है, इस सम्बंध में पीठ द्वारा कोई आदेश परित नहीं किया जा सकता है। तदनुसार शिकायतकर्ता का प्रार्थनापत्र निस्तारित किया जाता है।
4... विपक्षी उपरोकतानुसार कब्जे हेतु मांग पत्र जारी करे। 8 विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह जून 2020 तक शिकायतकर्तागण से देय बकाया धनराशि प्राप्त कर site /सी.सी. सहित कब्जा देना सुनिश्चित करें। साथ ही विपक्षी विलम्बित अवधि के लिए 30.04. 2046 तक की अवधि के लिए अनुबन्ध के अनुसार शिकायतकर्तागण को प्रतिपूर्ति देना सुनिश्चित करें और 0१.05.2046 से WMA Gt सहित कब्जा दिये जाने तक एम.सी.एल.आर+4 की प्रतिशत की दर से ब्याज देना सुनिश्चित करें। ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी। विपक्षी, शिकायतकर्ता द्वारा दौरान निर्माण जमा की जाने वाली ई.एम.आई.की धनराशि को अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित किया जाये | यदि जून 2020 तक सभी सुविधाओं सहित कब्जा नहीं दे पाते, तो अगले 45 दिन में शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि जमा करने की तिथि से भुगतान की तिथि तक ८४५३ प्रतिशत की दर से ब्याज सहित धनराशि लौटाये। यदि इस इकाई हेतु बैंक से कोई ऋण लिया गया है, तो उक्त धनराशि में से पहले बैंक की धनराशि अदा की जायेगी, उसके पश्चात अवशेष धनराशि शिकायतकर्ता को दी जायेगी। इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र०भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। । खीर जे हम (कल्पना मिश्रा) (सदस्य) Soro भू--सम्पदा विनियामक प्राधिकरण