Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Akanksha Kushwaha and Shashi Kushwaha v. Project Category-Un-Register Promoter Other - SUNSHINE INFRAWELL PRIVATE LIMITED
Complaint No. 11201825340
- Decision date
- 2019-05-07
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 2 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्रीमती कल्पना मिश्रा, सदस्य शिकायत Wo 44204825340 आकांक्षा कुशवाहा बनाम मैसर्स सनशाईन इंफावेल प्राएलि0 आदेश 29.04.2049 प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध यूनिट की रजिस्ट्री कराने एवं अतिरिक्त जमा धनराशि वापस दिलाये जाने प्रस्तुत किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की परियोजना Helios में फ्लैट सं० बी-404, बुक कराया था तथा विपक्षी को समय-समय पर किश्तों के आधार पर कुल GO 34,00,000/— अदा किये गये, जबकि यूनिट की कीमत 32,62,375,/- रूपये है। विपक्षी को दिनांक 30.6.2043 तक कब्जा देना था, किन्तु विपक्षी द्वारा यूनिट का कब्जा 75.47.2076 को दिया गया और यूनिट की रजिस्ट्री आज तक नही करायी गयी। विपक्षी द्वारा 37,625 /- रूपये की अतिरिक्त धनराशि प्राप्त की गयी, जो कि यह नही बताया गया कि किस मद में ली जा रही है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी से अतिरिक्त जमा धनराशि मय ब्याज वापस दिलाये जाने एवं यूनिट की रजिस्ट्री कराये जाने हेतु विपक्षी को आदेशित किये जाने की याचना की गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में भुगतान की रसीदें और आवंटन पत्र, पैन कार्ड, पासपोर्ट, मोबाईल कम्पयूनिकेशन की प्रति, छायाप्रति ee 2 कंपलीशन प्रमाण पत्र दिनांक 4.42.2047 व 23.4.20:8, नोएडा प्राधिकरण के बकाये का विवरण, की प्रतिलिपि दाखिल की गयी है।
विपक्षी को नोटिस जारी किये गये, जिस पर विपक्षी के अधिवक्ता पीठ के समक्ष उपस्थित आये और अपना वकालतनामा दाखिल किया गया, और बहस के दौरान विपक्षी की ओर से विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह कहा गया कि परियोजना पूर्ण है और ओ.सी. आ चुका है, विपक्षी को कब्जा दिया जा चुका है और उसका किरायेदार मकान में रह रहा है। परियोजना रेरा की क्षेत्राधिकारिता से बाहर है और पीठ को सुनवाई का क्षेत्राधिकार प्राप्त नही है और लिखित बहस दाखिल करते हुए कहा गया कि विपक्षी द्वारा दिनांक 72.:2.2074 को नोएडा प्राधिकरण को कंपलीशन सार्टिफिकेट हेतु 8..75,000 /- रूपये शुल्क देते हुए कंपलीशन जारी करने का अनुरोध किया गया, जिस कारण रेरा अधिनियम के अन्तर्गत शिकायत की सुनवाई का पीठ को क्षेत्राधिकार प्राप्त नही है। साथ ही यह भी कहा गया कि जहां शिकायतकर्ता 2046 से कब्जे में है, उसे विलंब के लिए किसी क्षतिपूर्ति का अधिकार नही है और अपने कथन के समर्थन में हलधर मेहतो बनाम सतीश बोरा एंड ऐसोसियेटस महाराष्ट्र रेरा का आदेश संलग्न किया गया अपने विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में विभिन्न विभागों से प्राप्त अनापत्ति प्रमाण पत्र, ओ.सी. दिनांक 4.2.20:7, 23.4.20:8, wate लैटर, छायाप्रति बिजली का बिल, लीज एग्रीमेन्ट, किराये की अनुमति का प्रमाण पत्र, किरायानामा, अधिसूचना की छायाप्रतियां दाखिल की गयी हैं। पक्षकारों के मध्य निम्न बिन्दु विवादित हैं :- 4. क्या परियोजना रेरा की क्षेत्राधिकारिता के अन्तर्गत है? 2... क्या शिकायतकर्ता अपनी यूनिट की रजिस्ट्री कराने का अधिकारी है? 3. क्या शिकायतकर्ता विलंबित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है? निस्तारण बिन्दु tio 4
बिन्दु सं० 4 के अन्तर्गत इस तथ्य का निर्धारण किया जाना है कि क्या प्रश्नगत परियोजना रेरा की क्षेत्राधिकारिता के अन्तर्गत है? यह बिन्दु विपक्षी के अभिवचनों पर आधारित है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है | or 3
विपक्षी का कहना है कि प्रश्नगत परियोजना रेरा के अस्तित्व एवं कियान्वयन में आने से पूर्व पूर्ण हो चुकी थी, जिस कारण प्रश्नगत परियोजना रेरा की परिधि के अन्तर्गत नही है। विपक्षी द्वारा अपने कथन के समर्थन में एक प्रार्थनापत्र की छायाप्रति दाखिल की गयी है, जो कि अस्पष्ट है, जिस पर प्रेषक की ओर से कोई तिथि अंकित नही है, किन्तु मुख्य वास्तुविद नियोजक की मोहर अंकित है, जिस पर अंकित तिथि अपठनीय है और प्रथम दृष्टया 42.2. 20:7 Uda होती है, इसके विपरीत शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि इस सम्बंध सचिव रेरा के कार्यालय में कार्यवाही प्रचलित थी, जहां सचिव रेरा द्वारा इस परियोजना को रेशा के अन्तर्गत पंजीयन योग्य माना गया है और कार्यवाही की जा रही है। शिकायतकर्ता की ओर से अपने कथन के समर्थन में विपक्षी द्वारा नोएडा प्राधिकरण को जारी पत्र दिनांक 29.8.2047 स्पष्ट रूप से अंकित है, जो कि विपक्षी की ओर से नोएडा प्राधिकरण को पूर्णता प्रमाण पत्र जारी करने हेतु प्रेषित किया गया है। उक्त पत्र में पूर्व में दिनांक 24.8.2047 को पूर्णता प्रमाण पत्र हेतु प्रस्तुत आवेदन पत्र का उल्लेख किया गया है, जिससे यह स्पष्ट है कि विपक्षी की ओर से दिनांक 2:8.20:7 को पूर्णता प्रमाण पत्र हेतु आवेदन किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस सम्बंध में सचिव रेरा द्वारा दिनांक 09.04.2049 को आदेश पारित किया गया है कि ” परियोजना रेस में पंजीकृत नही है; उनके द्वारा यह जानकारी दी wet fe परियोजना का पूर्णता प्रमाण पत्र उन्हे प्राप्त हो चुका था। अतः उनके द्वारा परियोजना का eer में पंजीकरण नही कराया यया। उनके द्वार Wega किया यया एूर्णता प्रमाण पत्र दो चरणों में दिनांक ॥.722077 व 2942076 को जारी किया गया है/ इस प्रकार उनके grr दिनांक ॥.5.2077 ग्रे दिनांक 37.72077 को मध्य इस ऑन गोइंग परियोजना का पंजीयन रेशा में कराया जाना अनिवार्य था। उनके द्वार परियोजना का ऐश में पंजीयन न कराकर अधिनियम की धारा-3 का उल्लघन करने को लिए अधिनियम की धार-59 के अन्तर्गत दंड आरोपित किया जाये। प्राधिकरण के अधिशासी अभियंता द्वारा 75 दिन के अन्दर परियोजना स्थल का निरीक्षण नोएडा ऑद्योगिक विकास ग्राधिकरण द्वारा नागित अधिकारी को साथ करके परियोजना की कुल aria का विवरण mega किया जाये/' जिससे स्पष्ट है कि प्रश्नगत परियोजना रेरा की क्षेत्राधिकारिता के अन्तर्गत है और सचिव रेरा द्वारा इस सम्बंध आवश्यक कार्यवाही भी की जा रही है। अतः इस सम्बंध में पृथक से कोई आदेश पारित किया जाना उचित प्रतीत नही होता है। चूंकि परियोजना रेरा के अन्तर्गत है, जिस कारण इस शिकायत की सुनवाई का
Que 4 क्षेत्रिधिकार इस पीठ को प्राप्त है। तदनुसार बिन्दु to 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु do 2 शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया है कि उसके विपक्षी द्वारा उससे अनुबन्ध से अधिक धनराशि प्राप्त करने के बाद भी उसकी रजिस्ट्री नही करायी गयी है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उसके द्वारा समस्त धनराशि जमा करायी जा चुकी है और विपक्षी द्वारा उसे अदेयता प्रमाण पत्र व कब्जा भी दिया जा चुका है, किन्तु बार बार कहने पर भी वह यूनिट की रजिस्ट्री नहीं करा रहा है। शिकायतकर्ता द्वारा यह भी कथन किया गया कि विपक्षी द्वारा उससे 4,37,625/— रूपये की धनराशि अधिक ली जा चुकी है और wat धनराशि की बाबत कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि क्यों विपक्षी द्वारा यह अतिरिक्त धनराशि वसूल की गयी है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में जमा धनराशि की रसीदें दाखिल की गयी हैं, जिससे विदित होता है कि शिकायतकर्ता द्वारा समस्त धनराशि अदा की जा चुकी है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उनके द्वारा स्टाम्प की धनराशि को विपक्षी को दी जा चुकी है और विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता का स्टाम्प कय करके अपने पास रखे हैं और शिकायतकर्ता की रजिस्ट्री नही की जा रही है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने इस कथन के समर्थन में विपक्षी के अधिवक्ता श्री राजीव से मोबाईल कम्यूनिकेशन की स्कीन शॉट की प्रति दाखिल की गयी है, यूनिट Wo बी--304 व बी-404 के लिए GAT: 3,40,000 /- व 3,33,000/- रूपये के KIT कय होने के कथन की पुष्टि होती है। विपक्षी द्वारा wa भी इस तथ्य को स्वीकार किया गया है कि शिकायतकर्ता की पूर्ण धनराशि प्राप्त हो चुकी है। ऐसी दशा में शिकायतकर्ता अपनी रजिस्ट्री कराने का अधिकारी है। तदनुसार बिन्दु Wo 2 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु Ho 3
शिकायतकर्ता द्वारा कहा गया है कि विपक्षी द्वारा अनुबन्ध के अनुसार यूनिट का कब्जा दिनांक 30.6.20:3 को दिया जाना था, किन्तु विपक्षी द्वारा आज तक यूनिट की रजिस्ट्री नही करायी गयी है, इसके विपरीत विपक्षी का कहना है कि शिकायत्कर्ता को कब्जा दिया जा चुका है और यूनिट में उसके किरायेदार रह रहे हैं। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र की प्रति दाखिल की गयी है, जिसमें प्रस्तर 29 में यूनिट का कब्जा जून 2043+3 माह अर्थात सितम्बर 20:3 तक दिये जाने का कथन किया गया है। विपक्षी की ओर से अपने कथन के समर्थन में विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता को यूनिट किराये पर देने हेतु दिये जाने वाले अनुमति पत्र की प्रति दाखिल की गयी है, जो कि दिनाक 30.44.2047 को जारी किया गया है। इसके अतिरिक्त किरायेनामे की प्रति दाखिल की गयी है, जो कि 29.44.2047 को निष्पादित किया गया है, इससे यह प्रतीत है कि शिकायतकर्ता को वर्ष 20:7 में यूनिट का कब्जा दिया जा चुका था, किन्तु शिकायतकर्ता की रजिस्ट्री अभी तक नही हुई है और विपक्षी को ओ.सी. किस तिथि को दिया गया, इस सम्बंध में भी विपक्षी की ओर से कोई स्थिति स्पष्ट नही की गयी है। यह निर्विवादित है कि विपक्षी अनुबंधित अवधि में यूनिट का कब्जा देने में असफल रहा है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल Raced सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. The interest is merely compensation for use of money. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। यह भी उल्लेखनीय है कि पक्षकारों के मध्य एक अनुबन्ध निष्पादित है, जिसमें 40/— रूपये प्रतिवर्गफूट प्रतिमाह की दर से विलंबित अवधि में भुगतान किये जाने का प्राविधान है, जो कि उभयपक्ष द्वारा हस्ताक्षरित है, जिससे यह अवधारित किया we
जा सकता है कि उभयपक्ष को vat अनुबन्ध की शर्ते स्वीकार हैं, जिसके अनुसार शिकायतकर्ता क्षतिपूर्ति पाने का अधिकारी है, किन्तु शिकायतकर्ता की ओर से यह भी आपत्ति की गयी है कि उक्त क्षततिपूर्ति अत्यंत कम है और रेरा के प्राविधानों के अनुसार जिस दर से विपक्षी द्वारा क्षतिपूर्ति प्राप्त की गयी है उसी दर से क्षतिपूर्ति देने का प्राविधान है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 78, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 4.5.206) से पूर्व, चूंकि पक्षकारों का अनुबन्ध प्रभावी है जिस कारण अनुबन्ध के अनुसार क्षतिपूर्ति की जानी चाहिये और रेरा के आने के बाद रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा।
जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 7.:0.20I8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय ,/पटटा के लिए करार) नियमावली 208 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय /पटटा विलेख के प्रारूप के प्रस्तर 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें प्रस्तर 9 (ii) F प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः- The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +!% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी प्रस्तर ofiii) 4 निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को McLR+ प्रतिशत की Ge ब्याज दर पर ब्याज सहित धनवापसी किया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाता है कि यदि शिकायतकर्ता की कोई देय धनराशि विलंबित हे, तो विपक्षी भी उस पर MCLRH प्रतिशत की दर से ही ब्याज प्राप्त कर सकेगा। जहां तक ब्याज की अवधि का प्रश्न है तो इस सम्बंध में सिविल अपील सं0 6649-50/20i8 सुपरटेक लिमिटेड बनाम रजनी गोयल में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि :- " the period of Interest should close on April 20!6
when the Full Occupancy Certificate was obtained as per the admission of the Respondent — Purchaser herself in Para 4(j) of the Consumer Complaint, wherein she has admitted that the Appellant — Builder had obtained the Completion Certificate as late as April 206. The Respondent — Purchaser could not have any further grievance after April 20l6 with respect to delay in handing over possession. The Respondent — Purchaser ought not to be allowed to reap the benefits of her own delay in taking possession. " उपरोक्त विधि व्यवस्था के के अनुसार ओ.सी. मिलने व कब्जा ऑफर करने की तिथि, जो भी बाद में हो, तक शिकायतकर्ता विलम्ब ब्याज पाने का अधिकारी होगा। विपक्षी की ओर से ओ.सी. की प्रति दाखिल की गयी है, जिसके अवलोकन से fated है कि शिकायतकर्ता के टॉवर बी का ahah. दिनाक 42.20:7 को प्राप्त हुआ है, जिस कारण शिकायतकर्तागण मात्र ओ.सी. मिलने के दिनांक तक ही ब्याज पाने के अधिकारी होगें। तदनुसार बिन्दु सं० 3 निस्तारित किया जाता है। जहां तक क्षतिपूर्ति का प्रश्न है, तो रेशा अधिनियम के अन्तर्गत इसका क्षेत्रिधाकार एडजूडिकेटर को प्राप्त है, पीठ द्वारा इस सम्बंध में कोई आदेश पारित नहीं किया जा सकता है। तदनुसार शिकायतकर्ता का प्रार्थनापत्र निस्तारित किया जाता है। 4. विपक्षी को आदेशित किया जाता है कि वह आदेश अपलोड होने की तिथि से 30 दिन के अन्दर शिकायतकर्तागण की रजिस्ट्री कराना सुनिश्चित करे |
2. विपक्षी दिनांक 4.40.2043 से दिनांक 30.4.20i6 तक 40/- रूपये प्रति वर्गफुट प्रतिमाह की दर से व दिनांक 4.5.206 से .42.20I7 तक शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि पर MCLRH प्रतिशत की दर से ब्याज शिकायतकर्ता को अदा करना सुनिश्चित करें | ‘ee 3. इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2046 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। Kinane (कल्पना मिश्रा) (सदस्य) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण