Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Ved Prakash S/o Shri Ramji Lal v. La Residentia Developers Private Limited
Complaint No. 12201827211
Verified by Puneet Jain, Editor
- Decision date
- 2019-07-19
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
- Counsel
- Puneet Jain (in this matter)
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
English translation. Machine translation from the Hindi by AI (Claude Haiku), not reviewed. The original order below is the authoritative text.
Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority, Regional Office, Gautam Buddh Nagar. Hearing Bench-04 Shri Rajeev Kumar, Chairman Complaint No.: 422082724 Ved Prakash v. La Residencia Developers Pvt. Ltd. The present complaint application has been filed by the complainant against the opposite party seeking registration of the flat, compensation for delay penalty, Rs. 5 lakh for mental harassment, and Rs. 4 lakh as legal costs. Briefly, the complainant's case is that in 2043 he booked a flat (No. L4-50i, 945 sq ft, value Rs. 26.92 lakh) in the "Amrapali Golf Homes" project of Amrapali Smart City Developers Pvt. Ltd., and a builder-buyer agreement (BBA) was signed on 05.04.2043. Possession of the flat was to be given by 05.07.206, including the 36-month and 6-month grace period. Against this, Rs. 24.70 lakh was paid up to March 2045, out of which Rs. 29.64 lakh was taken as a loan from Vijaya Bank.
Because possession was not given on time, and under continuous pressure, the promoters of Amrapali Smart City Developers allotted the complainant's unit to the present company, La Residencia, as flat No. 4803 (880 sq ft). After obtaining no-objection from the former company, they assured the complainant that registration would be done. The agreement for this unit was executed on 42.06.2047. Its value was Rs. 25.54 lakh, of which Rs. 24.70 lakh had been paid earlier. On 30.08.2047 the complainant received a no-dues certificate relating to payment, but registration has still not been done. The opposite party has handed over possession of the unit, but no amount has been adjusted for the delay. In support of his statement, the complainant has filed photocopies of the BBA dated 05.04.2043, a statement of the amount deposited, receipts for the amount deposited, and an interest statement.
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत संख्या : 422082724 वेद प्रकाश बनाम ला रेजीडेंसिया डेवलपर्स प्राएलि0 प्रस्तुत शिकायत प्रार्थना पत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध फ्लैट की रजिस्ट्री कराने, विलम्ब अर्थदंड की क्षतिपूर्ति एवं मानसिक उत्पीड़न हेतु 5 लाख, विधिक खर्चे के रूप में 4 लाख रूपये दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है।
संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा वर्ष 2043 में "आम्रपाली स्मार्ट सिटी डवलपर्स प्रा.लि." की “आम्रपाली गोल्फ होम्स” परियोजना में फ्लैट बुक कराया (संख्या L4-50i, 945 वर्गफीट रूपये, 26.92 लाख मूल्य) जिसका बी.बी.ए. 05.04.2043 को हस्ताक्षरित किया गया। फ्लैट का कब्जा 36 माह तथा 6 माह ग्रेस अवधि सहित 05.07.206 तक दिया जाना था। इसके सापेक्ष रूपये 24.70 लाख मार्च 2045 तक भुगतान किया गया, जिसमें रूपये 29. 64 लाख विजया बैंक से ऋण के रूप में लिया गया था। समय से कब्जा न मिलने के कारण व निरन्तर दबाव के बाद आम्रपाली स्मार्ट सिटी डवलपर्स के प्रवर्तकों द्वारा प्रार्थी की इकाई को (वर्तमान कम्पनी) “ला-रेजिडेंशिया“ में फ्लैट संख्या 4803 (880 वर्ग फुट) आवंटित कर दिया व पूर्व कम्पनी से अनापत्ति प्राप्त करने के बाद रजिस्ट्री करने का आश्वासन दिया गया। इस इकाई का एग्रीमेन्ट 42.06.2047 को किया गया। इसका मूल्य रू. 25.54 लाख था जिसमें से रू. 24.70 लाख का भुगतान पूर्व में किया गया था। दिनांक 30.08.2047 को शिकायतकर्ता को भुगतान सम्बंधी नो डयूज प्राप्त हो गया, किन्तु आज तक रजिस्ट्री नहीं करायी गयी। विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा भी दे ad T 7a है, किन्तु विलम्ब के लिए धनराशि समायोजित नहीं की गयी el ; A 2 शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में अनुबन्ध पत्र दिनांक 05.04.2043, जमा धनराशि का विवरण, जमा धनराशि की रसीदें, ब्याज विवरण, की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं।
विपक्षी द्वारा प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कहा गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा दिनांक 42.06.2047 का अनुबन्ध पत्र दाखिल नहीं किया गया है अतः कब्जे की तिथि का आकलन सम्भव नहीं है। साधारण तौर पर कब्जे की अवधि 42 माह एवं 6 माह अनुबन्ध की तिथि से होती है एवं इस दृष्टि से कब्जे की तिथि अभी आयी नहीं है व वाद का कोई कारण नहीं है। अतः इसके अनुसार शिकायतकर्ता के वाद में कार्यवाही का कोई कारण नहीं बनता है। शिकायतकर्ता द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया है कि कब उनके द्वारा अनापत्ति पत्र एवं कब्जा लिया गया है। शिकायतकर्ता को कब्जे के उपरान्त कोई हानि नहीं हुई है। फ्लैट का कब्जा फोर्स मैज्योर कारणों से विलम्बित हुआ है जिसमें की भूमि अधिग्रहण प्रकरण जो कि माननीय उच्चतम न्यायालय में विचाराधीन था और अंतिम रूप से दिनांक 44.05.2045 को सावित्री देवी बनाम उ0प्र0 सरकार में निर्णीत किया गया। माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा हरकरन एवं अन्य बनाम उ0प्र0 सरकार द्वारा Re याचिका o—77068 / 2009 के आदेश दिनांक 49.07.2004 को पटवारी गाँव के अधिग्रहण ज्ञाप्त को खारिज कर दिया गया, तत्पश्चात् दिनांक 24.40.20॥4 को गजराज एवं अन्य बनाम उ0प्र0 में निर्णीत किया गया। अपने दूसरे उत्तर में Wass द्वारा यह बिन्दु उठाया कि रेरा की धारा 42, 4, 8 व 49 के अधीन किसी प्रकरण के निर्णय का अधिकार इस अथॉरिटी को नही है एवं यह “एडजुडिकेटिंग” अधिकारी का कार्य क्षेत्र में है: राज्य सरकार द्वारा कोई ब्याज दर निर्धारित नही है एवं धारा 43 के अधीन “एग्रीमेन्ट टू सेल“ के अन्तर्गत निर्धारित ब्याज दर धारा 48 (4) व 49(7) के अधीन निर्धारित ब्याज दर नहीं मानी जा सकती। यह भी कहा गया है कि प्रकरण में मा. सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दिसम्बर 209 तक इस परियोजना में रजिस्ट्री करने का समय दिया गया है व अन्य के साथ दिनांक 40.05.20i9 को सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस बिन्दु पर निर्णय सुरक्षित रखा है कि क्या यह आम्रपाली समूह की कम्पनी है अथवा नहीं। विपक्षी अनुबन्ध के अनुसार 5,//-रूपये प्रति वर्ग फुट की क्षतिपूर्ति देने को तैयार है।
उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। यह निर्विवादित है कि विपक्षी की परियोजना में शिकायतकर्ता द्वारा फ्लैट बुक कराया गया और कब्जा प्राप्त कर लिया गया है, किन्तु सेल डीड ‘$ 3 निष्पादित नहीं करायी गयी है। विपक्षी द्वारा कहा गया कि फोर्स मैज्योर के कारण परियोजना विलंम्बित हुई। किन्तु शिकायतकर्ता को विलम्ब के लिए 5/-रूपये प्रति वर्ग फुट की क्षतिपूर्ति देने को तैयार है। पक्षकारों के अभिवचनों के आधार पर निम्नलिखित वाद बिन्दु विचरित किये गये :- 4. wM force majeure event के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई ? यदि हां तो प्रभाव ? 2... क्या शिकायतकर्ता को विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये ? 3. क्या शिकायतकर्ता की रजिस्ट्री करायी जानी है ? 4... क्या इस अथारिटी को यह प्रकरण सुनने का अधिकार नहीं है ? 5 क्या विलम्ब के लिए एग्रीमेन्ट-टू-सेल में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित विलम्ब ब्याज की दर के रूप में लागू की जा सकती है ? निस्तारण बिन्दु Wo 4 बिन्दु सं? 4 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या force majeure event के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure) (जैसे दंगा, आंदोलन, हड़ताल, औद्योगिक विवाद, परियोजना पर सेवाओं एवं आपूर्ति का बाधित होना, न्यायिक स्थगन आदेश, निर्णय व डिकी से कार्य बाधित होने) के कारण परियोजना विलंबित हुई विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन force majeure event के कारण उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही किसी force majeure event की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है, ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। इसके अतिरिक्त यह भी महत्वपूर्ण है कि वर्तमान फ्लैट का बी.बी.ए. दिनांक 42.06.2047 को हुआ एवं force majeure सम्बंधी सभी event इससे पूर्व के हैं। तदनुसार बिन्दु to निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु tio 2 बिन्दु wo 2 इस आशय का विचरित किया गया है कि क्या शिकायतकर्ता को विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जा सकता है? यह वाद बिन्दु भी शिकायतकर्ता के अभिकथनों के आधार पर विचरित किया गया है, जिसे साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है। शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अनुबंधित अवधि में कब्जा नहीं दिया गया है, जिस पर विपक्षी की ओर से कहा गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा स्पष्ट नहीं किया गया है कब उनके द्वारा एन.ओ.सी. और कब्जा लिया गया है।
यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा जब मूल परियोजना में फ्लैट बुक कराया गया था तो उसका कब्जा ग्रेस अवधि सहित दिनांक 05.07.206 तक दिया जाना था। तदोपरान्त इकाई नई कम्पनी में sea हुई व एक नया बी.बी.ए. दिनांक 2.06.20:7 को हुआ जो शिकायतकर्ता द्वारा प्रारम्भ में प्रस्तुत नहीं किया गया है। दूसरी ओर विपक्षी का कहना है कि सामान्यतः 42 माह की अवधि अनुबन्ध में होती है तथा इस दृष्टि से परियोजना विलम्बित नहीं है किन्तु वे दिसम्बर 209 तक रजिस्ट्री करा देंगे। स्वयं विपक्षी की ओर से भी उक्त बी.बी.ए. की प्रति दाखिल नहीं की गई है। शिकायतकर्ता द्वारा बाद में प्रस्तुत Wire at प्रति दिनांक 42.06.207 के प्रस्तर 9 में एग्रीमेन्ट के 42 माह के भीतर कब्जा देने की बात लिखी है। अतः यह अवधि दिसम्बर 2020 तक है। इस white में मूल इकाई के लिए किए गये Wie का अथवा विशेष रूप से पूर्व एग्रीमेन्ट में कब्जे की तिथि विलम्ब की गणना होगी ऐसा कोई उल्लेख नहीं है। ऐसी दशा में वर्तमान इकाई के बी.बी.ए के अनुरूप कोई विलम्ब दर्शित नहीं है। पत्रावली पर शिकायतकर्ता की ओर से दिए पत्र दिनांक 04.05.20I8 4 उल्लिखित है कि फ्लैट संख्या टी-5,/4803,/ला रेजिडेन्शिया का कब्जा दिनांक 23.03.20:7 को उन्हें प्राप्त हो चुका है। अतः समय की दृष्टि से यदि मूल wre के सापेक्ष भी देखा जाये तो दिनांक 05.07.20I6 के स्थान पर शिकायतकर्ता को दिनांक 23.03.20:7 को हस्तान्तरित इकाई का कब्जा मिल गया जिसे बहुत विलम्बित नहीं कहा जा सकता। अतः विलम्ब के लिए कोई धनराशि देय हो ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। तदूनुसार बिन्दु Go 2 निस्तारित किया जाता है। े निस्तारण बिन्दु संख्या-3
बिन्दु संख्या-3 इस तथ्य पर विचरित है कि क्या शिकायतकर्ता की रजिस्ट्री करायी जाये, जिसको साबित करने का भार शिकायतकर्ता पर है। शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में कहा गया है कि यूनिट का कब्जा विपक्षी द्वारा दे दिया गया है और दिनांक 30.08.20i7 को कम्पनी द्वारा एन.ओ.सी. भी मिल चुका है किन्तु रजिस्ट्री नहीं करायी जा रही है। प्रार्थी के द्वारा स्वयं कहा गया है कि दिनांक 23.03.2047 से वह वहाँ रह रहा है। तत्पश्चात् पीठ के समक्ष दिनांक 22.05.2049 के दिन शिकायतकर्ता द्वारा भी कहा गया कि कब्जा मिल गया है। विपक्षी इस परियोजना का ओ.सी./सी.सी मिलते ही शिकायतकर्ता की रजिस्ट्री कराना सुनिश्चित करें। इस सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से रेरा अधिनियम 2046, की धारा-47() में प्राविधानित है कि-:
7. (0) The promoter shall execute a registered conveyance deed in favour of the allottee along with the undivided proportionate title in the common areas to the association of the allottees or the competent authority, as the case may be, and hand over the physical possession of the plot, apartment of building, as the case may be, to the allottees and the common areas to the association of the allottees or the competent authority, as the case may be, in a real estate project, and the other title documents pertaining thereto within specified period as per sanctioned plans as provided under the local laws: Provided that, in the absence of any local law, conveyance deed in favour of the allottee or the association of the allottees or the competent authority, as the case may be, under this section shall be carried out by the promoter within three months from date of issue of occupancy certificate.
(2) After obtaining the occupancy certificate and handing over physical possession to the allottees in terms of sub- section (I), it shall be the responsibility of the promoter to handover the necessary documents and plans, including common areas, to the association of the allottees or the competent authority, as the case may be, as per the local laws: Provided that, in the absence of any local law, the promoter shall handover the necessary documents and plans, including common areas, the association of the allottees or the competent authority, as the case may be, within thirty days after obtaining the occupancy certificate. Xs उपरोक्त प्राविधानों से यह स्पष्ट है कि प्रोमोटर का यह दायित्व है कि वह आवंटी का ओ.सी मिलने के उपरान्त ही नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। तद्नुसार बिन्दु संख्या-3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-4 क्या इस अथारिटी को यह प्रकरण सुनने का अधिकार नहीं है ? जहाँ तक प्राधिकरण के विधिक रूप से सुनवाई न करने के क्षेत्राधिकार का प्रश्न है। इस सम्बंध में स्पष्ट करना है कि प्रथम दृष्टया किसी परिवाद को दर्ज कराये जाने के लिए भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2046 के धारा-34 के अन्दर प्राविधान दिये गये है जो कि निम्न रूप से उललेखित है-:
3l. (l) Any aggrieved person may file a complaint with the Authority or the adjudicating officer, as the case may be, for any violation or contravention of the provisions of this Act or the rules and regulations made thereunder against any promoter allottee or real estate agent, as the case may be. Explanation.—For the purpose of this sub-section "person" shall include the association of allottees or any voluntary consumer association registered under any law for the time being in force. (2) The form, manner and fees for filing complaint under sub-section (l) shall be such as may be specified by regulations उपरोक्तानुसार कोई पीड़ित व्यक्ति, किसी wade, आवंटी या भू-सम्पदा अभिकर्ता के विरूद्र अधिनियम या उसके अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के उपबन्धों के किसी अतिकमण या उल्लंघन के लिए मामलों के अनुसार (as the case may be), प्राधिकरण या न्यायनिर्णायक अधिकारी के समक्ष शिकायत दाखिल कर सकता है। इससे स्पष्ट है कि शिकायत को प्राधिकरण और न्यायनिर्णायक अधिकारी दोनों के समक्ष उनके क्षेत्राधिकार एवं मामलों के अनुसार (as the case may ४०) प्रस्तुत किये जा सकते है। प्राधिकरण और न्यायनिर्णायक अधिकारी के क्षेत्राधिकार और उनके सुन जाने वाले मामले WTI अधिनियम में सम्बंधित प्राविधानों के अन्तर्गत उल्लेख किये गये है। Rr अधिनियम में प्राधिकरण (Authority) ERT प्रयोग किये जाने वाली शक्तियों (Powers) का अधिकार धारा-35,36,37,38, के अन्तर्गत दी गयी है। इनमें से मुख्य शक्ति जो कि धारा-38 में प्राधिकरण को दी गयी है, जिसका पढ़ा जाना उचित होगा, जो कि निम्नवत है :-
38. (l) The Authority shall have powers to impose penalty or interest, inregard to any contravention of obligations cast upon the promoters, the allottees and the real estate agents, under this Act or the rules and the regulations made thereunder. (2) The Authority shall be guided by the principles of natural justice and, subject to the other provisions of this Act and the rules made thereunder, the Authority shall have powers to regulate its own procedure. (3) Where an issue is raised relating to agreement, action, omission, practice or procedure that— (a) has an appreciable prevention, restriction or distortion of competition in connection with the development of a real estate project; or (b) has effect of market power of monopoly situation being abused for affecting interest of allottees adversely, then the Authority, may suo motu, make reference in respect of such issue to the Competition Commission of India. उपरोक्त प्राविधान की धारा-38 की उपधारा-4 यह है कि प्राधिकरण को, सम्प्रवर्तकों, आवंटियों और भू-सम्पदा अभिकर्ताओं पर डाली गयी बाध्यताओं के किसी भी उल्लंघन के सम्बंध में, इस अधिनियम और उसके अधीन बनाये गये नियमों और विनियमों के अधीन अर्थदंड (Penalty) या Aoi (Interest) अधिरोपित करने की शक्ति होगी। इससे स्पष्ट है कि सम्प्रवर्तक, आवंटियों और भू-सम्पदा अभिकर्ताओं पर डाली गयी बाध्यताओं (Obligations) के किसी भी उल्लंघन के लिए अर्थदंड (Penalty) और ब्याज (Interest) WHT ERT घारा 38(4) के अन्तर्गत अधिरोपित किया जायेगा।
इसके अतिरिक्त नन््यायनिर्णयन करने की शक्ति भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम 20i6, की धारा-74 में दी गयी है। जो कि निम्नवत् है-: 7l. (!) For the purpose of adjudging compensation under sections 2, 4, 8 and section 9, the Authority shall appoint in consultation with the appropriate Government one or more judicial officer as deemed necessary, who is or has been a District Judge to be an adjudicating officer for holding an inquiry in the prescribed manner, after giving any person concerned a reasonable opportunity of being heard: Provided that any person whose complaint in respect of matters covered under sections 2, 4, 8 and section 9 is pending before the Consumer Disputes Redressal Forum or the Consumer Disputes __Redressal Commission or the National Consumer Redressal Commission, established under section 9 of the Consumer Protection Act, 986, on or before the commencement of this Act, he may, with the permission of such Forum or Commission, as the case may be, withdraw the complaint pending before it and file an application before the adjudicating officer under this Act.
(2) The application for adjudging compensation under sub-section (), shall be dealt with by the adjudicating officer as expeditiously as possible and dispose of the same within a period of sixty days from the date of receipt of the application: Provided that where any such application could not be disposed of within the said period of sixty days, the adjudicating officer shall record his reasons in writing for not disposing of the application within that period. > (3) While holding an inquiry the adjudicating officer shall have power to summon and enforce the attendance of any person acquainted with the’ facts and circumstances of the case to give evidence or to produce any document which in the opinion of the adjudicating officer, may be useful for or relevant to the subject matter of the inquiry and if, on such inquiry, he is satisfied that the person has failed to comply with the provisions of any of the sections specified in sub-section (), he may direct to pay such compensation or interest, as the case any be, as he thinks fit in accordance with the provisions of any of those sections.
उपरोक्त प्राविधान की aee7i(i) यह है कि प्राधिकरण की a2, धारा-44, aRI—-78 और धारा-49 के अधीन जहाँ क्षतिपूर्ति (Compensation) न्यायनिर्णीत करने के लिए, प्राधिकरण समुचित सरकार के परामर्श से ऐसे एक या अधिक न्यायिक अधिकारी जैसा आवश्यक समझे, जो जिला न्यायधीश है या रहा है, न्यायनिर्णायक अधिकारी के रूप में नियुक्त करेगा, जो कि किसी संबद्ध व्यक्ति को सुनवाई का समुचित अवसर प्रदान किये जाने के पश्चात्, विहित रीति (Prescribed manner) में जाँच करेगा। ऐसे में यह स्पष्ट है कि जहाँ क्षतिपूर्ति (Compensation) की मांग की जायेगी, तो उसका निर्णय न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा दिया जायेगा। इससे यह भी प्रतीत होता है कि प्राधिकरण की शक्ति न््यायनिर्णायक अधिकारी के नियुकती हेतु अहम है, क्योंकि मुख्यतः नियुक्तिकर्ता प्राधिकरण है जो कि सरकार के परामर्श से करेगा। अतः रेरा अधिनियम की धारा-38 एवं धारा-74 से स्पष्ट है कि धारा-38 में प्राधिकरण की शक्तियां दी गयी है जिसमें कि सम्प्रवर्तकों, आवंटियों और भू-सम्पदाओं अभिकर्ताओं पर डाली गयी बाध्यताओं (Obligations) के किसी भी उल्लंघन (Any Contravention) के सम्बंध में, अर्थदंड (Penalty) एवं ब्याज (Interest) अधिरोपित किया जायेगा और धारा-77 में क्षतिपूर्ति (Compensation) हेतु न््यायनिर्णयन करने की शक्ति का अधिकार न्यायनिर्णायक अधिकारी को है जो कि केवल धारा-42, धारा-44, धारा-48 और धारा-49 (Only for Sections 2,4,8,9) के अधीन किया जायेगा। रेरा अधिनियम की धारा-42 में निम्न प्राविधान है :- ys 0
2, Where any person makes an advance or a deposit on the basis of the information contained in the notice advertisement or prospectus, or on the basis of any model apartment, plot or building, as the case may be, and sustains any loss or damage by reason of any incorrect, false statement included therein, he shall be compensated by the promoter in the manner as provided under this Act: Provided that if the person affected by such incorrect, false statement contained in the notice, advertisement or prospectus, or the model apartment, plot or building, as the case may be, intends to withdraw from the proposed project, he shall be returned his entire investment along with interest at such rate as may be prescribed and the compensation in the manner provided under this Act. उपरोकतानुसार प्राविधान से यह है कि जहाँ कोई व्यक्ति सूचना, विज्ञापन प्रास्पेक्ट्स में दिये जानकारी के आधार पर कोई अग्रिम देता है या जमा करता है और उसे उसमें सम्मलित गलत, मिथ्या कथन के कारण कोई हानि या नुकसान उठाना पढ़ता है, तो उसकी सम्प्रवर्तक द्वारा इस अधिनियम के अधीन यथा उपबंधित रीति में क्षतिपूर्ति की जायेगी। ऐसे में जहाँ शिकायतकर्ता धारा 42 के प्राविधानों के अनुसार ससाक्ष्य क्षतिपूर्ति की माँग करेगें वहाँ उसका अभिनिर्णय न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा दिया जायेगा।
इसी धारा के प्राविधान के दूसरे अनुच्छेद (Paragraph 2) में यह कहा गया है कि पीड़ित आवंटी परियोजना से यदि अपना नाम वापस लेना चाहता है, तो उसके निवेश की गयी धनराशि, ब्याज सहित, ऐसी दर जो कि पर जो कि विहित की जाए के अनुसार लौटाया जायेगा, और अधिनियम के अधीन उपबंधित रीति के अनुरूप उसकी क्षतिपूर्ति की जायेगी। स्पष्टतया यदि केवल ब्याज सहित धनराशि वापिस माँगी गई है व ब्याज दर विहित है तो उसमें अभिनिर्णय का कोई अंश समाविष्ट नहीं है। व4 अतः इस धारा में 2 अंग है, पहला (Para ) जहाँ क्षतिपूर्ति का प्रश्न है वह न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा निर्णय किया जायेगा और दूसरा (Para 2) जहाँ जमा धनराशि मय ब्याज का प्रश्न है वह प्राधिकरण द्वारा निर्णीत किया जायेगा, इसी प्रकार रेरा अधिनियम की ari की उपधारा-3 निम्नवत प्राविधानित है-: 4(3) In case any structural defect or any other defect in workmanship, quality or provision of services or any other obligations of the promoter as per the agreement for sale relating to such development is brought to the notice of the promoter within a period of five years by the allottee from the date of handing over possession, it shall be the duty of the promoter to rectify such defects without further charge, within thirty days, and in the event of promoter's failure to rectify such defects within such time, the aggrieved allottees shall be entitled to receive appropriate compensation in the manner as provided under this Act.
ani—i4 4 सम्प्रवर्तक द्वारा मंजूर रेखांको और परियोजना विनिर्देशों का पालन किये जाने का प्राविधान है। इसी कम में onr-i4 की उपधारा-3 में यह प्राविधानित है कि यदि कब्जा सौपें जाने की तारीख से 5 वर्ष की अवधि के भीतर आवंटी द्वारा, ऐसे विकास से सम्बंधित किसी संरचनात्मक त्रुटि या सेवाओं के कर्मकौशल, क्वालिटी या उपबन्ध या सम्प्रवर्तक की किन्हीं अन्य बाध्यताओं की ओर सम्प्रवर्तक का ध्यान दिलाया जाता है, तो सम्प्रवर्तक का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसी त्रुटियों को बिना किन्हीं अतिरिक्त प्रभारों के 30 दिन के भीतर दूर कराये और सम्प्रवर्तक द्वारा ऐसी त्रुटियों को ऐसे के भीतर दूर करने में असफल रहने की दशा में पीड़ित आवंटी समुचित प्रतिकर पाने का हकदार होगा, जो इस अधिनियम के अधीन उपबंधित हो। इससे भी यह स्पष्ट है कि इसमें क्षतिपूर्ति के निर्धारण का प्रश्न है जो कि बाध्यकारी शर्तों को पूरा न किये जाने के लिए इस धारा के अन्तर्गत, इसका निर्णय न््यायनिर्णायक अधिकारी का होगा। परन्तु पीड़ित व्यक्ति को यह स्वतंत्रता होगी कि वह, सम्प्रवर्तक द्वारा उन बाध्यकारी शर्तों को पूर्ण कराये जाने हेतु आदेश के लिए, प्राधिकरण के समक्ष अपना वाद प्रस्तुत कर सकते है। 2 रेरा अधिनियम की धारा-48 के अन्तर्गत निम्नवत् प्राविधान दिये गये है :- 8. () If the promoter fails to complete or is unable to give possession of an apartment, plot or building,—
(a) in accordance with the terms of the agreement for sale or, as the case may be, duly completed by the date specified therein; or (b) due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under this Act or for any other reason, he shall be liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice to any other remedy available, to return the amount received by him in respect of that apartment, plot, building, as the case may be, with interest at such rate as may be prescribed in this behalf including compensation in the manner as provided under this Act: Provided that where an allottee does not intend to withdraw from the project, he shall be paid, by the promoter, interest for every month of delay, till the handing over of the possession, at such rate as may be prescribed. sae प्राविधान यह है कि यदि सम्प्रवर्तक-: (क). विकय करार के निबन्धों के अनुसार उसमें निर्धारित तारीख तक सम्यक रूप से पूरा करने में, या (ख). इस अधिनियम के अधीन अथवा किसी अन्य प्रकरण से रजिस्ट्रीकरण का निलंबन या प्रतिसंहरण के कारण विकासकर्ता के रूप में उसका कारोबार बन्द होने के कारण,
