Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Shailendra Kumar Chaturvedi v. Cosmos Infraestate Pvt. Ltd
Complaint No. 12201826073
- Decision date
- 2019-05-10
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 2 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार,अध्यक्ष शिकायत सं0 42204826073 शैलेन्द्र कुमार चतुर्वेदी बनाम कॉसमोस इन्फास्टेट yo लि0 आदेश 28.02.2049 प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध जमा धनराशि मय ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया संक्षिप्त में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना Shivalik Homes 2 में एक फ्लैट स0 बी-4,004 बुक किया गया, जिसके लिए शिकायतकर्ता द्वारा समय समय पर किश्तों के आधार पर 43,90,577 /- रूपये का भुगतान किया गया। विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट का कब्जा 28.02.20I9 तक कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा अनुबन्ध में निर्धारित अवधि में शिकायतकर्ता को कब्जा देने में असमर्थ रहा, जिस कारण शिकायतकर्ता द्वारा उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण अधिनियम की धारा 3 के अन्तर्गत विपक्षी के विरूद्ध शिकायत दर्ज करायी गयी। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र, अनुबंध पत्र, आवेदन पत्र, जमा धनराशि की रसीदों की छायाप्रतियां दाखिल की गयीं | विपक्षी की ओर से प्रतिवादपत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया है कि शिकायतकर्ता द्वारा शिवालिक होम्स-टू में फ्लैट Wo-t004 टावर बी- बुक कराई गई दिनांक 07.09.20i5 को आवंटन पत्र जारी किया गया, जिसके अनुबंध बिन्दु to 6 के अनुसार 36+6 माह में कब्जा दिया जाना था, जिसके अनुसार 7.03.2049 है एवं उपरोक्त शिकायत प्री-मैच्योर है। विपक्षी का यह भी कहना है कि परिययोजना में a)
विलंब फोर्स मैज्योर, नोटबंदी, आर्थिक मंदी के कारण विलंब हुआ है। विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि शिकायतकर्ता को अपनी दूसरी परियोजना में पूर्णतः प्रमाण पत्र के साथ कब्जा दे सकता है ॥ STII को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। यह निर्विवादित है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना में यूनिट डक करायी गयी और विपक्षी उसे अनुबंधित अवधि (अर्थात ग्रेस पीरियड सहित मार्च 209) 4 यूनिट का कब्जा देना al पत्रावली के अवलोकन से विदित है, कि प्रस्तुत शिकायत 09.42.2048 को की गयी है जो कि अनुबंधित अवधि समाप्त होने से पहले की गयी है। इस स्तर पर विपक्षी की परियोजना को विलम्ब नहीं माना जायेगा। यदि विपक्षी अनुबंधित अवधि समाप्त होने के पश्चात् शिकायतकर्ता को फ्लैट का कब्जा देने में असमर्थ रहता है, तो विलम्ब के लिए शिकायतकर्ता लाभ पाने का अधिकारी है। शिकायतकर्ता की शिकायत को दृष्टिगत रखते हुए निम्न बिन्दु विचारणीय है :- 4. शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि वापस दिलाये जाने की मांग करना। 2. विलंब अवधि का ब्याज दिलाया जाना। 3... क्या विकत्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है? निस्तारण बिन्दु सं0 4
शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया है कि विपक्षी द्वारा मार्च 2049 तक कब्जा दिया जाना था, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया जिस पर विपक्षी का कहना है कि विपक्षी की परियोजना फोर्स मैज्योर के कारण जैसे की नोटबंदी, आर्थिक मंदी के करण विलंब है। इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील wo 744/2047 चित्रा शर्मा आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया आदि में किया गया आब्जरवेशन महत्वपूर्ण है :- "40. The figures........ which have been made available presently, following the Opening of the web portal by the amicus curiae, indicate that 8% of the home buyers have Sought a refund of their monies while 92% would evidently prefer possession of the homes which they have purchased. We cannot be unmindful of the interests of 92% of the home buyers many of whom would also have obtained loans to secure a home. They would have a legitimate grievance if the corpus of Rs 750 crores (together with accrued interest) is distributed to the home buyers who seek a refund." इस स्टेज पर रियल एस्टेट सेक्टर की वर्तमान वित्तीय स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए धनराशि वापस किये जाने से उन आवंटियों के हित प्रतिकूलतः प्रभावित होने संभावित है, जो कि यूनिट का कब्जा लेना चाहते हैं। साथ ही विपक्षी की ओर विपक्षी की ओर से कहा गया की उनकी दूसरी परियोजना में रेडी टू मूव फ्लैट दिलाया जा सकता है। माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित vat के अधीन शिकायतकर्ता को धनवापसी किया जाना उचित प्रतीत नही होता है। तदनुसार बिन्दु vo 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Wo 2
शिकायतकर्ता का कहना है कि परियाजना मार्च 209 तक पूर्ण कर कब्जा दिया जाना था, किन्तु विपक्षी की परियोजना अभी तक पूर्ण नहीं है। अतः विलंबित अवधि का ब्याज दिलाया जाये। विपक्षी की ओर से कहा गया कि वह अनुबंध के अनुसार विलंबित अवधि का धनराशि शिकायतकर्ता को दे देगा इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन wife. anfe बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- Section 8(4)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money.
अतः: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व dar के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वाश उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया जा सकता है कि उभयपक्ष को उक्त अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं। अनुबन्ध के अनुसार विपक्षी द्वारा क्षतिपूर्ति प्राप्त की गयी है उसी दर से क्षतिपूर्ति देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :--
For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are Prospective in nature. The penalty under Sections 78, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of Provisions of RERA, Prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.2046) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 4.5.2046 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40.2048 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय ,// पटटा के लिए करार) नियमावली > 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) A प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः-
The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी wea o(iii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को McCLR+I प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित है, तो विपक्षी भी MCLR+ प्रतिशत की दर से ही ब्याज पाने का अधिकारी होगा। इस सम्बंध में सिविल अपील vio 6s49-50/20:8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 206 when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4G) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 20!6. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20l6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay
in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने व कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। ऐसी दशा में उक्त दोनो शिकायतकर्तागण मात्र ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तदनुसार बिन्दु vo 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु to 3 VJ बिन्दु सं० 3 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या विकल्प देने की दशा में शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विचारित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि वह आवंटी को कोई अन्य विकल्प दिया जा सकता है जहां शिकायतकर्ता अपने आवंटित परियोजना की फ्लैट के कब्जे हेतु प्रतिक्षा नहीं कर सकते। इस सम्बंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा बैंगलोर डेवलेपमेन्ट एथारिटी बनाम सिंडीकेट बैंक 2007 सी.टी.जे. 689 (एस.सी.) प्रस्तुत किया गया है, जिसमें माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " Where an alternative site is offered or delivered (at the agreed price) in view of its inability to deliver the earlier allotted plot/flat/house, or where the delay in delivering possession of the allotted plot/flat/house is for justifiable reasons, ordinarily the allottee will not be entitled to any interest or compensation. This is because the buyer has the benefit of appreciation in value. "
उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह स्पष्ट किया गया है कि यदि आवंटी को अन्य कोई विकल्प दिया जाता है, तो वह अन्य किसी ब्याज अथवा क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी नही है हैं। यद्यपि उक्त निर्णय रेरा अधिनियम लागू होने से पूर्व का है। विशेष रूप से उन परिस्थितियों में जबकि प्रोपर्टी रेट्स निरन्तर बढ़ रहे थे व सामान्यतः यह स्थिति वर्तमान में नहीं है तथापि यह स्पष्ट है कि मूल भवन न दे पाने की स्थिति में एक समकक्ष ईकाई Hal को ऑफर की जा सकती है। मार्च 2049 की पूर्णता: अवधि के बाद अभी अधिक विलम्ब नहीं हुआ है। अतः उचित होगा यदि प्रार्थी विलंब ब्याज सहित वैकलपिक समकक्ष इकाई पर विचार करें। तदनुसार बिन्दु do 3 निस्तारित किया जाता है। तदनुसार शिकायतकर्ता का प्रार्थनापत्र निस्तारित किया जाता है | 4. favelt को आदेशित किया जाता है कि वह ओ.सी. /सी.सी.सहित दिसम्बर 2049 से पूर्व, यदि कोई देय धनराशि बकाया है, तो उसे प्राप्त कर मूल इकाई का कब्जा देना सुनिश्चित करें और नियमानुसार स्टाम्पशुल्क प्राप्त कर पंजीयकरण कराना सुनिश्चित करें। विकल्पस्वरूप, शिकायतकर्ता की सहमति से विपक्षी ओ.सी /सी.सी. सहित, समकक्ष इकाई दिसम्बर 2049 से पूर्व कब्जा दें | 3 विपक्षी, शिकायतकर्ता को मार्च 2009 से कब्जा देने की तिथि तक MCLR+ प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ब्याज की यह धनराशि अंतिम भुगतान की धनराशि में समायोजित की जायेगी और यदि ब्याज की धनराशि देय धनराशि से अधिक है, तो नियमानुसार शिकायतकर्ता को वापस की जाये।
विपक्षी, अगर दिसम्बर 20:9 तक शिकायतकर्ता को कब्जा देने में असफल रहता है तो उसके पश्चात् शिकायतकर्ता को 45 दिन में समस्त मूल धनराशि सहित उसके द्वारा जमा धनराशि पर, जमा करने की तिथि से ॥४८टाए+ा प्रतिशत सहित भुगतान करना सुनिश्चित करे। इस आदेश का ved उ0प्र0/भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20i6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। Que TE (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण