Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Himanshu Shekhar v. La Residentia Developers Private Limited
Complaint No. 12201827783
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- Counsel
- Puneet Jain (for the respondent)
Source: UP RERA order
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Judgment text
व उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार,अध्यक्ष कम सं० [शिकायत सं० | [शिकायतकर्ता | | __4 _ | t2200827792 [अपूर्व शर्मा | [2 _| t2200827774 नीरज शर्मा ।| शम | _3 _| 920789248 [फेशलअनीस | | ___4 __| 220082783 [हिमांशु शेखर | | बनाम लॉ रेजिडेन्सिया डेवलपर्स प्राएलि0 शिकायतकर्ता ag शर्मा के साथ 3 अन्य शिकायकतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान है और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें La Residentia से सम्बंधित है। अतः एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत Wo 42204827792 अपूर्व शर्मा अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध ई.एम. आई. एवं अर्थदंड, विधिक शुल्क, यात्रा खर्चा, दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्तागण का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना La Residentia में एक फ्लैट Wo टी-24 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय-समय पर किश्तों के आधार पर 3,23,843 /- रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा दिनांक 34.03. soy तक दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अनुबन्ध के निर्धारित अवधि में शिकायतकर्तागण को कब्जा देने में असमर्थ रहा। शिकायतकर्ता का यह भी कहना है कि अनुबन्ध में 48 माह में फ्लैट का कब्जा देना था, किन्तु आज तक ऑफर ऑफ पजेशन नहीं दिया गया। फ्लैट को wader स्कीम के तहत लिया गया था जिसमें विपक्षी द्वारा प्री-ई.एम.आई का भुगतान ऑफर ऑफ पजेशन तक किया गया था। विपक्षी द्वारा मार्च 2007 तक डी.एच.एफ.एल को भुगतान किया गया और उसके
eG 2 पश्चात् भुगतान रोक दिया गया। जिस कारण शिकायतकर्तागण द्वारा soso भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण अधिनियम की धारा 3 के अन्तर्गत विपक्षी के विरूद्ध शिकायत दर्ज करायी गयी। शिकायतकर्तागण द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, फ्लैट केता अनुबन्ध, ई-मेल, खाता विवरण, पत्र दिनांक 30.09.20:7, चैक की छायाप्रति, त्रिपक्षीय अनुबन्ध (सवर्बेशन), ऋण पत्र, आवेदन फार्म की छायाप्रतियां दाखिल की गयीं।
विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया है कि फ्लैट केता अनुबन्ध दिनांक 47.04.20i5 के अनुसार कब्जा 42 माह एवं 6 माह की aque अवधि के साथ दिनांक 47.04.20:9 को दिया जाना था, किन्तु प्रस्तुत शिकायत कब्जे की तिथि से पूर्व संस्थित की गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा फ्लैट को सबवेंशन प्लॉन के तहत i8 माह अथवा ऑफर ऑफ पजेशन तक दिया जाना था। त्रिपक्षीय अनुबन्ध के अनुसार ई.एम.आई का भुगतान 8 माह अनुबन्ध की तिथि से अथवा कब्जे की तिथि जो भी पहले तक किया जाना था। डी.एच.एफ.एल. द्वारा ऋण की धनराशि जारी करने से पूर्व में ही ie माह की प्री-एम.आई ली जा चुकी है, जिसके पश्चात् विपक्षी उत्तरदायी नहीं है। शिकायतकर्ता द्वारा किश्त रूपये 4,58,400/— का भुगतान teat तल के निर्माण कार्य हेतु दिनांक 28.05.20:6 से बकाया है। शिकायतकर्ता द्वारा समय के अनुसार किश्तों का भुगतान नहीं किया गया है, परियोजना का निर्माण कार्य फोर्स मैज्योर के कारण विलम्ब हुआ है। विपक्षी का यह भी कहना है कि उनके द्वारा माननीय सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र दाखिल करते हुए परियोजना के कब्जे की तिथि दिसम्बर 2049 दी गई है। विलम्ब के लिए विपक्षी 5 रूपये प्रति वर्ग फुट क्षतिपूर्ति देने को तैयार है | परियोजना में 42 टॉवर के ओसी प्राप्त करा जा चुका है और शेष 7 टॉवर हेतु आवेदन किया जा चुका है। परियोजना को पूर्ण कर दिसम्बर 209 तक कब्जा दे दिया जायेगा। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया।
यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी और विपक्षी उसे अनुबंधित अवधि में यूनिट का कब्जा देने में असमर्थ रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया कि सवर्बेशन प्लॉन के तहत प्री-ई. एम.आई का भुगतान नहीं किया जा रहा है। अतः प्री-ई.एम.आई दिलायी जाये। जिस पर विपक्षी द्वारा कहा गया कि त्रिपक्षीय अनुबन्ध के अनुसार ई.एम.आई का भुगतान अनुबन्ध की तिथि से 48 माह अथवा कब्जे की तिथि जो भी पहले तक किया जाना था। डी.एच.एफ.एल द्वारा प्री-ई.एम.आई ऋण की धनराशि जारी करने से पहले कटौती कर ली गयी है। जिसके पश्चात् विपक्षी उत्तदायित्व नहीं है, विपक्षी द्वारा परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्ब होने का उल्लेख भी किया गया है। 3 शिकायतकर्तागण की सामूहिक शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए निम्न बिन्दु विचारणीय है :- 4... क्या परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई ? 2. क्या विपक्षी द्वारा त्रिपक्षीय अनुबच्ध में सबवेंशन स्कीम होने के बावजूद भी ई. एम.आई. का भुगतान नहीं किया गया ? 3. क्या शिकायतकर्तागण को कब्जा एवं विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया . जाये? 4... क्या इस अथारिटी को यह प्रकरण सुनने का अधिकार है ? 5, क्या विलम्ब के लिए एग्रीमेन्ट-टू-सेल में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित विलम्ब ब्याज की दर के रूप में लागू की जा सकती है ? निस्तारण बिन्दु Wo 4
विपक्षी का कहना है कि परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई है, जिसको साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी द्वारा अपने प्रतिवाद पत्र में कहा गया है कि फ्लैट के कब्जे देने की तिथि फोर्स मैज्योर प्रतिबन्धों के अधीन था और परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण विलम्बित हुई जिसमें की भूमि अधिग्रहण को लेकर प्राधिकरण एवं किसान में विवाद थे, परियोजना का निर्माण कार्य माननीय उच्च न्यायालय के आदेश दिनांक 49.07.2074 (हरकरण एवं अन्य बनाम उ0प्र0 राज्य सरकार एवं अन्य) के कारण बाधित रहा है जिसमें की पटवारी गाँव के अधिकरण को खारिज किया गया और निर्देश दिया गया कि किसानों को अधिग्रहित भूमि लौटायी जाये। तत्पश्चात् गजराज एवं अन्य बनाम उ0प्र0 राज्य सरकार के आदेश के कारण विपक्षी द्वारा निर्माण कार्य नहीं शुरू कराया गया क्योंकि किसानों द्वारा उग्र yee किये गये जिसमें की उनकों अतिरिक्त मुआवजा देने के आदेश हुए व बाद में परियोजना का निर्माण कार्य शुरू कराया गया। किन्तु विपक्षी द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया कि क्या न्यायालय में विचाराधीन विवादित भूमि उनकी परियोजना से सम्बंधित थी और न हीं कोई ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत किया गया है जिससे कि विदित हो कि परियोजनां उस आदेश के कारण विलम्बित हुई है। तद्नुसार बिन्दु सं0 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Ho 2 शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया कि उनके द्वारा त्रिपक्षीय अनुबन्ध के सबवेंशन स्कीम में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसकी ई.एम.आई का भुगतान कब्जे मिलने तक विपक्षी द्वारा किया जाना था, किन्तु अब विपक्षी द्वारा ई.एम.आई का भुगतान नहीं किया जा रहा है जिस कारण शिकायतकर्ता को उक्त ई.एम.आई. का भुगतान करना पड़ रहा a H
है, जिससे वह विषण्य आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा है। इस पर विपक्षी की और से प्रतिवाद पत्र प्रस्तुत करते हुए कहा गया कि अनुबन्ध के अनुसर i8 माह तक ई. एम.आई. का भुगतान विपक्षी द्वारा किया गया है और प्रतिवाद पत्र के प्रस्तर 5 में यह भी कहा गया है कि डी.एच.एफ.एल द्वारा ऋण की धनराशि जारी करने से पहले 78 माह का प्री-ई.एम.आई उस धनराशि में से कटौती कर ली गयी है। प्रपत्रों के अवलोकन से विदित है कि पक्षकारों के मध्य त्रिपक्षीय अनुबन्ध निष्पादित किये गय जिस पर पक्षकारों के हस्ताक्षर है। त्रिपक्षीय aged के wae 5 में स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि-: The builder shall make the payment of pre-emi interest for the term of l8 months or offer of possession as stated above in the advance/upfront on behalf of the borrower to DHFL.The said pre-emi amount payable by the builder shall be paid directly, by way of deduction of appropriate sum by DHFL,as authorized by the builder, from the loan being disbursed by DHFL,in case disbursement date of loan is other than Ist day of the month,pre- emi for the broken period (i.e fro the disbursement that till end of the month)shall be paid by borrower forthwith.
उपरोक्त से यह we है कि बिल्डर द्वारा केता की ओर से प्री-ई.एम.आई का भुगतान निश्चित समय 48 माह अथवा ऑफर ऑफ पजेशन तक डी.एल.एफ.एल को की जायेगी। प्री-ई.एम.आई की धनराशि का भुगतान बिल्डर द्वारा सीधे, ऋण की कुल धनराशि में से कटौती के रूप में, जो कि बिल्डर द्वारा अधिकृत किया जायेगा के अनुसार किया जायेगा। शिकायतकर्ता द्वारा अपनी शिकायत में कहा गया है कि विपक्षी द्वारा मार्च 2007 तक ई.एम.आई. का भुगतान किया गया है। चूंकि उक्त अनुबन्ध पर शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर है जिससे प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता को उपरोक्त शर्त स्वीकार्य थी। अतः: शिकायतकर्ता का तर्क बलहीन है कि विपक्षी द्वारा ई.एम.आई का भुगतान नहीं किया गया। तदनुसार बिन्दु to 2 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 3 शिकायतकर्ता का कहना है कि परियोजना मार्च 2047 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। विपक्षी की ओर से कहा गया कि माननीय उच्च न्यायालय के we के कारण परियोजना का निर्माण कार्य बाधित रहा है, जिस कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई है। किन्तु ऐसा साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया कि जिससे स्पष्ट हो सके कि माननीय उच्च न्यायालय के कौन से आदेश इस परियोजना पर लागू होते है। अभिलेखों के अवलोकन से विदित है कि विपक्षी को दिनांक 47.04.209 तक कब्जा देना था, 5
किन्तु विपक्षी अनुबंधित अवधि A कब्जा देने में असमर्थ रहा है। विपक्षी द्वारा अपने ghar पत्र कहा गया है कि दिसम्बर 20I9 तक कब्जा देगें। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता को अनुबंधित अवधि में पश्चात् शिकायतकर्ता को ओ.सी/सी.सी सहित दिसम्बर 2049 तक कब्जा दिये जाने तक की अवधि पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित है।इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबशर्बन प्रा.लि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- Section 48(4)(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable.
अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक AIT निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि उभयपक्ष को उक्त अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के अनुसार परियोजना के विलंब की अवधि में 5 रूपये प्रतिवर्ग फूट प्रतिमाह की दर से धनराशि का प्राविधान है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता धनराशि पाने का अधिकारी है, रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा धनराशि प्राप्त की गयी है उसी दर से धनराशि देने का प्राविधान है। ०2 इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 8, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively.
अत: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 04.05.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 04.05.2046 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20i6 के अधीन दिनांक 7.40.20:8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2or8 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के wae 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (li) A प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +l% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: ESS \ ८
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर o(iii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLR+I प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहाँ तक किस अवधि तक ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में सिविल अपील Wo 6649-50 /208 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 206 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार ओ.सी. मिलने तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में शिकायतकर्तागण मात्र ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तदनुसार बिन्दु do 3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या--4
क्या इस अथारिटी को यह प्रकरण सुनने का अधिकार नहीं है ? जहाँ तक प्राधिकरण के विधिक रूप से सुनवाई न करने के क्षेत्राधिकार का प्रश्न है। इस सम्बंध में स्पष्ट करना है कि प्रथम grea किसी परिवाद को दर्ज कराये जाने के लिए भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 206 के धारा-3॥ के अन्दर प्राविधान दिये गये है जो कि निम्न रूप से उल्लेखित है-: 3l. () Any aggrieved person may file a complaint with the Authority or the adjudicating officer, as the case may be, for any violation or contravention of the provisions of this Act or the rules and Y regulations made thereunder against any promoter allottee or real estate agent, as the case may be. Explanation.—For the purpose of this sub-section "person" shall include the association of allottees or any voluntary consumer association registered under any law for the time being in force. (2) The form, manner and fees for filing complaint under sub-section () shall be such as may be specified by regulations
उपरोक्तानुसार कोई पीड़ित व्यक्ति, किसी wade, आवंटी या भू-सम्पदा अभिकर्ता के flee अधिनियम या उसके अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के उपबन्धों के किसी अतिकमण या उल्लंघन के लिए मामलों के अनुसार (as the case may be), प्राधिकरण या न््यायनिर्णायक अधिकारी के समक्ष शिकायत दाखिल कर सकता है। इससे स्पष्ट है कि शिकायत को प्राधिकरण और न्यायनिर्णायक अधिकारी दोनों के समक्ष उनके क्षेत्राधिकार एवं मामलों के अनुसार (as the case may 9०0) प्रस्तुत किये जा सकते है। प्राधिकरण और न्यायनिर्णायक अधिकारी के क्षेत्राधिकार और उनके सुन जाने वाले मामले रेरा अधिनियम में सम्बंधित प्राविधानों के अन्तर्गत उल्लेख किये गये है। रेरा अधिनियम में प्राधिकरण (Authority) ERT प्रयोग किये जाने वाली शक्तियों (Powers) का अधिकार धारा-35,36,37,38, के अन्तर्गत दी गयी है। इनमें से मुख्य शक्ति जो कि धारा-38 में प्राधिकरण को दी गयी है, जिसका पढ़ा जाना उचित होगा, जो कि निम्नवत है :- 38. (l) The Authority shall have powers to impose penalty or interest, inregard to any contravention of obligations cast upon the promoters, the allottees and the real estate agents, under this Act or the rules and the regulations made thereunder. (2) The Authority shall be guided by the principles of natural justice and, subject to the other provisions of this Act and the rules made thereunder, the Authority shall have powers to regulate its own procedure. (3) Where an issue is raised relating to agreement, action, omission, practice or procedure that—
(a) has an appreciable prevention, restriction or distortion of competition in connection with the development of a real estate project; or (b) has effect of market power of monopoly situation being abused for affecting interest of allottees adversely, then the Authority, may suo motu, make reference in respect of such issue to the Competition Commission of India. उपरोक्त प्राविधान की धारा-38 की VIIRI-7 यह है कि प्राधिकरण को, सम्प्रवर्तकों, आवंटियों और भू-सम्पदा अभिकर्ताओं पर डाली गयी बाध्यताओं के किसी भी उल्लंघन के सम्बंध में, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाये गये नियमों और विनियमों के अधीन अर्थदंड (Penalty) या ब्याज (Interest) अधिरोपित करने की शक्ति होगी। इससे स्पष्ट है कि सम्प्रवर्तक, आवंटियों और भू-सम्पदा अभिकर्ताओं पर डाली गयी बाध्यताओं (Obligations) किसी भी उल्लंघन के लिए अर्थदंड (Penalty) और ब्याज (Interest) प्राधिकरण द्वारा घारा 38(4) के अन्तर्गत अधिरोपित किया जायेगा। इसके अतिरिक्त नयायनिर्णयन करने की शक्ति भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 2076, की eRI-7" में दी गयी है। जो कि निम्नवत् है-;
7i. (0) For the purpose of adjudging compensation under sections 2, 4, 8 and section 9, the Authority shall appoint in consultation with the appropriate Government one or more judicial officer as deemed necessary, who is or has been a District Judge to be an adjudicating officer for holding an inquiry in the prescribed manner, after giving any person concerned a reasonable opportunity of being heard: Provided that any person whose complaint in respect of matters covered under sections 2, 4, 8 and section 9 is pending before »J 40 the Consumer Disputes Redressal Forum or the Consumer Disputes _ Redressal Commission or the National Consumer Redressal Commission, established under section 9 of the Consumer Protection Act, 986, on or before the commencement of this Act, he may, with the permission of such Forum or Commission, as the case may be, withdraw the complaint pending before it and file an application before the adjudicating officer under this Act. (2) The application for adjudging compensation under sub-section (), shall be dealt with by the adjudicating officer as expeditiously as possible and dispose of the same within a period of sixty days from the date of receipt of the application: Provided that where any such application could not be disposed of within the said period of sixty days, the adjudicating officer shall record his reasons in writing for not disposing of the application within that period.
(3) While holding an inquiry the adjudicating officer shall have power to summon and enforce the attendance of any person acquainted with the facts and circumstances of the case to give evidence or to produce any document which in the opinion of the adjudicating officer, may be useful for or relevant to the subject matter of the inquiry and if, on such inquiry, he is satisfied that the person has failed to comply with the provisions of any of the sections specified in sub-section (), he may direct to pay such compensation or interest, as the case any be, as he thinks fit in accordance with the provisions of any of those sections. उपरोक्त प्राविधान की ae7i(t) यह है कि प्राधिकरण की sRt-72, धारा-44, URI-t8 और धारा-49 के अधीन जहाँ क्षतिपूर्ति (Compensation) न्यायनिर्णीत करने के लिए, प्राधिकरण समुचित सरकार के परामर्श से ऐसे एक या अधिक न्यायिक अधिकारी जैसा आवश्यक समझे, जो जिला न्यायधीश हैया के 42 रहा है, न््यायनिर्णायक अधिकारी के रूप में नियुक्त करेगा, जो कि किसी संबद्ध व्यक्ति को सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान किये जाने के पश्चात्, विहित रीति (Prescribed manner) में जाँच करेगा। ऐसे में यह स्पष्ट है कि जहाँ क्षतिपूर्ति (Compensation) की मांग की जायेगी, तो उसका निर्णय zara अधिकारी द्वारा दिया जायेगा। इससे यह भी प्रतीत होता है कि प्राधिकरण की शक्ति न््यायनिर्णायक अधिकारी के नियुक्ती हेतु अहम है, क्योंकि मुख्यतः नियुक्तिकर्ता प्राधिकरण है जो कि सरकार के परामर्श से करेगा।
अतः रेरा अधिनियम की धारा-38 एवं INI-74 से स्पष्ट है कि धारा-38 में प्राधिकरण की शक्तियां दी गयी है जिसमें कि सम्प्रवर्तकों, आवंटियों और भू-सम्पदाओं अभिकर्ताओं पर डाली गयी बाध्यताओं (Obligations) के किसी भी उल्लंघन (Any Contravention) के सम्बंध में, अर्थदंड (Penalty) एवं ब्याज (interest) अधिरोपित किया जायेगा और arte7i a क्षतिपूर्ति (Compensation) हेतु न्यायनिर्णयन करने की शक्ति का अधिकार न्यायनिर्णायक अधिकारी को है जो कि केवल धारा-42, धारा-44, ARI-78 और धारा--49 (Only for Sections 2,4,8,9) के अधीन किया जायेगा। रेरा अधिनियम की धारा-१2 में निम्न प्राविधान है :- 2. Where any person makes an advance or a deposit on the basis of the information contained in the notice advertisement or prospectus, or on the basis of any model apartment, plot or building, as the case may be, and sustains any loss or damage by reason of any incorrect, false statement included therein, he shall be compensated by the promoter in the manner as provided under this Act: Provided that if the person affected by such incorrect, false statement contained in the notice, advertisement or prospectus, or the model apartment, plot or building, as the case may be, intends to withdraw from the proposed project, he shall be returned his entire investment along with interest at such rate as may be prescribed and the compensation in the manner provided under this Act. a, 42
उपरोकतानुसार प्राविधान से यह है कि जहाँ कोई व्यक्ति सूचना, विज्ञापन प्रास्पेक्ट्स में दिये जानकारी के आधार पर कोई अग्रिम देता है या जमा करता है और उसे उसमें सम्मलित गलत, मिथ्या कथन के कारण कोई हानि या नुकसान उठाना पढ़ता है, तो उसकी सम्प्रवर्तक द्वारा इस अधिनियम के अधीन यथा उपबंधित रीति में क्षतिपूर्ति की जायेगी। ऐसे में जहाँ शिकायतकर्ता धारा 2 के प्राविधानों के अनुसार ससाक्ष्य क्षतिपूर्ति की माँग करेगें वहाँ उसका अभिनिर्णय न््यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा दिया जायेगा। इसी धारा के प्राविधान के दूसरे अनुच्छेद (Paragraph 2) में यह कहा गया है कि पीड़ित आवंटी परियोजना से यदि अपना नाम वापस लेना चाहता है, तो उसके निवेश की गयी धनराशि, ब्याज सहित, ऐसी दर जो कि पर जो कि विहित की जाए के अनुसार लौटाया जायेगा, और अधिनियम के अधीन उपबंधित रीति के अनुरूप उसकी क्षतिपूर्ति की जायेगी। स्पष्टतया यदि केवल ब्याज सहित धनराशि वापिस माँगी गई है व ब्याज दर विहित है तो उसमें अभिनिर्णय का कोई अंश समाविष्ट नहीं है। अतः इस धारा में 2 अंग है, पहला (Para l) जहाँ क्षतिपूर्ति का प्रश्न है वह न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा निर्णय किया जायेगा और दूसरा (Para 2) जहाँ जमा धनराशि मय ब्याज का प्रश्न है वह प्राधिकरण द्वारा निर्णीत किया जायेगा, इसी प्रकार रेरा अधिनियम की oRri4 की उपधारा-3 निम्नवत प्राविधानित है-:
4(3) In case any structural defect or any other defect in workmanship, quality or provision of services or any other obligations of the promoter as per the agreement for sale relating to such development is brought to the notice of the promoter within a period of five years by the allottee from the date of handing over possession, it shall be the duty of the promoter to rectify such defects without further charge, within thirty days, and in the event of promoter's failure to rectify such defects within such time, the aggrieved allottees shall be entitled to receive appropriate compensation in the manner as provided under this Act. ) ४] धारा-१4 में सम्प्रवर्तक द्वारा मंजूर रेखांको और परियोजना विनिर्देशों का पालन किये जाने का प्राविधान है। इसी कम में धारा-44 की उपधारा-3 में यह प्राविधानित है कि यदि कब्जा सौपें जाने की तारीख से 5 वर्ष की अवधि के भीतर आवंटी द्वारा, ऐसे विकास से सम्बंधित किसी संरचनात्मक त्रुटि या सेवाओं के कर्मकौशल, क्वालिटी या उपबन्ध या सम्प्रवर्तक की किन्हीं अन्य बाध्यताओं की ओर सम्प्रवर्तक का ध्यान दिलाया जाता है, तो सम्प्रवर्तक का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी त्रुटियों को बिना fart afer wart के 30 दिन के भीतर दूर कराये और सम्प्रवर्तक द्वारा ऐसी त्रुटियों को ऐसे के भीतर दूर करने में असफल रहने की दशा में पीड़ित आवंटी समुचित प्रतिकर पाने का हकदार होगा, जो इस अधिनियम के अधीन उपबंधित हो।
इससे भी यह स्पष्ट है कि इसमें क्षत्िपूर्ति के निर्धारण का प्रश्न है जो कि बाध्यकारी शर्तों को पूरा न किये जाने के लिए इस धारा के अन्तर्गत, इसका निर्णय न््यायनिर्णायक अधिकारी का होगा। परन्तु पीड़ित व्यक्ति को यह स्वतंत्रता होगी कि वह, सम्प्रवर्तक द्वारा उन बाध्यकारी शर्तों को पूर्ण कराये जाने हेतु आदेश के लिए, प्राधिकरण के समक्ष अपना वाद प्रस्तुत कर सकते है। रेरा अधिनियम की ais के अन्तर्गत निम्नवत् प्राविधान दिये गये है :- 48. (4) If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,— (a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed — in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the 2 34 project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. उपरोक्त प्राविधान यह है कि यदि सम्प्रवर्तक-:
(क). विकय करार के feet के अनुसार उसमें निर्धारित तारीख तक सम्यक रूप से पूरा करने में, या (ख). इस अधिनियम के अधीन अथवा किसी अन्य प्रकरण से रजिस्ट्रीकरण का निलंबन या प्रतिसंहरण के कारण विकासकर्ता के रूप में उसका कारोबार बन्द होने के कारण, यथार्थिति, किसी अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन का पूरा करने में असफल रहता है या उसका कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो वह उपलब्ध किसी अन्य उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना आवंटी की मांग पर, यदि आवंटी परियोजना से बाहर होना चाहता है, तो यथास्थिति, उस अपार्टमिन्ट, भू-खण्ड या भवन के सम्बंध में उसके द्वारा प्राप्त रकम को, ऐसी दर पर ब्याज सहित, जो इस नियमित विहित की जाये एवं इस अधिनियम के अधीन यथा उपबच्धित रीति में क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का पात्र होगा। परन्तु जहाँ किसी आवंटी का परियोजना से बाहर आने का आशय नहीं है, वहाँ सम्प्रवर्तक द्वारा उसे कब्जा सौपें जाने तक विलम्ब के प्रत्येक माह के लिए उस दर पर जो विहित की जाये, ब्याज पाने का अधिकारी होगा। अतः यह स्पष्ट है कि यदि सम्प्रवर्तक द्वारा अनुबन्ध के अनुसार परियोजना को अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन पूर्ण नहीं किया जाता है, या कब्जा नहीं दिया जाता है और यदि आवंटी परियोजना से बाहर आना चाहता है, तो वह अपनी जमा धनराशि ब्याज सहित और क्षतिपूर्ति भी पाने का अधिकारी होगा। यदि आवंटी परियोजना में बना रहना चाहता है, तो प्रतिमाह विलम्ब के लिए ब्याज देय होगा। इससे भी यह स्पष्ट है कि धारा-38 के अन्तर्गत प्राधिकरण को यह शक्ति है कि जहाँ ब्याज और अर्थदंड का प्रश्न होगा, तो यह प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार में होगा और जहाँ क्षतिपूर्ति का प्रश्न होगा, तो वह
धारा-74 के अन्तर्गत न््यायनिर्णायक अधिकारी के क्षेत्राधिकार में होगा। ८ i5 इन प्राविधानों को संयुक्त रूप से पढ़ा जाये, तो इन प्राविधानों की भाषा में यह प्रस्तावित है कि यदि प्रोमोटर द्वारा अपने बाध्यकारी अनुबन्ध के निबन्धनों के अनुसार कब्जा नहीं दिया जाता है, तो आवंटी को यह दावा करने का अधिकार होगा कि अपना जमा धनराशि ब्याज सहित वापस ले सकेगें। sonic विशेष रूप से ARI 8 को दृष्टिगत रखते हुए भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम की धारा-84 के अन्तर्गत उ0प्र0 भू-सम्पदा नियमावली, — 2076 बनायी गयी। जिसमें प्राधिकरण के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करने के लिए फार्म “एम” नियम-33() एवं न्यायनिर्णायक अधिकारी के समक्ष आवेदन करने के लिए फार्म “एन” नियम-34(0) का प्राविधान है। इसके अतिरिक्त उ0प्र0 भू-सम्पदा प्राधिकरण (सामान्य) विनियमन, 209 के WER 24 के अन्तर्गत ऑनलाईन शिकायत दर्ज कराना का भी प्राविधान है। इसी कम में आवंटियों के हित के लिए निम्न प्राविधान हैं :- Right of Allottee 9. (4) The allottee shall be entitled to claim the refund of amount paid along with interest at such rate as may be prescribed and compensation in the manner as provided under this Act, from the promoter, if the promoter fails to comply or is unable to give possession of the apartment, plot or building, as the case may be, in accordance with the terms of agreement for sale or due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of his registration under the provisions of this Act or the rules or regulations made thereunder.
उपरोक्तानुसार यह है कि यदि सम्प्रवर्तत fea करार के निबन्धों के अनुसार या इस अधिनियम या उसके अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के उपबन्धों के अधीन उसके रजिस्ट्रीकरण निलम्बन या प्रतिसंहरण हो जाने के कारण, विकासकर्ता के रूप में उसका कारोबार बन्द हो जाने के कारण या विकय करार के निबन्धानुसार अनुपालन करने में असफल रहता है या, यथास्थिति, अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन का कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो आवंटी जा 6 द्वारा waade or दिये गये धनराशि ऐसी ब्याज दर पर वापस जायेगी जो कि विहित की जायेगी तथा अधिनियम के अधीन उपबंधित रीति में क्षतिपूर्ति सहित दावा करने का हकदार होगा। अतः यह स्पष्ट है कि यदि सम्प्रवर्तक द्वारा किये गये विकय करार के नियम एवं शर्तों के अनुसार कब्जा नहीं दिया जाता है, तो वह अधिनियम के अधीन नियम एवं नियमावली के अन्तर्गत जमा धनराशि ब्याज सहित दावा करने का हकदार होगा और इसके अतिरिक्त क्षतिपूर्ति पाने का भी अधिकारी होगा। ऐसे में यह अवधारित किया जा सकता है कि जहाँ आवंटी को जमा धनराशि ब्याज सहित दावा करने का हकदार है, तो उसका क्षेत्राधिकार प्राधिकरण के अन्तर्गत मानी जायेगी, जिसकी शक्ति धारा-38 के अन्तर्गत दी गयी है और जहाँ तक क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का प्रश्न है, तो यह क्षेत्राधिकार धारा-77 के अनुसार न्यायनिर्णायक अधिकारी का होगा। रेरा अधिनियम धारा-72 में न््यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा क्षतिपूर्ति पर विचार किये जाने वाले कारण के बारे में भी प्राविधान दिये गये है जो कि निम्नवत् है :- 72. While adjudging the quantum of compensation or interest, as the case may be, under section 7i, the adjudicating officer shall have due regard to the following factors, namely:—
(a) the amount of disproportionate gain or unfair advantage, | wherever quantifiable, made as a result of the default; (b) the amount of loss caused as a result of the default; (c) the repetitive nature of the default; (d) such other factors which the adjudicating officer considers necessary to the case in furtherance of justice. इस धारा के प्राविधान में ब्याज भी जोड़ा गया है, क्योंकि क्षतिपूर्ति की धनराशि की मात्रा का निर्धारण एकमुश्त धनराशि अथवा समकक्ष ब्याज दोनों के रूप हो सकता है। स्पष्टतया क्षतिपूर्ति के रूप दिये जाने वाला ब्याज, आवंटी की जमा धनराशि की ब्याज सहित धनवापसी के प्रकरण से अलग है। जहाँ ~3 7 ब्याज के रूप में दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की राशि में ब्याज दर का निर्धारण सम्मिलित है, प्राधिकरण द्वारा धनराशि ब्याज सहित वार्षिक करने की दशा में ब्याज दर पूर्व निर्धारित है तथा उसमें अभिनिर्णय का अंश नहीं है। धनवापस किये जाने वाले प्रकरण में भुगतान किये जाने वाले ब्याज की दर राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमावली के अन्तर्गत दी जाती है और क्षतिपूर्ति निर्धारण या ब्याज की गणना अधिनिर्याणक द्वारा निम्न 4 बिन्दुओं को दृष्टिगत रखते हुए दिये जाते है। (क) व्यतिकम के परिणाम स्वरूप अनुपातिक लाभ या अनुचित फायदे की, जहाँ कहीं अनुमान्य हो, रकमः (ख) व्यतिकम के परिणामस्वरूप हानि की रकमः (ग) व्यतिकम के पुनरावुत्तिपूर्ण प्रकृति: (घ) ऐसे अन्य कारक, जो न््यायनिर्णायक अधिकारी न्याय के अग्रसरण के मामले में आवश्यक समझें |
ऐसे में यह स्पष्ट है कि क्षतिपूर्ति वाले प्रकरण के निस्तारण जो न््यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किया जाएगा, उसका जमा धनराशि मय ब्याज वापस किये जाने वाली धनराशि से कोई लेन-देना नहीं है। यह भी है कि रेरा अधिनियम में क्षतिपूर्ति एवं जमा धनराशि मय ब्याज हेतु अलग-अलग प्राविधान दिये गये है। क्षतिपूर्ति की गणना धारा-72 में दिये गये सिर्फ 4 आधारों एवं धारा 42, 44, 8 व १9 के प्राविधानों तथा शर्तों के अनुसार ही दी जायेगी। अधिनियम के अनुसार प्राधिकरण को भू-सम्पदा सेक्टर को नियमित रूप विभिन्न प्राविधानों के अनुसार विकास करने हेतु दिये गये है साथ प्राधिकरण को एक अधिनिर्णायक अधिकारी को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है जो सिर्फ विशिष्ठ रूप से कृत्य अनुसार क्षतिपूर्ति वाली धनराशि का निर्धारण करेगें। जहाँ तक ब्याज, अर्थदंड, क्षतिपूर्ति में अन्तर का प्रश्न है, तो इन सभी के अन्तर के सम्बंध में निम्नवत् साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किये गये है माननीय उच्च न्यायालय बाम्बे द्वारा नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्राएलि0 आदि बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया आदि में अभिनिर्धारित किया गया है कि-: a १8