यथास्थिति, किसी अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन का पूरा करने में असफल रहता है या उसका कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो वह उपलब्ध किसी अन्य उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना आवंटी की मांग पर, यदि आवंटी परियोजना से बाहर होना चाहता है, तो यथास्थिति, उस अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन के सम्बंध में उसके द्वारा प्राप्त रकम को, ऐसी दर पर ब्याज 43 सहित, जो इस नियमित विहित की जाये एवं इस अधिनियम के अधीन यथा उपबन्धित रीति में क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का पात्र होगा। परन्तु जहाँ किसी आवंटी का परियोजना से बाहर आने का आशय नहीं है, वहाँ सम्प्रवर्तक द्वारा उसे कब्जा सौपें जाने तक विलम्ब के प्रत्येक माह के लिए उस दर पर जो विहित की जाये, ब्याज पाने का अधिकारी होगा। अतः यह स्पष्ट है कि यदि सम्प्रवर्तक द्वारा अनुबन्ध के अनुसार परियोजना को अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन पूर्ण नहीं किया जाता है, या कब्जा नहीं दिया जाता है और यदि आवंटी परियोजना से बाहर आना चाहता है, तो वह अपनी जमा धनराशि ब्याज सहित और क्षतिपूर्ति भी पाने का अधिकारी होगा। यदि आवंटी परियोजना में बना रहना चाहता है, तो प्रतिमाह विलम्ब के लिए ब्याज देय erm इससे भी यह स्पष्ट है कि धारा-38 के अन्तर्गत प्राधिकरण को यह शक्ति है कि जहाँ ब्याज और अर्थदंड का प्रश्न होगा, तो यह प्राधिकरण के क्षेत्राधिकार में होगा और जहाँ क्षतिपूर्ति का प्रश्न होगा, तो वह धारा-74 के अन्तर्गत न््यायनिर्णायक अधिकारी के क्षेत्राधिकार में होगा।
इन प्राविधानों को संयुक्त रूप से पढ़ा जाये, तो इन प्राविधानों की भाषा में यह प्रस्तावित है कि यदि प्रोमोटर द्वारा अपने बाध्यकारी अनुबन्ध के निबन्धनों के अनुसार कब्जा नहीं दिया जाता है, तो आवंटी को यह दावा करने का अधिकार होगा कि अपना जमा धनराशि ब्याज सहित वापस ले सकेगें। BRIG विशेष रूप से ois को दृष्टिगत रखते हुए भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम की धारा-84 के अन्तर्गत उ0प्र0 भू-सम्पदा नियमावली, 20:6 बनायी गयी। जिसमें प्राधिकरण के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करने के लिए फार्म “एम” नियम-33(4) एवं न््यायनिर्णायक अधिकारी के समक्ष आवेदन करने के लिए फार्म “एन” fraa-aa(t) का प्राविधान है। इसके अतिरिक्त उ0प्र0 भू-सम्पदा प्राधिकरण (सामान्य) विनियमन, 20i9 & wer 24 के अन्तर्गत ऑनलाईन शिकायत दर्ज कराना का भी प्राविधान है। इसी कम में आवंटियों के हित के लिए निम्न प्राविधान हैं :- Right of Allottee S 34 9. (4) The allottee shall be entitled to claim the refund of amount paid along with interest at such rate as may be prescribed and compensation in the manner as provided under this Act, from the promoter, if the promoter fails to comply or is unable to give possession of the apartment, plot or building, as the case may be, in accordance with the terms of agreement for sale or due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of his registration under the provisions of this Act or the rules or regulations made thereunder.
उपरोक्तानुसार यह है कि यदि सम्प्रवर्त्त विकय करार के निबन्धों के अनुसार या इस अधिनियम या उसके अधीन बनाये गये नियमों या विनियमों के उपबन्धों के अधीन उसके रजिस्ट्रीकरण निलम्बन या प्रतिसंहरण हो जाने के कारण, विकासकर्ता के रूप में उसका कारोबार बन्द हो जाने के कारण या विकय करार के निबन्धानुसार अनुपालन करने में असफल रहता है या, यथास्थिति, अपार्टमेन्ट, भू-खण्ड या भवन का कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो आवंटी द्वारा सम्प्रवर्तत को दिये गये धनराशि ऐसी ब्याज दर पर वापस जायेगी जो कि विहित की जायेगी तथा अधिनियम के अधीन उपबंधित रीति में क्षतिपूर्ति सहित दावा करने का हकदार होगा। अतः यह स्पष्ट है कि यदि सम्प्रवर्तक द्वारा किये गये विकय करार के नियम एवं शर्तों के अनुसार कब्जा नहीं दिया जाता है, तो वह अधिनियम के अधीन नियम एवं नियमावली के अन्तर्गत जमा धनराशि ब्याज सहित दावा करने का हकदार होगा और इसके अतिरिक्त क्षतिपूर्ति पाने का भी अधिकारी होगा। ऐसे में यह अवधारित किया जा सकता है कि जहाँ आवंटी को जमा धनराशि ब्याज सहित दावा करने का हकदार है, तो उसका क्षेत्राधिकार प्राधिकरण के अन्तर्गत मानी जायेगी, जिसकी शक्ति धारा-38 के अन्तर्गत दी गयी है और जहाँ तक क्षततिपूर्ति दिलाये जाने का प्रश्न है, तो यह क्षेत्राधिकार ene के अनुसार न्यायनिर्णायक अधिकारी का होगा। रेरा अधिनियम धारा-72 में न््यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा क्षतिपूर्ति पर विचार किये जाने वाले कारण के बारे में भी प्राविधान दिये गये है जो कि निम्नवत् है :- 25 0) 72. While adjudging the quantum of compensation or interest, as the case may be, under section 7, the adjudicating officer shall have due regard to the following factors, namely:—
(a) the amount of disproportionate gain or unfair advantage, wherever quantifiable, made as a result of the default; (b) the amount of loss caused as a result of the default; (c) the repetitive nature of the default; (d) such other factors which the adjudicating officer considers necessary to the case in furtherance of justice. इस धारा के प्राविधान में ब्याज भी जोड़ा गया है, क्योंकि क्षतिपूर्ति की धनराशि की मात्रा का निर्धारण एकमुश्त धनराशि अथवा समकक्ष ब्याज दोनों के रूप हो सकता है। स्पष्टतया क्षतिपूर्ति के रूप दिये जाने वाला ब्याज, आवंटी की जमा धनराशि की ब्याज सहित धनवापसी के प्रकरण से अलग है। जहाँ ब्याज के रूप में दी जाने वाली क्षतिपूर्ति की राशि में ब्याज दर का निर्धारण सम्मिलित है, प्राधिकरण द्वारा धनराशि ब्याज सहित वार्षिक करने की दशा में ब्याज दर पूर्व निर्धारित है तथा उसमें अभिनिर्णय का अंश नहीं है। धनवापस किये जाने वाले प्रकरण में भुगतान किये जाने वाले ब्याज की दर राज्य सरकार द्वारा बनाये गये नियमावली के अन्तर्गत दी जाती है और क्षतिपूर्ति निर्धारण या ब्याज की गणना अधिनिर्याणक द्वारा निम्न 4 बिन्दुओं को दृष्टिगत रखते हुए दिये जाते है। (क) व्यतिकम के परिणाम स्वरूप अनुपातिक लाभ या अनुचित फायदे की, जहाँ कहीं अनुमान्य हो, रकमः (ख) व्यतिकम के परिणामस्वरूप हानि की रकमः (ग) व्यतिकम के पुनरावुत्तिपूर्ण प्रकृति: (@) ऐसे अन्य कारक, जो न्यायनिर्णायक अधिकारी न्याय के अग्रसरण के मामले में आवश्यक समझें | OX 36
ऐसे में यह we है कि क्षतिपूर्ति वाले प्रकरण के निस्तारण जो न्यायनिर्णायक अधिकारी द्वारा किया जाएगा, उसका जमा धनराशि मय ब्याज वापस किये जाने वाली धनराशि से कोई लेन-देना नहीं है। यह भी है कि रेरा अधिनियम में क्षतिपूर्ति एवं जमा धनराशि मय ब्याज हेतु अलग-अलग प्राविधान दिये गये है। क्षतिपूर्ति की गणना धारा-72 में दिये गये सिर्फ 4 आधारों एवं धारा 42, 44, 48 व १9 के प्राविधानों तथा शर्तों के अनुसार ही दी जायेगी। अधिनियम के अनुसार प्राधिकरण को भू-सम्पदा सेक्टर को नियमित रूप विभिन्न प्राविधानों के अनुसार विकास करने हेतु दिये गये है साथ प्राधिकरण को एक अधिनिर्णायक अधिकारी को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है जो सिर्फ विशिष्ठ रूप से कृत्य अनुसार क्षतिपूर्ति वाली धनराशि का निर्धारण करेगें। जहाँ तक ब्याज, अर्थदंड, क्षतिपूर्ति में अन्तर का प्रश्न है, तो इन सभी के अन्तर के सम्बंध में निम्नवत् साक्ष्यों के आधार पर स्पष्ट किये गये है माननीय उच्च न्यायालय बाम्बे द्वारा नीलकमल Raced सबथअर्बन प्राणलि0 आदि बनाम यूनियन ऑफ इण्डिया आदि में अभिनिर्धारित किया गया है कि-:
258. In paragraph-9 of Alok Shanker Pandey v. Union of India, (2007) 3 SCC 545, the Apex Court has held that “There is misconception about interest. Interest is not a penalty or punishment at all, but it is the normal accretion on capital. For example if A had to pay B a certain amount, sayl0 years ago, but he offers that amount to him today, then he has pocketed the interest of the principal amount. Had A paid that amount to B 0 years ago, B would have invested that amount somewhere and earned interest thereon, but instead of that A has kept that amount with himself and earned interest on it for this period. Hence equity demands that A should not only pay back the principal amount but also the interest thereon to B.” The object of Section 8 is to recompense an allottee for depriving him of the use of the funds paid by him. The promoter who has received money from the allottee but has failed to adhere to his contractual or statutory obligations, cannot claim that he is entitled to utilize the monies without os 47 paying any interest with respect thereto to the allottee. उक्त से we है कि ब्याज adds नहीं है और न ही कोई सजा है, किन्तु साधारण रूप से रकम पर हुई अभिवृद्धि है। धारा-48 का लक्ष्य आवंटी को वंचित जमा किये गये धनराशि के उपयोग का प्रतिदान करने हेतु है। इसी कारण यह अनुतोष प्राधिकरण द्वारा क्षेत्राधिकारिता के अन्तर्गत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए दिया जा रहा है। तद्नुसार बिन्दु संख्या-4 Pata किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-5
an विलम्ब के लिए एग्रीमेन्ट टू सेल में राज्य सरकार द्वारा निर्धारित दर विलम्ब ब्याज की दर के रूप में लागू की जा सकती है ? जहाँ तक देय ब्याज दर नियमावली के अन्तर्गत अधिसूचित न किये जाने का प्रश्न है। इस सम्बंध में स्पष्ट करना है कि उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) अधिनियम की धारा-84 की उपधारा-2 के खण्ड-(च) और IRI-3 की उपधारा-2 के साथ पठित wat धारा-84 की उपधारा-॥ द्वारा प्रदत्त शक्तियों का अधिकार प्रयोग करते हुए दिनांक 77.0.20i8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास), (विकय पट्टा के लिए करार) नियमावली Rules), 2048 अधिसूचित की गयी है। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9.2 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) eA में ब्याज दर निर्धारित है, जिसके प्रस्तर 9.2 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost_of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +I% H% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: Provided that where an Allottee does not intend to withdraw from the Project or terminate the ov 48
Agreement, he shall be paid, by the Promoter, interest at the rate prescribed in the Rules, for every month of delay till the handing over of the possession of the [Apartment/Plot], which shall be paid by the Promoter to the Allottee within forty- five days of it becoming due. इसी कम में आवंटियों के डिफॉल्ट प्रकरण के बारे में यही ब्याज दर प्रस्तर 9.30) में. प्रोमोटर हेतु निर्धारित की गयी है और निम्न रूप से प्राविधानित है-: In case the Allottee fails to make payments for 2 (two) -consecutive demands made by the Promoter as per the Payment Plan annexed hereto, despite having been issued notice in that regard the Allottee shall be liable to pay interest to the promoter on the unpaid amount at the rate equal _to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +I% unless provided otherwise otherwise under the Rules. The Promoter must not be in default to take this benefit; इससे यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो प्रोमोटर भी cine प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। उपरोकतानुसार से यह स्पष्ट है कि ब्याज दर mci प्रतिशत की वार्षिक दर से दोनों पक्षों (आवंटी एवं प्रोमोटर) के लिए इस नियमावली में निर्धारित की गयी है। इस ब्याज दर के निर्धारण को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी उचित माना गया है। इस सम्बंध में माननीय सर्वोच्च. न्यायालय के सिविल अपील संख्या-42238 / 2048 पायनियर ada es एवं इन्फास्ट्रक्चर लिमिटेड बनाम गोविन्द राघवन में अभिनिर्धारित किया गया है कि-:
5.3. The Respondent further submitted that the National Commission had ordered payment of Interest as per the statutory Rules i.e. Rule 5 of the Haryana Real Estate (Regulation and Development) Rules, 207 @I0.7% S.I. p.a. The Respondent - Flat Purchaser submitted that he had obtained a loan for Rs. 3,30,00,000/- from Standard Chartered Bank to purchase the flat in question, and had entered into a Tripartite Loan Agreement with the i9 Bank 3 and the Builder. The Respondent - Flat Purchaser had to pay Interest @0% p.a. for servicing the loan for the entire period. Hence, Interest @0.7% S.I. p.a. awarded by the National Commission was just and fair. उपरोक्तानुसार से यह स्पष्ट है कि हरियाणा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) नियमावली, 20i7 द्वारा वार्षिक ब्याज दर MCLR+2 प्रतिशत (Interest &40.7% S.l. pa) निर्धारित की गयी थी, जो सम्बन्धित मामले में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (४८०४८) द्वारा अनुमन्य किया गया है, जिसको माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा उचित एवं सही माना है, साथ ही इसी आदेश के प्रस्तर 8.4 में भी स्पष्ट रूप से उललेखित है कि-: The National Commission has rightly awarded Interest @0.7% S.I. p.a. by applying Rule 5 of the Haryana Real. 2i Estate (Regulation And Development) Rules, 20i7 from the date of each installment till 05.02.207 ice. till the date after which the Order of stay of cancellation of the allotment was passed; and thereafter, from the date of the Commission’s final Order till the date on which the amount is refunded with Interest.
अत: यह स्पष्ट है कि ब्याज दर जो कि 40.7 प्रतिशत (wcir+2 प्रतिशत) हरियाणा रेरा द्वारा निर्धारित किया गया वह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भी सही ब्याज दर माना गया है। इससे यह अवधारित किया जा सकता है कि राज्य सरकार द्वारा नियमावली के अन्तर्गत निर्धारित की गयी ब्याज दर उचित एवं सही है। ब्याज दर को Ke बैंक ऑफ इण्डिया के McLRH से सम्बद्ध करने के सिद्धान्त को माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी eters गया है और न्यायोचित ठहराया है। ऐसे में उ0प्र0 राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित की गयी भू-सम्पदा (विनियमनन और विकास), (विकय,/ पट्टा के लिए करार) नियमावली (Rules), 20I8 के अन्तर्गत निर्धारित की गयी वार्षिक ब्याज दर MCLR+H प्रतिशत, जो कि स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की अधिकतम ब्याज दर से 4 प्रतिशत ज्यादा है उचित एवं सही है। बिन्दु संख्या-5 निस्तारित किया जाता है जहां तक क्षतिपूर्ति (Compensation) देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है तथा न ही यह कम्पलेन्ट फार्म ey 20 एन पर दायर की गयी है। अतः इस बिन्दु पर पीठ द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा सकता है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि शिकायतकर्ता को हस्तांतरित किए गये फ्लैट की परियोजना /टॉवर का ओ.सी /सी.सी मिलते ही दिसंम्बर 2049 से पूर्व देय Tey शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री कराना सुनिश्चित Hr | 2 इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। ८0 a ay (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण