Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Bhupender Singh v. Project Category-Un-Register ORRIS INFRASTRUCTURE PRIVATE LIMITED
Complaint No. 420189933
- Decision date
- 2019-08-27
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04, श्रीमती कल्पना मिश्रा, सदस्य Hoe | शिकायत संख्या शिकायतकर्ता का नाम | 4. [420489933 | भूपेन्द्र सिंह 2. 420489944 रेनू कादयान बनाम ata इन्फास्ट्रक्चर प्राएलि0 शिकायतकर्ता भूपेन्द्र सिंह व रेनू कादयान द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य तथा साक्ष्य एक समान हैं। यह दोनों शिकायतें Green Bay Golf Village से सम्बंधित है। अत: एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत सं0 420489933 भूपेन्द्र सिंह अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत वाद शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं विलंबित ब्याज दिलाये जाने हेतु प्रस्तुत किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना Green Bay Golf Village में प्लॉट संख्या p-i:5 दिनांक 28.02.2044 को बुक कराया था जिसके उपरान्त शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी को समय-समय पर अनेक किश्तों के आधार पर विकय प्रतिफल का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण के पक्ष में एक आवंटन पत्र निष्पादित किया गया, जिसके अनुसार विपक्षी को आवंटन पत्र में अंकित नियत अवधि + 3 माह ग्रेस अवधि में कब्जा प्रदान करना प्रस्तावित था। यहाँ यह महत्वपूर्ण होगा कि विपक्षी आज तक कब्जा देने में असमर्थ रहा। जिस कारण शिकायतकर्तागण द्वारा भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण अधिनियम की धारा 34 के अन्तर्गत विपक्षी के विरूद्ध शिकायत दर्ज करायी गयी। शा 2 शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, SHA पत्र, भुगतान की रसीदें, भुगतान का विवरण, विपक्षी को प्रेषित पत्रों की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं।
विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया कि यमुना विकास प्राधिकरण द्वारा उसे आवंटित भूमि पूर्ण नही दी गयी, जिस पर अभी तक किसानों का कब्जा है और प्राधिकरण द्वारा विपक्षी से अनुचित धनराशि की मांग की जा रही थी, जिसके सम्बंध मे प्रकरण माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में लंबित है और विपक्षी द्वारा माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में धनराशि भी प्राधिकरण को दी जा चुकी है और मामला ee निस्तारित होने की संभावना है। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवेदन पत्र, पंजीयन प्रमाण पत्र, परियोजना के वर्तमान फोटो, यमुना विकास प्राधिकरण को प्रेषित पत्रों की छायाप्रतियां दांखिल की गयी। उभयपक्ष को सुना तथा पत्रावली का अवलोकन किया। शिकायतकर्ता का कहना है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में प्लॉट बुक किया था और विपक्षी को उक्त आवंटन के सापेक्ष धनराशि भी अदा की गयी थी, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नही दिया गया, इसके विपरीत विपक्षी का कहना है कि प्राधिकरण के साथ उसका मामला लंबे समय से माननीय उच्च न्यायालय में लबित है, जिसे यद्यपि विपक्षी द्वारा शीघ्र निस्तारित होने की संभावना अवश्य प्रकट की है, किन्तु यदि यह मान भी लिया जाये कि मामला शीघ्र निस्तारित हो जायेगा और शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा दे दिया जायेगा। विपक्षी द्वारा स्वयं इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि उसके द्वारा आज तक शिकायतकर्ता को कब्जा नही दिया जा सका है, जबकि अनुबन्ध के अनुसार कन्फर्मेशन की तिथि से 48+3 माह में दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कब्जा नही दिया जा सका है।
शिकायतकर्तागण द्वारा यह भी कहा गया कि उक्त परियोजना की भूमि अभी तक विपक्षी के कब्जे में नही है और मौके पर खेती हो रही है और विकास कार्य अधूरे हैं। शिकायतकर्तागण के आरोपों की जांच हेतु पीठ द्वारा निर्माण wa की जांच हेतु आदेश पारित किये गये, जिस पर श्री बलराम वर्मा, wa उप-सचिव, रेरा द्वारा दिनांक 45.02.2049 को निर्माण स्थल की जांच कर आख्या प्रस्तुत की गयी। जांच आख्या में उल्लिखित है कि क्लब हाऊस का निर्माण अभी शुरू नही हुआ है, एस.टी.पी. का अधिकांश सिविल वर्क पूर्ण किया जा चुका है, पानी व बिजली की फिटिंग का कार्य पूर्ण है, सडक का कार्य 90 प्रतिशत पूर्ण है, ओ.सी. के सम्बंध में कोई प्रपत्र मांगने पर विपक्षी की ओर से प्रस्तुत नही किया जा सका, कुछ प्लॉट की भूमि पर खेती हो रही है और यमुना विकास प्राधिकरण के कब्जे में है। जांच आख्या से स्पष्ट है कि परियोजना में कार्य हुआ है, किन्तु यह भी स्पष्ट है कि परियोजना की भूमि पर किसानों का कब्जा है। विपक्षी की ओर से कहा गया है कि यमुना विकास प्राधिकरण और विपक्षी के मध्य विवाद शीघ्र निस्तारित होने की संभावना है, शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं कब्जा दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को विलंबित अवधि की प्रतिपूर्ति दिलाया जाना उचित है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 48(4)(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि vouo रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व dat के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि wed द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। Go 4
यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जो कि उभयपफक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि उभयपक्ष को vat अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के अनुसार परियोजना के विलंब की अवधि में 45 रूपये प्रतिवर्ग गज प्रतिमाह की दर से धनराशि का प्राविधान है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता धनराशि पाने का अधिकारी है, किन्तु शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आपत्ति की गयी है कि उक्त धनराशि अत्यंत कम है और रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा धनराशि प्राप्त की गयी है उसी दर से धनराशि देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- "For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 8, 38, 59, 60, 6, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively.” अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि vouo रेरा के
प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 4.5.2046 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 47.0.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय ,//पटटा के लिए करार) नियमावली 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये faea/ueci विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- eo "The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:"
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी wea ofiii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को McLR+H प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी MciR+H प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक ब्याज की अवधि का प्रश्न है, तो विपक्षी की ओर से कहा गया कि वह नवम्बर 2049 तक कब्जा दे दिया जायेगा, इस सम्बंध में सिविल अपील Wo 6649-50/20i8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- “the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent - Purchaser herself in Para 40) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant —Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने व कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्तागण मात्र ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। जा 6 जहां तक मुआवजा देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के
क्षेत्राधिकार में है। अतः इस बिन्दु पर प्राधिकरण द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा सकता है। शिकायतकर्ता का प्रार्थनापत्र तदनुसार निस्तारित किया जाता है और विपक्षी को निम्नलिखित रूप से आदेशित किया जाता है कि :- 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह ओ.सी./सी.सी. सहित 45 दिन के अंदर, यदि कोई देय धनराशि अनुबंध के अनुसार बकाया है, तो उसे प्राप्त कर कब्जा देना सुनिश्चित करें और नियमानुसार स्टाम्पशुल्क प्राप्त कर पंजीयकरण कराना सुनिश्चित करें। विपक्षी, शिकायतकर्ता को ग्रेस पीरियड के साथ विलंबित अवधि का ब्याज रेरा आने के पूर्व अनुबन्ध के अनुसार देय होगा एवं रेरा आने के उपरांत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित McLR+ प्रतिशत की ब्याज दर पर देय होगा। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। यंदि ब्याज की धनरांशि देय धनरांशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये। यदि बायर्स की ओर से कोई धनराशि बिल्डर को देय रहती है तो धारा 2 (za) () के प्राविधानों के अनुरूप बिल्डर MCLR+H प्रतिशत वार्षिक ब्याज दर से ही ब्याज ले। आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस आदेश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन उ0फप्र०भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक- 2.2. /oQ /2049 Kw Fa vaya (कल्पना मिश्रा) > (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण