Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Shilpi Srivastava / Anupam Kumar v. Lucknow Development Authority Lucknow Development
Complaint No. 2201930835
- Decision date
- 2019-07-16
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 1 Lucknow
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
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Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, लखनऊ | सुनवाई पीठ-04, उपस्थिति — श्री राजीव कुमार (अध्यक्ष) शिकायत संख्या : 2204930835 शिल्पी श्रीवास्तव / अनुपम कुमार, 9/204, मलहार सहारा स्टेट, जानकीपुरम लखनऊ | जनणओ >> शिकीयिलेकर्ता बनाम लखनऊ विकास प्राधिकरण, विपिन खण्ड, गोमतीनगर, ae 'ज कर हे ४ reaumnineignnearaONRENTEERE विपक्षी आदेश शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध कब्जा एवं लिम्बित ब्याज दिलाये जाने की प्रार्थना की गयी है। संक्षेप में शिकायतकर्ता द्वारा अपने शिकायत में यह अंकित किया गया है कि उसने जानकीपुरम विस्तार के अंतर्गत “स्मृति अपार्टमेंट" में एक फ्लैट ८/303/#-2 दिनांक 43.06.2044 को बुक कराया था जिसकी कुल कीमत wo 24,90,000/— (चौबीस लाख नब्बे हजार रुपये मात्र) थी। शिकायतकर्ता द्वारा BO 4,55,248 /- (ग्यारह लाख Ta हजार दो सौ अठारह रुपये मात्र) की अदायगी की गयी। शिकायतकर्ता द्वारा यह अवगत कराया गया कि विपक्षी की पंजीकरण पुस्तिका के अनुसार 24 माह अर्थात् दिनांक 43.06.203 तक कब्जा दिया जाना था, परन्तु विपक्षी नियत अवधि में कब्जा दिये जाने में असफल रहा हैं। विपक्षी ने पत्र दिनांक 25.05.208 द्वारा अवगत कराया कि बिना परिवर्तन शुल्क के इकाई or wag सरगम अपार्टमेंट में कर दिया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा आवंटित फ्लैट का कब्जा दिलाये जाने एवं कब्जे में हुये विलम्ब के लिए विलम्बित ब्याज दिलाये जाने की प्रार्थना की गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने शिकायत के सम्बन्ध में निम्नलिखित साक्ष्य दाखिल की हैः- दिनांक 43.06.2044 को जारी आवंटन पत्र। धनराशि अदायगी की रसीदें | विपक्षी द्वारा भेजे गए पत्र। पंजीकरण पुस्तिका। a oN =
विपक्षी द्वारा इस सम्बन्ध में लिखित अभिकथन दिनांक 44.03.2049 को दाखिल किया गया जिसमें यह बताया गया कि शिकायतकर्ता द्वारा अनुरोध किये जाने पर उनकी इकाई को 3B.H.K. से SBLHLK. सरगम अपार्टमेंट में बिना परिवर्तन शुल्क के स्थानान्तरित कर दिया गया। फ्लैट के aan i9.72 वर्ग फीट बढ़ गया जिसके एवज में शिकायतकर्ता द्वारा धनराशि की अदायगी की जानी है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी से क्षतिपूर्ति की मांग की गयी है जो कि पोषणीय नहीं है, क्योंकि आवंटन पत्र के प्रस्तर-44.2 में अंकित है कि यदि विपक्षी द्वारा विलम्ब से इकाई का कब्जा दिया जाता है तो आवंटी को कोई ब्याज /प्रतिकर देय नहीं होगा। इस सम्बन्ध में विपक्षी द्वारा मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या 6054/2002 गाजियाबाद विकास प्राधिकरण बनाम शकुन्तला रोहतगी का आदेश उद्धृत किया है। अतः शिकायतकर्ता को क्षतिपूर्ति पाने का लाभ नहीं प्राप्त हो सकता है। परियोजना में हुआ विलम्ब किसान आन्दोलन तथा राज्य सरकार एवं किसानों के मध्य हुए विवाद के कारण हुआ। परियोजना के निर्माणकर्ता एजेंसी मेसर्स मार्ग लि0 एवं विपक्षी के मध्य विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई जिससे मामला विवादित होता चला गया और अंततः आर्बिट्रेटर श्री अरूण कुमार Reel के समक्ष उक्त प्रकरण प्रस्तुत किया गया। उक्त प्रकरण का निस्तारण आिंट्रेटर द्वारा दिनांक 26.0.2046 को किया गया। जिसमें उल्लेख किया है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण और मेसर्स मार्ग के मध्य के विवाद को हल करने में अक्टूबर-2045 तक समय लग गया था। विपक्षी द्वारा यह भी अंकित किया है कि वह एक सरकारी संस्था है और NO PROFIT NO LOSS के अर्न्तगत परियोजनाओं का निर्माण करते है। विपक्षी ने यह भी अंकित किया कि शिकायतकर्ता से प्राप्त जी.एस.टी. की राशि प्रत्यक्ष रूप से भारतीय सरकार को जमा की जानी है। विपक्षी द्वारा रेरा के पोर्टल पर परियोजना की पूर्ण तिथि 34. 42.209 अंकित की गयी है।
विपक्षी द्वारा अपने समर्थन में निम्न साक्ष्य दाखिल किये गये हैं :- 4. आवंटन पत्र की प्रति। 2. निर्माणकर्ता एजेंसी को भेजे गए पत्र। दोनों पक्षों के तर्कों को सुना एवं पत्रावली पर उपलब्ध अभिलेखों का परिशीलन किया। अभिलेखों के अवलोकन से स्पष्ट है कि यह वाद निम्नलिखित बिन्दु पर पूर्णतः आधारित हैः- 4. क्या मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बी0डी0ए0 बनाम शकुन्तला रोहतगी में दिया गया निर्णय प्रस्तुत प्रकरण में भी लागू होगा ? 2. war विपक्षी की परियोजना विलम्बित है अथवा नहीं, यदि हाँ तो किस अवधि के लिए ? 3. क्या लखनऊ विकास प्राधिकरण vat अवधि में कोई रिलीफ पाने का अधिकारी है अथवा नहीं ? 4. क्या शिकायतकर्ता विलम्बित अवधि के लिए विलम्बित ब्याज पाने का अधिकारी है अथवा नहीं? विवाद बिन्दु--4
जहाँ तक प्रश्न Alo सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बी0डी0ए0 बनाम शकुन्तला रोहतगी में दिया गया निर्णय प्रस्तुत प्रकरण में भी लागू होगा, इस सम्बन्ध में विपक्षी की ओर से माए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गाजियाबाद विकास प्राधिकरण बनाम शकुन्तला रोहतगी (सिविल अपील संख्या 6057/2002) F दी गयी विधि व्यवस्था उद्धृत की है जिसके अनुसार जहाँ संपत्ति अनुमानित मूल्य पर अंतिम मूल्यांकन की शर्त के साथ आवंटित किया जाता है तथा अंतिम मूल्यांकन के बाद अगणित मूल्यांकन के आधार बनाकर बिना मूल्य बढ़ाए संपत्ति दी जाती है तो उसे पुनरीक्षित मूल्य नहीं माना जा सकता व विलम्ब के लिए कोई धनराशि देय नहीं होगी। मूलतः यह ACHR इस अवधारण पर आधारित है कि इस अन्तराल में हुई संपत्ति की मूल्य वृद्धि विलंब के लिए पर्याप्त कम्पेनसेशन है किन्तु वर्तमान रियल एस्टेट मार्केट में सभी स्थितियों में ऐसा नहीं कहा जा सकता। साथ ही यह नजीर रेरा के लागू होने से पूर्व की है तथा धारा-48 रेरा के प्राविधान प्रस्तुत प्रकरण में लागू होगा | विवाद बिन्दु-2
जहाँ तक परियोजना के विलम्ब का प्रश्न है, विपक्षी द्वारा अपने लिखित प्रतिवाद-पत्र दिनांक- 44.03.2049 में किसान आन्दोलन एवं न्यायिक विवाद कारणों का आधार लिया है, इसके समर्थन में अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत किये गये हैं। परियोजना के निर्माणकर्ता एजेंसी मेसर्स मार्ग लि0 एवं विपक्षी के मध्य विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई जिससे मामला विवादित होता चला गया और अंततः आर्बिट्रेटर श्री अरूण कुमार Reet के समक्ष उक्त प्रकरण प्रस्तुत किया गया। उक्त प्रकरण का निस्तारण आरिट्रिटर द्वारा दिनांक 26.40.206 को किया गया। जिसमें उल्लेख किया है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण और मेसर्स मार्ग के मध्य के विवाद को हल करने में अक्टूबर-2045 तक समय लग गया था। पंजीकरण पुस्तिका के प्रस्तर-2.4 के अनुसार परियोजना का निर्माण कार्य 24 माह में पूर्ण होना था। आवंटन-पत्र दिनांक 43.06.2044 का है व इस प्रकार कब्जा दिनांक 3.06.203 तक दिया जाना था, परन्तु विपक्षी लगभग 6 वर्ष बीत जाने के उपरान्त भी शिकायतकर्ता को कब्जा प्रदान कराने में असफल रहा है। अतः इससे स्पष्ट है कि परियोजना में लगभग 6 वर्ष का विलम्ब है। विवाद बिन्दु- 3
जहाँ तक प्रश्न लखनऊ विकास प्राधिरण उक्त अवधि में कोई रिलीफ पाने का अधिकारी है अथवा नहीं, इस सम्बन्ध में विपक्षी की ओर से अनिवार्य बाध्यता के सम्बन्ध में अंकित किया है कि किसान आन्दोलन तथा राज्य सरकार एवं किसानों के मध्य हुए विवाद के कारण हुआ। परियोजना के निर्माणकर्ता एजेंसी मेसर्स मार्ग द्वारा निर्माण कार्य विलंब से किया गया है,जिनको समय-समय पर अनुस्मारक पत्र भेजे गये थे। परियोजना के निर्माणकर्ता एजेंसी मेसर्स मार्ग लि0 एवं विपक्षी के मध्य विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई जिससे मामला विवादित होता चला गया और अंततः py आर्बिट्रेटर श्री अरूण कुमार Reet के समक्ष उक्त प्रकरण प्रस्तुत किया गया। उक्त प्रकरण का निस्तारण आईिट्रेटर द्वारा दिनांक 26.40.2046 को किया गया। जिसमें उल्लेख किया है कि लखनऊ विकास प्राधिकरण और मेसर्स मार्ग के मध्य के विवाद को हल करने में अक्टूबर-2045 तक समय लग गया था। निर्माणकर्ता एजेंसी को चेतावनी भी दी गयी परन्तु इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। ऐसी परिस्थिति में निर्माणकर्ता एजेंसी का अनुबन्ध दिनांक 46.02.2048 को निरस्त कर दिया गया था। उक्त के सम्बन्ध में विपक्षी को एक वर्ष की रिलीफ प्रदान की जाती है। इस प्रकार विपक्षी को बुकिंग तिथि से 24 माह में कब्जा प्रदान था, परन्तु अभी तक नहीं किया गया है। विपक्षी की परियोजना दिनांक 04.4.2045 से कब्जा ऑफर करने की तिथि तक विलम्बित मानी जायेगी। विवाद बिन्दु- 4
जहाँ तक प्रश्न शिकायतकर्ता विलंबित अवधि के लिए विलम्बित ब्याज पाने का अधिकारी है अथवा नहीं, इस सम्बन्ध में उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को लगभग 04 वर्ष बीत जाने के उपरान्त भी कब्जा प्राप्त नहीं कराया गया है। अतः स्पष्ट है कि संप्रवर्तक / विपक्षी विलम्ब के लिए स्वयं उत्तरदायी है तथा उसके द्वारा प्रस्तुत तर्क आधारहीन है। अभिलेखों से यह भी स्पष्ट है कि विपक्षी शिकायतकर्ता को कब्जा प्राप्त कराने में अत्याधिक विलम्ब होने के उपरान्त भी असफल रहा है। इसके फलस्वरूप विपक्षी रियल wee (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 की धारा- 48 के अन्तर्गत उत्तरदायी है। ऐसी स्थिति में शिकायतकर्ता विपक्षी के मूल धनराशि जो उसके द्वारा जमा की गयी है तथा कब्जा दिये जाने के सम्बन्ध में हुए विलम्ब के लिये ब्याज पाने का अधिकारी है। इस सम्बन्ध में महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया की याचिका में याचीगण की ओर से यह तर्क लिया गया था कि :- Section 4(2)(4)(0) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section4(2)(l)(c) enables the promoter to giver fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to a
prescribe fresh time line under Section 4(2)(2)(c), he is not absolved of liability under the agreement for sale. Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month’s delay till handing over of the possession. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह wre है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रोमोटर व केता के बीच किये गये अनुबन्ध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज होगा, क्योंकि प्रोमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। ज देय जहाँ तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं
विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक- 47.0.208 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास (विकय / पट्टा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी है। इसमें संलग्नक के ) रूप में दिये गये विकय /पट्टा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रोमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (i) ¥ प्रोमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to D refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +2% unless provided otherwise under the Rules, within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफाल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर oii) F निर्धारित है। var प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को ४८३५१ प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। TR शिकायतकर्ता का प्रार्थना-पत्र स्वीकार किये जाने योग्य है। 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश की तिथि से 60 दिन के अन्दर शिकायतकर्ता की मूल इकाई या सरगम अपार्टमेंट में वैकल्पिक इकाई की रजिस्ट्री कराकर कब्जा प्रदान करना सुनिश्चित करें।
2. विलम्ब की अवधि के लिए स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा निर्धारित ॥८।३+१% सामान्य वार्षिक ब्याज की दर से दिनांक 02.:7.205 से वास्तविक कब्जा ऑफर करने की तिथि तक भुगतान करना सुनिष्चित करें| ब्याज की यह धनराशि अन्तिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी। विलम्ब ब्याज की धनराशि भुगतान की धनराशि से अधिक होने की दशा में शिकायतकर्ता को नियमानुसार वापस की जाये। इस आदेश का उल्लंघन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20:6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। उपरोक्तानुसार शिकायतकर्ता के शिकायत का निस्तारण किया जाता है। दिनांक:-09 /०७३// 2049 Qos अत (राजीव कुमार) अध्यक्ष उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण