Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Devendra Singh Gusain v. Patel Advance Jv S-406 L.G
Complaint No. 12201826491
- Decision date
- 2019-08-14
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
i Sono भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर | सुनवाई पीठ-04, उपस्थिति : श्रीमती कल्पना मिश्रा, सदस्य कम सं० | शिकायत to शिकायतकर्ता 4 5204840487 अमोद कुमार चौधरी 2 42204825975 7 Oe ॥ श्रीवास्तव 3 4220826494 देवेन्द्र सिंह "रन शिकायतकर्तागण बनाम पटेल एडवांस जे0वी० एस-406 एल--जी ग्रेटर कैलाश-2 नई दिल्ली- t40048 आदेश 'शिकायतकर्ता अमोद कुमार चौधरी के साथ 02 अन्य शिकायकतकर्तागण द्वारा विपक्षी के विरूद्ध वाद योजित किया गया है। इन सभी शिकायतों के तथ्य समान हैं और एक समान साक्ष्य हैं। यह सभी शिकायतें NEOTOWN PHASE-] से सम्बंधित है। अतः: एक ही निर्णय से इनका निस्तारण किया जा रहा है। शिकायत do 520480i87 अमोद कुमार चौधरी अग्रणी वाद रहेगा। प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध अविलम्ब कब्जा अथवा जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है | संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्तागण द्वारा विपक्षी की परियोजना NEOTOWN PHASE-| में फ्लैट बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्तागण द्वारा समय समय पर अनेक किस्तों के आधार पर विकय प्रतिफल का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा निष्पादित अनुबंधित नियत अवधि में शिकायतकर्तागण को कब्जा दिया जाना प्रस्तावित था। किन्तु विपक्षी द्वारा अभी तक कब्जा नहीं दिया गया, अतः शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है। ue 2 शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, जमा धनराशि की रसीदें, मांग पत्र, ई-मेल की छायाप्रतियां दाखिल की गयी।
विपक्षी की ओर से जवाब दाखिल करते हुए कहा गया कि वह विलम्ब के लिए उत्तरदायी नहीं है तथा उसके लिए अन्य पक्ष wy: ग्रेटर नोएडा व माननीय न्यायालयों के आदेश जिम्मेदार है, तथा अप्रत्याशित घटनाओं के कारण परियोजना विलंबित हुई है, जिसके लिए विपक्षी उत्तरदायी नहीं है, तथा अपने कथन के समर्थन q- 4. ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण का यथास्थिति बनाये रखने का आदेश दिनांक 34.05.2044 संलग्न है, तथा पत्रावली पर उपलब्ध है। तथा ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण का यथास्थिति बनाये रखने के आदेश का स्थगनादेश मुक्ती 26.27.20i5 का है। जिससे स्पष्ट है कि लगभग 53 माह स्थगनादेश रहा | 2. दिनांक 29.07.2044 को लीज डीड का निर्धारण का आदेश जो पत्रावली पर उपलब्ध है। 3... दिनांक 24.0.200. माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद में योजित रिट याचिका सं0-37443 ,/ 2044 गजराज एवं अन्य बनाम उ.प्र. शासन व अन्य तथा 470 अन्य रिट याचिकाओं में समंकित रूप से पारित आदेश दिनांक 24.40. 204 में मास्टरप्लान 202 के कियान्वयन के सम्बंध में सूचित किया गया कि एन.सी.आर. प्लानिंग बोर्ड से प्राधिकरण के मास्टर प्लान 2024 की स्वीकृति प्राप्त होने तक स्थल पर निर्माण/विकास कार्य न करायें जायें। जिसकी प्रति पत्रावली पर उपलब्ध है। 4. दिनांक 29.09.2043 का माननीय एन.जी.टी.का सेन्ट्रल ग्राउन्ड वाटर अथारिटी को आदेश जिसके cea grew वाटर एक्सट्रक्शन पर do लगा दी गयी, जिसकी पब्लिक नोटिस की छायाप्रति पीठ को उपलब्ध करायी गयी। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली पर उपलब्ध समस्त प्रपत्रों का अवलोकन किया।
यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट बुक करायी गयी। इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं है कि विपक्षी निर्धारित अवधि में कब्जा प्रदान करानें में असमर्थ रहा है। प्राधिकरण द्वारा अपने अभिलेखों का अवलोकन किया गया एवं यह पाया कि विपक्षी की परियोजना रेरा के अन्तर्गत पंजीकृत है, जिसके अन्तर्गत परियोजना कार्य प्रारम्भ होने की तिथि दिनांक-40.03. 20I अंकित है तथा रेरा की वेबसाईट पर परियोजना की पूर्णता की तिथि 30.06. 2049 है। —_ 3 शिकायतकर्तागण की सामूहिक शिकायतों को दृष्टिगत रखते हुए निम्न बिन्दु विचारणीय है :- 4, शिकायतकर्तागण द्वारा जमा धनराशि वापस दिलाये जाने की मांग करना। 2. ager में आर्बिट्रेशन क्लॉज होने के कारण इस पीठ की क्षेत्राधिकारिता न होना। 3. विपक्षी द्वारा किसान प्रतिकर के मद में अतिरिक्त धनराशि की मांग किया OT | | 4. विषक्षी द्वारा अनुबन्ध में सबवेंशन स्कीम होने के बावजूद भी ई.एम.आई. का भुगतान न किया जाना। 5. विपक्षी द्वारा अवैध रूप से मांगे जाने वाले वाटर कनेक्शन व लेबर सेस चार्ज को हटाया जाये। 6. विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये। निस्तारण बिन्दु do 4
शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया है कि विपक्षी द्वारा जनवरी 2044 तक कब्जा दिया जाना था, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया है, जिस कारण जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने का अनुरोध किया गया है, जिस पर विपक्षी का कहना है कि विपक्षी को आवंटित भूमि पर किसानों द्वारा विरोध किया गया तथा विलम्ब के लिए प्रमुखतः ग्रेटर नोएडा अथारिटी व माननीय न्यायालय के आदेश के जिम्मेदार हैं तथा कुछ अप्रत्याशित घटनाओं के कारण परियोजना विलम्बित हुई हैं और माननीय उच्च न्यायालय एवं माननीय उच्चतम न्यायालय में कार्यवाही चलने के कारण परियोजना विलंबित हुई, जिसके लिए विपक्षी उत्तरदायी नहीं है। विपक्षी अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप परियोजना पूर्ण करने को तत्पर है और परियोजना पर निर्माण कार्य प्रगति से चल रहा है और वह दिसम्बर 209 तक शिकायतकर्तागण को कब्जा दे देगा। इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील सं0 744/207 चित्रा शर्मा आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया आदि में किया गया आब्जरवेशन महत्वपूर्ण है :- "40. The figures........ which have been made available presently, following the opening of the web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of ee 4 the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund."
इस स्टेज पर रियल wee सेक्टर की वर्तमान वित्तीय स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए धनराशि वापस किये जाने से उन आवंटियों के हित प्रतिकूलतः प्रभावित होने संभावित है, जो कि यूनिट का कब्जा लेना चाहते हैं | साथ ही विपक्षी की ओर से कहा गया है कि छः माह तक कब्जा दे दिया जायेगा, यदि शिकायतकर्ता को विलम्ब के लिए धनराशि, ब्याज के साथ कब्जा मिल जाता है तो इससे सभी आवंटियों के हित साध्य हो सकेंगें | माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित war के अधीन शिकायतकर्तागण को धनवापसी किया जाना उचित प्रतीत नही होता है। तदनुसार बिन्दु सं० 4 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Ho 2 विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आर्बीट्रेशन का क्लाज है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही निस्तारित किया जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध की बिन्दु 38 में कथन किया गया है कि :- " That all the disputes or disagreements arising out of in connections with or in relation to this allotment shall be mutually discussed and settled between the parties. However the disputes which cannot be amecably settled shall be finally decided by artitration and the sole arbitrator in such a case shall be appointed by the company. the arbitral proceedings shall take place as per the Indian Arbitration and Conciliation Act 996 or any amendement thereof shal! be applicable. "
जिससे विदित है कि अनुबन्ध के अनुसार दोनो पक्षों के मध्य किसी भी विवाद का निस्तारण परस्पर सहमति से Indian Arbitration and Conciliation Act 996 के अन्तर्गत किया जायेगा, जिसका क्षेत्राधिकार दिल्ली होगा। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बूज एलन व हेमिल्टन इंक आदि बनाम एस.बी.आई. होम फाईनेंस feo व अन्य में अभिनिर्धारित किया गया है कि :- ८. 5 " all aspects of arbritrability have to be decided by the court seized of the suit, and cannot be left to the decision of the Arbitrator. Even if an arbitration agreement exists and the dispute is covered therein, the court will refuse to refer the parties to arbitration ~ if the subject matter of the suit is capable of adjucdication only by a public forum or the relief clamied can only be granted by a special court or Tribunal." इसके अतिरिक्त ए.अय्यास्वामी बनाम ए परमाशिवम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " there are classes of disputes that fall within the exclusive domain of special bodies created under legislation that confers jurisdiction ot the exclusion of ordinary civil courts. Such disputes would not then be capable of resolution by arbitration," साथ माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा भी यह निर्णत किया गया है कि:--
The NCDRC finally held that in light of the overall architecture of the CPA and Court-evolved jurisprudence, amended sub-section (l) of Section 8 cannot be construed as a mandate to the Consumer Fora, constituted under the CPA, to refer the parties to arbitration in terms of the Arbitration Agreement. the principle that - Jurisdiction of specially constituted judicial authorities cannot be ousted by a blanket mandate to refer disputes to arbitration under the umbrella of Section 8, A&C Act. On the ground level, it provides relief to a party to avail special remedies available under a statute, despite presence of an arbitration clause. This serves to protect parties from lop-sided and sparely-negotiable standard form agreements. From another angle, parties will no longer be mandated to adopt the relatively long and expensive process of arbitration - in disputes arising under specific statutes having specific dispute redressal mechanisms. This judgment could also be used to interpret Section 79 of the Real Estate (Regulation and Development) Act 206 (“Real Estate Act”) which bars the jurisdiction of civil courts in matters involving real estate. The NCDRC applied the reasoning in Ayyaswamy to conclude that the same principles could apply to cases under the Real Estate Act, which provides a special mechanism for resolution of disputes between buyers and builders. aoe 6
माननीय उच्चतम न्यायालय एवं माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नहीं किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये हैं और दीवानी न्यायालय के अतिरिक्त क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 2076 की धारा 79, आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल wee अधिनियम के तहत उक्त मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं font के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु wo 2 Prana किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Ho 3
कुछ शिकायतकर्तागण द्वारा यह भी अवगत कराया गया कि शिकायतकर्ता द्वारा किसान प्रतिकर के रूप में अतिरिक्त धनराशि की मांग की जा रही है, जो कि अनुचित है और वापस करायी जाये। विपक्षी की ओर से तर्क प्रस्तुत किया गया कि उक्त धनराशि माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेशानुसार विपक्षी द्वारा प्राधिकरण को दी जा रही है, जिस कारण वह उक्त विपक्षी उसे आवंटियों से प्राप्त करने का अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि Savitri devi vs State of U.P. SC 507 में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सावित्री देवी बनाम उ0प्रएसरकार के मामले में किसानों को अतिरिक्त 64.07 प्रतिशत मुआवजा देने हेतु प्राधिकरण को आदेशित किया गया था, जिस कारण उक्त अधिभार अधिरोपित किया गया है, किन्तु यह विपक्षी का दायित्व है कि वह यह स्पष्ट करें कि उसके द्वारा कितनी धनराशि प्राधिकरण को इस मद में दी गयी है और उक्त दी गयी धनराशि को किस प्रकार अनुपातिक रूप में आवंटियों पर समान रूप से अधिरोपित किया गया है। तदोपरांत प्रूफ ऑफ पेमेन्ट के साथ विपक्षी उक्त धनराशि को प्राप्त करने का अधिकारी है, यदि कोई भुगतान बाद में किया जाता है, तो यथासमय विपक्षी उसे प्राप्त कर सकता है। तदनुसार बिन्दु to 3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु tio 4 कुछ शिकायतकर्तागण द्वारा यह भी कहा गया कि उनके द्वारा सबवेंशन स्कीम में यूनिट बुक करायी गयी थी, जिसकी ई.एम.आई. का भुगतान कब्जे मिलने तक विपक्षी द्वारा किया जाना था, किन्तु अब विपक्षी द्वारा ई.एम.आई. का भुगतान नही हु 7
किया जा रहा है, जिस कारण शिकायतकर्ता को उक्त ई.एम.आई. का भुगतान करना पड रहा है, जिससे वह विषय आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा है। इस पर विपक्षी की ओर से मौखिक तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध के अनुसार 24 माह तक ई.एम.आई. का भुगतान विपक्षी द्वारा किया गया है एवं वर्तमान में रियल एस्टेट मार्केट मंदी के दौर से गुजर रहा है। ऐसी दशा में विपक्षी स्वयं विषम आर्थिक परिस्थितियों से गुजर रहा है और वर्तमान में वह पूर्ण रूप से परियोजना को पूर्ण करने में तत्पर है, ऐसी दशा में वह ई.एम.आई. का भुगतान करने में असमर्थ है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि रेरा के गठन का मूल उददेश्य से गृहकेताओं के हितों को दृष्टिगत रखते हुए रियल wee सैक्टर का विकास करना है। ऐसी परिस्थितियों में पीठ को दोनो पक्षों के आर्थिक हितों को दृष्टिगत रखते हुए सामंजस्य स्थापित करना है। ऐसी दशा में चूंकि विपक्षी परियोजना पूर्ण करने में तत्पर है और ऐसी स्थिति में यदि वह धनराशि को परियोजना से निकालता है, तो इससे अनेको ऐसे गृहकेताओं के हित प्रभावित होना अधिसंभावित हैं, जो अपने घरों के लिए प्रतीक्षारत हैं, किन्तु अनुबन्ध के विपरीत यदि गृहकेताओं द्वारा यदि ई.एम.आई. का भुगतान किया जा रहा है, तो शिकायतकर्ता इसका लाभ पाने का अधिकारी है। शिकायतकर्ता को उसके द्वारा भुगतान की जा रही ई.एम.आई. का लाभ अंतिम भुगतान में समायोजित कर दिया जाये।
कुछ शिकायतकर्ता द्वारा यह भी कथन किया गया कि उनके द्वारा 40 //60, 95/5 अथवा 40,//30,/30 के प्लॉन के अंतर्गत बुकिंग करायी गयी है, किन्तु अब विपक्षी द्वारा धनराशि की मांग की जा रही है। इस सम्बंध में स्पष्ट किया जाता है कि विपक्षी अनुबन्ध के अनुसार ही शिकायतकर्ता से धनराशि की मांग कर सकते हैं। तदनुसार बिन्दु सं० 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 5 शिकायतकर्तागण की ओर से यह भी कथन किया गया कि विपक्षी द्वारा अनुचित रूप से वाटर कनेक्शन चार्ज व लेबर सेस की मांग की जा रही है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि सिविल अपील wo 6649-50 // 2048 सुपरटेक बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि :- ii Water connection charges, if paid to the concerned Authority, on proportionate _ basis subject to furnishing proof of such payment, in terms of this order. iii Labour welfare —_ charges subject to furnishing proof and computation with respect to the said charges in terms of _ this order. — 8 ऐसी दशा में माननीय उच्चतम न्यायालय के आदेश के आलोक में विपक्षी शिकायतकर्ता से उक्त धनराशि पाने का अधिकारी है, किन्तु विपक्षी इस सम्बंध में शिकायतकर्ता को उक्त गणना का द्विभाजन (bifurcation of calculation) wreq कराना होगा, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि विपक्षी द्वारा कितनी धनराशि इस मद में सम्बंधित विभाग को दी गयी और उक्त देय धनराशि के आधार पर शिकायतकर्ता की यूनिट पर कितना अधिभार उक्त धनराशि का आता है। तदनुसार बिन्दु wo 5 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु सं० 6
शिकायतकर्ता का कहना है कि परियोजना जनवरी 204 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नही है। अतः विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल Raced सबशर्बन wf. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में याचीगण की ओर से यह तर्क लिया गया था कि :- Section 4(2)()(c) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)(l)(c) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In othe words, by giving Opertunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)()(c), he is not absolved of the liability under the agreement for sale.
Section 8(I)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the Ya 9 apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा fda के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है कि:-- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी wer ofiii) ¥ निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को mcrry प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज सहित धनवापसी किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। तद्नुसार निस्तारण बिन्दु सं०0-6 निस्तारित किया जाता है। जहां तक मुआवजा&क्षतिपूर्ति देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अत: इस बिन्दु पर प्राधिकरण द्वारा कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है।
t. शिकायतकर्तागण को दिनांक 34.42.20I9 तक ओ.सी/सी.सी सहित विकय विल्लेख कराकर नियमानुसार कब्जा प्रदान करें एवं विलम्बित ब्याज हेतु अनुबंध में निर्धारित अवधि से वास्तविक कब्जा दिये जाने तक विलम्बित ब्याज प्रदान करना सुनिश्चित करें। यह ब्याज रेरा आने के पूर्व अनुबन्ध के अनुसार (रु 05,//-रूपये प्रतिवर्गफुट प्रतिमाह ) देय होगा Ye १0 एवं रेरा आने के उपरांत स्टेट बैंक ऑफ इंडिया द्वारा निर्धारित mcr प्रतिशत की ब्याज दर पर देय होगा। 2. उपरोक्त आदेश का अनुपालन न (करने की स्थिति में विपक्षी शिकायतकर्तागण द्वारा जमा की गयी कुल धनराशि पर स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा निर्धारित mere प्रतिशत ब्याज की दर से शिकायतकर्तागण को ब्याज सहित मूल धनराशि 45 दिन के अन्दर वापस करना सुनिश्चित करें। 3. विपक्षी, शिकायतकर्ता द्वारा दौरान निर्माण जमा की जाने वाली ई.एम. आई.की धनराशि को अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित कर, यदि शिकायतकर्तागण द्वारा प्रश्नाधीन इकाई के कय हेतु बैंक से ऋण लिया हो तो विलम्बित ब्याज की धनराशि का उपयोग पहले बैंक का ऋण व देय ब्याज लौटाने के बाद शेष धनराशि शिकायतकर्तागण को दिया जाए। 4. रेरा अधिनियम 2076 की धारा 2 (alli) रेरा लागू होने के बाद से दोनों ual के डिफॉल्ट पर ब्याज की दर MCLR+I प्रतिशत होनी चाहिए। इस आदेश का उल्लंघन भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दण्डनीय होगा। उपरोक्तानुसार शिकायतकर्ता के शिकायत का निस्तारण किया जाता है। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये एवं इसकी प्रति सभी सम्बन्धित पत्रावली में लगायी जाएं। दिनांक- ७8 /og /2049 ७७७० Kr ang, (कल्पना मिश्रा) ०» ५७४ (सदस्य)
Boro भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण