Uttar Pradesh Real Estate Regulatory Authority
Ravinder Kumar v. Project Category-Un-Register Yamuna Expressway Industrial
Complaint No. 11201823946
- Decision date
- 2019-09-26
- Text availability
- Machine-read (OCR) text, unverified
- Bench
- Adjudicating Officer Gautam Budh Nagar
Source: UP RERA order
Connected provisions and cases
No further provision or case links are recorded.
Judgment text
4 उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण, क्षेत्रीय कार्यालय, गौतमबुद्धनगर। सुनवाई पीठ-04ए श्री राजीव कुमार, अध्यक्ष शिकायत सं0 44204823946 रविन्द्र कुमार बनाम यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण प्रस्तुत शिकायत प्रार्थनापत्र शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध अधिरोपित किये गये ब्याज को कब्जे तक हटाये जाने और विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु संस्थित किया गया है। संक्षेप में शिकायतकर्ता का कथन है कि शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी परियोजना यूनिट संख्या-एफ-44 बुक कराया गया। विपक्षी समय-समय पर किश्तों के आधार पर 44,50,000,//- रूपये की धनराशि अदा की गयी। विपक्षी को दिनांक 37.03.2074 तक कब्जा दिया जाना था, परन्तु 40 वर्ष बीत जाने के बाद भी कब्जा नहीं दिया गया और अतिरिक्त 4 लाख रूपये की धनराशि अधिरोपित की गयी है। अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि कब तक उन्हें कब्जा मिलेगा। अतः शिकायतकर्ता द्वारा विपक्षी के विरूद्ध अधिरोपित किये गये ब्याज को wat तक हटाये जाने और विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने हेतु अनुरोध किया गया है। शिकायतकर्ता द्वारा अपने कथन के समर्थन में विपक्षी द्वारा प्राप्त की गयी धनराशि का विवरण, आवंटन पत्र, डिमांड ड्राफ्ट, एग्रीमेन्ट टू-लीज आदि की छायाप्रति प्रस्तुत की गयी।
विपक्षी द्वारा प्रतिवाद पत्र दाखिल करते हुए कथन किया गया कि शिकायतकर्ता को ड्रा के जरिये प्लॉट आवंटित किये गये थे और ब्रोशर के अनुसार कब्जे की संभावित तिथि अक्टूबर नवम्बर 20:3 थी, किन्तु आवासीय परियोजना जिन 44 ग्रामों के अन्तर्गत थी, उसमें 347 याचिकायें दायर की गयी, जो कि माननीय उच्च न्यायालय में विचाराधीन हैं, जिन पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा WA आदेश पारित किये गये हैं, जो वर्तमान तक प्रभावी हैं। याचिका Ho 37443 /2044 में आदेश पारित होने के पश्चात उक्त कृषकों ने भी अतिरिक्त 64.7 प्रतिशत प्रतिकर o 2
की मांग की जाने लगी और निर्माण कार्य अवरूद्ध कर दिया, जिस कारण समय से कब्जा दिया जाना संभव नही हो सका। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में किसानों को अतिरिक्त प्रतिकर देने हेतु आवंटियों से धनराशि की मांग की गयी तो आवंटी सहमत नही हुए, तो विपक्षी द्वारा कहा गया कि जो आवंटी सहमत नही है, वह 90 दिन में अपनी जमा घनराशि वापस ले सकते हैं। सैक्टर 20 के कुछ ब्लॉकों में निविदा आमंत्रित कर विकास कार्य किया जाना प्रस्तावित है। प्रश्नगत भूखण्ड की बाबत दिनांक 47.40.2078 को चैक लिस्ट जारी की जा चुकी है और शीघ्र कब्जा दिया जाना प्रस्तावित है। प्राधिकरण की ओर से बोर्ड बैठक में विलंब से कब्जा दिये जाने के कारण कुछ सुविधायें (लीज डीड में लगने वाला शुल्क न लिया जाना, वाटर चार्ज, सीवर चार्ज, रैम्प व ट्वेल चार्ज.टेलीफोन पाईप चार्ज, ड्रैन चार्ज, इलैक्ट्रिक पाईप चार्ज न लिये जाने) आवंटियों को दिये जाने का निर्णय लिया गया है। साथ ही विलंब देय धनराशि पर 22 प्रतिशत के स्थान पर 40.65 प्रतिशत की दर से ब्याज लिये जाने का निर्णय भी लिया गया है। आवंटियों के पास विकल्प होगा कि यदि वह अपने भूखण्ड को समर्पण करता है, तो और आवंटी ने लीज रेंट जमा कर रखा है, तो वह लीज डीड की तिथि से सरेंडर की तिथि तक 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित अपनी धनराशि वापस ले सकता है। उभयपक्ष को सुना व पत्रावली का अवलोकन किया। उपरोक्त शिकायत को दृष्टिगत रखते हुए निम्नलिखित बिन्दु विचारणीय है। 4. क्या परियोजना माननीय उच्च न्यायालय के VAM आदेश के कारण परियोजना विलम्बित हुई है ? 2. क्या शिकायतकर्ता को कब्जा एवं विलम्बित अवंधि का ब्याज दिलाया जाये ? निस्तारण बिन्दु संख्या-
बिन्दु wo 4 इस आशय का विरचित किया गया है कि क्या परियोजना माननीय उच्च न्यायालय के WHA आदेश के कारण परियोजना विलम्बित हुई ? यदि हां तो प्रभाव? यह वाद बिन्दु भी विपक्षी के अभिकथनों के आधार पर विरचित किया गया है, जिसे साबित करने का भार विपक्षी पर है। विपक्षी की ओर से कथन किया गया है कि किसानों द्वारा भूमि अधिग्रहण के कारण माननीय उच्चतम न्यायालय में as 2004 में विभिन्न Re याचिका दायर किये जाने के उपरान्त माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगत आदेश दिये गये थे। विपक्षी की ओर से न तो यह कथन किया गया कि किन फोर्स मैज्योर की बाबत उसकी परियोजना की भूमि पर विलंबित हुई और न ही फोर्स मैज्योर की बाबत कोई साक्ष्य पत्रावली पर दाखिल किया गया है। व फे 3 इसी कम में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा सिविल अपील संख्या-940 / 2047 विकम चटर्जी एवं अन्य बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य के निर्णय के पृष्ठ संख्या-234 एवं प्रस्तर 440 में फोर्स मैज्योर को निम्नवत् परिभाषित किया हैः- Force majeure shall mean a case of war, flood, drought, fire, cyclone, earthquake or any other calamity caused by nature. उपरोक्त फोर्स मैज्योर के परिभाषा से यह स्पष्ट है कि फोर्स मैज्योर वह स्थिति है, जिसमें की युद्ध, बाढ़, सूखा, आग, तूफान, भूकम्प या अन्य प्रकृतिक आपदा आई हो, प्रश्नगत प्रकरण में ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई और विपक्षी ऐसी दशा में वह इस तर्क का लाभ पाने का अधिकारी नहीं है। तदनुसार बिन्दु to 4 निस्तारित किया जाता है। निस्तारण बिन्दु संख्या-2
शिकायतकर्ता का मुख्य अनुतोष कब्जा दिलाये जाने व विलंबित अवधि की क्षतिपूर्ति दिलाये जाने का है। विपक्षी द्वारा स्वयं प्रतिवादपत्र में यह स्वीकार किया गया है कि उनका ब्रोशर ही अनुबन्ध है और ब्रोशर /अनुबन्ध के अनुसार कब्जा दिये जाने की तिथि अक्टूबर /नवम्बर 2043 थी। विपक्षी द्वारा स्वयं कहा गया है कि आवंटन संख्या-वाई.ई.ए044774 के सापेक्ष कब्जे के सम्बन्ध में चेकलिस्ट दिनांक 7. 40.2048 को जारी हो चुकी है और कब्जा दिया जाना प्रस्तावित है। यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता को कब्जा नही दिया गया है। अतः विपक्षी को यथाशीघ्र कब्जा दिये जाने हेतु आदेशित किया जाना विधिसंगत प्रतीत होता है और चूंकि अभी तक कब्जा नही मिला है और विपक्षी द्वारा शिकायतकर्ता की धनराशि का उपभोग किया गया है, ऐसी दशा में शिकायतकर्ता जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है। पत्रावली पर दाखिल आवंटन पत्र दिनांक 20.4.2009 के अवलोकन से विदित है कि कब्जे वाले wer में इस आवंटन पत्र के जारी होने की तिथि से 4 वर्ष में कब्जा दिया जाना था, जिसके अनुसार कब्जे की तिथि 20.4.2043 होती है। ऐसे में शिकायतकर्ता को दिनांक 24.44.2043 से वास्तवित कब्जा दिये जाने की तिथि तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि महाराष्ट्र उच्च न्यायालय के नीलकमल रियलटर्स सबअर्बन प्रालि. आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की याचिका में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि :- Section 4(2)()(c) enables the promoter to revise the date of completion of project and hand over 2)
possession. The provisions of RERA, however, do not rewrite the clause of completion or handing over possession in agreement for sale. Section 4(2)()(c) enables the promoter to give fresh time line independent of the time period stipulated in the agreements for sale entered into between him and the allottees so that he is not visited with penal consequences laid down under RERA. In othe words, by giving opertunity to the promoter to prescribe fresh time line under Section 4(2)()(c), he is not absolved of the liability under the agreement for sale. Section 8(4)(b) lays down that if the promoter fails to complete or is unable to give possession of an aprtment due to discontinuance of his business as a developer on account of suspension or revocation of the registration under the Act or for any other reason, he is liable on demand to the allottees, in case the allottee wishes to withdraw from the project, without prejudice in this behalf including compensation. If the allottee does not intent to withdraw from the project he shall be paid by the promoter interest for every month's delay till handing over of the possession,. The requirement to pay interest is not a penalty as the payment of interest is compensatory in nature in the light of the delay suffered by the allottee who has paid for his apartment but has not received possession of it. The obligation imposed on the promoter to pay interest till such time as the apartment is handed over to him is not unreasonable.
अतः उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह wre है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्रमोटर व केता के बीच किये गये अनुबंध के अनुरूप विलम्ब तथा मूल धनराशि पर ब्याज देय होगा, क्योंकि प्रमोटर्स द्वारा उक्त धनराशि का उपभोग किया गया है। अनुबन्ध के अनुसार विपक्षी को कब्जा अक्दूबर/ नवम्बर 203 में देना था, किन्तु आज तक कब्जा नही दिया गया। विपक्षी द्वारा कहा गया है कि कृषकों द्वारा परियोजना की भूमि की बाबत माननीय उच्च न्यायालय में याचिकायें योजित की गयी हैं, जिन पर माननीय उच्च न्यायालय द्वारा स्थगन आदेश पारित किये गये हैं, जो कि वर्तमान तक प्रभावी हैं, किन्तु विपक्षी की ओर से माननीय उच्च न्यायालय के किसी आदेश की कोई प्रति पत्रावली पर दाखिल नही की गयी हे, ऐसी दशा में विपक्षी को माननीय उच्च न्यायालय के VPA आदेशों का कोई लाभ दिया जाना संभव नही है। विपक्षी द्वारा यह भी कहा गया है कि धनवापसी के लिए विपक्षी की प्राविधानों के YY अनुसार 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के लिए तैयार है, किन्तु विपक्षी द्वारा स्वयं प्रतिवादपत्र में कहा गया कि बोर्ड बैठक में किश्तों में किये गये विलम्ब पर विलंबित अवधि पर १2 प्रतिशत के स्थान पन 40.65 प्रतिशत की दर से ब्याज लिये जाने का कथन किया गया है, जो कि रेरा के प्राविधानों के लगभग समान है। विपक्षी द्वारा अपने प्रतिवाद पत्र में कहा गया है कि उक्त भू-खण्ड संख्या के सम्बन्ध में चैक लिस्ट दिनांक 7.0.20I8 को लीज़ लीड निष्पादन हेतु औपचारिकतायें पूर्ण की वाबत सूचित किया जा चुका है तथा शिकायतकर्ता को कब्जा दिया जाना प्रस्तावित है। ऐसे में शिकायतकर्ता को वास्तविक कब्जा दिये जाने की तिथि तक विलम्बित अवधि का ब्याज पाने का अधिकारी है।
इस सम्बंध में उल्लेखनीय है कि माननीय उच्च न्यायालय मुम्बई द्वारा उपरोक्त विधि व्यवस्था में यह भी अभिनिर्धारित किया गया है कि :- For the reasons already indicated, aforesaid decisions are not applicable to the facts of the present case. / have already indicated that the provisions of RERA are prospective in nature. The penalty under Sections 78, 38, 59, 60, 67, 63 and 64 is to be levied on account of contravention of provisions of RERA, prospectively and not retrospectively. अतः: उपरोक्त निर्णय के आलोक में यह स्पष्ट है कि उ0प्र0 रेरा के प्राविधानों के अन्तर्गत प्राविधानित दंड पूर्वव्यापी नही, बल्कि भविष्यलक्षी होना चाहिये। ऐसी दशा में रेरा के प्रभाव में (देनाक 4.5.206) से पूर्व अनुबन्ध के अनुसार धनराशि भुगतान किया जाना चाहिये और रेरा के आने के बाद दिंनांक 4.5.2046 से रेरा के प्राविधानो के अनुसार विलंबित अवधि में जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी है, जिस वाद में पक्षकारों के मध्य कोई अनुबन्ध निष्पादित नही है, वहां शिकायतकर्ता रेरा के प्राविधानों के अनुरूप जमा धनराशि पर ब्याज पाने का अधिकारी होगा। जहां तक देय ब्याज दर का प्रश्न है, तो राज्य सरकार द्वारा भू-सम्पदा (विनियमन एवं विकास) अधिनियम 2046 के अधीन दिनांक 47.40.20I8 को भू-सम्पदा (विनियमन और विकास) (विकय,/पटटा के लिए करार) नियमावली 2048 अधिसूचित की गयी हैं। इसमें संलग्नक के रूप में दिये गये विकय ,/पटटा विलेख के प्रारूप के wea 9 में प्रमोटर्स के डिफाल्ट प्रकरण (Events of default) परिभाषित है, जिसमें wer 9 (i) A प्रमोटर के डिफाल्टर होने की स्थिति में आवंटी हेतु प्राविधानित है किः-
The Allottee shall have the option of terminating the Agreement in which case the Promoter shall be V liable to refund the entire money paid by the Allottee under any head whatsoever towards the purchase of the apartment, along with interest at the rate equal to MCLR (Marginal Cost of Lending Rate) on home loan of State Bank of India +l% unless provided otherwise under the Rules. within forty-five days of receiving the termination notice: यही दर आवंटियों के द्वारा डिफॉल्ट की स्थिति में भी weak ofiii) A निर्धारित है। उक्त प्राविधान को: दृष्टिगत रखते हुए आवंटी को MCLRH प्रतिशत की ब्याज दर पर ब्याज दिलाया जाना न्यायोचित प्रतीत होता है। जहाँ तक किस अवधि तक विलम्बित अवधि का ब्याज दिलाये जाने का प्रश्न है, तो इस सम्बन्ध में राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा सी.सी 739/20:7 विकास गर्ग बनाम एम.आर.एम.जी.एफ लैन्ड लिमिटेड एवं अन्य में निम्नवत निर्णित किया गया है, जिसमें स्पष्ट रूप से उललेखित है कि:-
The contention of the learned counsel is that having taken possession of the plot and got the conveyance deed executed in his favour, the complainant is estopped from raising any claim against the opposite party. I however, find no merit in the contention, as far as the compensation for the delay in delivery of possession of the plot is concerned. While, taking possession, the complainant inter-alia stated that he had no claim with respect to the size, dimension, area, location and legal status of the plot. He did not say that he had no claim with respect to the delay in delivery of possession of the plot to him. While executing the conveyance deed, he recorded his satisfaction about the plot, area, dimension, boundaries etc. and stated that he had no claim of any nature regarding the same, meaning thereby that he had no claim with respect to the plot, area, dimension, boundaries etc. He did not say that he did not have claims of any nature whatsoever. Use of the words “regarding the same” qualified the claim, which he confirmed having not been left against the vendor. Therefore, neither the possession letter nor the conveyance deed would come in way of the complainant claiming possession for the delay in delivery of the plot to him. उपरोक्त माननीय राष्ट्रीय writen विवाद निवारण आयोग के आब्जर्वेशन से स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता भौतिक वास्तविक कब्जे की तिथि तक विलम्बित अवधि के ब्याज की धनराशि पाने का अधिकारी है। तद्नुसार बिन्दु संख्या-2 निस््तारित किया जाता है। Oo
उपरोक्त बिन्दुओं का निस्तारण करते हुए निम्न आदेश पारित किये जाते है। आदेश 4. आदेश की तिथि से 45 दिनों के अन्दर शिकायतकर्ता को कब्जा प्रदान करें और विलंबित अवधि दिनांक 24.40.2043 से 30.04.20:6 तक, ब्रोशर की शर्तों के अनुसार 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज की दर से व रेरा लागू होने के बाद से अर्थात दिनांक 04.05.2046 से कब्जा ऑफर किये जाने तक MCLRtH प्रतिशत की दर से ब्याज अदा करना सुनिश्चित करे। 2 यह भी स्पष्ट किया जाता है कि रेरा अधिनियम 2046 के धारा 2 (ali) के अन्तर्गत परिभाषित किया गया है कि रेरा लागू होने के बाद यदि कोई ब्याज दर आवंटी के डिफॉल्ट से प्रोमोटर द्वारा लिया जाता है, तो उसी दर से ब्याज प्रोमोटर द्वारा डिफॉल्ट किये जाने पर भी आवंटी को दिया जायेगा। ब्याज की दर MCLRH प्रतिशत होनी चाहिए। 3. इस आदेश का उल्लघंन उ0प्र0भू-सम्पदा (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 20i6 की धारा-63 तथा अन्य सुसंगत प्राविधानों के अन्तर्गत दंडनीय होगा। आदेश पोर्टल पर अपलोड किया जाये। दिनांक) /og /209 O “3 N\ ' _ ०४ on’ a (राजीव कुमार) (अध्यक्ष) उ0प्र0 भू-सम्पदा विनियामक प्राधिकरण