Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Sundeep Soin v. Project Category-Un-Register Yamuna Expressway Industrial
Complaint No. 11201825111
- Decision date
- 2019-09-02
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Bench 2 Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04, श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत Wo 44204825444 संदीप सोईन बनाम यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध पूर्ण रूप से विकसित प्लॉट एवं 60 माहों के लिए 44 प्रतिशत ब्याज की दर से जो कि विपक्षी द्वारा भी उनसे डिफॉल्ट पेमेन्ट किये जाने पर लिया गया है, उसे दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी की स्कीम में प्लॉट do i88 पोकेट आर, सेक्टर-20 में बुक कराया था और 29,0,375 /— रूपये की धनराशि जमा की गयी, विपक्षी को प्लॉट का कब्जा 49.4.2043 में दिया जाना था, किन्तु आज तक कब्जा नहीं दिया गया है। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध पूर्ण रूप से विकसित प्लॉट एवं 60 माहों के लिए 44 प्रतिशत ब्याज की दर से जो कि विपक्षी द्वारा भी उनसे डिफॉल्ट पेमेन्ट किये जाने पर लिया गया है, उसे दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में आवंटन पत्र दिनांक 49.4. 2009, पत्र दिनांक 47.0.2048, लीज़ डीड दिनांक 08.44.2040 आदि की छायाप्रतियां प्रस्तुत की गयी।
विपक्षी द्वारा प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया कि शिकायतकर्ता को ड्रा के जरिये प्लॉट आवंटित किये गये थे और ब्रोशर के अनुसार कब्जे की संभावित तिथि अक्टूबर नवम्बर 20:3 थी, किन्तु आवासीय परियोजना जिन 44 ग्रामों के अन्तर्गत थी, उसमें 347 याचिकायें दायर की गयी, जो कि माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं, जिन पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश पारित किये गये हैं, जो वर्तमान तक प्रभावी हैं। याचिका Go 37443 /2044 में आदेश पारित होने के पश्चात उक्त कृषकों ने भी अतिरिक्त 64.7 प्रतिशत प्रतिकर 9 2
की मांग की जाने लगी और निर्माण कार्य अवरूद्ध कर दिया, जिस कारण समय से कब्जा दिया जाना संभव नहीं हो सका। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में किसानों को अतिरिक्त प्रतिकर देने हेतु आवंटियों से धनराशि की मांग की गयी तो आवंटी सहमत नही हुए, तो विपक्षी द्वारा कहा गया कि जो आवंटी सहमत नही है, वह 90 दिन में अपनी जमा धनराशि वापस ले सकते हैं। सैक्टर 20 के कुछ ब्लॉकों में निविदा आमंत्रित कर विकास कार्य किया जाना प्रस्तावित है। प्रश्नगत भूखण्ड की बाबत दिनांक 47.40.208 को चैक लिस्ट जारी की जा चुकी है और शीघ्र कब्जा दिया जाना प्रस्तावित है। प्राधिकरण की ओर से बोर्ड बैठक में विलंब से कब्जा दिये जाने के कारण कुछ सुविधायें (लीज डीड में लगने वाला शुल्क न लिया जाना, वाटर चार्ज, सीवर चार्ज, रैम्प व ट्वेल चार्ज,टेलीफोन पाईप चार्ज, ड्रैन चार्ज, इलैक्ट्रिक पाईप चार्ज न लिये जाने) आवंटियों को दिये जाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही विलंब देय धनराशि पर १2 प्रतिशत के स्थान पर 40.65 प्रतिशत की दर से ब्याज लिये जाने का निर्णय भी लिया गया है। आवंटियों के पास विकल्प होगा कि यदि वह अपने भूखण्ड को समर्पण करता है, तो और आवंटी ने लीज रेंट जमा कर रखा है, तो वह लीज डीड की तिथि से सरेंडर की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अपनी धनराशि वापस ले सकता है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। उपरोक्त शिकायत को दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित बिन्दु विचारणीय है। 4. an परियोजना माननीय उच्च न्यायालय के WA आदेश के कारण परियोजना विलम्बित हुई है ? 2. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाये ? निस्तारण बिन्दु aear—
बिन्दु सं? 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या क्या परियोजना माननीय उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश के कारण परियोजना विलम्बित हुई ? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि किसानों द्वारा भूमि अधिग्रहण के कारण माननीय उच्चतम न्यायालय में वर्ष 200 में विभिन्न Re याचिका दायर किये जाने के उपरान्त माननीय उच्च न्यायालय द्वारा wera आदेश दिये गये थे। विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना की भूमि पर विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है। 0 इसी कम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 / 2047 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य में अभिनिर्धारित किया गया हैः-
4l. On behalf of Amrapali group, learned senior counsel submitted that there were force majeure conditions in completing the projects. There were legal impediments in the completion of projects within the period given in the flat-buyers agreement during the period from 20I-5. The submission is baseless. It is apparent that the Full Bench of the High Court though held that the land acquisition was vitiated but still it was upheld. The High Court did not quash it for the reason that development has taken place. Higher compensation was ordered to be paid. That order was affirmed by this Court in 205 in Savitri Devi v. State of U.P. (20I5) 7 SCC 2l. There was no interim stay granted by the High Court on construction work, is made clear by the Noida and Greater Noida authorities. There was no room to entertain any doubt as to the fact whether for a particular village the acquisition had been quashed. There was no quashing of land acquisition and moreover, there was no stay. Only higher compensation was ordered to be paid. There was no force majeure condition or any legal impediment as such the period from 204 to 20i5 cannot be treated as a moratorium period vis-a-vis the dues of Noida and Greater Noida authorities, The submission made as to the farmers' agitation etc. is too vague and 30% of the projects have come up; whereas 70% have not yet come up, out of the projects in Noida and Greater Noida alone.
उपरोक्त अबज़रवेशन से यह स्पष्ट है कि वर्ष 2044 से वर्ष 2005 के मध्य निर्माण कार्य पर कोई wom आदेश नहीं थे, जो कि नोएडा एवं ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण द्वारा दर्शित किया गया और इस आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि वर्ष 2044 से वर्ष 2045 के बीच कोई फोर्स मैज्योर कारण या विधिक रूप से रोक नहीं था। चूंकि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा भी यह स्पष्ट किया जा चुका हैकि वर्ष 2044 से वर्ष 20i5 के बीच कोई फोर्स मैज्योर see नहीं था, ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तदनुसार बिन्दु सं० 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2 शिकायतकर्ता का मुख्य अनुतोष कब्जा दिलाये जाने व विलंबित अवधि के लिए ब्याज दिलाये जाने का है। विपक्षी द्वारा स्वयं प्रतिवादपत्र में यह स्वीकार किया गया है कि उनका ब्रोशर ही अनुबन्ध है और ब्रेशर/अनुबन्ध के अनुसार कब्जा दिये »
जाने की तिथि अक्टूबर /नवम्बर 20:3 थी, स्वयं शिकायतकर्ता द्वारा भी धनराशि जमा करायी जा चुकी है, यहां तक कि शिकायतकर्ता द्वारा किसान प्रतिकर की धनराशि भी जमा करायी जा चुकी है। विपक्षी द्वारा स्वयं कहा गया है कि कुछ आवंटियों की चेकलिस्ट जारी हो चुकी है और मार्च 209 तक कब्जा दे दिया जायेगा, शिकायतकर्ता की भी चैक लिस्ट जारी की जा चुकी है और शीघ्र ही कब्जा दिया जायेगा। यद्यपि प्रतिवादपत्र में मार्च 2049 में कब्जा दिये जाने का कथन किया गया है, किन्तु मार्च 2049 व्यतीत हो चुकी है और शिकायतकर्ता को कब्जा नही दिया गया है। अतः विपक्षी को यथाशीघ्र कब्जा दिये जाने हेतु आदेशित किया जाना विधिसंगत प्रतीत होता है और चूंकि अभी तक कब्जा नहीं मिला है और विपक्षी द्वारा शिकायतकर्तागण की धनराशि का उापभोग किया गया है, ऐसी दशा में शिकायतकर्ता जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है। पत्रावली पर दाखिल आवंटन पत्र दिनांक 49.4.2009 के अवलोकन से विदित है कि कब्जे वाले प्रस्तर में इस आवंटन पत्र के जारी होने की तिथि से 4 वर्ष में कब्जा दिया जाना था, जिसके अनुसार कब्जे की तिथि 29.7.20i3 होती है। ऐसे में शिकायतकर्ता को दिनांक 20.::.20:3 से कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि :-
Section 4(2)()(0) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)()(c) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In othe words, by giving opertunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)()(c), he is not absolved of the liability under the agreement for sale. Section 8()(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the py
allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि wou रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है।
अनुबन्ध के अनुसार विपक्षी को कब्जा अक्टूबर / नवम्बर 2043 में देना था, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया। विपक्षी द्वारा कहा गया है कि कृषकों द्वारा परियोजना की भूमि की बाबत माननीय उच्च न्यायालय में याचिकायें योजित की गयी हैं, जिन पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश पारित किये गये हैं, जो कि वर्तमान तक प्रभावी हैं, किन्तु विपक्षी की ओर से माननीय उच्च न्यायालय के किसी आदेश की कोई प्रति पत्रावली पर दाखिल नहीं की गयी हे, ऐसी दशा में विपक्षी को माननीय उच्च न्यायालय के wes आदेशों का कोई लाभ दिया जाना संभव नही है। विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि विलंबित अवधि के लिए विपक्षी की प्राविधानों के अनुसार 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के लिए तैयार है, किन्तु शिकायतकर्ता द्वारा मौखिक रूप से कहा गया है कि विपक्षी द्वारा 24 प्रतिशत की दर से ब्याज लिया जाता है, किन्तु विपक्षी द्वारा स्वयं प्रतिवादपत्र में कहा गया कि बोर्ड बैठक में विलंबित अवधि पर १2 प्रतिशत के स्थान पन 40.65 प्रतिशत की दर से ब्याज लिये जाने का कथन किया गया है, जो कि रेरा के प्राविधानों के लगभग समान है। विपक्षी द्वारा अपने प्रतिवाद पत्र में कहा गया है कि उक्त भू-खण्ड संख्या के सम्बन्ध में चैक लिस्ट दिनांक i7t0208 को लीज़ लीड निष्पादन हेतु औपचारिकतायें पूर्ण की वाबत सूचित किया जा चुका है तथा शिकायतकर्ता को कब्जा दिया जाना प्रस्तावित है। ऐसे में शिकायतकर्ता कब्जा ऑफर किये जाने की तिथि तक विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid
decisions are not applicable to the facts of the present case. | have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 78, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (दिनाक 52006) OW अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिनांक 45.206 से WS प्राविधानों के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा UT (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 20I6 के अधीन दिनांक 7.0.20i8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,// पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय,/पटटा विलेख के प्रारूप के UR 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें wax 9 (ii) J प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः-
The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी wee oliii) में निर्धारित है। उक्त प्राविधान को दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। TATA बिन्दु संख्या-2 निस्तारित किया जाता है। » o 7 wei तक क्षतिपूर्ति (Compensation) देने का प्रश्न है, तो यह एडज्यूडिकेटिंग ऑफिसर के क्षेत्राधिकार में है। अतः इस बिन्दु पर पीठ द्वारा कोई आदेश पारित नही किया जा रहा है। उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश आदेश अपलोड होने से 45 दिन के अन्दर शिकायतकर्ता को कब्जा प्रदान करें और विलंबित अवधि दिनांक 20..2043 से 30.04.2046 तक, ब्रोशर की शर्तों के अनुसार 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से व रेरा लागू होने के बाद से अर्थात दिनांक 20.::203 से कब्जा ऑफर किये जाने तक MCLRH प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे।
यदि आवंटी कब्जा प्राप्त नही करना चाहता है, तो शिकायतकर्ता द्वारा जमा धनराशि MCLRH प्रतिशत की दर से ब्याज सहित वापस की जाये और साथ ही यह भी निर्देश दिया जाता है कि यदि इस इकाई पर बैंक ऋण ली गयी, हो तो पहले भुगतान बैंक को की जाये और शेष धनराशि शिकायत्तकर्ता को वापस की जाये। यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2046 के धारा 2 (28)0) के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर ४८ा/२+ प्रतिशत होनी चाहिए। इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 2006 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक (9 /o8 /20:9 a 7 जैज. ' oa ॥।१.३$ IS (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) somo भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण