Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Unmesh Singhal v. Uppal Chadha Hi-Tech Developers Pvt. Ltd
Complaint No. 12201826414
- Decision date
- 2019-06-20
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 2 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
व उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्री बलविन्दर कुमार, सदस्य शिकायत संख्या : 42204826444 उमेश सिंघल बनाम उप्पल चढढा हाई-टेक डेवलपर्स प्राईवेट लिमिटेड, आदेश 27.05.2049 प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध विलंबित अवधि का ब्याज दिलाये जाने एवं अनुचित चार्ज हटाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना UCHDPL Sec-7, Plots ¥ प्लॉट Wo 4020 बुक करायी गयी, जिसके सापेक्ष शिकायतकर्ता द्वारा अंकन 35,00,000/- रूपये जमा कराये गये और यूनिट का कब्जा दिनांक 07.:2.200 तक दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नही दिया गया और विकास के नाम पर कई तरह के चार्ज की मांग की जा रही है, जिस कारण कब्जा, विलंबित अवधि का ब्याज व क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का अनुरोध किया गया। शिकायतकर्तागण द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, परियोजना के फोटो, पेमेन्ट प्लान की प्रतियां, दाखिल की गयी हैं। विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अपनी परियोजना को रेरा में पंजीकृत कराया गया और पजीकरण के समय पूर्णता की तिथि दी गयी थी, जो अभी आनी शेष है और उससे पूर्व यह वाद पोषणीय नही है, क्योंकि रेरा अधिनियम पूर्ववर्ती नही है बल्कि भविष्यवर्ती है। शिकायतकर्ता द्वारा क्षतिपूर्ति की मांग की गयी है, जिसको देने का अधिकार एडजूटिकेटर को है। यदि शिकायतकर्ता को विकल्प दिया जाता है, तो वह क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है। इसके अतिरिक्त आवंटन पत्र में आरबीट्रेशन क्लॉज होने any 2
के कारण इस पीठ को सुनवाई का क्षेत्राधिकार नही है। शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियेजना में यूनिट बुक करायी गयी थी और शिकायतकर्ता का ऑफर ऑफ पोजेशन भेजा जा चुका है। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के नियमों के अनुरूप शिकायतकर्ता से चार्ज लिये जा रहे हें। vat परियोजना दिनांक 37.05.2020 तक पूर्ण होकर शिकायतकर्ता को कब्जा दे दिया जायेगा। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में फार्म सी प्रस्तुत किया गया है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। पक्षकारों के मध्य निम्न बिन्दु विवादय है :- 4. क्या प्रश्नगत वाद रेरा दी गयी तिथि के बाद ही पोषणीय है? 2 क्या अनुबन्ध में आरबीट्रैशन क्लॉज होने के कारण वाद की सुनवाई का aati इस पीठ को नही है? 3... क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नहीं है? 4... क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? 5... क्या शिकायतकर्ता की जमा धनराशि वापस दिलायी जा सकती है? 6... क्या शिकातकर्ता विलंबित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? 7. क्या विपक्षी विकास कार्य के मद में कोई भुगतान पाने का अधिकारी है? निस्तारण बिन्दु सं0 4 बिन्दु सं० 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या प्रश्नगत वाद रेरा दी गयी तिथि के बाद ही पोषणीय है? यह वाद बिन्दु विपक्षी के अभिकथन पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है।
विपक्षी का कहना है कि उसके द्वारा रेरा में अपनी परियोजना पंजीकरण के समय की पूर्णता की तिथि 34.05.2020 दी गयी है, उससे पूर्व शिकायतकर्ता का वाद पोषणीय नही है। इसके विपरीत शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता के साथ एक अनुबन्ध निष्पादित किया गया है, जिसमें विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा निर्माण शुरू होने से तीन वर्ष में कब्जा दिये जाने का कथन किया गया था। विपक्षी की ओर से अनुबन्ध की प्रति दाखिल की गयी है, जिसके परे अवलोकन से विदित है कि अनुबन्ध के प्रस्तर 3.4 में यूनिट का कब्जा निर्माण कार्य शुरू होने से 3 वर्ष में दिये जाने का उल्लेख है, विपक्षी की ओर से निर्माण कार्य शुरू होने की जानकारी की बाबत कोई प्रपत्र पत्रावली पर दाखिल नही किया गया है, किन्तु ta की वेबसाईट पर विपक्षी की ओर से परियोजना के शुरू होने की तिथि 40.7.2009 दी गयी है, जिसे बाद में संशोधित कर 02.44.2043 किया गया है, विपक्षी द्वारा wa भी रेरा की वेबसाईट पर दी गयी पूर्णता की तिथि का आलम्ब लिया गया है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि विपक्षी द्वारा दी गयी उक्त सूचनायें विपक्षी को स्वीकृत है। इस प्रकार कब्जे की विलंबतम तिथि 02.44.2046 थी, किन्तु विपक्षी की ओर से रेरा में परियोजना के पंजीकरण के समय दी गयी पूर्णता की तिथि को माने का कथन किया गया है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" Section 4(2)(I)(C) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)()(C) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In other words, by giving opportunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)(I)(C) he is not absolved of the liability under the agreement for sale." उपरोक्त से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा रेरा में परियोजना के पंजीकरण के समय दी गयी पूर्णता की तिथि विपक्षी को रेरा के दंडात्मक प्राविधानों से बचा सकता है, किन्तु इससे आवंटी एवं प्रमोटर के मध्य निष्पादित अनुबन्ध को समाप्त नहीं माना जा सकता | विपक्षी उक्त अनुबन्ध की अनदेखी नही कर सकता है। उपरोक्त विधि व्यवस्था के प्रकाश में विपक्षी की आवंटी को यूनिट देने की उत्तरदायिता अनुबन्ध के अनुसार ही होगी। अतः विपक्षी का यह तर्क बलहीन है कि रेरा में पूर्णता की दी गयी तिथि के उपरान्त ही शिकायतकर्ता किसी अनुतोष को प्राप्त करने का अधिकारी है। तदनुसार बिन्दु vo 4 Pena किया जाता है। निस्तारण बिन्दु सं० 2 कै) WA
विपक्षी की ओर से यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अनुबन्ध में आर्बट्रेशन का art है, जिस कारण शिकायतकर्ता व विपक्षी के मध्य किसी भी विवाद को केवल आर्बीट्रेटर के माध्यम से ही Prema fear जा सकता है और इस पीठ को इस शिकायत को सुने जाने की क्षेत्राधिकारिता प्राप्त नही है। विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध के WER 29 में कथन किया गया है कि :- " All or any disputes arising out or in relation to the terms of this arrangement or its termination, including the interpretation and validity thereof and the respective rights and obligations of the parties shall be settled amicably by mutual discussion faliing which the same shall be settled through arbitration proceedings shall be governed by the Indian Arbitration and Conciliation Act 996 or any amendement, modifications thereof the time being in force. " जिससे विदित है कि अनुबन्ध के अनुसार दोनो पक्षों के मध्य किसी भी विवाद का निस्तारण परस्पर सहमति से Indian Arbitration and Conciliation Act 996 के अन्तर्गत किया जायेगा, जिसका क्षेत्राधिकार दिल्ली होगा। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बूज एलन व हेमिल्टन इंक आदि बनाम एस.बी.आई. होम फाईनेंस लि0 व अन्य में अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
" all aspects of arbritrability have to be decided by the court seized of the suit, and cannot be left to the decision of the Arbitrator. Even if an arbitration agreement exists and the dispute is covered therein, the court will refuse to refer the parties to arbitration — if the subject matter of the suit is capable of adjucdication only by a public forum or the relief clamied can only be granted by a special court or Tribunal." इसके अतिरिक्त ए.अय्यास्वामी बनाम ए परमाशिवम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि — " there are classes of disputes that fall within the exclusive domain of special bodies created under legislation that confers jurisdiction ot the exclusion of ordinary civil courts. Such disputes would not then be capable of resolution by arbitration," साथ माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा भी यह निर्णीत किया गया है किः- wr The NCDRC finally held that in light of the overall architecture of the CPA and Court-evolved jurisprudence,
amended sub-section (l) of Section 8 cannot be construed as a mandate to the Consumer Fora, constituted under the CPA, to refer the parties to arbitration in terms of the Arbitration Agreement. the principle that - jurisdiction of specially constituted judicial authorities cannot be ousted by a blanket mandate to refer disputes to arbitration under the umbrella of Section 8, A&C Act. On the ground level, it provides relief to a party to avail special remedies available under a statute, despite presence of an arbitration clause. This serves to protect parties from lop- sided and sparely-negotiable standard form agreements. From another angle, parties will no longer be mandated to adopt the relatively long and expensive process of arbitration - in disputes arising under specific statutes having specific dispute redressal mechanisms. This judgment could also be used to interpret Section 79 of the Real Estate (Regulation and Development) Act 20I6 (“Real Estate Act”) which bars the jurisdiction of civil courts in matters involving real estate. The NCDRC applied the reasoning in Ayyaswamy to conclude that the same principles could apply to cases under the Real Estate Act, which provides a special mechanism for resolution of disputes between buyers and builders.
माननीय उच्चतम Wares एवं माननीय एन.सी.डी.आर.सी. द्वारा पारित उपरोक्त विधि व्यवस्थाओ के आलोक में यह स्पष्ट है कि विशेष रूप से गठित प्राधिकरणों का क्षेत्राधिकार मात्र आर्बिट्रेशन क्लॉज के आवरण से बेदखल नही किया जा सकता है। ऐसे सभी विवाद जिसके लिए विधि द्वारा विशेष निकाय बनाये गये हैं और दीवानी न्यायालय के अतिरिक्त क्षेत्राधिकार दिया गया है, इस प्रकार विवाद को निस्तारित करने के लिए आर्बट्रेटर सक्षम नही है। उपरोक्त विधि व्यवस्थाओं के प्रकाश में यह स्पष्ट है कि भू-सम्पदा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण अधिनियम 2046 की धारा 79, आर्बिट्रेशन एक्ट पर अभिभूत होगा। एन.सी.डी.आर.सी. ने ए.अय्यास्वामी में दिए तर्क को लागू करने के लिए यह निष्कर्ष निकाला है कि एक ही सिद्धांत रियल wee अधिनियम के तहत उक्त मामलों में लागू हो सकता है, जो कि गृहकेताओं एवं बिल्डरों के बीच विवादों के समाधान के लिए एक विशेष तंत्र प्रदान करता है। उपरोक्त प्रतिपादित सिद्धांतों को दृष्टिगत रखते हुए विपक्षी द्वारा आर्बिट्रेटर को संदर्भित करने का प्रश्न स्वतः समाप्त हो जाता है। तदनुसार बिन्दु सं० 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 3 बिन्दु vo 3 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। QW
विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि जहां आवंटी को कोई अन्य विकल्प दिया जाये, वहां शिकायतकर्ता /आवंटी किसी अन्य क्षतिपूर्ति को पाने का अधिकारी नही है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में शिकायतकर्ता द्वारा बैंगलोर डेवलेपमेन्ट एथारिटी बनाम सिंडीकेट बैंक 2007 सी.टी.जे. 689 (एस.सी.) प्रस्तुत किया गया है, जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " Where an alternative site is offered or delivered (at the agreed price) in view of its inability to deliver the earlier allotted plot/flat/house, or where the delay in delivering possession of the allotted plot/flat/house is for justifiable reasons, ordinarily the allottee will not be entitled to any interest or compensation. This is because the buyer has the benefit of appreciation in value. " उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि आवंटी को अन्य कोई विकल्प दिया जाता है, तो वह अन्य किसी ब्याज अथगवा क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है, यदि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को कोई वैकल्पिक अनुतोष प्रदान किया गया होता, तो वह उपरोक्त विधि व्यवस्था का लाभ पाने का अधिकारी होता, किन्तु प्रश्नगत प्रकरण में विपक्षी की ओर से शिकायतकर्ता को कोई विकल्प नही दिया गया है, ऐसी दशा में तथ्यों एवं परिस्थितियों की भिन्नता के कारण उपरोक्त विधि व्यवस्था प्रश्नगत प्रकरण पर लागू नही होती है। तदनुसार बिन्दु to 3 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 4
बिन्दु wo 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या force majeure होने के कारण विपक्षी की परियोजना विलंबित हुई? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि कुछ अप्रत्याशित घटनाओं (force majeure) के कारण परियोजना विलंबित हुई, जिसके सम्बंध में विपक्षी द्वारा अपने अनुबन्ध के प्रस्तर 22 में उल्लिखित किया गया था, जिसे शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किया गया था, ऐसी दशा में शिकायतकर्ता किसी ब्याज को पाने का अधिकारी नही है, किन्तु विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना विलंबित हुई और न ही किसी फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल नही किया गया है, ऐसी दशा में 3३0४४: वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नही है। तदनुसार बिन्दु do 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 5 व 6 यह दोनो वाद बिन्दु परस्पर सम्बधित होने के कारण इनका निस्तारण एक साथ किया जा रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा कथन किया गया है कि विपक्षी द्वारा अनुबंधित अवधि में कब्जा नही दिया गया है, जिस कारण वह परियोजना के साथ नही रहना चाहता है और उसकी जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलायी जाये, जिस पर विपक्षी की ओर से कहा गया कि निर्माण कार्य पूर्ण है और दिनांक 34.05.2020 तक कार्य पूर्ण कर कब्जा दे दिया जायेगा। इस स्तर पर धनवापस किया जाना विपक्षी के लिए संभव नही है।
यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना फ्लैट बुक कराया था। इस तथ्य पर भी कोई विवाद नहीं है कि विपक्षी अनुबंधित अवधि में कब्जा प्रदान करने में असमर्थ रहा है। यह तथ्य भी विचारणीय है कि रेरा की वेबसाईट पर vad परियोजना के शुरू होने की तिथि 02.44.2043 है, अर्थात परियोजना को शुरू हुए लगभग 6 वर्ष से अधिक का समय हो चुका है और रेरा की वेबसाईट पर ही प्रस्तावित पूर्णता की तिथि 34.02.2020 दी गयी है, जो कि निकट है, विपक्षी की ओर से कहा गया है कि रेरा की दी गयी तिथि तक उसके द्वारा निर्माण कार्य पूर्ण कर लिया जायेगा और आवंटियों को कब्जा दे दिया जायेगा। इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील to 744/20i7 चित्रा शर्मा आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया आदि में किया गया आब्जरवेशन महत्वपूर्ण है :- " 40. The figures........ which have been made available presently, following the opening of the web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund." इस स्टेज पर रियल wee सेक्टर की वर्तमान वित्तीय स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए धनराशि वापस किये जाने से उन आवंटियों के हित प्रतिकूलतः प्रभावित होने संभावित है, जो कि यूनिट का कब्जा लेना चाहते हैं। साथ ही della
विपक्षी की ओर से सशपथ कहा गया है कि 6 माह तक कब्जा दे दिया जायेगा, यदि शिकायतकर्ता को विलम्ब के लिए धनराशि / ब्याज के साथ कब्जा मिल जाता है तो इससे सभी आवंटियों के हित साध्य हो सकेंगें। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उक्त के अधीन शिकायतकर्तागण को धनवापसी किया जाना उचित प्रतीत नही होता है। बिन्दु to 4 में इस तथ्य का निर्धारण किया जा चुका है कि यूनिट का कब्जा 02.44206 तक देना था, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक कब्जा नही दिया गया है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 48(4)(0) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व dar के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि उभयपक्ष को vat अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के अनुसार परियोजना के विलंब की अवधि में 5 रूपये प्रतिवर्ग फुट प्रतिमाह की दर से क्षतिपूर्ति का प्राविधान है, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का 40४ अधिकारी है, किन्तु शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आपत्ति की गयी है कि उक्त क्षतिपूर्ति अत्यंत कम है और रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा क्षतिपूर्ति प्राप्त की गयी है उसी दर से क्षतिपूर्ति देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. /| have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 78, 38, 59, 60, 64, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively.
अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में Rr के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 4.5.2046 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 7.0.20:8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +I% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: al 0
यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर oii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को McLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज सहित धनवापसी किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि देय है, तो विपक्षी भी MCLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त सकता है। जहां तक ब्याज की अवधि का प्रश्न है, उपरोक्त विवेचना से स्पष्ट है कि विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को 2.0:.20i5 तक यूनिट का कब्जा देना था और शिकायतकर्ता द्वारा कब्जा दिये जाने तक ब्याज दिलाये जाने की याचना की गयी है। इस सम्बंध में सिविल अपील vio 6649-50 /20:8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20I6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20l6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent - Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. "
उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने व कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। अतः शिकायतकर्ता ओ.सी. / सी.सी. प्राप्त होने अथवा कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तदनुसार बिन्दु to 5 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 7 fag to 7 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या विपक्षी विकास कार्य के मद में कोई भुगतान पाने का अधिकारी है? शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि विपक्षी द्वारा विकास कार्य के नाम पर लगभग दस लाख रूपये की मांग की जा रही है, जिसमें से लगभग सात लाख रूपये एक्सटर्नल इलैक्ट्रिफिकेशन चार्ज हैं, इसके अतिरिक्त सीवर चार्ज, डाटा चार्ज, वांटर कनेक्शन चार्ज व गैस चार्ज आदि में मद में अतिरिक्त धनराशि वसूल की जा रही है, जबकि अनुबन्ध के अन्दर यह धनराशि समायोजित थी, विपक्षी की ओर से yw 42 कहा गया कि उनके द्वारा अनुबन्ध के अनुसार चार्ज लिये जा रहे हैं और कोई धनराशि अलग से नही मांगी जा रही है। इस सम्बंध में पत्रावती पर शिकायतकर्ता की ओर से अनुबन्ध की प्रति दाखिल की गयी है, जिसमें wee 4.7 मे उल्लिखित किया गया है कि :-
In case of any charges which are chargeable/payable as per the Hi-Tech Twonship Policy (if any) in the future for infrastructure or any other purpose, then the same shall be proportionately charged to the Allottees at the rates as may be decided by the government of Uttar Pradesh or any other concerned statutory Body(ies)/Authorities. That the allottees shall pay directly, or if paid by the Developer, then reimburse the Developer on demand the Government rates, taxes or cesses, taxes of all and any kind by whatever name called, levy of proportionate developement charges with regard to, but not limited to state/national highways, transport, irrigation facilities and power facilities electricity facilities/requirements, electricity distribution network/system, metro cess, Telephone/internet cables, gas pipelines etc, whether levied or leviable, retrospectively, presently or in future on the "Residential Floor" forming a part of the overall development of the Said Project WAVE CITY, as assessable/applicable from the date of application, and the same shall be borne and paid by the Allottees.
जिसमें स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि यदि हाई-टेक टाऊनशिप को विकसित करने के लिए किसी एजेंसी, प्राधिकरण अथवा सरकार द्वारा कोई धनराशि की मांग की जाती है, तो विपक्षी उसे प्रोरेटा के आधार पर आवंटियों से प्राप्त करने का अधिकारी है। उक्त अनुबन्ध शिकायतकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किया गया है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि शिकायतकर्ता को उक्त अनुबन्ध के नियम व शर्ते स्वीकार है। विपक्षी की ओर से उक्त मदों में होने वाले खर्च कर मदवार विवरण दिया गया है। विपक्षी उक्त मदों में सम्बंधित विभाग अथवा एजेंसी को किये गये भुगतान का साक्ष्य शिकायतकर्ता को प्रस्तुत कर प्रोरेटा के आधार पर शिकायतकर्ता से पाने का अधिकारी है। तदनुसार बिन्दु सं० 7 Pena किया जाता है। जहां तक मुआवजा देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अत: इस बिन्दु पर प्राधिकरण द्वारा कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। तदनुसार शिकायतकर्ता का निस्तारित किया जाता है। बी Qu 2 विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह, यदि कोई धनराशि बकाया है, तो उसे प्राप्त कर दिनाक 37.05.2020 तक शिकायतकर्ता को ओ.सी. / सी.सी. सहित कब्जा दें और देय स्टाम्प शुल्क प्राप्त कर नियमानुसार रजिस्ट्री करायें। विपक्षी दिनांक 02.44.2046 से ओ.सी./ सी.सी. अथवा कब्जा ऑफर करने, जो भी बाद में हो, तक की अवधि के लिए शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर MCLR+ प्रतिशत ब्याज अदा करना सुनिश्चितकरें।| ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक होने पर नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जायेगी।
विपक्षी यदि दिनांक 34.05.2020 तक कब्जा देने में असफल रहता है, तो वह दिनांक 34.05.2020 के पश्चात 45 दिन के भीतर शिकायतकर्ता की धनराशि जमा करने की तिथि से वास्तविक भुगतान की तिथि तक MCLR+ प्रतिशत ब्याज सहित वापस करना सुनिश्चित करें। यदि इस यूनिट को कय करने के लिए बैंक से कोई ऋण लिया गया है, तो पहले बैंक की धनराशि व ब्याज की अदायगी की जायेगी, उसके पश्चात यदि कोई धनराशि अवशेष बचती है, तो वह शिकायतकर्ता को दी जायेगी। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र/भू-सम्पदा (विनियमनन तथा विकास) अधिनियम, 20i6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण