Chhattisgarh High Court
Magma H. D. I. General Insurance Company Limited v. Rukshana Begum
2026:CGHC:29441 · MAC/461/2021
- Decision date
- 2026-07-12
- Text availability
- Full text
- Judges
- Sanjay Kumar Jaiswal
Source: Indian High Court Judgments, AWS Open Data (CC BY 4.0) ↗
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Judgment text
1 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021} CGHC010203522021 2026:CGHC:29441 अप्रतिवेद्य छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर विविध अपील (प्रतिकर ) क्रमांक-461 /2021 1. मैग्मा एच.डी.आई. जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड, द्वारा शाखा प्रबंधक, शाखा कार्यालय-कीर्ति कॉम्प्लेक्स, राजेन्द्र नगर चौक, लिंक रोड, बिलासपुर, तहसील एवं जिला बिलासपुर (छत्तीसगढ़) । (दोषी वाहन कार क्रमांक-सी.जी.-06-जी.एम.-0855 का बीमा कंपनी) -----अपीलार्थी विरूद्घ 1. रुकसाना बेगम, पति स्वर्गीय मोहम्मद अलीम खान, आयु लगभग 34 वर्ष, 2. मोहम्मद हाशिम, पिता स्वर्गीय मोहम्मद अलीम खान, आयु लगभग 18 वर्ष, 3. आयशा परवीन, पुत्री स्वर्गीय मोहम्मद अलीम खान, आयु लगभग 16 वर्ष, 4. आसमा परवीन, पुत्री स्वर्गीय मोहम्मद अलीम खान, आयु लगभग 15 वर्ष, दावाकर्ता/प्रत्यर्थी क्रमांक-3 एवं 4 द्वारा-अपनी माता एवं प्राकृतिक संरक्षिका रुकसाना बेगम (प्रत्यर्थी क्रमांक-1), उपरोक्त सभी जाति-मुस्लि म, निवासी-वार्ड क्रमांक 10, बसना, पुलिस थाना एवं तहसील-बसना, जिला-महासमुंद (छत्तीसगढ़) । (-----दावाकर्तागण) 5. रज्जब खान, पिता जुम्मन खान, आयु लगभग 30 वर्ष, निवासी- ग्राम साहस, पुलिस थाना पामगढ़, जिला जांजगीर-चांपा (छत्तीसगढ़) । (दोषी वाहन कार क्रमांक-सी.जी.-06-जी.एम.-0855 का वाहन चालक) 6. प्रेम सिंह पोर्त, पिता करण सिंह पोर्त, आयु लगभग 41 वर्ष, निवासी- ग्राम एवं डाकघर भुकाल, पुलिस थाना एवं तहसील-बसना, जिला महासमुंद (छत्तीसगढ़) । (दोषी वाहन कार क्रमांक-सी.जी.-06-जी.एम.-0855 का पंजीकृत स्वामी) -----प्रत्यर्थीगण Digitally signed by POMAN POMAN DEWANGAN DEWANGAN Date: 2026.07.15 14:48:31 +0530 2 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021}
अपीलार्थी बीमा कंपनी द्वारा : श्री सौरभ शर्मा, अधिवक्ता । दावाकर्ता/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 से 4 द्वारा : कोई उपस्थि त नहीं । प्रत्यर्थी क्रमांक-5 एवं 6 द्वारा : कोई उपस्थि त नहीं । न्यायमूर्ति श्री संजय कुमार जायसवाल !! निर्णय पीठ पर पारित !! 13/07/2026 1. मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत प्रस्तुत इस अपील में अतिरिक्त मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण, सरायपाली (महासमुंद), छत्तीसगढ़ द्वारा दावा प्रकरण क्रमांक-35/2019, “रूकसाना बेगम वगैरह विरुद्ध रज्जब खान वगैरह” में पारित अधिनिर्णय दिनांक 30/03/2021 को चुनौती दी गई है । जिसके तहत अपीलार्थी बीमा कंपनी के विरूद्घ तथा दावाकर्तागण/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 से 4 के पक्ष में ₹11,80,000/-(रुपये ग्यारह लाख अस्सी हजार मात्र) का अधिनिर्णय मय ब्याज के पारित किया गया, जिसे आगे संक्षेप में “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” से संबोधित किया जा रहा है । 2. प्रकरण के तथ्य, संक्षेप में, इस प्रकार हैं कि दिनांक 18/02/2019 को सायं लगभग 07:30 बजे मोहम्मद अलीम खान (मृतक) अपनी मोटरसाइकिल में बाजार से वापस अपने घर जा रहा था । उसी समय अल्टो कार क्रमांक-सी.जी.-06-जी.एम.-0855 (जिसे आगे संक्षेप में “दोषी वाहन” से संबोधित किया जा रहा है) का चालक रज्जब खान उक्त वाहन को बसना मुख्य मार्ग स्थि त कब्रिस्तान के सामने तीव्र एवं लापरवाहीपूर्वक चलाते हुए आया जिसकी ठोकर लगने से मृतक को सिर में गंभीर उपहति कारित हुई । उपचार के दौरान दिनांक 22/02/2019 को मेकाहारा, रायपुर में उसकी मृत्यु हो गई । 3 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021}
प्रारंभ में थाना-गोल बाजार, रायपुर में मर्ग कायम किया गया, जिसे अग्रिम कार्यवाही हेतु थाना-बसना, जिला-महासमुंद को प्रेषित किया गया । थाना-बसना द्वारा असल मर्ग कायम कर मर्ग जाँच की गई । मर्ग जाँच में “दोषी वाहन” के चालक रज्जब खान की लापरवाही परिलक्षित होने पर उसके विरूद्घ दिनांक 07/04/2019 को प्रथम सूचना पत्र लेखबद्ध कर अपराध क्रमांक-163/2019 पंजीबद्ध किया गया तथा विवेचना पूर्ण होने पर अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया गया । 3. दावाकर्तागण/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 से 4 द्वारा मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 166 के अंतर्गत प्रस्तुत दावा आवेदन पर उभयपक्ष को सुनने के उपरांत अधिकरण ने "प्रश्नाधीन अधिनिर्णय" पारित किया । उक्त अधिनिर्णय में अधिकरण ने यह अभिलिखि त किया कि "दोषी वाहन" का चालक रज्जब खान तथा उसका पंजीकृत स्वामी प्रेम सिंह पोर्त है । अधिकरण ने यह भी अभिलिखि त किया कि दुर्घटना की तिथि को "दोषी वाहन" अपीलार्थी बीमा कंपनी से बीमित थी । फलस्वरूप, अधिकरण ने दावाकर्तागण/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 से 4 के पक्ष में ₹11,80,000/- (रुपये ग्यारह लाख अस्सी हजार मात्र) की प्रतिकर राशि पर अधिनिर्णय पारित करते हुए उक्त राशि का भुगतान 7% वार्षिक ब्याज सहित करने का दायित्व अपीलार्थी बीमा कंपनी पर अधिरोपित किया । साथ ही, यह भी आदेशित किया कि यदि अधिनिर्णय दिनांक से 30 दिवस के भीतर प्रतिकर राशि जमा नहीं की जाती है, तो अधिनिर्णय दिनांक से 9% वार्षिक ब्याज देय होगा । जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।
4. अपीलार्थी बीमा कंपनी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि दुर्घटना में “दोषी वाहन” की संलिप्तता प्रमाणित नहीं हुई है । दुर्घटना दिनांक 18/02/2019 की है, जबकि प्रथम सूचना पत्र दिनांक 07/04/2019 को अर्थात् लगभग 50 दिवस पश्चात अज्ञात वाहन के 4 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021} विरुद्ध लेखबद्ध की गई । ऐसी स्थि ति में “दोषी वाहन” को दुर्घटना में संलिप्त करने हेतु कोई समुचित एवं विश्वसनीय साक्ष्य अभिलेख पर उपलब्ध नहीं है । फलस्वरूप, अपीलार्थी बीमा कंपनी पर प्रतिकर राशि के भुगतान का दायित्व अधिरोपित किया जाना विधिसम्मत नहीं है । अतः “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” को अपास्त करते हुए अपीलार्थी बीमा कंपनी को उक्त दायित्व से मुक्त किया जाए । यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत अपील प्रस्तुत करने के लिए 90 दिवस की वैधानिक अवधि निर्धारित है, जबकि अधिकरण ने अधिनिर्णय दिनांक से 30 दिवस के भीतर प्रतिकर राशि जमा न किए जाने की स्थि ति में ब्याज की दर 7% से बढ़ाकर 9% वार्षिक कर दी है । यह वस्तुतः दण्डात्मक ब्याज अधिरोपित करने के समान है, जिसका कोई वैधानिक आधार नहीं है । अतः “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” का उक्त भाग भी अपास्त किया जाए । अपने तर्क के समर्थन में विद्वान अधिवक्ता ने National Insurance Company Limited v.Keshav Bahadur and others, (2004) 2 SCC 370 का हवाला दिया है । 5. दावाकर्तागण की ओर से कोई उपस्थि त नहीं । 6. उपस्थि त पक्ष का तर्क श्रवण किया गया तथा अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।
7. दावाकर्ता पक्ष से मृतक की पत्नी रूकसाना बेगम तथा दुर्घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के रूप में मोहम्मद हबीब का परीक्षण कराया गया है । वहीं, अपीलार्थी बीमा कंपनी की ओर से सहायक विधि अधिकारी दुष्यंत कुमार वर्मा का परीक्षण कराया गया है । दुष्यंत कुमार वर्मा ने अपने कथनों में मुख्यतः वही तथ्य दोहराए हैं, जो अपीलार्थी बीमा कंपनी की ओर से 5 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021} प्रस्तुत तर्कों का आधार हैं । उन्होंने यह कहते हुए दुर्घटना में “दोषी वाहन” की संलिप्तता पर आपत्ति किया है कि प्रथम सूचना पत्र घटना के लगभग 50 दिवस पश्चात लेखबद्ध की गई है । 8. दुर्घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी मोहम्मद हबीब ने स्पष्ट रूप से अपने कथनों में यह अभिकथित किया है कि दुर्घटना “दोषी वाहन” से ही कारित हुई थी । उसके इस कथन का प्रतिपरीक्षण में कोई खण्डन नहीं किया जा सका है । उसके कथनों का समर्थन पुलिस द्वारा विवेचना उपरांत प्रस्तुत अंतिम प्रतिवेदन तथा उसके साथ संलग्न प्रमाणित दस्तावेजों से भी होता है । पुलिस ने विवेचना पूर्ण होने पर “दोषी वाहन” के चालक रज्जब खान के विरुद्ध अभियोग-पत्र प्रस्तुत किया है । 9. पुलिस द्वारा विवेचना पश्चात प्रस्तुत अभियोग-पत्र के साक्ष्यिक मूल्य के बिंदु पर माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा ICICI Lombard General Insurance Company Limited v. Rajani Sahu and Others, (2025) 2 SCC 599 के निर्णय की कण्डि का-8 से 10 में निम्नानुसार विधि प्रतिपादित की गई हैः-“8 As regards the reliability of charge-sheet and other documents collected by the police during the investigation in motor accident cases, this Court in Mangla Ram v.
Oriental Insurance Co. Ltd. [Mangla Ram v. Oriental Insurance Co. Ltd., (2018) 5 SCC 656 : (2018) 3 SCC (Civ) 335 : (2018) 2 SCC (Cri) 819 : 2018 INSC 311] , held in para 27, thus : (SCC p. 672) “27. Another reason which weighed with the High Court to interfere in the first appeal filed by Respondents 2 and 3, was absence of finding by the Tribunal about the factum of negligence of the driver of the subject jeep. Factually, this view is untenable. Our understanding of the analysis done by the Tribunal is to hold that Jeep No. RST 4701 was driven rashly and 6 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021} negligently by Respondent 2 when it collided with the motorcycle of the appellant leading to the accident. This can be discerned from the evidence of witnesses and the contents of the charge-sheet filed by the police, naming Respondent 2. This Court in a recent decision in Dulcina Fernandes [Dulcina Fernandes v. Joaquim Xavier Cruz, (2013) 10 SCC 646 : (2014) 1 SCC (Civ) 73 : (2014) 1 SCC (Cri) 13] , noted that the key of negligence on the part of the driver of the offending vehicle as set up by the claimants was required to be decided by the Tribunal on the touchstone of preponderance of probability and certainly not by standard of proof beyond reasonable doubt.
Sufficeittoobservethattheexpositioninthe judgmentsalreadyadvertedtobyus,filingof charge-sheetagainstRespondent2primafacie points towards his complicity in driving the vehicle negligently and rashly. Further, even when the accused were to be acquitted in the criminal case, this Court opined that the same may be of no effect on the assessment of the liability required in respect of motor accident cases by the tribunal.” 9. It is true that the Tribunal had looked into the oral and documentary evidence including the FIR, final report and such other documents prepared by the police in connection with the accident in question. The Tribunal had also taken note of the fact that based on the final report, the driver of the offending truck was tried and found guilty for rash and negligent driving. The High Court took note of such aspects and found no illegality in the procedure adopted by the Tribunal and consequently dismissed the appeal. 10. In the contextual situation it is relevant to refer to a decision of this Court in MathewAlexander v. Mohd.Shafi [MathewAlexander v. Mohd.Shafi, (2023) 13 SCC 510 : 2023 INSC 621] , this Court held thus : (SCC p. 514, para 12) “12. …A holistic view of the evidence has to be taken into consideration by the Tribunal and strict proof of an accident caused by a particular vehicle in a particular manner need not be established by the claimants. The claimants have to establish their case on the touchstone of preponderance of probabilities. 7 / 10
{MA(C) No. 461 of 2021} The standard of proof beyond reasonable doubt cannot be applied while considering the petition seeking compensation on account of death or injury in a road traffic accident. To the same effect is the observation made by this Court in Dulcina Fernandes v. Joaquim Xavier Cruz [Dulcina Fernandes v. Joaquim Xavier Cruz, (2013) 10 SCC 646 : (2014) 1 SCC (Civ) 73 : (2014) 1 SCC (Cri) 13] which has referred to the aforesaid judgment in Bimla Devi [Bimla Devi v. Himachal RTC, (2009) 13 SCC 530 : (2009) 5 SCC (Civ) 189 : (2010) 1 SCC (Cri) 1101] .”
10. उपरोक्त न्यायदृष्टांत के प्रकाश में यह स्थि ति स्पष्ट होती है कि दुर्घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी मोहम्मद हबीब ने अपने कथनों में स्पष्ट रूप से “दोषी वाहन” की संलिप्तता का अभिकथन किया है जिसका खण्डन नहीं हुआ है । पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम प्रतिवेदन में मोहम्मद हबीब का नाम साक्षी के रूप में सूचीबद्ध है । उस पर अविश्वास करने का कोई आधार नहीं है । अभिलेख से भी स्पष्ट है कि दुर्घटना दिनांक 18/02/2019 को थाना-बसना क्षेत्र में घटित हुई थी, जबकि मृतक मोहम्मद अलीम खान की उपचार के दौरान दिनांक 22/02/2019 को मेकाहारा अस्पताल, रायपुर में मृत्यु हुई । फलस्वरूप, मर्ग की प्रारंभिक कायमी थाना-गोल बाजार, रायपुर में की गई तथा तत्पश्चात शून्य पर मर्ग पंजीबद्ध कर अग्रिम कार्यवाही हेतु थाना-बसना को प्रेषित किया गया । स्वाभाविक रूप से मर्ग थाना-बसना को प्राप्त होने एवं आवश्यक मर्ग जाँच पूर्ण किए जाने के उपरांत ही अपराध पंजीबद्ध किया गया । अतः प्रथम सूचना पत्र में हुआ विलंब, अपने आप में, “दोषी वाहन” की संलिप्तता पर संदेह उत्पन्न करने का आधार नहीं बनता । ऐसी स्थि ति में, जब प्रत्यक्षदर्शी साक्षी मोहम्मद हबीब के कथनों का समर्थन पुलिस द्वारा विवेचना उपरांत प्रस्तुत चालानी दस्तावेजों से भी होता है तथा उसके कथनों का प्रतिपरीक्षण में कोई खण्डन नहीं किया जा सका है, तब केवल प्रथम सूचना पत्र के विलंब से लेखबद्ध होने के आधार पर “दोषी वाहन” की संलिप्तता से इंकार नहीं किया जा सकता । 8 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021}
11. ऐसी दशा में, Rajani Sahu (पूर्वोक्त) के न्यायदृष्टांत के प्रकाश में यह न्यायालय पाती है कि अधिकरण द्वारा अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर दुर्घटना में “दोषी वाहन” की संलिप्तता के संबंध में अभिलिखि त निष्कर्ष अभिलेख के प्रतिकूल नहीं है । अतः उक्त बिंदु पर अपीलार्थी बीमा कंपनी का तर्क स्वीकार योग्य नहीं है । 12. जहाँ तक, अधिकरण द्वारा प्रतिकर राशि के भुगतान में व्यतिक्रम की स्थि ति में दण्डात्मक ब्याज अधिरोपित किए जाने का प्रश्न है? उस संबंध में “प्रश्नाधीन अधिनिर्णय” की कण्डि का-31 निम्नानुसार हैः- “31. उक्त कुल अधिनिर्णित मुआवजा रूपये 11,80,000 राशि में अधिकरण द्वारा पारित अंतरिम अवार्ड राशि यदि कोई हो, को समायोजित किया जावे । उपरोक्तानुसार आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आवेदकगण के पक्ष में अनावेदकगण के विरूद्ध निम्नानुसार अवार्ड पारित किया जाता है :- (1) अनावेदक कमांक 03, आवेदकगण को रूपये 11,80,000/- क्षतिपूर्ति राशि अदा करेगा । (2) उक्त क्षतिपूर्ति राशि पर दावा दिनांक से अंतिम अदायगी तक 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी अनावेदक कमांक 03 द्वारा आवेदकगण को अदा करेंगे । (3) x x x x x (4) अनावेदकगण क्षतिपूर्ति की राशि अधिनिर्णय दिनांक से 30 दिन के भीतर अधिकरण में जमा करें, ऐसा न करने पर अधिनिर्णय दिनांक से ब्याज की दर 9 प्रतिशत रहेगी । (5) x x x x x (6) x x x x x“
13. मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा-171 के अधीन प्रतिकर राशि पर ब्याज प्रदान किए जाने तथा प्रतिकर राशि के भुगतान में व्यतिक्रम होने की स्थि ति में उच्चतर ब्याज अधिरोपित किए जाने की अधिकरण की शक्ति एवं उसकी सीमाओं के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा Keshav Bahadur (पूर्वोक्त) के निर्णय की कण्डि का-13 में निम्नानुसार विधि प्रतिपादित की गई हैः- 9 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021}
“13. Though Section 110-CC of the Act (corresponding to Section 171 of the new Act) confers a discretion on the Tribunal to award interest, the same is meant to be exercised in cases where the claimant can claim the same as a matter of right. In the above background, it is to be judged whether a stipulation for higher rate of interest in case of default can be imposed by the Tribunal. Once the discretion has been exercised by the Tribunal to award simple interest on the amount of compensation to be awarded at a particular rate and from a particular date, there is no scope for retrospective enhancement for default in payment of compensation. No express or implied power in this regard can be culled out from Section 110-CC of the Act or Section 171 of the new Act. Such a direction in the award for retrospective enhancement of interest for default in payment of the compensation together with interest payable thereon virtually amounts to imposition of penalty which is not statutorily envisaged and prescribed. It is, therefore directed that the rate of interest as awarded by the High Court shall alone be applicable till payment, without the stipulation for higher rate of interest being enforced, in the manner directed by the Tribunal.”
14. माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उपर्युक्त विधि के प्रकाश में "प्रश्नाधीन अधिनिर्णय" का परिशीलन करने से यह स्थि ति स्पष्ट होती है कि अधिकरण द्वारा प्रतिकर राशि पर 7% वार्षिक ब्याज अधिरोपित किया जाना विधिसम्मत है । तथापि, अधिनिर्णय की कण्डि का-31(4) के माध्यम से अधिनिर्णय दिनांक से 30 दिवस के भीतर प्रतिकर राशि जमा न किए जाने की स्थि ति में 9% वार्षिक ब्याज अधिरोपित किया गया है । जबकि मोटर यान अधिनियम, 1988 की धारा 173 के अंतर्गत अपील प्रस्तुत करने हेतु 90 दिवस की वैधानिक अवधि निर्धारित है । ऐसी दशा में यह 9% ब्याज अधिरोपण न्यायोचित नहीं पाया जाता । 15. ऐसी दशा में, Keshav Bahadur (पूर्वोक्त) के न्यायदृष्टांत के प्रकाश में यह न्यायालय पाती है कि कण्डि का-31(4) के माध्यम से अधिरोपित उच्चतर ब्याज विधिसम्मत नहीं 10 / 10 {MA(C) No. 461 of 2021} है । अतः उक्त सीमा तक अपील स्वीकार की जाती है तथा "प्रश्नाधीन अधिनिर्णय" की कण्डि का-31(4) अपास्त की जाती है । शेष की पुष्टि की जाती है । 16. उपरोक्तानुसार, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की जाती है । 17. निर्णय की प्रति के साथ अधिकरण का अभिलेख शीघ्रतापूर्वक आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ व पालनार्थ वापस प्रेषित हो । सही/- (संजय कुमार जायसवाल) न्यायाधीश पोमन