258. In paragraph-9 of Alok Shanker Pandey v. Union of India, (2007) 3 SCC 545, the Apex Court has held that “There is misconception about interest. Interest is not a penalty or punishment at all, but it is the normal accretion on capital. For example if A had to pay B a certain amount, sayl0 years ago, but he offers that amount to him today, then he has pocketed the interest of the principal amount. Had A paid that amount to B 0 years ago, B would have invested that amount somewhere and earned interest thereon, but instead of that A has kept that amount with himself and earned interest on it for this period. Hence equity demands that A should not only pay back the principal amount but also the interest thereon to B.” The object of Section 8 is to recompense an allottee for depriving him of the use of the funds paid by him. The promoter who has received money from the allottee but has failed to adhere to his contractual or statutory obligations, cannot claim that he is entitled to utilize the monies without paying any interest with respect thereto to the allottee. उक्त से we है कि ब्याज अर्थदंड नहीं है और न ही कोई सजा है, किन्तु साधारण रूप से रकम पर हुई अभिवृद्धि है। aie का लक्ष्य आवंटी को वंचित जमा किये गये धनराशि के उपयोग का प्रतिदान करने हेतु है। इसी कारण यह अनुतोष प्राधिकरण द्वारा क्षेत्राधिकारिता के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए दिया जा रहा है। तद्नुसार बिन्दु संख्या-4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-5
an विलम्ब के लिए एग्रीमेन्ट टू सेल में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित दर विलम्ब ब्याज की दर के रूप में लागू की जा सकती है ? जहाँ तक देय ब्याज दर नियमावली के अन्तर्गत अधिसूचित न किये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में स्पष्ट करना है कि उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा भूनसम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम की धारा-84 की उपधारा-2 के खण्ड-(च) और धारा-43 की उपधारा-2 के साथ पठित उक्त धारा-84 की उपधारा- द्वारा प्रदत्त शक्तियों का अधिकार प्रयोग करते हुए दिनांक 77.0.208 को भू-सम्पदा है i9 (विनियमन और विकास), (विकय /पद्टा के लिए करार) नियमावली (Rules), 2048 अधिसूचित की गयी है। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9.2 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) होने में ब्याज दर निर्धारित है, जिसके TER 9.2 () में प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending arginal Cost of Lendin: Rate) on home loan of State Bank of tndia "hv Bank of India +% unless provided otherwise under the Kules. otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice:
Provided that where an Allottee does not intend to withdraw from the Project or terminate the Agreement, he shall be paid, by the Promoter, interest at the rate prescribed in the Rules, for every month of delay till the handing over of the possession of the [Apartment/Plot], which shall be paid by the Promoter to the Allottee within forty- five days of it becoming due. इसी कम में आवंटियों के डिफॉल्ट प्रकरण के बारे में यही ब्याज दर ger 9.30) में. प्रोमोटर हेतु निर्धारित की गयी है और निम्न रूप से प्राविधानित है-: In case the Allottee fails to make payments for 2 (two) -consecutive demands made by the Promoter as per the Payment Plan annexed hereto, despite having been issued notice in that regard the Allottee shall be liable to pay interest to the promoter on the unpaid amount at the rate equal_to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home Toan 9: Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +I% unless provided otherwist +i% unless provided otherwise under the Rules. The Promoter must not be in default to take this benefit; >/ 20 इससे यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो प्रोमोटर भी mine प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। उपरोक्तानुसार से यह स्पष्ट है कि ब्याज दर MCA प्रतिशत की वार्षिक दर से दोनों पक्षों (आवंटी एवं प्रोमोटर) के लिए इस नियमावली में निर्धारित की गयी है।
इस ब्याज दर के निर्धारण को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी उचित माना गया है। इस सम्बंध में माननीय सर्वोच्च. न्यायालय के सिविल अपील संख्या--2238 / 2048 पायनियर अर्बन लैन्ड एवं इन्फास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गोविन्द राघवन में अभिनिर्धारित किया गया है कि-: 5.3. The Respondent further submitted that the National Commission had ordered payment of Interest as per the statutory Rules i.e. Rule 5 of the Haryana Real Estate (Regulation and Development) Rules, 207 @0.7% S.I. 9.8. The Respondent — Flat Purchaser submitted that he had obtained a loan for Rs. 3,30,00,000/- from Standard Chartered Bank to purchase the flat in question, and had entered into a Tripartite Loan Agreement with the Bank 3 and the Builder. The Respondent — Flat Purchaser had to pay Interest @0% p.a. for servicing the loan for the entire period. Hence, Interest @0.7% S.I, p.a. awarded by the National Commission was just and fair. उपरोक्तानुसार से यह wre है कि हरियाणा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) नियमावली, 207 के द्वारा वार्षिक ब्याज दर MCLR+2 प्रतिशत (Interest &0.7% 5. pa) निर्धारित की गयी थी, जो सम्बन्धित मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) द्वारा अनुमन््य किया गया है, जिसको माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा उचित एवं सही माना है, साथ ही इसी आदेश के प्रस्तर 8 में भी स्पष्ट रूप से उल्लेखित है कि-:
The National Commission has rightly awarded Interest ७00.7% S.I. p.a. by applying Rule 5 of the Haryana Real. 2i Estate (Regulation And Development) Rules, 20I7 from the date of each installment till 05.02.207 ice. till the date after which the Order of stay of cancellation of the allotment was passed; and thereafter, from the date of the (॥ 24 Commission’s final Order till the date on which the amount is refunded with Interest. अत: यह स्पष्ट है कि ब्याज दर जो कि 40.7 प्रतिशत (श८॥२+2 प्रतिशत) हरियाणा रेरा द्वारा निर्धारित किया गया वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी सही ब्याज दर माना गया है। इससे यह santa किया जा सकता है कि राज्य सरकार द्वारा नियमावली के अन्तर्गत निर्धारित की गयी ब्याज दर उचित एवं सही है। ब्याज दर को स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया के McLRH से सम्बद्ध करने के सिद्धान्त को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी स्वीकारा गया है और न्यायोचित ठहराया है। ऐसे में उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गयी weve (विनियमन और विकास), (विकय / पट्टा के लिए करार) नियमावली Rules), 2048 के अन्तर्गत निर्धारित की गयी वार्षिक ब्याज दर MCLRH प्रतिशत, जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अधिकतम ब्याज दर से 4 प्रतिशत ज्यादा है उचित एवं सही है। बिन्दु संख्या-5 निस्तारित किया जाता है जहां तक मांगे गये अन्य क्षतिपूर्ति के मदों का प्रश्न है, वह क्षेत्राधिकार “एडज्यूडिकेटर” को है। फिर भी रेरा अधिनियम की धारा-42,4,8 व 9 के अधीन “कम्पनसेशन देने की व्यवस्था है। शिकायतकर्ता द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि उक्त में किन धाराओं के किन प्राविधानों के उल्लंघन हेतु यह आवेदन किया गया है।
उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह शिकायतकर्तागण को ओ.सी. #सी.सी. सहित दिसम्बर 2049 से पूर्व, यदि कोई देय धनराशि बकाया है, तो उसे प्राप्त कब्जा देना सुनिश्चित करें और नियमानुसार स्टाम्पशुल्क प्राप्त कर पंजीयकरण कराना सुनिश्चित करें| 2... विपक्षी, शिकायतकर्तागण को प्रत्येक मामले में अनुबन्ध के अनुरूप ग्रेस पीरियड के साथ अनुबंधित अवधि के पश्चात 5/- रूपये प्रतिवर्गफूट प्रतिमाह की दर से से दिनांक 30.4.20:6 तक व दिनांक 07.05.2046 से ओ. सी. / सी.सी. सहित मांग पत्र जारी करने की तिथि तक, MCLR+I प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से “a 22 है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये। अन्य शिकायतकर्तागण , के प्रकरण में अनुबन्ध के अनुसार प्रत्येक मामले में उपरोक्तानुसार गणना की जाये। इस आदेश की एक-एक प्रति सम्बंधित पत्रावलियों पर रखी जाये एवं इस ओदश में प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुरूप धनराशि व ब्याज की प्रत्येक मामले में गणना की जायेगी। इस आदेश का werd उ0प्र/भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 206 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। dh oe ~~ VY es— (राजीव कुमार) 2 | (अध्यक्ष) Boro भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण